दक्षिण भारत के लोग नहीं नेता करते हैं हिंदी का विरोध

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उमेश चतुर्वेदी

अभावग्रस्त भिखारी हों या फिर पर्यटकों को लुभाने वाली दुकानों के मालिक और काउंटरकर्मी, या फिर सामान्य दुकानदार, रिक्शे वाले हों या फटफट ऑटो वाले, उनकी बोली सुन नहीं लगता कि वे उस तमिलनाडु से हैं, जहां की राजनीति अक्सर हिंदी के विरोध में उतरती हैं।

स्वाधीनता संग्राम में सपना तो था राष्ट्रभाषा बनाने का, लेकिन संविधान सभा की बहसों तक पहुंचते-पहुंचते हिंदी राजभाषा की जिम्मेदारी तक ही सिमट गई। यह बात और है कि कायदे से अपना वह स्थान भी वह संपूर्णता में नहीं हासिल कर पाई। संविधान लागू होने से पंद्रह साल तक की उसे जो मोहलत मिली, वह लगातार बढ़ती चली गई। जब भी उसे संपूर्णता में आगे बढ़ाने की कोशिश हुई, उसके विरोध में स्थानीय राजनीति खड़ी हो गई। विरोध की तीखी शुरुआत 25 जनवरी 1965 को जो हुई, वह हर बार तब और तेजी से उभर आती है, जब भी राजभाषा बनाने की दिशा में सरकारी स्तर पर कोई कदम उठाया जाता है। ऐसा ही नजारा एक बार फिर दिख रहा है। इसका माध्यम बनी है संसदीय राजभाषा समिति की हालिया रिपोर्ट, जिसमें उसने उच्च और तकनीकी शिक्षा का माध्यम बनाने के लिए हिंदी पर जोर देने की वकालत की है। इस रिपोर्ट में केंद्रीय नौकरियों में अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म करने और उसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के लिए गंभीर और ठोस प्रयास करने की भी सिफारिश की गई है।

हिंदी को आधिकारिक स्थान दिलाने की जब भी कोशिश होती है, विरोध में सबसे पहली राजनीतिक आवाज तमिलनाडु से ही उठती है। 1965 में हिंदी को राजभाषा के तौर पर लागू करने की तैयारी हो या फिर 1967 का लोहिया का अंग्रेजी हटाओ आंदोलन, 1986 में आई नई शिक्षा नीति हो या 2020 की शिक्षा नीति, हर बार हिंदी के खिलाफ सबसे कठोर राजनीतिक आवाज तमिलनाडु से ही उठी है। इस समय भी सबसे मुखर और तीक्ष्ण विरोधी आवाज तमिलनाडु से ही उठी है। राज्य की विधानसभा ने हिंदी के विरोध में बाकायदा प्रस्ताव पारित किया है। जिसमें केंद्र सरकार से मांग की गई है कि हिंदी को लेकर जो मांग समिति ने की है, उसे लागू न किया जाये। राजभाषा समिति की रिपोर्ट के विरोध में वह चिदंबरम भी हैं, जिन्होंने गृहमंत्री रहते 2021 में राजभाषा हिंदी दिवस पर हिंदी को लोक की भाषा बताते हुए हिंदी में ही संवाद करने पर जोर दिया था। तब हैरतअंगेज था कि उन्होंने अपना पूरा भाषण हिंदी में दिया था।

हिंदी की एक सहयोगी भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग जब लोकसभा में उठी थी, तब उसका जवाब देते वक्त चिदंबरम ने अपने वक्तव्य की शुरुआत में एक पंक्ति भोजपुरी में भी बोली थी। सवाल यह है कि क्या तमिलनाडु अब भी उसी हिंदी विरोध की ग्रंथि के घेरे में है, जो अतीत में रही है। तमिलनाडु की हालिया हफ्तेभर की यात्रा में कम से कम ऐसा नहीं महसूस हुआ। तमिलनाडु के लोगों की जो प्रतिक्रिया मिली, जैसा उनका हावभाव नजर आया, उससे स्पष्ट है कि हिंदी विरोध से तमिलनाडु आगे निकल चुका है। राज्य के मशहूर तीर्थस्थल महाबलिपुरम् की गलियों में हिंदी अजनबी भाषा नहीं थी।

