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आर्यसमाज का तप और भारत के स्वाधीनता आंदोलन में योगदान

आर्यसमाज का तप
पराधीन भारत में अंग्रेज पादरियों और अधिकारियों की आर्यसमाज के अनुयायियों पर कू्रर दण्डात्मक दृष्टि थी। इसके लगभग 24 उदाहरण आर्यसमाज के विद्वान आचार्य पं. सत्यप्रिय शास्त्री, प्राचार्य, दयानन्द ब्राह्म महाविद्यालय, हिसार ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय स्वातन्त्र्य संगाम में आर्यसमाज का योगदान’ में दिये हैं। वह पुस्तक के छठे अध्याय में लिखते हैं कि आर्यसमाज सामान्यतः अपने जन्मकाल से ही विशेषकर श्यामजी कृष्ण वर्मा तथा लाला लाजपतराय के समय से ब्रिटिश सरकार के प्रबल सन्देह का विषय बन गया था। आर्यसमाज के भयंकर राजद्रोही होने का विचार विदेशी सरकार तक कैसे पहुंचा? यह हम आर्यसमाज के लौहपुरुष अमर शहीद स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज के शब्दों में ही यहां पर उद्धृत कर रहे हैं–
“गरीब हिन्दुओं को वाग्युद्ध में सदा पछाड़ने के अभ्यासी पादरियों को जब आर्यसमाज में पले बालकों तक से पटकनी पर पटकनी मिलने लगी तब वे ओछी करतूतों पर उतर आये और उन्होंने सरकारी अधिकारियों को यह विश्वास दिलाना आरम्भ कर दिया कि आर्यसमाज से क्रिश्चियन मत को तो कम भय है अधिक भय गवर्नमेन्ट को है।” (कल्याण मार्ग का पथिक पृ. 146)
इस विश्वास के कारण (जो किसी भी इतिहासकार की दृष्टि में अनुचित नहीं कहा जा सकता है) अंग्रेजी सरकार ने आर्यसमाज को कुचलने तथा दबाने का पूर्ण निश्चय कर लिया था। स्थान-स्थान पर आर्यसमाजियों तथा आर्यसमाज से सम्बन्धित पुरुषों को उत्पीड़ित किया जाने लगा था, उस समय की सरकारी नौकरियों में विद्यमान आर्यसमाजियों पर तो मानों विपत्तियों का पहाड़ ही टूट पड़ा था क्योंकि सरकारी नौकरी में होने के कारण उनको पीड़ित, दुःखी तथा त्रस्त करना सरकार के लिए बहुत ही सरल काम हो गया था। उस समय के आर्यसमाजियों पर क्या बीती, इसका दिग्दर्शन कराने के लिए कुछ घटनाओं का संक्षिप्त संगंह यहां प्रस्तुत किया जाता है। इससे पाठकों को यह भी ज्ञात हो जायेगा कि विपदा और आंधी के उस तूफानी दौर तथा काल में आर्यसमाजियों ने किस प्रकार अपनी बहादुरी का परिचय दिया। वे टूट तो गये परन्तु झुके नहीं और किस प्रकार अपनी लौकिक अनित्य सम्पदाओं के सर्वस्व की बाजी लगाकर भी उन्होंने अपने सिद्धान्तों, मान्यताओं तथा आर्यत्व की रक्षा करके उस विपत्ति की घड़ी में खरे उतरे, यह एक गौरव का विषय है।
आर्यसमाजियों से दुर्व्यवहार की कुछ घटनायें
1- मैं सायंकाल सड़क पर घूम रहा था, सामने से घोड़े पर सवार नाभा के वृद्ध राजा हरि सिंह आ रहे थे। वह अक्सर लाहौर आते थे और मैं उन्हें पहचालता था। मैंने हाथ जोड़कर उनका उचित सत्कार किया। उन्होंने पूछा कि पढ़ते हो? मेरे उत्तर देने पर पूछा कि कहां? मैंने कहा कि दयानन्द कालेज में। ‘कहने लगे कि हंसराज से कह देना कि अंग्रेजों के साथ उलझना ठीक नहीं, जितने आर्यसमाजी तुम हो, उनके लिए तो मेरी फौज ही काफी है। राजा नाभा ने अपना सन्देश पहुंचाने के लिए अच्छा दूत चुना। उनके कथन से इतना तो पता लगता है कि उस समय का राजनैतिक वायुमण्डल कैसा था?’ (आर्यसमाज के त्या0 तप0 सं0 पृ0 32)
2- गुलाबचन्द एक सिख रेजिमेण्ट में लेखक था। वह कर्तव्य परायण तथा सत्यप्रिय और परिश्रमी था। परन्तु साथ ही अध्किरियों को उत्तर देने में निर्भीक था। पहले तो उसकी इस बात की प्रशंसा होती थी किन्तु अब उसका वही गुण कांटे की तरह खटकने लगा और उसे इसलिए पृथक् कर दिया कि वह आर्यसमाजी है। इस प्रकार हम देखते हैं कि आर्यसमाजी का अर्थ हुआ उद्दण्ड अर्थात् निर्भीक एवं सत्यवादी।
3- जिला करनाल के तीन जेलदारों में से एक आर्यसमाजी था। उसकी डायरी में लिख दिया गया कि वह जेलदार तो अच्छा है परन्तु इसका निरीक्षण किया जाना चाहिये क्यांकि वह आर्यसमाजी है।
4- एक डिप्टी कमिश्नर ने एक नगर के प्रमुख पुरुषों को बुलाकर कहा कि यदि तुम्हारे यहां कोई आर्यसमाजी रहता है तो उसे निकाल दो। स्वयं उन प्रमुख पुरुषों में ही दो आर्यसमाजी थे। उन्होंने पूछा कि आर्यसमाजियों के विरुद्ध क्या किया जाये? डिप्टी कमिश्नर ने कहा कि कुछ करो, तुम्हारे विरुद्ध कोई भी कार्रवाई न होगी। वे बोले कि आप स्पष्ट निर्देश करें, तो उनका पालन किया जा सकता है और आप स्पष्ट कार्रवाई करने से डरते हैं तो फिर हममें यह साहस कहां है?
