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भारतीय संस्कृति

सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय – 10 ख एक महत्वपूर्ण दृष्टांत

एक महत्वपूर्ण दृष्टांत

हमने अन्यत्र एक प्रसंग का उल्लेख किया है। जिसे जहां भी प्रसंग वश लिखित कर रहे हैं। सन 1200 के लगभग भारत में कन्नौज में गहरवाड़ या राठौड, दिल्ली-अजमेर में चौहान, चित्तौड़ में शिशोदिया और गुजरात में सोलंकी-ये चार राजपूत वंश शासन कर रहे थे। इन राजपूत वंशों में परस्पर बड़ी ईर्ष्या बनी रहती थी। उसी ईर्ष्या भाव के कारण विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं को यहां शासन करने का अवसर मिला।एक बार की बात है कि गुजरात के सोलंकी राज परिवार के कुछ सदस्य रूष्ट होकर गुजरात से अजमेर आ गये। पृथ्वीराज चौहान उस समय अजमेर ओर दिल्ली के शासक नही बने थे। उनके पिता सोमेश्वर सिंह ने सोलंकी परिवार के अतिथियों का पूर्ण स्वागत सत्कार किया। अतिथि भी प्रसन्नवदन होकर रहने लगे।
पृथ्वीराज चौहान व राजा तो अतिथियों के प्रति सदा विनम्र रहे और वह इन राजकीय परिवार के अतिथियों के महत्व को जानते भी थे, परंतु यह आवश्यक नही कि परिवार का हर सदस्य ही आपकी भावनाओं से सहमत हो और उसी के अनुरूप कार्य करना अपना दायित्व समझता हो। पृथ्वीराज व राजा सोमेश्वर के साथ भी यही हो रहा था, वह अतिथियों के प्रति जितने विनम्र थे पृथ्वीराज के चाचा कान्ह कुंवर उतने ही उनके प्रति असहज थे।
एक दिन की बात है कि राजा की अनुपस्थिति में दरबार में एक सोलंकी सरदार ने अपनी मूंछों पर ताव देना आरंभ कर दिया। कान्ह कुंवर ने राजा सोमेश्वर व पृथ्वीराज चौहान की अनुपस्थिति का लाभ उठाते हुए मूंछों पर ताव देते सरदार की यह कहकर दरबार में ही हत्या कर दी कि चौहानों के रहते और कोई मूंछों पर ताव नही दे सकता। कान्ह कुंवर ने मानो आगत के लिए आफत के बीज बो दिये थे।
जब पृथ्वीराज चौहान दरबार में आए और उन्हें घटना की जानकारी मिली तो वह स्तब्ध रह गये। राजकीय परिवार के लोगों के साथ हुई यह घटना उनको भीतर तक साल गयी। उन्हें कान्ह कुंवर का यह व्यवहार अनुचित ही नही अपितु सोलंकियों से शत्रुता बढ़ाने वाला भी लगा। इसलिए उन्होंने आज्ञा दी कि कान्ह कुंवर की आंखों पर पट्टी बांध दी जाए और सिवाय युद्घ के वह कभी खोली न जाए।
उधर शेष सोलंकी अतिथि इस घटना के पश्चात स्वदेश लौट गये। गुजरात के सोलंकी राजपरिवार को यह घटना अपने सम्मान पर की गयी चोट के समान लगी। राजा मूलचंद सोलंकी ने अजमेर पर चढ़ाई कर दी। सोमवती युद्घ क्षेत्र में जमकर संघर्ष हुआ। मूलराज सोलंकी ने दांव बैठते ही राजा सोमेश्वर की गर्दन धड़ से अलग कर दी। मूंछों की लड़ाई की पहली भेंट राजा सोमेश्वर चढ़ गये।
आफत अभी और भी थी। इस घटना के बाद से चौहान और सोलंकी परस्पर एक दूसरे के घोर शत्रु बन गये। कालांतर में जब संयोगिता के स्वयंवर का अवसर आया तो सोलंकी राजा ने जयचंद का साथ दिया। पृथ्वीराज चौहान ने संयोगिता हरण के समय अपनी सुरक्षा में बताया जाता है कि अपने पक्ष के 108 राजाओं की सेना को कन्नौज से लेकर दिल्ली के रास्ते में थोड़ी थोड़ी दूर पर तैनात कर दिया था। उधर जयचंद की सेना भी अपने राजाओं की सेना को मिलाकर बहुत बड़ी बन गयी थी। कहा जाता है कि दोनों महान शक्तियों में घोर संग्राम कन्नौज से दिल्ली तक होता चला था। संयोगिता के डोले को सुरक्षा सहित दिल्ली पहुंचाने की व्यवस्था कर पृथ्वीराज चौहान स्वयं भी लड़ा। युद्घ तो जीत गया पर भारत माता के कितने ही वीर इस व्यर्थ की लड़ाई में नष्ट हो गये। मौहम्मद गोरी से लड़ने की शक्ति भी पृथ्वीराज की क्षीण हुई। पृथ्वीराज के 108 साथी राजाओं में से 64 राजा मारे गये। फलस्वरूप जब मोहम्मद गोरी आया तो उसने दोनों पक्षों को अलग अलग सहज रूप से पराजित कर दिया। इस प्रकार एक कान्ह कुंवर की मूर्खता और दम्भी स्वभाव के कारण देश घोर अनर्थ में फंस गया। व्यर्थ की लड़ाई ने भारी अनर्थ करा दिया।

