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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 14 क शासन के तीन स्तंभ और सेना

शासन के तीन स्तंभ और सेना

पिछले अध्याय में हमने स्पष्ट किया था कि व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसी शासन की तीन सभाओं का सबसे पहले भारत ने ही चिंतन किया था। व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच उचित समन्वय होना तो आवश्यक है ही साथ ही देश की सेना और इन तीनों सभाओं के मध्य भी उचित समन्वय होना बहुत आवश्यक है। देश को सुव्यवस्थित शासन व्यवस्था देने के लिए वेद भी इस बात का समर्थन करता है। यदि इस बात को ऐसे कहा जाए कि वैदिक व्यवस्था में पुराकाल से ही इस बात पर बल दिया गया है कि व्यवस्थापिका, कार्यपालिका , न्यायपालिका और सेना के मध्य उचित समन्वय होना आवश्यक है तो अतिशयोक्ति न होगी। इन चारों के बीच का समन्वय शत्रु को सिर उठाने से रोकता है। इसका कारण केवल एक है कि इन चारों का एक ही सांझा उद्देश्य है कि समाजविरोधी और राष्ट्रद्रोही लोगों का विनाश होना चाहिए और समाज के शांतिप्रिय लोगों को समय पर न्याय मिलता रहना चाहिए। व्यवस्थापिका कार्यपालिका और न्यायपालिका का जहां शांति काल से संबंध है वहीं सेना शांति काल और युद्ध काल दोनों के लिए काम करती है। यद्यपि शांति काल में वह जनसाधारण को अधिक दिखाई नहीं देती और अपने कार्यों में व्यस्त रहती है। परंतु उसके दिखाई न देने का अभिप्राय यह नहीं कि उसका अस्तित्व नहीं है।
वेद का यह संदेश उद्धृत करते हुए स्वामी जी महाराज लिखते हैं –

तं सभा च समितिश्च सेना च ।।1।।
-अथर्व० कां० 15। अनु० 2। व० 9। मं० 2।।
सभ्य सभां मे पाहि ये च सभ्याः सभासदः ।।2।।
-अथर्व० कां० 19। अनु० 7। व० 55। मं० 6।।
(तम्) उस राजधर्म को (सभा च) तीनों सभा (समितिश्च) संग्रामादि की व्यवस्था और (सेना च) सेना मिलकर पालन करे।।1।। (सत्यार्थ प्रकाश, षष्ठम समुल्लास)

सेना के गठन का उद्देश्य

वेद के संदर्भ और अर्थों में सेना का उद्देश्य निरपराध लोगों को सताना या उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार करना या उनके धन संपत्ति को लूटना नहीं है। वेद जन सामान्य की जीवन शैली को सुचारू रूप से गतिशील बनाए रखने के लिए सेना की आवश्यकता अनुभव करता है। जो लोग जनसाधारण के सामान्य जीवन में किसी भी प्रकार का गतिरोध या अवरोध उत्पन्न करते हैं उनको समाप्त करना सेना का उद्देश्य है। यह किसी भी प्रकार से अत्याचार करने के लिए गठित नहीं की जाती बल्कि अत्याचारों को रोकने के लिए ही इसका गठन होता है। देश की एकता अखंडता और संप्रभुता के शत्रु लोगों का विनाश करना भी सीना का ही उद्देश्य है। इसके लिए भी उसकी अपनी मर्यादा है अर्थात युद्ध काल में भी वह जनसंहार नहीं कर सकती। उसे केवल और केवल शत्रु संहार के लिए ही काम करना होता है। जो लोग युद्ध में सम्मिलित होना नहीं चाहते हैं या युद्ध से दूर रहते हैं उन पर सेना किसी भी प्रकार के अत्याचार नहीं करेगी ऐसी वैदिक मान्यता रही है।
ऐसी सेना का धर्मार्य सभा के साथ समन्वय होना या उसके साथ समन्वय किए जाने की व्यवस्था करना, इस बात का संकेत है कि सेना उन परिस्थितियों में ही अपना काम करेगी जब उसे धर्मार्य सभा की अनुमति प्राप्त होगी।
धर्मार्य सभा में एक से बढ़कर एक बुद्धिमान, न्यायप्रिय और प्राणीमात्र का हितचिंतक विद्वान बैठा होता है। ऐसे में धर्मार्य सभा से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती थी कि वह जनसाधारण का नरसंहार करने या उसे किसी भी प्रकार से क्षति पहुंचाने का निर्णय या आदेश देश की सेना को दे सकती है। इस बात को यदि विदेशी आक्रमणकारी तुर्कों, मुगलों और अंग्रेजों की सेना के संदर्भ में तुलनात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो पता चलता है कि इन विदेशी आक्रमणकारियों ने कभी भी न्यायशील लोगों की सहमति और अनुमति लेकर सेना को युद्ध के लिए प्रस्थान करने के लिए नहीं कहा। वहां केवल और केवल तानाशाह सुल्तान या बादशाह या वायसराय के हाथ में ही यह निर्णय करने की शक्ति होती थी कि सेना को युद्ध के लिए प्रस्थान करने के लिए कहा जाए या नहीं। सुल्तान ,बादशाह या वायसराय अपनी तानाशाही दिखाते हुए अपने स्वयं के विवेक से ही इतना महत्वपूर्ण निर्णय लेते थे। यही कारण था कि भारत के इन विदेशी आक्रमणकारियों या उनके वंशजों ने या उत्तराधिकारियों ने भारत पर जितनी देर भी शासन किया उतनी देर सेना निर्ममता और क्रूरता का प्रतीक बनी रही।

