भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने हेतु नागरिकों में “स्व” का भाव जगाना आवश्यक

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किसी भी देश में सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए “स्व” आधारित सामूहिक दृष्टिकोण होना आवश्यक है। भारत के संदर्भ में “स्व” का मूल हिंदुत्व में ही निहित है, और भारत में “स्व” आधारित इतिहास मिलता है। इस दृष्टि से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम भी एक आध्यात्मिक एवं नैतिक कार्य था, क्योंकि यह भारत में पुनः सनातन धर्म को स्थापित करने हेतु किया गया संघर्ष था। महर्षि श्री अरबिंदो ने तो इसी कारण से उस समय पर कहा भी था कि “स्व” आधारित स्वतंत्रता संग्राम को हमारे जीवन के सभी क्षेत्रों में ले जाने की आवश्यकता है।

ऐसा कहा जाता है कि वर्ष 1498 में वास्को डिगामा पुर्तगाल से कालिकट में व्यापार करने नहीं आया था, बल्कि वह सम्भवतः ईसाई धर्म का प्रचार प्रसार करने के लिए आया था। अंग्रेजों के बारे में भी कहा जाता है कि वे व्यापार के लिए आए थे पर शायद उनका भी अप्रत्यक्ष कार्यक्रम भारत में ईसाईयत फैलाना ही था। वरना वे पादरियों को साथ क्यों लाए थे? ईसाई धर्म की पुस्तकें भी साथ क्यों लाए थे?

इसीलिए कहा जाता है कि  पहला स्वतंत्रता युद्ध वर्ष 1857 में नहीं हुआ था बल्कि इसके पूर्व भी इस प्रकार के युद्ध भारत में होते रहे हैं। रानी अबक्का (कालिकट) ने पुर्तगालियों से युद्ध किया था और यह विरोध वर्ष 1554 आते आते बहुत बढ़ गया था।  स्वतंत्रता संग्राम की मूल प्रेरणा भी “स्व” का भाव ही थी। यह युद्ध भी “स्व” के लिए ही था। इसलिए आज “स्व” के भाव को समाज में ले जाने के प्रयास हम सभी को करने चाहिए।

देश के इतिहास को कैसे बदला जाता हैं और इसका समाज पर कैसा प्रभाव पड़ता है यह भारत की स्थिति में स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आता है। अपने ही देश का गल्त इतिहास पढ़कर समाज निरुत्साहित हो जाता है। जैसा कि भारत के बारे में अंग्रेज कहते थे कि भारत   एक देश नहीं है बल्कि यह टुकड़ों टुकड़ों में बटां कई राज्यों का एक समूह है, क्योंकि यहां के विभिन्न भौगौलिक क्षेत्रों पर अलग अलग राजाओं का राज्य स्थापित था। अंग्रेज कहते थे कि उन्होंने इन समस्त राजाओं को एक किया और भारत को एक देश बनाया। जबकि देश के विभिन्न भूभाग पर अलग अलग राजा राज्य जरूर करते थे परंतु वे “स्व” के भाव को लेकर भारत को एक महान शक्ति बनाए हुए थे। देश के नागरिकों में नकारात्मक भाव विकसित करने वाले व्यक्ति, देश के नागरिकों का मानसिक और बौद्धिक विनाश करते हैं, और ऐसा अंग्रेजों ने भारत में किया था। आक्रांताओं एवं अंग्रेजों द्वारा सनातन हिंदू बुद्धिजीवी पुस्तकों का योजनाबद्ध तरीके से एक तरह का संहार किया गया था।

ब्रिटिश शासन काल में अंग्रेजों ने जाति और साम्प्रदायिक चेतना को उकसाते हुए प्रतिक्रियावादी ताकतों की मदद भी की थी। ईस्ट इंडिया कम्पनी शासनकाल में, पश्चिमी सभ्यता के आगमन के फलस्वरूप ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां सक्रिय रूप में काफी व्यापक हो गई थीं। ये मिशनरियां ईसाइयत को श्रेष्ठ धर्म के रूप में मानती थी, और पश्चिमीकरण के माध्यम से वे भारत में इसका प्रसार करना चाहती थीं, जो उनके अनुसार धर्म, संस्कृति और भारतीयता के “स्व” में यहां के मूल निवासियों के विश्वास को नष्ट कर देगा। इस दृष्टि से ईसाई मिशनरियों ने उन कट्टरपंथियों का समर्थन किया, जिनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण, उनके अनुसार, भारतीय देशी संस्कृति और विश्वासों तथा भारतीयता के “स्व” को कमजोर करने वाला था। साथ ही उन्होंने साम्राज्यवादियों का भी समर्थन किया, क्योंकि उनके प्रसार के लिए कानून और व्यवस्था एवं ब्रिटिश वर्चस्व का बना रहना आवश्यक था।

