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भारत को सोने की चिड़िया कहलाने वाले सम्राट विक्रमादित्य

उगता भारत ब्यूरो

एक समय सोने की चिड़िया कहलाता था पर क्या आपको पता है की भारत सोने की चिड़िया किस राजा के काल में कहलाया, क्या आपको पता है की एक ऐसा राजा था जिसका साम्राज्य अरब से लेकर टर्की तक फैला हुआ था।

किस राजा के शासन काल में विक्रम संवत की शुरुआत हुई?

किस हिंदु राजा ने लगभग पूरे विश्व पर राज किया?

ईशा मसीह के समय में कौन सा राजा भारत में राज्य करता था?

किस राजा ने अरब में मक्केश्वर जिसे अब मक्का कहते हैं, का निर्माण करवाया?

किस राजा के शासन काल में धनवंतरी, कालीदास और वराहमिहिर जैसे विद्वान थे?

इन सारे प्रश्न का उत्तर एक ही है सम्राट विक्रमादित्य। उस वक्त भारत में प्रति व्यक्ति की जीडीपी 1305 अमेरिकी डॉलर थी (तुलनात्मक रूप से) जो की उस समय अमेरिका, जापान, चीन और ब्रिटेन से भी अधिक थी। और यही अकूत संपदा ही भारत में विदेशी आक्रमण का कारण बनी।

विक्रमादित्य का जन्म

सम्राट विक्रमादित्य का जन्म 101 ईशा पूर्व हुआ था और इन्होंने लगभग 100 वर्ष तक राज किया। महाराजा विक्रमादित्य का वर्णन स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में भी मिलता है।

उज्जैन के राजा थे गन्धर्व सेन जिनकी तीन संताने थी, सबसे बड़ी लड़की मैनावती, उससे छोटा लड़का भ्रितहरी और सबसे छोटा विक्रमादित्य।

ईशु मसीह राजा विक्रमादित्य के ही समकालिक थे। राजा विक्रमादित्य का शासन अरब और मिस्त्र तक फैला हुआ था। प्राचीन अरब साहित्य में भी विक्रमादित्य का वर्णन मिलता है। विक्रमादित्य प्राचीन भारतीय नगरी उज्जयिनी ( उज्जैन) के राजा थे और वो पूरे विश्व में अपनी उदारता, ज्ञान और वीरता के लिए प्रसिद्ध थे।

इन्होंने शको को हराया था। नेपाली राजवंशवाली के अनुसार नेपाल के राजा अंशुवर्मन के समय में राजा विक्रमादित्य के नेपाल यात्रा का भी उल्लेख है।

राजा विक्रमादित्य के बाद में कई राजाओं ने ये उपाधि रख ली और ये बहुत ही सम्मान की उपाधि मानी जाती थी जैसे श्री हर्ष, शुद्रक, हल, चंद्रगुप्त द्वितीय, शिलादित्य, यशोवर्धन आदि ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। विक्रम सम्वत का आरंभ भी राजा विक्रमादित्य ने 57 ईसा पूर्व शुरू किया।

विक्रमादित्य का राज्य:

आज से 2078 साल पहले सम्पूर्ण विश्व पर एक हिंदू चकवर्ती क्षत्रिय सम्राट विक्रमादित्य का शासन था। आप विक्रमादित्य के शाशन काल का नक्शा देख कर ही उनके शासन काल की भव्यता का अंदाजा लगा सकते हैं।

आज का पूरा भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तजाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्की, अफ्रीका, अरब, नेपाल, थाईलैंड, इंडोनेशिया, कंबोडिया, श्रीलंका, चीन और रोम तक राजा विक्रमादित्य का राज्य फैला हुआ था।

उन्होंने रोम के राजा और शक राजाओं को मिलाकर 95 देश जीते। लोकतंत्र की शुरुआत राजा विक्रमादित्य ने ही किया था। परमार वंश के राजपूत राजा विक्रमादित्य के शासनकाल में सेनापति प्रजा खुद चुनती थी।

आजकल जो शक्ति अमेरिका या रूस के राष्ट्रपति के पास है वही शक्ति राजा विक्रमादित्य के सेनापति के पास होती थी लेकीन वो सारा काम विक्रमादित्य की आज्ञा से ही करते थे। विक्रमादित्य ने खुद को राजा नही बल्कि प्रजा का सेवक घोषित कर रखा था।

