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चक्रवर्ती सम्राट रघु


महाकवि कालिदास ने न बताया होता , तो शायद ही हम रघु के बारे में विस्तार से कुछ जान पाते।यूँ भी हम इतना ही जानते हैं , कि राम रघु के कुल में हुए ,और ” रघुकुल रीत सदा चलि आई , प्राण जाइ पर बचन न जाई। ”

किंतु कुछ तो है , कि मनु के होते हुए ,राजा दिलीप और दशरथ के होते हुए भी वंश रघु के नाम से चला। दुर्भाग्य है कि हम राम को तो आद्यन्त जानते -समझते हैं,लेकिन राम के प्रपितामह महात्मा रघु की खोज-बीन करने का प्रयत्न बहुत कम किया गया। राम का गौरव रघुपति होने में है ,राघव होने में है,रघुवीर और रघुनंदन होने में है।

आइए। थोड़ी सी मुलाकात महात्मा रघु से। रघु के बिना हम अपनी संस्कृति को समझने का दावा शायद ही कर सकें।

रघु प्रतापी राजा दिलीप और रानी सुदक्षिणा की सन्तति हैं । रघु के जन्म लेते ही आकाश खुल गया था , शीतल- मंद-सुगंधित हवा चलने लगी थी। वशिष्ठ जी ने जब रघु के जातकर्म संस्कार सम्पन्न करवाए , तब वह नवजात बालक वैसे ही लगने लगा था ,जैसे खान से निकालकर खरादा हुआ हीरा।

उन दिनों जब राजपरिवार में पुत्रजन्म होता, तब कारागृह के सब बंदी छोड़ दिये जाने की परम्परा थी , किन्तु राजा दिलीप के शासनकाल में कोई अपराधी नहीं था , इसलिये कारागृह खाली पड़े रहते थे। इसलिये राजा ने यही समझा कि पुत्र का जन्म होने से मैं ही पितृऋण के बंधन से छूट गया। दिलीप सब विषयों के जानकार थे। उन्होंने ही पुत्र का नाम रघु रखा। रघु में “रघि”धातु जाने के अर्थ में है।राजा दिलीप जानते थे कि उनका पुत्र सब शास्त्रों के पार चला जाएगा ,और युद्ध में सब व्यूह तोड़ कर आगे निकल जाएगा।

युवावस्था में रघु की भुजाएँ हल के जुए के समान दृढ हो गईं थीं,छाती चौड़ी और कन्धे भारी हो गये थे।वे ऊँचे-पूरे और तगड़े थे, फिर भी बहुत विनम्र।कभी अपना बड़ापन प्रकट नहीं होने देते।पिता ने जब उन्हें राज्य का भार सौंप दिया,तब उन्हें सिंहासन पर बैठा हुआ देखकर बच्चे-बूढे उसी तरह प्रसन्न होते, जैसे आकाश में उठे हुए इन्द्रधनुष को देखकर लोग प्रसन्न होते हैं । उस समय उनके चारों ओर प्रकाश का एक घेरा सा बन जाता था।यों तो रघु से पहले मनु आदि बहुत से प्रतापी सम्राट पृथ्वी को भोग चुके थे,परंतु रघु के हाथों में आकर पृथ्वी इतनी सुंदर हो गई थी, मानों पहली बार ही किसी वीर पुरुष को सामने खड़ा देख रही हो।

नीति जानने वाले मंत्रियों ने रघु को सरल नीति भी बताई थी ,और कुटिल नीति भी। किन्तु रघु ने सीधी सरल नीति ही अपना कर अपना लोहा मनवाया। “राजाप्रकृतिरञ्जनात्” (राजा वही,जो प्रजा की भलाई करे) राजा की इस परिभाषा को रघु ने चरितार्थ कर दिया था।

रघु के नेत्र कानों तक फैले हुए थे,और बहुत बड़े-बड़े थे, पर वे अपने कानों से ज्यादा भरोसा शास्त्र-चक्षुओं पर करते। लोग रघु से इतना ज्यादा प्यार करते थे कि धान के खेतों में रखवाली करने वाली किसान की स्त्रियाँ ईख की छाया में बैठ कर राजा रघु के बचपन से लेकर तब तक की गुणकथाओं के गीत बना-बनाकर गाती रहतीं।

