वैदिक सम्पत्ति : प्रक्षेप और पुनरुक्ति

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वैदिक सम्पत्ति

प्रक्षेप और पुनरुक्ति

गतांक से आगे …..

जहाँ तक हमको ज्ञात है, अब तक एक भी प्रमाण इस प्रकार का नहीं उपस्थित किया गया कि अमुक स्थल प्रक्षिप्त है और इसको आज तक कोई नहीं जानता था। जिन स्थानों को प्रक्षिप्त बतलाया जाता है, वे बहुत दिन से ब्राह्मणकाल से सबको ज्ञात हैं। वे प्रक्षिप्त नहीं हैं, किन्तु एक प्रकार के परिशिष्ट हैं, जो लेखकों और प्रेसवालों की असावधानी से मूल में घुस कर मूल जैसे मालूम होते हैं । वालखिल्य सूक्त ऋग्वेद में, खिल अर्थात् ब्राह्मणभाग यजुर्वेद में, आरण्यक और महानाम्नी सुक्त सामवेद में और कुन्तापसूक्त अथर्ववेद में मिले हुए हैं। इनको सब लोग जानते हैं। और सबके विषय में विस्तृत प्रमाण उपलब्ध हैं । इनके अतिरिक्त कुछ स्थल यजुर्वेद और अथर्ववेद में और हैं जिनकी सूचना उन्हीं वाक्यों से हो जाती है कि वे प्रक्षिप्त हैं । कहने का मतबल यह कि जिस प्रकार शाखाओं का गड़बड़ सबको ज्ञात है और शुद्ध वैदिक शाखाएँ उपलब्ध हैं, उसी तरह प्रक्षिप्त भाग का भी ज्ञान सबको है और उसको हटाकर शुद्ध संहिताओं के रूप को सब जानते हैं। ऋग्वेद के वालखिल्य सूक्तों के लिए ऐतरेय ब्रा० 28/8 में लिखा है कि ‘वज्रेण वालखिल्याभिर्वाव: कूटेन’ । इसके भाष्य में सायाणाचार्य कहते हैं कि ‘वालखिल्यनामकाः केचन महर्षयः तेषां सम्बन्धन्यष्टौ सूक्तानि विद्यते तानि वालखिल्यनाम के ग्रंथे समाम्नायन्ते’ अर्थात् वालखिल्य नाम के कोई महर्षि थे । उनसे सम्बन्ध रखनेवाले आठ सूक्त हैं। वे खिल्य नाम के ग्रन्थ में लिखे गये हैं । इस वर्णन से मालूम हुआ कि वालखिल्य सूक्तों की अलग पुस्तक थी। वही पुस्तक ऋग्वेद के परिशिष्ट में आ गई है और अब तक ‘अथ वालखिल्य’ और ‘इति वालखिल्य’ के साथ ऋग्वेद में ही सम्मिलित है। इसके अतिरिक्त अनुवाकानुक्रमरणी में स्पष्ट लिखा हुआ है। कि ‘सहस्रमेतत्सूक्तानां निश्चितं खैलिकैविना’ अर्थात् खिल भाग को छोड़कर ऋग्वेद के एक सहस्र सूक्त निश्चित हैं। यहाँ वालखिल्यों को ऋग्वेद की गिनती में नहीं गिना गया। इस तरह से ऋग्वेद का खिल सबको ज्ञात है।

इसी तरह यजुर्वेद का मिश्रण भी प्रसिद्ध है। सर्वानुक्रमणी में लिखा है कि ‘माध्यन्दिनीये वाजसनेयके यजुर्वेदान्नाये सर्वे सखिले सशुक्रिय ऋषिदेवताछन्दा स्यानुक्रमिष्यामः’ अर्थात् ऋचा, खिल और शुक्रिय मंत्रोंके सहित माध्यन्दिनी यजुर्वेद के ऋषि, देवता और छन्दों की अनुक्रमणी बनाता हूँ । यहाँ खिल भाग का प्रत्यक्ष इशारा है। इसके आगे अनुक्रमणी में ही लिखा हुआ है कि, ‘देवा यज्ञ’ ब्राह्मणानुवाकोविंशतिरनुष्टुभः सोमसम्पत्’ अर्थात् यजुर्वेद 17 / 12 के ‘देवा यज्ञमतन्वत’ मन्त्र से लेकर बीस अनुष्टुभ छन्द ब्राह्मणभाग हैं और ‘अश्वस्तुपरी ब्राह्मणाध्याय: शाददद्भिस्त्वचान्तश्च’ अर्थात् यजुर्वेद का चौबीसवाँ अध्याय सबका सब और 25 वें अध्याय के आरम्भ के शाद से लेकर त्वचा तक नौ मन्त्र ब्राह्मण हैं और ब्राह्मणे ब्राह्मणमिति द्वे काण्डिके तपसे अनुवाकश्च ब्राह्मणम्’ अर्थात् यजुर्वेद अध्याय 30 के ‘ब्राह्मणे ब्राह्मणम्’ और शेष सारा अध्याय ब्राह्मण है । परन्तु हम देखते हैं कि वाजसनेयी संहिता की मन्त्रसंख्या 1900 ही है, जिसमें शुक्रिय के भी मन्त्र मिले हुए हैं। क्योंकि लिखा है कि-
द्वे सहस्त्रे शतं न्यूनं मन्त्रे वाजसनेयके । इत्युक्त परिसंख्यातमेतत्सर्वं सशुक्रियम् ॥
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ननु चोक्त’ नहि छन्दांसि क्रियन्ते नित्यानि छन्दांसीति । यद्यप्यर्थो नित्यः यत्त्वसौ वर्णानुपूर्वी साऽनित्या । तदुभेदाच्चैतद्भवति काठकं, कालापकं, मौदकं, पैप्पलादकमिति । ( महाभाष्य )

अर्थात् सौ कम 2000 मंत्र वाजसनेय के हैं और इसी में शुक्रिय के भी सम्मिलित हैं। जब यह वाजसनेय संहिता है, तब इसमें सब मंत्र वाजसनेय के ही होने चाहिए , शुक्रिय के नहीं । किन्तु हम देखते हैं कि वर्तमान वाजसनेय संहिता की मंत्र संख्या 1975 है, इससे स्पष्ट हो जाता है कि शुक्रिय के मंत्र तो 19000 में ही घुसे हैं और शेष 75 मंत्र कहीं बाहर से लाकर जोड़े गए हैं । हमको ब्राह्मणभाग के प्रक्षेप का पता मिल रहा है, इसे ज्ञात होता है कि यजुर्वेद का प्रक्षेप भी सब पर प्रकट है और प्रसिद्ध है।
क्रमश:

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