अध्यक्ष की बजाय कांग्रेस को चाहिए मैनेजर

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वेदप्रताप वैदिक

राजस्थान के कांग्रेसी विधायकों ने जो कुछ किया है, मुझे याद नहीं पड़ता कि भारत के किसी भी राजनीतिक दल में कभी इस तरह की बगावत हुई है। इसे आप बगावत कह सकते हैं, लेकिन वास्तव में यह भारत के राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का शंखनाद है। भारत के लगभग सभी राजनीतिक दल पिछले कुछ दशकों में प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां बन चुके हैं। हमारी राजनीतिक पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र समाप्तप्राय हो गया है। इनमें से ज्यादातर पार्टियां मां-बेटा पार्टी, भाई-भाई पार्टी, बाप-बेटा पार्टी, पति-पत्नी पार्टी या बुआ-भतीजा पार्टी बन गई हैं। देश की अखिल भारतीय और उससे भी ज्यादा प्रादेशिक पार्टियों में नेता की इच्छा ही पार्टी-कानून माना जाता है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने और सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने का जो इरादा सोनिया गांधी और राहुल गांधी का था, वह अब अधर में लटक गया है।

दोनों पदों की इच्छा

गहलोत को कांग्रेस-अध्यक्ष बनने में जरा भी संकोच नहीं था। वह कांटों के इस ताज को अपने सिर पर धरने के लिए तैयार थे लेकिन चाहते थे कि मुख्यमंत्री भी बने रहें। लेकिन केरल में उनके पहुंचते ही राहुल गांधी ने कांग्रेस में ‘एक व्यक्ति, एक पद’ का मंत्रोच्चार कर दिया। बेचारे गहलोत क्या करते? वह चुप होकर बैठ गए, लेकिन उनके समर्थक 92 विधायकों ने अपने केंद्रीय नेताओं को धता बता दी। उन्होंने दिल्ली से आए पार्टी-प्रतिनिधियों द्वारा आहूत विधायकों की बैठक का ही बहिष्कार कर दिया। उन्हें न तो इन प्रतिनिधियों से कोई शिकायत थी और न ही वे सोनिया या राहुल के विरोधी हैं। उन्होंने कहा है कि ये प्रतिनिधि हम पर सचिन पायलट को मुख्यमंत्री के रूप में थोपने आए थे। इसीलिए हमने विधानसभा अध्यक्ष को अपने इस्तीफे सौंप दिए। दिल्ली से जयपुर गए पार्टी-प्रतिनिधियों ने अपनी जो रिपोर्ट पार्टी अध्यक्ष को पेश की है उसमें तीन विधायकों पर अनुशासनहीनता का आरोप लगाया है। तीनों को नोटिस भेज दिया गया है।

लोकतंत्र का तकाजा

यदि लोकतंत्र में हर फैसला बहुमत से होता है तो राजस्थान के इन कांग्रेसी विधायकों का दोष क्या है? उनका प्रचंड बहुमत याने तीन-चौथाई से भी ज्यादा जिस बात का समर्थन कर रहे हैं, उसे अनुशासनहीनता कैसे कहा जा सकता है? यदि ये विधायक अपनी पार्टी छोड़कर किसी अन्य पार्टी में शामिल हो जाते तो इनका वह अतिवादी कार्य भी संवैधानिक ही माना जाता। दल-बदल कानून भी उसकी अनुमति देता है। इसमें शक नहीं है कि राजस्थान के इन कांग्रेसी विधायकों ने अपने दो शीर्ष नेताओं का अंधानुकरण नहीं किया है, लेकिन उन्होंने अपनी स्वतंत्र राय को अमली जामा पहनाकर देश की सभी पार्टियों के कार्यकर्ताओं को यह संदेश दे दिया है कि ऊपर से मनचाहे लोगों को थोपने का जमाना लद गया है।

अब कांग्रेस-नेतृत्व की स्थिति विचित्र हो गई है। उसे समझ नहीं आ रहा कि वह क्या करे। उसकी दुविधा और असमंजस के कई पहलू हैं:

एक बड़ा सवाल यह है कि अब गहलोत को कांग्रेस-अध्यक्ष बनाया जाए या न बनाया जाए। यदि उन्हें कांग्रेस-अध्यक्ष बनाया जाता है तो राजस्थान का मुख्यमंत्री किसे बनाया जाएगा?
उधर, इस्तीफा देने वाले विधायक पूछ रहे हैं कि कांग्रेस-अध्यक्ष का चुनाव 17 अक्टूबर को होना है तो उसके 20 दिन पहले ही गहलोत को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने की जरूरत क्या है?
सवाल यह भी है कि कांग्रेस-नेतृत्व यह मानकर क्यों चल रहा है कि गहलोत ही चुनाव में जीत जाएंगे? अगर वह जीत गए तो मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा अपने आप दे देंगे। क्या सोनिया गांधी और राहुल को शक है कि अध्यक्ष बनने के बाद गहलोत अपनी चलाने की कोशिश करते हुए कह सकते हैं कि वह दोनों पदों पर बने रहेंगे? अगर हां तो अध्यक्ष बनने के बाद वह कई और तरह से मनमानी कर सकते हैं। उसका क्या इलाज होगा?
लेकिन यह भी है कि अगर पहले एक व्यक्ति प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष, दोनों पदों पर एक साथ रह सकता था तो अब एक मुख्यमंत्री कांग्रेस अध्यक्ष का पद क्यों नहीं संभाल सकता?
इन तमाम सवालों के बीच बागी विधायक अपनी इस बात पर कायम हैं कि जिन लोगों ने 2020 में सचिन पायलट के साथ मिलकर गहलोत सरकार को पलटने की कोशिश की थी, उनमें से किसी को मुख्यमंत्री न बनाया जाए। केंद्र के जो प्रतिनिधि जयपुर भेजे गए थे, उन्हें सारे विधायकों से सामूहिक तौर पर खुलकर बात करनी थी, न कि एक-एक विधायक को बुलाकर उसके कान में दिल्ली की फूंक मारनी थी।

इस उठापटक के बीच राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा हाशिए पर चली गई है। ‘कांग्रेस जोड़ो’ असली मुद्दा बन गया है। राहुल गांधी ने केरल से ‘एक आदमी, एक पद’ का नारा दिया था। अब आदमी और पद, दोनों ही हवा में लटक रहे हैं। कांग्रेस-अध्यक्ष और गहलोत में अभी भी संवाद जारी है। लेकिन अंदेशा यह है कि अब अध्यक्ष पद के लिए किसी नए नाम की खोज शुरू हो गई है। वास्तव में कांग्रेस को अध्यक्ष की जरूरत ही नहीं है। उसके मालिकों को किसी आज्ञाकारी प्रबंधक की जरूरत है। उसके लिए दर्जनों लोग तैयार हैं। राजस्थान की घटनाओं ने यह डर पैदा कर दिया है कि गहलोत जैसा अनुभवी, विनम्र और लोकप्रिय नेता कहीं असली अध्यक्ष ही न बन बैठे?

क्या करेंगे विधायक

यदि गहलोत न अध्यक्ष बन पाते हैं और न ही मुख्यमंत्री रह पाते हैं तो राजस्थान-कांग्रेस की दशा वही होगी, जो पंजाब कांग्रेस की हो गई है। या तो कांग्रेसी विधायक नई पार्टी बना लेंगे या बीजेपी में शामिल हो जाएंगे या इस्तीफा देकर नए चुनाव की नौबत खड़ी कर देंगे। कांग्रेस लगभग ऐसी ही दुविधा में कर्नाटक और छत्तीसगढ़ में भी फंसी हुई है। राजस्थान के विधायकों के इस सत्साहस ने हमारी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र का बिगुल तो बजाया ही है, उन्होंने गहलोत की प्रतिष्ठा में चार चांद भी लगा दिए हैं। गहलोत पार्टी अध्यक्ष बनें या न बनें और मुख्यमंत्री रहें या न रहे, वे महानायक जरूर बन गए हैं।

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