पहला शक राजा मास था उसने ईशा की सदी से पूर्व गांधार को जीत लिया था। उसके बाद एजेस नाम का राजा ने गद्दी संभाली और उसने शक के राज्य को आगे बढ़ाकर पंजाब तक कर दिया। शक राजा गवर्नर प्रणाली से राज्य चलाते थे। इन्हीं शक राजाओं से प्रेरित गवर्नर “क्षत्रप” कहलाते थे।

इन गवर्नरों ने तकशीला से मथुरा तक राज्य किया है, ये शक लोग विंधयाचल पार करके दक्षिण की ओर भी गए। इसीलिए विक्रमादित्य को मालवा और गुजरात के आस पास शकों (क्षत्रापों) से लड़ना पड़ा। विक्रमादित्य ने इनको बुरी तरह हराया।

विक्रमादित्य मालव राजपूत जाति से थे जो आज परमार कहलाते हैं। इनका वर्णन हरिवंश पुराण में है इनको चंद्रवंशी क्षत्रिय कहा जाता था। मालव वंश के लोगों ने महाभारत में कौरवों का साथ दिया था।

अभी भी कुछ मल्ल वंशी क्षत्रिय नेपाल की तराई में रहते हैं। विक्रमादित्य ने शकों, हूणो को मारकर अरब तक खदेड़ दिया और शकारी की उपाधि ग्रहण की। विक्रमादित्य ने अरब में मक्केश्वर महादेव की स्थापना की। अरब साहित्य और अरब इतिहास में इसका वर्णन है।

हालंकि मुस्लिम शासकों ने बहुत जगह से उनका वर्णन हटा दिया है। ऐसा कहा जाता है कि ‘अरब’ का वास्तविक नाम ‘अरबस्थान’ है. ‘अरबस्थान’ शब्द आया संस्कृत शब्द ‘अटवस्थान’ से, जिसका अर्थ होता है ‘घोड़ों की भूमि, और हम सभी को पता है कि ‘अरब’ घोड़ों के लिए प्रसिद्ध है। विक्रमादित्य ने तत्कालीन रोमन सम्राट को बंदी बना लिया था तथा उनको उज्जैन ला कर यहां की सड़कों पर घुमाया था।

विक्रमादित्य की वीरता:

शुग वंश के बाद शकों ने पंजाब के रास्ते भारत में प्रवेश किया और भारत को तहस नहस कर डाला था। विक्रमादित्य ने इन शकों को पंजाब के रास्ते वापस भगाया और पुष्यमित्र शुंग की मृत्यू के बाद जो हिंदु शकों का शिकार हो रहे थे उनको फिर से संगठित करके नई जान डाल दी।

विक्रमादित्य जमीन पर सोते थे और अल्पाहार ही लेते थे इन्होंने योग के बल पर अपना शरीर वज्र सा बना दिया था।
विक्रमादित्य की पांच पत्नियां थीं, मलायावती, मदनलेखा, पद्मिनी, चेल्ल और चिल्लमहादेवी।

इनके दो पुत्र विक्रमचारित और विनयपाल तथा दो पुत्रियां प्रियंगुमंजरी और वसुंधरा थी। इनके सेनापति विक्रमशक्ति और चंद्र थे। भगवान श्री राम के बाद सबसे प्रभावशाली राजा विक्रमादित्य ही हुए हैं जिन्होंने भारत में राम राज की स्थापना की।

एक समय ऐसा था जब बौद्ध और जैन धर्म के प्रसार के कारण पूरे भारत में लोगों ने अहिंसा का मार्ग अपना लिया था। विदेशी लगातार हमले कर रहे थे और भारत के लोग बहुत परेशान थे।

शक, हूण और कुषाण शासकों ने आक्रमण करके खूब आतंक मचा रखा था। ऐसे में विक्रमादित्य ने इन सबको हराकर भारत की प्रजा को बचाए रखा। बनारस के शिव मन्दिर का पुनः निर्माण भी विक्रमादित्य ने करवाया।

भारत की संस्कृति अगर सुरक्षित है तो वो विक्रमादित्य के कारण। अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया था इस कारण भारत में सनातन धर्म लगभग समाप्ति की कगार पर आ गया था। क्युकी लोग बौद्ध और जैन में कन्वर्टेड हो रहे थे।

रामायण, महाभारत और गीता जैसे ग्रन्थ खोने लगे थे। विक्रमादित्य ने उनको पुनः खोज करवा कर स्थापित करवाया। विक्रमादित्य ने पूरे विश्व में विष्णु और शिव जी के मन्दिर बनवाए।

