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इतिहास के पन्नों से

बेमिसाल है लाल बहादुर शास्त्री का व्यक्तित्व

जयंती विशेषः नैतिकता की मिसाल थे लाल बहादुर शास्त्री

श्वेता गोयल

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1940 के दशक में लाला लाजपत राय की संस्था ‘सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ द्वारा गरीब पृष्ठभूमि वाले स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को जीवनयापन हेतु आर्थिक मदद दी जाया करती थी। उसी समय की बात है, जब लाल बहादुर शास्त्री जेल में थे।

वर्ष 1964 में प्रधानमंत्री बनने से पहले लाल बहादुर शास्त्री विदेश मंत्री, गृहमंत्री और रेल मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद संभाल चुके थे। ईमानदार छवि और सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले लाल बहादुर शास्त्री नैतिकता की मिसाल थे। जब शास्त्री जी प्रधानमंत्री बने, तब उन्हें सरकारी आवास के साथ इंपाला शेवरले कार भी मिली थी लेकिन उसका उपयोग वे बेहद कम किया करते थे। किसी राजकीय अतिथि के आने पर ही वह गाड़ी निकाली जाती थी। एक बार शास्त्री जी के बेटे सुनील शास्त्री किसी निजी कार्य के लिए यही सरकारी कार उनसे बगैर पूछे ले गए और अपना काम पूरा करने के पश्चात् कार चुपचाप लाकर खड़ी कर दी। जब शास्त्री जी को इस बात का पता चला तो उन्होंने ड्राइवर को बुलाकर पूछा कि गाड़ी कितने किलोमीटर चली? ड्राइवर ने बताया कि गाड़ी कुल 14 किलोमीटर चली है। उसी क्षण शास्त्री जी ने उसे निर्देश दिया कि रिकॉर्ड में लिख दो, ‘चौदह किलोमीटर प्राइवेट यूज’। उसके बाद उन्होंने पत्नी ललिता को बुलाकर निर्देश दिया कि निजी कार्य के लिए गाड़ी का इस्तेमाल करने के लिए वह सात पैसे प्रति किलोमीटर की दर से सरकारी कोष में पैसे जमा करवा दें।

प्रधानमंत्री बनने के बाद शास्त्री जी पहली बार अपने घर काशी आ रहे थे, तब पुलिस-प्रशासन उनके स्वागत के लिए चार महीने पहले से ही तैयारियों में जुट गया था। चूंकि उनके घर तक जाने वाली गलियां काफी संकरी थी, जिसके चलते उनकी गाड़ी का वहां तक पहुंचना संभव नहीं था, इसलिए प्रशासन द्वारा वहां तक रास्ता बनाने के लिए गलियों को चौड़ा करने का निर्णय लिया गया। शास्त्री जी को यह पता चला तो उन्होंने तुरंत संदेश भेजा कि गली को चौड़ा करने के लिए कोई भी मकान तोड़ा न जाए, मैं पैदल ही घर जाऊंगा।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1940 के दशक में लाला लाजपत राय की संस्था ‘सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ द्वारा गरीब पृष्ठभूमि वाले स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को जीवनयापन हेतु आर्थिक मदद दी जाया करती थी। उसी समय की बात है, जब लाल बहादुर शास्त्री जेल में थे। उन्होंने उस दौरान जेल से ही अपनी पत्नी ललिता को एक पत्र लिखकर पूछा कि उन्हें संस्था से पैसे समय पर मिल रहे हैं या नहीं और क्या इतनी राशि परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त है? पत्नी ने उत्तर लिखा कि उन्हें प्रतिमाह पचास रुपये मिलते हैं, जिसमें से करीब चालीस रुपये ही खर्च हो पाते हैं, शेष राशि वह बचा लेती हैं। पत्नी का यह जवाब मिलने के बाद शास्त्री जी ने संस्था को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने धन्यवाद देते हुए कहा कि अगली बार से उनके परिवार को केवल चालीस रुपये ही भेजे जाएं और बचे हुए दस रुपये से किसी और जरूरतमंद की सहायता कर दी जाए।

रेलमंत्री रहते हुए शास्त्री जी एक बार रेल के ए.सी. कोच में सफर कर रहे थे। उस दौरान वे यात्रियों की समस्या जानने के लिए जनरल बोगी में चले गए। वहां उन्होंने अनुभव किया कि यात्रियों को कितनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इससे वे काफी नाराज हुए और उन्होंने जनरल डिब्बे के यात्रियों को भी सुविधाएं देने का निर्णय लिया। रेल के जनरल डिब्बों में पहली बार पंखा लगवाते हुए रेलों में यात्रियों को खानपान की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए पैंट्री की सुविधा भी उन्होंने शुरू करवाई। 2 अक्तूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में जन्मे भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की आज हम जयंती मना रहे है। उनके बाद कई प्रधानमंत्रियों ने देश की बागडोर संभाली लेकिन उनके जितना सादगी वाला कोई भी दूसरा प्रधानमंत्री देखने को नहीं मिला। सही मायनों में शास्त्री जी को उनकी सादगी, कुशल नेतृत्व और जनकल्याणकारी विचारों के लिए ही स्मरण किया जाता है और सदैव किया भी जाता रहेगा। उनके पद्चिन्हों पर चलने का संकल्प लेना ही सच्चे अर्थों में उन्हें हमारी श्रद्धांजलि होगी ।

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