भारत पर दो सौ वर्षों तक राज करने वाले ब्रिटेन पर अब भारतवंशी का राज

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ललित गर्ग

भारतीय मूल के ऋषि सुनक एक नया इतिहास रचते हुए ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री की शपथ ले चुके हैं। उन्होंने पेनी मोरडॉन्ट को मात देते हुए जीत हासिल की है। कंजरवेटिव पार्टी का नेतृत्व करने की रेस ऋषि सुनक जीत चुके हैं। पार्टी ने उन्हें अपना नया नेता चुन लिया है। यह पहली बार हुआ है जब कोई भारतीय मूल का व्यक्ति ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बना है। हालांकि इससे ब्रिटेन पर छाए राजनीतिक और आर्थिक संकट के बादल कितने कम होंगे, यह भविष्य के गर्भ में है। लेकिन सुनक के बहाने यदि ब्रिटेन आर्थिक संकट से उबरने में सक्षम हो सका तो यह न केवल सुनक के लिये बल्कि भारत के लिये गर्व का विषय होगा। भले ही सुनक के सामने कई मुश्किल चुनौतियां और सवाल हैं, लेकिन उन्हें एक सूरज बनकर उन जटिल हालातों से ब्रिटेन को बाहर निकालना है।

भारत में सुनक की जीत पर काफी खुशी मनाई जा रही है, यह दीपावली का विलक्षण एवं सुखद तोहफा इसलिये है कि भारत पर दो सौ वर्षों तक राज करने वाले ब्रिटेन पर अब भारतवंशी का राज होगा। सुनक के रूप में उस ब्रिटेन को भारतीय मूल का पहला प्रधानमंत्री मिलने से निश्चित ही भारत का गौरव दुनिया में बढ़ा है। 42 साल के सुनक आधुनिक दौर में ब्रिटेन के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री हैं। किंग चार्ल्स तृतीय के ऑफिस ने उनके नाम पर मुहर लगा दी है। सुनक का ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनना इस मायने में भी बेहद अहम बात है कि ब्रिटेन में भारतीय मूल के लोग अल्पसंख्यक हैं। उनकी आबादी कम है। इसके बावजूद सुनक को ब्रिटेन में प्रधानमंत्री बनने का मौका मिल गया है। एक और खास बात यह है कि सुनक को ऐसी पार्टी ने अपना नेता चुना है, जो रूढ़िवादी विचारों के लिए जानी जाती है। प्रवासी लोगों के लिए कंजर्वेटिव पार्टी का रुख उदार नहीं रहा है। दुनिया में बढ़ रही कट्टरता और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाए जाने की बढ़ती हरकतों के बीच ब्रिटेन और वहां की कंजर्वेटिव पार्टी ने जो फैसला किया है, वह दुनिया को एक नई राह दिखाएगा, यह उम्मीद की जानी चाहिए। यह दुनिया की बदलती सोच का भी परिचायक है, वहीं दुनिया में भारत की सर्व-स्वीकार्यता का भी द्योतक है।

ब्रिटेन गहरे आर्थिक संकट की ओर बढ़ता दिख रहा है। महंगाई 40 साल के उच्चतम स्तर पर है। बैंक ऑफ इंग्लैंड का अनुमान है कि इस साल इंफ्लेशन 11 प्रतिशत के ऊपर जा सकती है। ऋषि सुनक इससे पहले बोरिस जॉनसन सरकार में वित्त मंत्री रह चुके हैं। उनके मंत्री रहते ब्रिटेन में महंगाई 40 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी। टैक्स भी बढ़ाए गए थे। जॉनसन मंत्रिमंडल से इस्तीफा देते हुए सुनक ने लिखा था कि कम टैक्स रेट और ऊंची ग्रोथ रेट वाली इकॉनमी तभी बनाई जा सकती है, जब ‘हम कड़ी मेहनत करने, कुर्बानियां देने और कड़े फैसले करने को तैयार हों। मेरा मानना है कि जनता सच सुनने को तैयार है। आम-जनता को यह बताया जाना चाहिए कि बेहतरी का रास्ता है, लेकिन यह आसान नहीं है।‘ सुनक ने तब जिस कड़ी मेहनत की बात की थी, वह अब उन्हें खुद करके दिखानी होगी। उनके पास जीये गये राजनीतिक कड़वे अनुभव हैं। उन अनुभवों से यदि वे ब्रिटेन की अर्थ-व्यवस्था को उबार सके तो यह समूची दुनिया के लिये एक रोशनी होगी।

