सावधानी से मन की गतिविधियों पर नजर रखो

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ऋषिराज नागर एडवोकेट

कबीर ने अपनी बातों में दोहों के माध्यम से हमारा बड़ा गहरा मार्गदर्शन किया है। यही कारण है कि वह एक महापुरुष के रूप में भारत का ही नहीं बल्कि बाहर के लोगों का भी मार्गदर्शन आज तक कर रहे हैं। अहंकार आदि के बीजनाश के लिए शिक्षा देते हुए वह कहते हैं कि :-

जीवन में मरना भला, जो मरि जानै कोय |
मरना पहिले जो मरै, अजय अमर सो होय ||

अर्थ : जीते जी ही मरना अच्छा है, यदि कोई मरना जाने तो। मरने के पहले ही जो मर लेता है, वह अजर-अमर हो जाता है। शरीर रहते-रहते जिसके समस्त अहंकार समाप्त हो गए, वे वासना – विजयी ही जीवनमुक्त होते हैं।
मन जिस प्रकार की तृष्णा का शिकार हुआ रहता है उससे वह हमें प्रभु भक्ति में नहीं लगने देता। चैन से बैठने नहीं देता । जिससे बहुत से लोगों का जीवन व्यर्थ चला जाता है। बड़ी सावधानी से मन की गतिविधियों को शांत करना होता है। कबीर जी कहते हैं :-
 
मैं जानूँ मन मरि गया, मरि के हुआ भूत |
मूये पीछे उठि लगा, ऐसा मेरा पूत ||

अर्थ : भूलवश मैंने जाना था कि मेरा मन भर गया, परन्तु वह तो मरकर प्रेत हुआ। मरने के बाद भी उठकर मेरे पीछे लग पड़ा, ऐसा यह मेरा मन बालक की तरह है। 
इस मन रूपी बालक को शांत कर अपने कल्याण रूपए घर अर्थात मोक्ष की तैयारी में लगना चाहिए जो व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं सचमुच उनका जीवन सफल हो जाता है।
 
भक्त मरे क्या रोइये, जो अपने घर जाय |
रोइये साकट बपुरे, हाटों हाट बिकाय ||

अर्थ : जिसने अपने कल्याणरुपी अविनाशी घर को प्राप्त कर लिया, ऐसे संत भक्त के शरीर छोड़ने पर क्यों रोते हैं? बेचारे अभक्त – अज्ञानियों के मरने पर रोओ, जो मरकर चौरासी लाख योनियों के बाज़ार में बिकने जा रहे हैं। 
कबीर दास जी कहना चाहते हैं कि शुभ कर्मों के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति की साधना करनी चाहिए नहीं तो यही जीवन मरण के चक्कर में मनुष्य पड़ा रहता है।
 
मैं मेरा घर जालिया, लिया पलीता हाथ |
जो घर जारो आपना, चलो हमारे साथ ||

अर्थ : संसार – शरीर में जो मैं – मेरापन की अहंता – ममता हो रही है – ज्ञान की आग बत्ती हाथ में लेकर इस घर को जला डालो। अपना अहंकार – घर को जला डालता है।
जब तक मैं और मेरा का अस्तित्व बना हुआ है तब तक जीवन में उन्नति नहीं हो सकती। अहंकार को मारकर विनम्रता के माध्यम से परमपिता परमेश्वर का सानिध्य प्राप्त करने की साधना में लगना ही जीवन की पवित्र साधना का नाम है।
 
शब्द विचारी जो चले, गुरुमुख होय निहाल |
काम क्रोध व्यापै नहीं, कबूँ न ग्रासै काल ||

अर्थ : गुरुमुख शब्दों का विचार कर जो आचरण करता है, वह कृतार्थ हो जाता है। उसको काम क्रोध नहीं सताते और वह कभी मन कल्पनाओं के मुख में नहीं पड़ता।
गुरु की आज्ञा का पालन करने से संसार में कल्याण होता है। सच्चा गुरु वही होता है जो अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश में ले जाता है। ज्ञान के प्रकाश में ले जाने वाली बातों को गांठ बांधकर हमें जीवन को ऊंचाई में डालने का प्रयास करना चाहिए।
 
जब लग आश शरीर की, मिरतक हुआ न जाय |
काया माया मन तजै, चौड़े रहा बजाय ||

अर्थ : जब तक शरीर की आशा और आसक्ति है, तब तक कोई मन को मिटा नहीं सकता। इसलिए शरीर का मोह और मन की वासना को मिटाकर, सत्संग रूपी मैदान में विराजना चाहिए।
 
मन को मिरतक देखि के, मति माने विश्वास |
साधु तहाँ लौं भय करे, जौ लौं पिंजर साँस ||

अर्थ : मन को मृतक (शांत) देखकर यह विश्वास न करो कि वह अब धोखा नहीं देगा। असावधान होने पर वह फिर से चंचल हो सकता है इसलिए विवेकी संत मन में तब तक भय रखते हैं, जब तक शरीर में सांस चलती है। 
मन को गहरी साधना का अभ्यासी बनाना चाहिए। यदि वह अभ्यासी नहीं है तो शांत होकर भी शांत नहीं रहता। कोई ना कोई उत्पात कर बैठता है। जिससे बना बनाया खेल बिगड़ जाता है । बनी बनाई साधना भंग हो जाती है।

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