अभावग्रस्त भिखारी हों या फिर पर्यटकों को लुभाने वाली दुकानों के मालिक और काउंटरकर्मी, या फिर सामान्य दुकानदार, रिक्शे वाले हों या फटफट ऑटो वाले, उनकी बोली सुन नहीं लगता कि वे उस तमिलनाडु से हैं, जहां की राजनीति अक्सर हिंदी के विरोध में उतरती हैं। कुछ साल पहले तमिलनाडु में ऐसे नजारे आम नहीं होते थे। परमाणु ऊर्जा केंद्र के तौर पर मशहूर कल्पकम् का समुद्री किनारे पर उस दिन जुटी भीड़ में ज्यादातर लोग मुस्लिम समुदाय के थे। जिस दिन की बात है, उस दिन ईद थी। ईद की छुट्टी का मजा उठाती उस भीड़ की अपनी जाति भले ही तमिल थी, लेकिन जरूरत पड़ने पर हिंदी गीतों के बोल भी उठ रहे थे। लग नहीं रहा था कि यह उस तमिलनाडु के समुद्र तट का नजारा है, जहां को लेकर उत्तर भारत की सामान्य अवधारणा रही है कि वहां हिंदी बोलना जैसे अपराध हो।

भारतीय राजनीति चाहे उत्तर की हो या दक्षिण की, सामान्य रूप से उसका स्वभाव एक ही जैसा है। लोक से उसका जीवंत और दोतरफा सहज संवाद कम ही है। इसलिए वह अवधारणाओं के ही हिसाब से अपने कदम उठाती रहती है। तमिल राजनीति इससे इतर नहीं है। उसे भी लगता है कि अब भी तमिलनाडु की जनता की रगों में बहने वाले रक्त में तेजी हिंदी विरोध के साथ आती है। दरअसल तमिलनाडु हिंदी विरोध से बहुत आगे बढ़ गया है। पिछली सदी के साठ के दशक में हिंदी के विरोध में उग्र प्रदर्शन करने वाली पीढ़ी अब बुजुर्ग हो गई है। कोयंबटूर के एक विवाह समारोह में मिले षडमुषनाथन उस आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए अफसोस जताने से नहीं चूके। इसलिए अब तमिलनाडु की वह पीढ़ी अपने बच्चों को बोलचाल की हिंदी सिखाने से परहेज नहीं कर रहे। तमिलनाडु की इस पीढ़ी को पता है कि जिसे हिंदी प्रदेश कहा जाता है, वहां अंग्रेजी पढ़ाने के लिए जब निजी स्कूल और प्रतिष्ठान अध्यापक की खोज करते हैं तो उनकी पहली पसंद दक्षिण के युवा होते हैं। हिंदी विरोध में अपनी जवानी का जोश दिखाने वाली पीढ़ी को पता है कि हिंदी बेशक हकीकत में राजकाज की आधिकारिक भाषा अब तक नहीं बन पाई हो, लेकिन वह अखिल भारत के दरवाजे खोलती है।

हिंदी वाले जिस तरह अंग्रेजी को साम्राज्यवाद को पुष्पित-पल्लवित करने वाली भाषा मानते रहे हैं, दक्षिण, विशेषकर तमिलनाडु में एक दौर में हिंदी को भी उसी अंदाज में प्रस्तुत किया गया। हिंदी ‘थोपने’ का जुमला इसी का प्रतीक है। तमिल राजनीति की सीमा है कि अब भी वह हिंदी को लेकर उसी अवधारणा के तहत राजनीति करती है। हकीकत तो यह है कि हिंदी साम्राज्यवादी सोच की भाषा नहीं है, उसका नजरिया विस्तारवादी नहीं है। बल्कि वह दिलों के तार जोड़ने का माध्यम है। तमिलनाडु की वह पीढ़ी इस तथ्य को समझने लगी है, जिसकी दृष्टि की सीमा तमिल सीमाओं से बाहर तक जा चुकी है या जो इसकी अभ्यस्त है। तमिल राजनीति को इसे समझना होगा। दुर्भाग्यवश उसे लोकभावनाओं को भड़काने से बचना होगा।

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