बना “मूछों की लड़ाई” का मुहावरा

आज तक लोग इस व्यर्थ के अनर्थ को ‘मूंछों की लड़ाई’ के नाम से जानते हैं। इसीलिए हिंदी में यह मुहावरा ही बन गया है मूंछों की लड़ाई का। आज भी लोग जब किसी व्यर्थ की बात को अपने अहम के साथ जोड़ते हैं और कहते हैं कि मेरी मूंछों की बात है तो उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि अहम की लड़ाई से अनर्थ के अतिरिक्त और कुछ हाथ नही आता है। इसलिए विवेक और धैर्य के साथ आगे बढें और अहम भी बातों को पीछे छोड़ें।
हमने इस प्रसंग को यहां पर इसलिए प्रस्तुत किया है कि इतिहास में ऐसे अनेक प्रकरण हैं, जब वाणी के तप के भंग हो जाने के कारण भारी अनर्थ हुआ है। महर्षि दयानंद इस इतिहास के इस भूत से भली प्रकार परिचित थे। वह कहते हैं कि जिस वाणी में सब अर्थ अर्थात् व्यवहार निश्चित होते हैं वह वाणी ही उन का मूल और वाणी ही से सब व्यवहार सिद्ध होते हैं उस वाणी को जो चोरता अर्थात् मिथ्याभाषण करता है वह सब चोरी आदि पापों का करने वाला है। स्वामी दयानंद जी महाराज घर से लेकर राष्ट्र तक में हमारी जहां जहां जैसी जैसी भूमिका है, सर्वत्र वाणी के तप को बनाए रखने का परामर्श देते हैं।
राजनीति में वाचिक तप की बहुत आवश्यकता होती है। वहां पर कितने ही अवसर ऐसे आते हैं जब वाणी के तप का प्रदर्शन करना अनिवार्य हो जाता है। जैसे गणेश को बड़े कानों वाला और बड़े पेट वाला दिखा जाता है, वैसे ही राजा रूपी गणेश को
बड़े कानों और वाला होना चाहिए अर्थात उसे सब की बात सुननी चाहिए और सुनकर अपने बड़े पेट में डाल लेनी चाहिए अर्थात पूर्ण गंभीर रहना चाहिए। राजा रामचंद्र जी के बारे में अक्सर लोग कहा करते हैं कि वह सबकी सुनते हैं, इसका अभिप्राय यही है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम अपने जीवन काल में भी राजा के रूप में प्रजाजनों की समस्याओं को बड़ी गंभीरता से सुनते थे। इस प्रकार की सुनवाई से भी लोगों को प्रथम दृष्टया राहत मिल जाती है। तनिक कल्पना करें कि राजा सुनने के स्थान पर अपनी ओर से सुनाकर अर्थात लताड़ कर भगा दे तो याचक के दिल पर क्या गुजरेगी ? अत: राजा को वाचिक तप वाला होना चाहिए।

