मुस्लिम महिला और बुर्का

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बेबी को बाबुल नहीं बुर्का पसंद है

डॉक्टर मोहन लाल गुप्ता

भारत की जनसंख्या वर्ष 2001 से 2011 के बीच में 1.7 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ी थी जबकि ई. 2011 से 2022 के बीच में 1.2 प्रतिशत बढ़ी है। इस दर से बढ़ती हुई आबादी भी भारत पर इतना बोझ डाल रही है कि हम अगले कुछ ही महीनों में 140 करोड़ आबादी वाले चीन को पीछे छोड़कर विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश हो जाएंगे। यदि इसी गति से बढ़ते रहे तो ई. 2050 तक भारत की जनंसख्या 166 करोड़ हो जाएगी।
एक सौ छासठ करोड़ लोगों के रहने, खाने और कमाने के लिए जितने संसाधन चाहिए, उतने संसाधन जुटाना अत्यंत कठिन हो जाएगा। इसलिए पढ़े-लिखे और राष्ट्रवादी लोग परिवारों को इतना सीमित करने लगेंगे कि बहुत से परिवार निःसंतान रहने लगेंगे। यूनाइटेड नेशन्स के अनुसार वर्ष 2100 तक भारत की आबादी घटकर केवल 103 करोड़ रह जाएगी। यह 103 करोड़ आबादी किन लोगों की होगी?

इस प्रश्न का उत्तर जानने से पहले सिनेमा इण्डस्ट्री का एक छोटा सा चक्कर लगा लेते हैं। सुना है कि शत्रुघ्न सिन्हा की सिने स्टार पुत्री किसी मुस्लिम से विवाह कर रही है। इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है! जब शर्मिला टैगोर ने नवाब पटौदी से शादी की, जब सुशीला चरक ने सलीम खान से शादी की थी, जब किरण राव ने आमिर खान से शादी की, जब गौरी ने शाहरूख खान से शादी की, जब अमृता राव ने सैफ अली से शादी की और कुछ दशकों बाद करीना कपूर ने भी सैफ अली से शादी की, तब भी किसी को कोई आपत्ति नहीं हुई, न किसी को आपत्ति करने का अधिकार था।

भारत का संविधान इस बात की अनुमति नही देता कि कोई किसी की शादी पर आपत्ति जताए किंतु क्या किसी पिता को भी उस समय आपत्ति करने का अधिकार नहीं है, जब कोई श्रद्धा अपने बाबुल की मर्जी के बिना, बाबुल का घर छोड़कर किसी आफताब के साथ रहने के लिए चली जाए? एक पिता को यह चिंता क्यों नहीं होनी चाहिए कि उसकी बेटी जिसके साथ जा रही है वह आगे चलकर उसकी बेटी को बुरका तो नहीं पहनाएगा, या उसके 35 टुकड़े तो नहीं करेगा, या उसे जीवित छोड़कर दूसरी, तीसरी और चौथी शादी तो नहीं करेगा?

एक समय था जब लड़की किसी परिवार की नहीं, पूरे गांव, पूरे मुहल्ले और पूरे संभ्रांत समाज की बेटी हुआ करती थी। महानगरों की भीड़भाड़ को छोड़ दें तो छोटे शहरों, कस्बों एवं गांवों में रहने वाले समाज का हर व्यक्ति यह ध्यान रखता था कि अपने गांव-मुहल्ले की बेटी या किसी
अनजान लड़की को भी कोई गुण्डा या समाजकंटक तंग न करे किंतु अब बिटिया जिस परिवार में पलकर बड़ी होती है. सबसे पहले उसी को कानूनी भाषा में समझाती है कि अब मैं बालिग हो गई हूँ और कानूनन सब प्रकार से स्वतंत्र हूँ।

बेटियों को संविधान से मिले इसी अधिकार के चलते भारतीय समाज की ऐसी स्थिति बनी है कि अब बेटियां घर छोड़कर चाहे जिसके साथ चली जाती हैं, मनमर्जी के लड़के या आदमी से शादी करने, लिव इन रिलेशन में रहने या अपनी ही जैसी किसी दूसरी लड़की से विवाह करने। यहाँ तक कि खुद अपने ही साथ विवाह करने।

घर छोड़कर जाने वाली लड़की को बाबुल की बजाय उस व्यक्ति से अधिक प्यार होता है जो कुछ ही समय में उसे बुरका पहना सकता है, या उसके पैंतीस टुकड़े कर सकता है। क्योंकि लड़की यह बात जानती ही नहीं कि उसके साथ क्या होने वाला है!

जाहिर है कि भारत के संविधान को इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है कि बालिग लड़की अपनी मर्जी से शादी करे किंतु क्या समाज को यह सोचने का अधिकार नहीं है कि क्या बालिग होते ही लड़की में अपनी जिंदगी के सम्बन्ध में सभी फैसले लेने की पर्याप्त समझ आ जाती है?

दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, माता-पिता और घर-परिवार के वे सब लोग जो उस लड़की को अपनी बांहों में झुलाकर, प्यार भरी थपकियां देकर, लोरियां सुनाकर पालते हैं, उसकी किलकारियां सुनकर खुश होते हैं, उसे अंगुली पकड़कर चलना सिखाते हैं, उसके लालन- पालन एवं पढ़ाई पर लाखों रुपए खर्च करते हैं, क्या उस लड़की के बालिग होते ही वे लड़की के शत्रु हो जाते हैं?

क्या कानून इसे किसी भी तरह परिभाषित कर सकता है कि ऐसा आखिर क्यों है कि घर-परिवार के लोग अपनी बिटिया को किसी गलत जगह शादी करने से नही रोक सकते ? क्यों एक बाप उस बहेलीये से अपनी बेटी को बचाने में असमर्थ है जो उसकी सोनचिरैया जैसी बेटी को फसां कर मारना चाहता है।

भारतीय परम्परा यह कहती है कि विवाह वैयक्तिक अथवा संवैधानिक विषय है ही नहीं। यह पारिवारिक और सामाजिक विषय है। जहाँ से मैंने आरम्भ की थी, यदि वहीं पर पहुंचकर सोंचें तो हम पाएंगे कि यह केवल पारिवारिक या सामाजिक मामला भी नहीं है, यह राष्ट्रीय अस्मिता का मामला है। यदि हिन्दुओं के देश हिन्दुस्तान में, हिन्दू कोख से बड़ी संख्या में गैर हिन्दू संतान पैदा होगी तो राष्ट्र का क्या होगा?

इस स्थिति को यदि ईमानदारी से व्याख्यायित किया जाए तो यह वैयक्तिक स्वतंत्रता की आड़ में कानून के जोर पर किया गया धर्मांतरण है जिसका अंतिम परिणाम राष्ट्रांतरण होता है। यह अलग बात है कि तब भी पूरे भारत का डीएनए वही चालीस हजार साल पुराना रहेगा किंतु क्या वह तब भी हिंदुस्तान ही होगा?

अब आप स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं कि वर्ष 2100 में भारत में रहने वाले 103 करोड़ लोग कौन होंगे! शायद मोहन भागवत को इससे फर्क न पड़े क्योंकि वे तब भी हिन्दू तथा हिन्दुत्व की ऊटपटांग व्याख्या करते रहेंगे और डीएनए डीएनए चिल्लाते रहेंगे। क्या जिनसे हमारा डीएनए नहीं मिलता, वे अकारण ही हमारे शत्रु हैं?

।। वयम् राष्ट्रे जाग्रयाम पुरोहिताः । ।

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