बहुत शीघ्र ही रघु ने अमात्यों से परामर्श कर दिग्विजय के लिये प्रस्थान किया। वे अपनी विशाल सेना के साथ पूर्वी समुद्र की ओर जा रहे थे , तब वे ऐसे लग रहे थे मानो शिव की जटा से निकली गंगा को लेकर भगीरथ जी चले जा रहे हों। पूर्वी राज्यों को जीतकर रघु ने सुन्ह देश के राजाओं पर आक्रमण कर दिया।उन राजाओं ने कान पकड़कर चुपचाप रघु की अधीनता स्वीकार कर अपने प्राण बचाए । फिर जलसेना लेकर लड़ने आये बंगाल के राजाओं को परास्त कर गंगासागर के द्वीपों में अपनी विजय-पताका फहराई। यहाँ हाथियों का पुल बनाकर रघु ने पूरी सेना को कपिशा नदी पार करवाई। उड़ीसा के राजाओं ने रघु के आगे घुटने टेक दिये ,और कलिंग को जीतने के लिये मार्ग भी बताया। रघु ने महेन्द्र पर्वत की चोटी पर पड़ाव डाला।कलिंग-नरेश ने हाथियों पर चढी सेना के साथ अस्त्र तो खूब बरसाये,मगर उनकी राज्यलक्ष्मी ने ही वहाँ रघु का राज्याभिषेक कर दिया। रघु के वीर सैनिकों ने महेन्द्र पर्वत पर पान के पत्ते बिछाकर मदिरालय बनाया ,और नारियल की मदिरा के साथ मानों वहाँ के राजाओं का यश भी पी गये।

रघु ने महेन्द्र पर्वत के राजाओं को बंदी तो बनाया,लेकिन जब उन राजाओं ने रघु की अधीनता स्वीकार कर ली,तब उन्हें छोड़ भी दिया था । रघु ने यही शैली सर्वत्र अपनाई। जीता हुआ राज्य लौटा देना रघु के ही बस की बात थी।

पूर्व दिशा को जीतकर रघु समुद्र के रास्ते दक्षिण में गये। वहाँ पकी हुई सुपारी के पेड़ लगे थे। कावेरी के तट पर पड़ाव डाला।रघु ने,उनकी विशाल सेना ने और असंख्य हाथियों ने कावेरी में स्नान किया , और फिर मलयाचल की तराई में उतरे , जहाँ काली मिर्च की झाड़ियाँ थीं। जंगलों में बिखरे पड़े लवंग के बीज घोड़ों की टापों से पिस कर उड़ते हुए हाथियों के कपोलों से चिपक गये थे । मद भरी गंध चारों ओर फैल गई थी । पाण्ड्य देश के राजा रघु के आने की खबर पाकर ही मूर्छित होने लगे थे । उन्होंने समुद्र से बटोरे मोतियों के भंडार के साथ अपना संचित यश रघु को अर्पित कर दिया। उन्हें जीतकर रघु और उनकी सेना बड़े दिनों तक मलय और दर्दुर पहाड़ियों पर रहे।

यहाँ से रघु ने सह्याद्रि पर्वतश्रृंखला को जीतते हुए मुरला नदी के किनारे-किनारे त्रिकूट पर्वत होकर पारसी राजाओं को जीतने के लिये स्थल मार्ग से प्रस्थान किया।पश्चिम देश के अश्वारोहियों के साथ रघु की सेना जमकर लड़ी । मधु- मक्खियों से भरे छत्ते के समान दाढियों वाले यवनों के सिरों को भल्ल नाम के बाणों से काट-काटकर रघु ने पृथ्वी पाट दी । जो जीवित रहे , उन्होंने अपने शिरस्त्राण उतार कर रघु के चरणों रख दिये। रघु के सैनिक द्राक्षालताओं से घिरी पृथ्वी पर मृगछालाएँ बिछाकर बैठ कर मदिरापान से अपनी थकान मिटाने लगे।

सिन्धु नदी के तट पर होते हुए रघु कम्बोज जा पहुँचे। काबुल के राजाओं ने रघु से हार मान ली । वहाँ से रघु और उनकी बड़ी भारी सेना हिमालय के ऊपर चढ गई। पहाड़ी राजाओं के साथ रघु का युद्ध लोहे और पत्थरों के बीच का युद्ध था । रघु ने युद्ध में उत्सवसंकेत नामक पहाड़ियों में रहने वाले किन्नरों का दिल जीत लिया।