अगर विक्रमादित्य सनातन धर्म की रक्षा ना करते तो शायद आज भारत पर एक भी हिंदू ना बचता क्युकी सारे लोग बौद्ध होने लगे थे और बौद्ध होने के कारण सब अहिंसा का पालन करते हुए कोई भी अस्त्र शस्त्र या सेना नही रखते थे।

जिसके कारण विदेशी आक्रमण बहुत हो रहे थे। विक्रमदित्य ने ही फिर से सनातन धर्म की रक्षा का बीड़ा उठाया। विक्रमादित्य ने भी श्री गुरु गोरक्ष नाथ जी से दीक्षा ली थी।

भारत बना सोने की चिड़िया:

विक्रमादित्य के काल में भारत का कपड़ा विदेशी व्यापारी सोने के वजन से खरीदते थे इससे भारत में इतना सोना आ गया की विक्रमादित्य के काल में सोने के सिक्के चलते थे।

विदेशी व्यापारी कई चीजों के बदले सोना देते थे। आप अंदाजा लगा सकते हैं की पद्मनाभमान स्वामी के मंदिर का खजाना, कोहिनूर हीरा, मोर सिंघाहन आदि में कितना खज़ाना था।

भारत हमेशा से कृषि प्रधान देश रहा है तो अन्न की कमी नहीं थी जो भी अधिक उत्पादन होता था उसे बाहर भेज दिया जाता था। भारत में अनेक खदाने थी जिससे हथियार, सिक्के और अन्य धातु बनाने में उपयोग में लाया जाता था।

कैलेंडर भी विक्रमादित्य का स्थापित किया हुआ है। ज्योतिष गड़ना जैसे: हिंदी सम्वत, वार, तिथियां, राशि, नक्षत्र, गोचर आदि उन्ही के काल में अच्छी तरह उपयोग की गई। कालीदास, धनवंतरी, वराहमिहिर जैसे विद्वान विक्रमादित्य के दरबार में थे।

विक्रमादित्य का शासन और कार्य

विक्रमादित्य का शासन अरब तक था और रोमन के सम्राट से उनकी प्रतिद्वंद्धा चलती थी। विक्रमादित्य ने रोम के शासक जूलियस सीजर को हराकर उज्जैन की सड़कों पर घुमाया था फिर उसे वापस छोड़ दिया था

जूलियस सीजर ने विक्रम सम्वत का प्रचलन रोक दिया था और येरुशलम, मिस्त्र और अरब पर आक्रमण कर दिया था। रोमन ने अपनी इस हार को छुपाने के लिए इस घटना को इतिहास में बहुत घुमा फिरा कर प्रस्तुत किया जिसमे रोमानो ने बताया की जल दस्यु ने सीजर का अपहरण कर लिया और बाद में जूलियस सीजर अपनी वीरता से वापस आने में सफल हुआ।

रोमानों ने विक्रम संवत की नकल करके नया रोमन कैलेंडर भी बनाया जिसको ईसाइयों ने यीशु के जन्म के बाद अपना लिया। जिसे हम आज ईसा पूर्व और ईसा बाद मानते हैं।

विक्रमादित्य के समय में अरब में यमन, इराक आसुरी, ईरान में पारस्य और भारत में आर्य सभ्यता के लोग रहते थे। यह असुर शब्द असुरी से बना है और जो इराक के पास सीरिया है वह भी असुरिया से प्रेरित है।

विक्रमादित्य के काल में विश्व भर में शिवलिंगों का जीर्णो उद्धार किया गया। कर्क रेखा पर निर्मित ज्योतिर्लिंग में प्रमुख थे मक्का के मक्केशवर ( मक्का में आज भी वो शिवलिंग स्थित है), गुजरात का सोमनाथ, उज्जैन का महाकालेश्वर और काशी में विश्वनाथ मन्दिर।

विक्रमादित्य ने कर्क रेखा के आस पास 108 शिवलिंगों का निर्माण करवाया। विक्रमादित्य ने ही नेपाल के पशुपतिनाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ मंदिरो को फिर से बनवाया। इसके लिए उन्होंने मौसम वैज्ञानिकों, खगोल वैज्ञानिक और वास्तुविदो से भरपूर मदत ली थी।

बौद्ध, मुगल, अंग्रेज आदि के द्वारा नष्ट करने के बाद भी भारत की संस्कृति के प्रमाण अन्य,अन्य भाषाओं और प्राचीन जगहों पर मिल जाते है। हालंकि मुगलों और अंग्रेजो ने हमारी संस्कृति का 80% से भी ज्यादा प्रमाण नष्ट कर दिया था।