सभा और सेना

विवेकशील लोगों से बनी तीनों सभाएं बहुत ही विषम परिस्थिति में सेना के प्रयोग की बात करती थीं। इससे सेना और जनसाधारण के मध्य बहुत ही प्रेमपूर्ण संबंध रहते थे। देश के निवासी सेना को अपना सुरक्षा कवच मानते थे। अपनी राष्ट्रीय सेना पर लोगों का पूर्ण विश्वास होता था। यही कारण था कि जब युद्ध के लिए हमारे सैनिक प्रस्थान करते थे तो देश के लोग युद्ध के लिए प्रस्थान करती अपनी सेना पर पुष्प वर्षा करके उनका मनोबल बढ़ाती थी।
इसी प्रकार सेना भी देशवासियों के प्रति बहुत ही ही विनम्र व्यवहार करती थी। सेना हर क्षेत्र में और हर समय अपने धर्म का पालन करने के लिए कटिबद्ध रहती थी। जनसाधारण की प्राण रक्षा करना और उसे समृद्धि ,सुख और शांति के अवसर उपलब्ध कराना वह अपना राष्ट्रीय धर्म मानती थी। सेना से किसी भी प्रकार के अत्याचार या लूटमार की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी। इसका अभिप्राय है कि सेना में भी बुद्धि से पैदल लोगों की भर्ती नहीं की जाती थी बल्कि जनसामान्य के प्रति उदार और विनम्र रहने वाले लोगों को ही सेना में चयनित किए किया जाता था। मूर्ख, अशिक्षित और कुपढ़ लोग सेना में भर्ती नहीं किए जाते थे। क्योंकि ऐसे लोगों से अस्त्र शस्त्र का प्रयोग करते समय विवेकपूर्ण निर्णय लेने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। यही कारण है कि सेना में भी विवेकशील लोगों को ही सम्मिलित किया जाता था। मूर्ख और अशिक्षित लोग अपने धर्म से पतित होकर विजय के क्षणों में अपना विवेक खो सकते हैं। इसलिए ऐसे क्षणों में वे लूटमार पर उतर सकते हैं। ऐसे अपराधों को हमने मुस्लिम सैनिकों के द्वारा होते भी देखा है। अंग्रेजी सेना ने भी इसी प्रकार का आचरण अनेक बार किया। उस समय सेना में हत्यारे, बलात्कारी, लुटेरे बदमाश लोगों को ही प्रवेश दिया जाता था।
इस प्रकार की प्रवृत्ति के चलते सेना उस समय आतंक का पर्याय बन गई थी।
हमारे देश में प्राचीन काल में सेना को मर्यादित और अनुशासित रखने के लिए तीनों सभाएं परस्पर समन्वय स्थापित करके चलती थी। इन तीनों सभाओं का सेना के साथ भी बहुत ही बेहतरीन समन्वय स्थापित रहता था।

मुस्लिम काल में सेना की भर्ती

आजकल सेना के लिए भर्ती की जाती है। भर्ती शब्द मुसलमानों के समय से भारत में प्रचलित हुआ है। भर्ती भेड़ बकरियों की होती है, जिन्हें मरने- कटने या मारने – काटने के लिए ‘लूटदल’ में शामिल किया जाता है। ऐसे लोगों को बुद्धि से पैदल भी बना दिया जाता है। जिससे कि वह अपने द्वारा मारकाट मचाने की और निरपराध लोगों को सताने की स्थिति को अधिक गंभीरता से ना ले सकें। इसके विपरीत भारत में सेना में उन लोगों को चयनित किया जाता था जो निरपराध लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने के लिए अपने आप को सहर्ष समर्पित करते थे। उनके भीतर प्रेम, न्याय, दया, क्षमा और उदारता के गुण कूट-कूट कर भरे होते थे। ऐसे विवेकशील और बुद्धिमान सैनिकों की भेड़ बकरियों की तरह सेना में भर्ती नहीं होती थी बल्कि उनका विधिवत चयन होता था। उनके भीतर मानवीय गुणों की विशिष्टता को देखा परखा व जांचा जाता था।
प्राचीन भारत के सैनिक जब चयन के माध्यम से अपने धर्म का निर्वाह करने के लिए सेना में पहुंचते थे तो वह सेना की गरिमा का ध्यान रखते हुए अपना आचरण निष्पादित करते थे। जब मुगल काल में सेना के लिए भर्ती की जाने लगी तो उसमें सेना की कोई मर्यादा नहीं रही। लुटेरे बदमाश लोगों ने अपनी सेनाओं का गठन किया और उसमें इसी प्रकार की सोच रखने वाले लोगों को भर्ती किया।