रघु पहले व्यक्ति हैं,जिन्होंने हिमालय की चोटी पर अपना झंडा गाड़ दिया । आगे कैलास की ओर न जाते हुए रघु लौट पड़े।लौहित्य नदी को पार कर रघु प्राग्ज्योतिष (असम) जा पहुँचे। कामरूप के नरेश ने रघु के चरणों की छाया को रत्नों से पूजा।

दिग्विजय कर रघु अयोध्या लौट आये ।यहाँ आकर रघु ने विश्वजित् यज्ञ किया, और इस यज्ञ में उन्होंने अपना सब कुछ दान में दे डाला। यज्ञ के बाद रघु ने हारे हुए सैकड़ों राजाओं का बहुमान किया , और उन्हें उनकी पराजय भुला दी।

अपना सब कुछ त्याग कर रघु अयोध्या से बाहर एक छोटी सी कुटिया बनाकर रहने लगे । उनके पास नाम मात्र की वल्कल और थोड़े से जरूरी मिट्टी के पात्र थे। रघु ने अपना शेष समय इसी कुटिया में रह कर राज्यभार सम्हालते हुए व्यतीत किया।

रघु चक्रवर्ती सम्राट थे ,दिग्विजयी थे , और इन सबसे ऊपर महात्मा थे । इसीलिये रघु के नाम से वंश चला । रघु की कीर्ति रघुवंश की महान् ऊँचाइयों के साथ आज भी शिखर पर है।
✍️मुरलीधर चाँदनीवाला जी