5- एक रेजिमेण्ट के सिपाही आर्यसमाजी थे। उन्हें यज्ञोपवीत उतार देने की आज्ञा दी गई। उन्होंने जाटसभा के द्वारा एक निवेदन पत्र भिजनवाया जिसे आपत्तिजनक समझा गया।
6- एक मुसलमान जमादार ने एक यूरोपियन लैफ्टिनेण्ट को विवाद में हरा दिया। इसकी शिकायत हुई और मुसलमान को डांटकर कहा गया कि तुम आर्यसमाजी हो। उसने उत्तर दिया कि मैं तो मुसलमान हूं। अधिकारी ने उसे और डांटा और कहा कि तुम मुसलमान आर्यसमाजी हो।
7- आर्यसमाज के प्रचारक पं0 दौलतराम झांसी गये। वहां उन्होंने सिपाहियों को भी उपदेश दिया और उनसे अनाथालय के लिए चन्दा लाये। पण्डित जी पर अभियोग चलाया और दण्ड यह दिया गया कि या तो झांसी या उसके पांच मील के अन्दर रहने वाले तथा सरकार को 1000 से 2000 की आय पर कर देने वाले दो सज्जनों की जमानतें दिलाओ या एक वर्ष के कठोर कारावास का कठोर दण्ड भुगतो। यों तो दालतराम जी आगरे के खाते पीते घर के थे परन्तु झांसी में अजनबी थे। इसलिये झांसी में कारावास भुगतना पड़ा।
8- जोधपुर में वायसराय पधारे थे। उनके मार्ग में आर्यसमाज मन्दिर पड़ता था। पुलिस ने समाज वालों से कहा कि अपना फट्टा तथा झण्डा उतार लो। उनके इन्कार करने पर पुलिस ने ये दोनों चिन्ह उतार दिये।
9- पंजाब की एक ब्रिगेड में आज्ञा दी गई कि सिपाही आर्यसमाज अथवा किसी अन्य राजनैतिक सभा में न जाया करें।
10- 10वीं जाट रेजीमेण्ट जो कि सन् 1898 में बनारस में थी, तब उसमें धार्मिक दृष्टि से आर्यसमाज का प्रभाव था। जब सन् 1899 में यह सिलचर पहुंची तो उसके (अंग्रेज) सेनापति को हिन्दी में बहुत ऐसे पत्र मिले जिन पर हिन्दी में ओ३म् लिखा था जिसे कुछ अधिकारियों ने सन्देह की नजरों से देखा। जब 1904 में यह रेजीमेण्ट कानपुर पहुंची तो उसके सैनिक आर्यसमाज के सत्संगों में जाने लगे तथा आर्यसमाज से अपना सम्पर्क बढ़ाने लगे। जब अधिकारियों को यह बात विद्रोह सा जान पड़ी तब उन्होंने उनके आर्यसमाज के सत्संगों, सभाओं में जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। साथ ही आर्यसमाजी साहित्य छावनी में लाने पर भी कठोर प्रतिबन्ध लगा दिया। सितम्बर 1905 में सुरजनसिंह नामक एक सिपाही इसी अपराध में दण्डित किया गया था कि उसने स्वदेश प्रचार के बारे में बुलाई गई आर्यसमाज की एक सभा में भाग लिया था।
पुस्तक में 24 घटनाओं में से हमने आरम्भ की 10 घटनायें ही इस लेख में प्रस्तुत की हैं। अन्य घटनायें भी यही कहानी कहती हैं कि आर्यसमाजियों को सरकारी नौकरी से हटाया गया व उन्हें प्रताड़ित किया गया। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में आर्यसमाज में शीर्ष नेता स्वामी श्रद्धानन्द ने आर्यों को सन्देश देते हुए अपने पत्र सद्धर्म प्रचारक में कहा था कि आर्य पुरुषो! क्या तुमको परमात्मा पर सच्चा विश्वास नहीं है? यदि है तो फिर दो हाथवालों की खातिर सहस्रबाहु का क्यों अनादर करते हो? दो भुजावाला जिस रोजी को छीन सकता है क्या सहस्रबाहु उससे बढ़कर रोजी तुम्हें दे नहीं सकता? इसलिये संसार को धर्म पर न्यौछावर करना ही आर्यत्व है। वैदिक धर्म की सेवा के लिए कायरों के उद्यत होने का क्या काम?
आचार्य सत्यप्रिय शास्त्री जी लिखते हैं कि स्वामी श्रद्धानन्द जी के चेतावनी भरे इन ओजस्वी शब्दों ने बिजली का सा असर किया। इसके परिणामस्वरूप् अनेक असह्य कष्ट आने पर भी आर्यसमाजी अपने निश्चित तथा स्वीकृत मार्ग से विचलित होने का विचार तक मन में भी नहीं कर सके। यह उस महान् सर्वस्व त्यागी तथा अवसर की नाड़ी को पहचानने वाले दूरदर्शी नेता के नेतृत्व की महान् सफलता थी जिसने मझधार में डूबने को तैयार आर्यसमाज की नौका को कुशल मल्लाह बनकर पार लगाने का साहसपूर्ण कार्य तथा वीरतायुक्त ऐतिहासिक कार्य किया। अन्धकार में भटक रहा आज का आर्यसमाज ऐसे निःस्पृह, दूरदर्शी नेतृत्व की आशा में है।

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