विक्रमादित्य के नौ रत्न:

हमारे इतिहास में अकबर के नौरत्न का जिक्र हर जगह है और विक्रमादित्य के नौ रत्नों का जिक्र कहीं नहीं किया गया। जबकि अकबर ने विक्रमादित्य की नकल की थी। आज भी बहुत से इतिहासकार मानते हैं की अकबर के दरबार में कोई नौ रत्न नहीं थे। वो सिर्फ़ मुगलों ने अकबर को महान बनाने के लिए इतिहास में लिख दिया।

बहुत से इतिहासकार मानते है की बीरबल नामक पात्र असली में नहीं था वो सिर्फ मुगल द्वारा बनाया गया था और बीरबल का पात्र को चुराया गया था विजयनगर साम्राज्य के प्रकांड मंत्री तेनालीराम से। विक्रमादित्य के राज्य में नौ रत्न थे जिनके बारे में हमको बहुत अधूरा सा पता है। आपको बताते हैं वो नौ रत्न कौन कौन थे।

1) धनवंतरी

धनवंतरी ऋषि को आर्युवेद का जनक माना गाय है। इन्ही के नाम पर धनवंतरी के माता पिता ने इनका नाम धनवंतरी रखा। इन्होंने आयुर्वेद के नौ ग्रंथो को रचा। कृपया धनवंतरी ऋषि और धनवंतरी में कन्फ्यूज ना हो। दोनो अलग अलग है। धनवंतरी ऋषि विष्णु जी का रूप थे जबकि धनवंतरी जी विक्रमादित्य के शासन काल में आयुर्वेद के बहुत योग्य चिकित्सक थे

2) छड़पक

ये एक संन्यासी थे इन्होंने ही भिक्षाटन और नानार्थकोश की रचना की

3) अमर सिंह

ये एक प्रकांड विद्वान थे। इनके बारे में बोधगया में कई शिलालेख भी मिले है। इन्होंने अमरकोष ग्रन्थ की रचना की।

4) शंकु

ये संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। इनका काव्यग्रंथ भुवनाभुदायम बहुत प्रसिद्ध था। इसके बारे में आज भी पुरातत्वविद खोज कर रहे हैं और पड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

5) वेताल भट्ट

विक्रम और बेताल कहानी के रचियता यही थे और उन्होंने इसे संस्कृत में रचा था

6) घटखपर्र

माना जाता है की इनकी प्रतिज्ञा थी की जो कवि अनुप्रास और यमक में इनको पराजित कर देगा उनके यहां वे घड़े से पानी भरेंगे। इन्होंने घटखपर्र और नीतिसार का संस्कृत में रचना की।

7) कालीदास

कालीदास जी के बारे में कुछ बताने की जरूरत नहीं है। मां काली के दर्शन के कारण ही इनका नाम कालीदास पड़ा। इन्होंने बहुत से ग्रंथो ( अभिज्ञान शकुंतलम, विक्रमोवर्षियम, रघुवंशम, कुमारसम्भव, मेघदूत, रितुसंहार) और काव्यों की रचना की। जिसमे से शकुंतला उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना मानी जाती है।

8) वराहमिहिर

भारतीय ज्योतिष शास्त्र के प्रकांड विद्वान थे। सूर्य सिद्धांत, ब्रस्पति संहिता, पंच सिद्धांति, लघु जातक, समास संहिता, विवाह पटल, योग यात्रा आदि की रचना की।

9) वर्रुची

कालीदास की भांति ही वर्रुचि भी महान काव्यकर्ता थे। सादुक्ततिकर्नामृत, शुबाशितावाली, सारडर्र संहिता आदि की रचना की। अब तक आप समझ गए होगें की हमारा भारतीय इतिहास कितना गौरवपूर्ण रहा है।

किंतु मुस्लिम आक्रमणकारियों और अंग्रेजो द्वारा हमारे सम्पूर्ण इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया और बहुत से मूल ग्रंथ नष्ट कर दिए गए अन्यथा हिंदु धर्म की वैज्ञानिकता और विशालता का अनुमान लगाना भी कठिन हो जाता। विक्रमादित्य तो सिर्फ़ एक राजा थे हमारा इतिहास ऐसे ना जाने कितने राजाओं से भरा पड़ा था।
साभार

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