सांसदों को कहा जाता था सभ्य

प्राचीन काल में भारत में सांसदों को सभासद के नाम से पुकारा जाता था। जो लोग सभा में बैठकर अपना बुद्धि संगत मत देने की क्षमता रखते थे उन्हीं को सभ्य कहा जाता था। कोई भूलकर भी जनसाधारण के अधिकारों का अतिक्रमण करने की बात सभा में नहीं बोल सकता था। सभ्य शब्द से ही स्पष्ट है कि ये लोग सभाओं में जाकर सभा के अनुकूल सभ्याचरण करने के अभ्यासी होते थे। उनसे किसी भी प्रकार की असभ्यता की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी।
वास्तव में भारत की प्राचीन राज्य व्यवस्था पूर्णतया लोकतांत्रिक थी। जिसमें किसी एक को सर्वाधिकार संपन्न नहीं बनाया गया था। उस समय की स्थिति यह थी कि राजा जो सभापति तदधीन सभा, सभाधीन राजा, राजा और सभा प्रजा के आधीन और प्रजा राजसभा के आधीन होती थी। इस प्रकार की व्यवस्था ही लोकतंत्र को मजबूती देती है। महर्षि दयानंद स्पष्ट करते हैं कि यदि राजा को स्वतंत्र कर दिया गया और उस पर प्रजा का कोई अंकुश नहीं रहा तो वह प्रजा के अधिकारों का शोषण करने वाला बन जाता है। कहने का अभिप्राय है कि प्राचीन काल में राजा और राज वर्ग पर प्रजा का अंकुश बराबर बना रहता था। ऐसा राजा प्रजा के हितों का हनन करता है और उसके लिए एक सुरक्षा कवच न बनकर दु:ख का कारण बन जाता है।

अकबर और उसका हरम

अबुल फजल ने आइन-ए-अकबरी में अकबर के हरम के बारे में लिखा है, ‘अकबर के हरम में पांच हज़ार औरतें थीं। और ये पांच हज़ार औरतें उसकी 36 पत्नियों से अलग थीं। बादशाह ने महल के नजदीक ही एक सराय भी बनवाई। वहां इतनी वेश्याएं इकट्ठी हो गई थीं कि उन्हें गिनना भी मुश्किल हो गया था। अगर कोई दरबारी नई लड़की को घर ले जाना चाहता, तो उसे अकबर से अनुमति लेनी पड़ती थी। कई बार खूबसूरत लड़कियों को ले जाने को लेकर लोगों में झगड़ा भी हो जाता था। एक बार अकबर ने ख़ुद कुछ वेश्याओं को बुलाकर पूछा था कि उनमें सबसे पहले कौन उनका आनंद लेता है।’
इससे स्पष्ट हो जाता है कि अकबर जैसे तथाकथित मानवतावादी बादशाह के यहां पर कितना दानवीय वातावरण था? जिस देश में नारियों का सम्मान होता आया है उस देश में नारियों की इस नारकीय स्थिति की उपेक्षा करके अकबर को मानवतावादी बताना इतिहासकारों की कितनी बड़ी मूर्खता है ?
जहां मुगलों के दरबार में या राजभवनों में इस प्रकार की अश्लीलता और वासना का वातावरण रहता था वहीं भारत के राजभवनों और दरबारों की स्थिति कैसी होनी चाहिए या कैसी होती थी ? इसके बारे में सत्यार्थ प्रकाश के छठे समुल्लास में महर्षि दयानंद जी (-अथर्व० कां० 6। अनु० 10। व० 98। म० 1। ) के माध्यम से बताते हैं कि :-
‘हे मनुष्यो ! जो (इह) इस मनुष्य के समुदाय में (इन्द्रः) परम ऐश्वर्य का कर्त्ता शत्रुओं को (जयाति) जीत सके (न पराजयातै) जो शत्रुओं से पराजित न हो (राजसु) राजाओं में (अधिराजः) सर्वोपरि विराजमान (राजयातै) प्रकाशमान हो (चर्कृत्यः) सभापति होने को अत्यन्त योग्य (ईड्यः) प्रशंसनीय गुण, कर्म, स्वभावयुक्त (वन्द्यः) सत्करणीय (चोपसद्यः) समीप जाने और शरण लेने योग्य (नमस्यः) सब का माननीय (भव) होवे उसी को सभापति राजा करें।’

राकेश कुमार आर्य

मेरी यह पुस्तक डायमंड बुक्स नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुई है । जिसका अभी हाल ही में 5 अक्टूबर 2000 22 को विमोचन कार्य संपन्न हुआ था। इस पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश के पहले 7 अध्यायों का इतिहास के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक में कुल 245 स्पष्ट हैं। पुस्तक का मूल्य ₹300 है।
प्रकाशक का दूरभाष नंबर : 011 – 407122000।

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