निश्चित ही सुनक ने एक कांटों भरा ताज पहना है। ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है। इन असाधारण चुनौतियों से पार पाना सुनक की सबसे बड़ी अग्नि-परीक्षा है। ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था के आपूर्ति पक्ष में कमजोरी अब एक तत्काल चिंता का विषय है। जबकि उत्पादन इसकी पूर्व-कोविड प्रवृत्ति से 2.6 प्रतिशत से कम है। ऐसे में सकल घरेलू उत्पाद को अतिरिक्त 1.4 प्रतिशत की दर से बढ़ाना होगा। अर्थव्यवस्था के सामने व्यापार की शर्तें भी बड़ी चुनौती है। आने वाले दिनों में इससे घरेलू और कॉर्पोरेट दोनों क्षेत्रों पर असर पड़ेगा। आर्थिक रूप से कमजोर लोग इससे और परेशान हो सकते हैं। प्रमुख नीतिगत सवाल यह है कि इस नुकसान को कैसे आवंटित किया जाए। मांग गिरने से निकट भविष्य में बेरोजगारी बढ़ने की आशंका है। भविष्य में बढ़ने वाली बेरोजगारी पर काबू पाना एवं बढ़ती महंगाई को नियंत्रित करना भी आसान नहीं है। अध्ययन के मुताबिक, 2023 तक महंगाई उच्च स्तर पर पहुंच सकती है, जिससे निपटना चुनौतीपूर्ण होगा। एक तरफ खुदरा महंगाई दर दोहरे अंकों में होने से जीवनयापन का संकट है। दूसरी ओर रुकी हुई आर्थिक वृद्धि की समस्या है, जो बदले में कम राजस्व और उच्च ऋण की ओर ले जाती है। अब अगर सरकार मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए खर्च पर अंकुश लगाती है, तो यह आर्थिक विकास को और नीचे ले जाएगी। आईएफएस की रिपोर्ट कहती है कि यह किसी भी ब्रिटिश नीति निर्माता के लिए सबसे अधिक चिंताजनक है।

इन आर्थिक चुनौतियों के साथ-साथ ऋषि सुनक के सामने सबसे पहली राजनीतिक चुनौती तो यही है कि उन्हें साबित करना है कि वह पार्टी को नियंत्रित कर सकते हैं। कंजरवेटिव पार्टी के पास संसद में बहुमत है लेकिन वह ब्रेग्जिट समेत तमाम मुद्दों पर बंटी हुई है। ऐसे में पार्टी को एक करना भी एक चुनौती है। आने वाले दिनों में पार्टी के ही कुछ लोगों द्वारा हाई टैक्स का विरोध किया जा सकता है। लोग स्वास्थ्य और रक्षा जैसे क्षेत्रों के खर्च में कटौती का भी विरोध कर सकते हैं। सुनक को ऐसे स्वरों को भी संभालना होगा, संतुलित राजनीति का नया अध्याय लिखते हुए ब्रिटेन पर छाये निराशा के बादल का छांटना होगा। गहन समस्याओं एवं निराशाओं के बीच प्रधानमंत्री का ताज धारण करके सुनक ने साहस एवं हौसलों का परिचय दिया है। एक कर्मयोद्धा की भांति इन सब समस्याओं को सुलझाने के लिये अभिनव उपक्रम करने होंगे।

ऋषि सुनक स्वयं को भारतीय एवं हिंदू कहकर गर्व महसूस करते हैं और अपनी धार्मिक पहचान को लेकर वह काफी मुखर रहते हैं। वह नियमित रूप से मंदिर जाते हैं और उनकी बेटियों, अनुष्का और कृष्णा की जड़ें भी भारतीय संस्कृति से जुड़ी हैं। सुनक जब सांसद बने थे तब उन्होंने भगवत गीता की शपथ ली थी। एक रैली में सुनक ने कहा था कि भले ही वह एक ब्रिटिश नागरिक हैं, उन्हें अपने ‘हिंदू होने पर गर्व’ है। कैलिफोर्निया की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में एमबीए की पढ़ाई के दौरान सुनक की मुलाकात उनकी फैशन डिजाइनर अक्षता मूर्ति से हुई थी। अगस्त 2009 में अक्षता और ऋषि शादी के बंधन में बंध गए। अक्षता इंफोसिस के को-फाउंडर और भारत के सबसे अमीर लोगों की सूची में शामिल नारायण मूर्ति की बेटी हैं। सुनक कई बार इसका जिक्र कर चुके हैं कि उन्हें अपने सास और ससुर पर बेहद गर्व है।