अयोध्या के इक्ष्वाकु वंश के एक प्रसिद्ध राजा जो राजा दिलीप के पुत्र थे। मान्यता है कि दिलीप को नंदिनी गाय की सेवा के प्रसाद से ये पुत्र रूप में प्राप्त हुए थे। ये बचपन से ही अत्यन्त प्रतिभाशाली थे। रघु के बाल्यकाल में ही उनके पिता ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा छोड़ा था। इन्द्र ने उस घोड़े को पकड़ लिया, परंतु उसे रघु के हाथों पराजित होना पड़ा।
रघु बड़े प्रतापी राजा थे। गद्दी पर बैठने के बाद उन्होंने अपने राज्य में शांति स्थापित की और दिग्विजय करके चारों दिशाओं में राज्य का विस्तार किया। एक बार इन्होंने दिग्विजय करके अपने गुरु वसिष्ठ की आज्ञा से विश्वजित यज्ञ किया और उसमें अपनी संपूर्ण संपत्ति दान कर दी। इसके बाद ही विश्वामित्र के शिष्य कौत्स ने आकर गुरु दक्षिणा चुकाने के लिए राजा रघु से धन की मांग की। इस पर रघु ने कुबेर पर आक्रमण करके उसे राज्य में सोने की वर्षा करने के लिए बाध्य किया और कौत्स को इच्छानुसार धन दिया।
‘आज मैं कृतार्थ हुआ! आप-जैसे तपोनिष्ठ, वेदज्ञ ब्रह्मचारी के स्वागत से मेरा गृह पवित्र हो गया। आपके गुरुदेव श्री वरतन्तु मुनि अपने तेज़ से साक्षात अग्निदेव के समान हैं। उनके आश्रम का जल निर्मल एवं पूर्ण तो है? वर्षा वहाँ ठीक समय पर होती है न? आश्रम के नीवार समय पर पकते हैं तो? आश्रम के, मृग एवं तरू पूर्ण प्रसन्न हैं न? आपका अध्ययन पूर्ण हो गया होगा। अब आपके गृहस्थाश्रम में प्रवेश का समय है। मुझे कृपापूर्वक कोई सेवा सूचित करें। मैं इसमें सौभाग्य मानूँगा।’ ब्राह्मणकुमार कौत्स का महाराज रघु ने स्वागत किया था। महाराज के कुशल-प्रश्न शिष्टाचार मात्र नहीं थे। उनका तात्पर्य इन्द्र, वरुण, अग्नि, वायु, वनदेवता, पृथ्वी-सबको वे दण्डधर शासित कर सकते थे। तपोमूर्ति ऋषियों के आश्रम में विघ्न करने का साहस किसी देवता को भी नहीं करना चाहिये।
‘आप-जैसे धर्मज्ञ एवं प्रजावत्सल नरेश के राज्य में सर्वज्ञ मंगल सहज स्वाभाविक है। आश्रम में सर्वत्र कुशल है। मैंने गुरुदेव से अध्ययन के अनन्तर गुरु-दक्षिणा माँगने का आग्रह किया। वे मेरी सेवा से ही सन्तुष्ट थे, पर मेरे बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने चौदह कोटि स्वर्ण-मुद्राएँ माँगीं; क्योंकि मैंने उनसे चतुर्दश विद्याओं का अध्ययन किया है। नरेन्द्र! आपका मंगल हो। मैं आपको कष्ट नहीं दूँगा। पक्षी होने पर भी चातक सर्वस्व अर्पितकर सहज शुभ्र बने घनों से याचना नहीं करता। आप अपने त्याग से परमोज्ज्वल हैं। मुझे अनुमति दें।’ कौत्स ने देखा था कि महाराज के शरीर पर एक भी आभूषण नहीं है। मिट्टी के पात्रों में उस चक्रवर्ती ने अतिथि को अर्ध्य एवं पाद्य निवेदित किया था। यज्ञान्त में महाराज ने सर्वस्व दान कर दिया था। राजमुकुट और राजदण्ड के अतिरिक्त उनके समीप कुछ नहीं था।
‘आप पधारे हैं तो मुझ पर दया करके तीन दिन मेरी अग्निशाला में चतुर्थ अग्नि की भाँति सुपूजित होकर निवास करें!’ रघु के यहाँ से सुयोग्य वेदज्ञ ब्राह्मण निराश लौटे, यह कैसे सहा जाय। कौत्स को महाराज की प्रार्थना स्वीकार करनी पड़ी।
‘मैं आज रथ में शयन करूँगा। उसे शस्त्रों से सुसज्जित कर दो! कुबेर ने कर नहीं दिया है।’ यज्ञ के अवसर पर सम्पूर्ण नरेश कर दे चुके थे। सम्पूर्ण कोष दान हो चुका। अतिथि की याचना पूरी किये बिना भवन में प्रवेश भी अनुचित जान पड़ा। कुबेर तो दूसरे देवताओं के समान स्वर्ग में नहीं रहते। उनकी अलका (निवास) हिमालय पर ही तो है। तब वे भी चक्रवर्ती के एक सामन्त ही हैं। कर देना चाहिये उन्हें। महाराज ने प्रात: अलका पर आक्रमण का निश्चय किया।
‘देव! को्षागार में स्वर्ण-वर्षा हो रही है।’ ब्राह्म मुहूर्त में महाराज नित्यकर्म से निवृत्त होकर रथ पर बैठे। उन्होंने शंखध्वनि की। इतने में दौड़ते हुए कोषाध्याक्ष ने निवेदन किया। वह कोषागार के प्रात: पूजन को गये थें कुबेर ने इस प्रकार कर दिया।
‘यह द्रव्य आपके निमित्त आया है। ब्राह्मण के निमित्त प्राप्त द्रव्य में से मैं या मेरी प्रजा कोई अंश कैसे ले सकती है।’ महाराज का आग्रह ठीक ही था।
‘मैं ब्राह्मण हूँ। ‘शिल’ या ‘कण’ मेरी विहित वृत्ति है। गुरु दक्षिणा की चौदह कोटि मुद्राओं से अधिक एक का भी स्पर्श मेरे लिये लोभ तथा पाप है। ब्रह्मचारी कौत्स का कहना भी उचित ही था। आज के युग में, जब मनुष्य दूसरों के स्वत्व का हरण करने को नित्य सोत्साह उद्यत है, यह त्यागमय विवाद कैसे समझ सकेगा वह। ब्रह्मचारी चौदह कोटि मुद्रा ले गये। शेष ब्राह्मणों को दान हो गयीं।
रघु अपने कुल में सर्वश्रेष्ठ गिने जाते हैं। इन्हीं की महत्ता के कारण इक्ष्वाकु वंश का नाम ‘रघु वंश’ हो गया। रघु के पुत्र अज, अज के पुत्र दशरथ और दशरथ के पुत्र राम अयोध्या के नरेश हुए। रघु के वंशज होने के कारण ही राम को राघव, रघुवर, रघुनाथ आदि भी कहा जाता है।

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