नियोग प्रथा पर स्वामी जी के विचार

स्वामी दयानंद जी की मान्यता थी कि विवाह वा नियोग
सन्तानों ही के अर्थ किये जाते हैं पशुवत् कामक्रीडा के लिये नहीं। सुसंतान की प्राप्ति और वंश वृद्धि के लिए विवाह या नियोग आवश्यक माना गया है । कुल की परंपरा बनी रहे और वंश वृद्धि भी होती रहे, इसके लिए पति-पत्नी का चारित्रिक पक्ष बहुत ही उज्ज्वल होना आवश्यक है। उन्होंने इस बात को भी स्पष्ट किया है कि महाभारत के युद्ध में पांडव नियोगज संतान थे। जिनके विषय में अधिकतर लोगों ने पाखंड रचने का प्रयास किया है कि माता कुंती को युधिष्ठिर की प्राप्ति अमुक देवता से और भीम आदि की प्राप्ति अमुक अमुक देवताओं से हुई थी। जबकि ऐसा नहीं था। सच यह था कि स्वयं महाराजा पाण्डु ने ही कुंती और माद्री को सुसंतान की प्राप्ति के लिए नियोग करने की अनुमति प्रदान कर दी थी। संदर्भ में महर्षि दयानंद कहते हैं कि :-
अन्यमिपिच्छस्व सुभगे  पतिं  मत् ।।
– ऋ  मं० ११ | सू० १० ||
जब पति सन्तानोत्पति में असमर्थ होवे तब अपनी स्त्री को आज्ञा देवे कि
हे सुभगे!सौभाग्य की इच्छा करने हारी स्त्री तू (मत्) मुझ से (अन्यम्) दूसरे पति की (इच्छस्व) इच्छा कर क्योंकि अब मुझ से सन्तानोत्पत्ति की आशा मत कर ।तब स्त्री दूसरे से नियोग करके सन्तानोत्पत्ति करे परन्तु उस विवाहित महाशय पति की
सेवा में तत्पर रहै । वैसे हीे स्त्री भी जब रोगादि दोषों से ग्रस्त होकर सन्तानोत्पत्ति में असमर्थ होवे तब अपने पति को आज्ञा देवे कि हे स्वामी आप सन्तानोत्पत्ति की इच्छा मुझ से छोड़ के किसी दूसरी विध्वा स्त्री से नियोग करके सन्तानोत्पत्ति कीजिये ।
जैसा कि पाण्डु राजा की स्त्री कुन्ती और माद्री आदि ने किया और जैसा व्यास जी ने चित्राग्द और विचित्रवीर्य के मर जाने पश्चात् उन अपने भाइयों की स्त्रिायों से नियोग करके अम्बिका में धृतराष्ट्र और अम्बालिका में पाण्डु और दासी में विदुर
की उत्पत्ति की । इत्यादि इतिहास भी इस बात में प्रमाण है ।”
गोद लेकर वंश वृद्धि करने की परंपरा भारत में नहीं दिखाई देती। प्राचीन भारत में नियोगज संतान प्राप्ति के विषय में ही उल्लेख मिलते हैं। इसका एक कारण यह भी है कि गोद ली हुई संतान के लिए यह आवश्यक नहीं कि वह आप के गुण, कर्म, स्वभाव के अनुसार हो। जबकि नियोगज संतान से ऐसी अपेक्षा की जा सकती है। नियोग की छूट देने का अभिप्राय असीमित व्यभिचार करने की छूट देना भी नहीं है। इतना ही नहीं, इसमें यह भी आवश्यक है कि यदि पति या पत्नी जीवित हैं और उसके उपरांत भी उनमें से कोई एक नियोग करके संतान प्राप्त कर रहा है तो उससे यह भी अपेक्षा की जाती है कि उसका प्रेम अपने पति और अपनी पत्नी से पूर्ववत बना रहेगा । उसके प्रति समर्पण भी वैसा ही रहेगा, जैसा पहले था। कहने का अभिप्राय है कि नियोग में परपुरुष या परस्त्री के प्रति वासनात्मक आकर्षण न होकर केवल संतानोत्पत्ति का आकर्षण रखा जाता है। परिवार, कुल, समाज और राष्ट्र की परंपरा और पवित्रता का इसमें पूरा ध्यान रखा जाता है।

राकेश कुमार आर्य

मेरी यह पुस्तक डायमंड बुक्स नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुई है । जिसका अभी हाल ही में 5 अक्टूबर 2000 22 को विमोचन कार्य संपन्न हुआ था। इस पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश के पहले 7 अध्यायों का इतिहास के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक में कुल 245 स्पष्ट हैं। पुस्तक का मूल्य ₹300 है।
प्रकाशक का दूरभाष नंबर : 011 – 407122000।

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