ऋषि सुनक को हाउस ऑफ कॉमन्स में सबसे अमीर शख्स कहा जाता है जिनकी कुल संपत्ति 730 मिलियन पाउंड है। कुछ रिपोर्ट्स तो यहां तक दावा करती हैं उनकी पत्नी ब्रिटेन के सम्राट से भी ज्यादा अमीर हैं। माना जाता है कि दंपति की कुल संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा इंफोसिस की हिस्सेदारी से आता है। हालांकि 2015 में राजनीति में कदम रखने से पहले फाइनेंस के क्षेत्र में सुनक का एक सफल करियर रहा है। दंपति के पास लंदन, कैलिफोर्निया, सैंटा मोनिका और यॉर्कशायर में कई घर हैं। अक्सर सुनक और अक्षता मूर्ति अपनी संपत्ति को लेकर सुर्खियां बटोर चुके हैं।

साल 2015 में यॉर्कशायर की रिचमंड सीट जीतकर टोरी नेता ऋषि सुनक का राजनीतिक सफर शुरू हुआ। फरवरी 2020 में साजिद जाविद के इस्तीफे के बाद सुनक चांसलर ऑफ एक्सचेकर के पद पर पहुंच गए। सुनक के कम अनुभव को लेकर कुछ लोगों को उन पर संदेह था लेकिन कोविड महामारी के दौरान आर्थिक मोर्चे को सफलतापूर्वक संभालकर उन्होंने अपने आलोचकों को गलत साबित कर दिया। कुछ महीनों पहले तक सुनक बोरिस जॉनसन कैबिनेट में वित्तमंत्री थे लेकिन उनके इस्तीफे ने ब्रिटेन में एक राजनीतिक परिवर्तन की नींव रखी। आज टैक्स-कटौती के लुभावने वादों के बजाय महंगाई को कम करने और अर्थव्यवस्था को बेहतर स्थिति में लाने की अपनी रणनीति की बदौलत ऋषि सुनक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं।

आधुनिक उदारवादी लोकतंत्र में परंपरावादी राजनीतिक दलों के अंतर्द्वंद्व कितने चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं, इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण ब्रिटेन है। डेढ़ महीना पहले ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बनीं लिज ट्रस ने आर्थिक अस्थिरता के दौर में देश की अपेक्षाओं पर खरा न उतर पाने की आशंका जाहिर करते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। पिछले कुछ वर्षों में ब्रिटिश राजनीति आप्रवासन और महंगाई जैसे मुद्दों पर अनिर्णय की स्थिति में रही है, जिसके चलते देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हुई है और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी है। 2019 में तत्कालीन प्रधानमंत्री टेरीजा मे ने ब्रेक्जिट को लेकर यूरोपीय संघ के साथ समझौते को संसद से पास न करा पाने की वजह से इस्तीफा दिया था। फिर बोरिस जानसन प्रधानमंत्री बने थे। उसके बाद कोरोना और रूस-यूक्रेन युद्ध से उपजी समस्याओं का सामना ब्रिटेन की जनता को करना पड़ा। उनकी नीतियों को लेकर कंजर्वेटिव पार्टी में ही सवाल खड़े हुए और अंततः उन्हें इस वर्ष जुलाई में पद से हटना पड़ा। उनके बाद कंजर्वेटिव पार्टी ने लिज ट्रस को अपना नेता चुना, जिनकी प्राथमिकता राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना, आप्रवासन और महंगाई को लेकर देश में बनी ऊहापोह की स्थिति को दूर करना था। राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना के अंतर्गत छियासठ लाख से ज्यादा लोग आते हैं, लेकिन उनका मुफ्त इलाज सुनिश्चित नहीं हो रहा है और इससे लोग नाराज हैं। देश में सरकारी कर बढ़ाने की आशंकाओं के बाद सत्तारुढ़ कंजर्वेटिव पार्टी का विरोध बढ़ा है। इसका एक प्रमुख कारण कंजर्वेटिव पार्टी के भीतर आपसी विवाद भी रहे हैं, जो राजनीतिक अदूरदर्शिता के रूप में सामने आते हैं।

वैश्विक सहयोग और विविधता को स्वीकार न कर पाने के चलते उदारवादी लोकतंत्र ब्रिटेन, गहरे संकट में फंसता दिखाई दे रहा है। कंजर्वेटिव पार्टी की वैश्विक बदलावों के साथ सामंजस्य बिठा पाने में नाकामी देश में राजनीतिक अस्थिरता के रूप में सामने आयी और मंदी से परेशान ब्रिटिश जनता देश में मध्यावधि चुनाव भी नहीं चाहती, लेकिन सत्तारुढ़ कंजर्वेटिव पार्टी के अंतर्द्वंद्व से देश की समस्याओं में इजाफा ही हो रहा है। इन समस्याओं के बीच सुनक एक रोशनी के रूप में उभरे हैं, देखना है कि उनका शासन काल ब्रिटेन को नयी शक्ति, नया वातायन दे पाता है या नहीं? 200 साल तक भारत पर राज करने वाले अंग्रेजों के मुल्क को अब एक भारतवंशी किस रूप में चला पायेगा?

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