स्वाहा का अर्थ क्या होता है ?

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प्रश्न :- स्वाहा का अर्थ क्या होता है ?
उत्तर :- निरुक्तकार यास्क जी कहते हैं की “स्वाहाकृतयः स्वाहेत्येतस्तु आहेति वा स्वा वागाहेति वा स्वं प्राहेति वा स्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा तासामेषा भवति || ||निरुक्त अध्याय 8/खण्ड २०||”

स्वाहा शब्द का अर्थ यह है –
१) (सु आहेति वा) सु अर्थात् कोमल, मधुर, कल्याणकारी, प्रिय वचन सब मनुष्यों को सदा बोलना चाहिए |
२)(सवा वागाहेति वा) जो अपनी वाणी ज्ञान में विद्यमान है, वह जो कहती है, वही वागिन्द्रिय से सदा बोलना चाहिए |
३) (स्व प्राहेती वा) स्व अर्थात् अपने पदार्थो को ही अपना कहना चाहिए, दूसरे के पदार्थों को नहीं |
४) (स्वाहुतं हवि.) अच्छी रीति से शुद्ध करके सदा हवि देनी चाहिए |

यह स्वाहा शब्द के पर्यायों का अर्थ है |

हम अपने पदार्थों के लिए सदा सत्य भाषण करें, दूसरे के पदार्थों के लिए मिथ्याभाषण न करें |
अर्थ साभार :- महर्षि दयानन्द जी कृत पञ्चमहायज्ञविधि:, अर्थ व्याख्या मन्त्र “चित्रं देवानामुदगादनीकं” यजुर्वेद अध्याय 7 मन्त्र 42

‘स्वाहा’ शब्द का अर्थ यह है कि जैसा ज्ञान आत्मा में हो वैसा ही जीभ से बोले, विपरीत नहीं। जैसे परमेश्वर ने सब प्राणियों के सुख के अर्थ इस सब जगत् के पदार्थ रचे हैं वैसे मनुष्यों को भी परोपकार करना चाहिये।
(सत्यार्थ प्रकाश, तृतीय समुल्लास)

मन से या बेमन से एक बार सत्यार्थ प्रकाश पढ़ें
श्रद्धा से या अश्रद्धा से एक बार सत्यार्थ प्रकाश पढ़ें
यदि कभी पढ़ा हो तो पुनः पढ़ें, लाभ मिलेगा
‘‘सत्यभाषणयुक्ता वाक्, यच्छोभनं वचनं सत्यकथनं, स्वपदार्थान् प्रति
ममत्ववचो, मन्त्रोच्चारणेन हवनं चेति स्वाहा-शदार्था विज्ञेयाः।’’ – यजुर्वेद 2.2
जो सत्यभाषणयुक्त वाणी, भ्रमोच्छेदन करने वाला सत्य कथन, अपने ही पदार्थों के
प्रति ममत्व अर्थात् अपनी वस्तु को ही अपना कहना और मन्त्रोच्चार के साथ हवन
आहुति देना ये सब स्वाहा के अर्थ हैं।

‘‘सुष्ठु जुहोति, गृहणाति, ददाति यथा क्रियया तथा, सुशिक्षितया वाचा, विद्याप्रकाशिकया वाण्या सत्यप्रियत्वादिगुणविशिष्टयावाचा।’’ – यजु. 4.6
जिस क्रिया के द्वारा अच्छे प्रकार ग्रहण किया और दिया जाता है, सुशिक्षा से युक्त, विद्या को प्रकाशित करने वाली, सत्य और प्रियता रूपी गुणों से विशिष्ट वाणी के द्वारा जो क्रिया की जाती है वह स्वाहा कहलाती है।
‘‘पुष्टायादि कारक घृतादि उत्तम पदार्थों के होम करने।’’ स.प्र.

‘‘सत्यमानं, सत्यभाषणं सत्याचरणं सत्यवचनश्रवणश्च’’ – ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ।
सत्य को मानना, सत्य भाषण करना, सत्य का आचरण करना और सत्यवचन का सुनना।
‘‘जैसा हृदय में ज्ञान वैसा वाणी से भाषण।’’ – आर्याभिविनय .
ये सब महर्षि दयानन्द जी द्वारा किये गये स्वाहा के अर्थ हैं। अधिक जानने के लिए महर्षि
दयानन्द कृत यजुर्वेद भाष्य व शतपथादि ग्रन्थों का अध्ययन करें।

प्रस्तुतिकर्ता –विश्वप्रिय वेदानुरागी आचार्य

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