भारतीय नागरिकों में जब जब स्व की प्रेरणा जागी है तब तब भारत जीता है।  वर्ष 1911 में बंगाल में एक प्रेजीडेन्सी के विभाजन किए जाने के विरुद्ध पूरा भारत एक साथ उठ खड़ा हुआ था। जबकि, वर्ष 1947 में भारत के विभाजन को रोकने ने लिए संघर्ष क्यों नहीं हुआ। क्योंकि इस खंडकाल में भारत में नागरिकों के “स्व” के भाव को व्यवस्थित तरीके से अंग्रेजों ने कमजोर कर दिया था। अंग्रेजों ने सोची समझी रणनीति के अंतर्गत मुस्लिम अतिवादी संगठनों, जैसे मुस्लिम लीग, आदि को बढ़ावा दिया। कांग्रेस जो कभी हिंदू पार्टी मानी जाती थी उन्होंने अपने ऊपर इस लेबल को हटाने के लिए मुस्लिमों की जायज/नाजायज मांगे माननी शुरू कर दीं ताकि वह एक धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) पार्टी कहलाए। हालांकि, इसके बाद कांग्रेस का झुकाव भी मुस्लिमों की ओर होता चला गया एवं कांग्रेस में हिंदुओं का तिरस्कार प्रारम्भ हो गया था। वर्ष 1923 आते आते कांग्रेस ने “वन्दे मातरम” गीत को अपने विभिन्न आयोजनों से बाहर कर दिया। नेताजी सुभाषचंद्र बोस को कांग्रेस में अप्रासंगिक बना दिया गया। स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरबिंदो, वीर सावरकर, आदि जिन्होंने भारत के नागरिकों में “स्व” के भाव को जगाया था उनके योगदान को भी व्यवस्थित तरीके से भुला दिया गया। भारत को भाषाई आधार पर भी विभिन्न टुकड़ों में बांटने के प्रयास हुए।

दुर्भाग्य से भारत, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी, अपने नागरिकों में “स्व” का भाव जगाने में असफल रहा है क्योंकि भारत में जिस प्रकार की नीतियों को लागू किया गया उससे देश के नागरिकों में देशप्रेम की भावना बलवती नहीं हो पाई एवं “स्व” का भाव विकसित ही नहीं हो पाया। अंग्रेजों एवं विदेशी आक्रांताओं ने अपने अपने शासनकाल में भारत की सांस्कृतिक विरासत पर जो आक्रमण किया था, उसका प्रभाव वर्ष 1947 के बाद भी जारी रहा। जबकि आजादी प्राप्त करने के बाद देश के नागरिकों में देशप्रेम की भावना विकसित कर “स्व” का भाव जगाया जाना चाहिए था क्योंकि भारत की महान संस्कृति के चलते ही भारत का आर्थिक इतिहास बहुत ही वैभवशाली रहा है। भारत को “सोने की चिड़िया” कहा जाता रहा है।

भारत में अब “स्व” पर आधारित दृष्टिकोण को लागू करने की सख्त आवश्यकता है। जापान, इजरायल, ब्रिटेन, जर्मनी आदि देशों ने भी अपने नागरिकों में “स्व” का भाव जगाकर ही अपने आपको विकसित देशों की श्रेणी में ला खड़ा किया है। भारत सहित उक्त चारों देशों ने भी एक तरह से वर्ष 1945 के द्वितीय विश्व युद्ध अथवा इसके पश्चात ही विकास प्रारम्भ किया है। भारत चूंकि वर्ष 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात अपने नागरिकों में “स्व” का भाव जागृत नहीं कर सका अतः वह आज भी विकासशील देश की श्रेणी में संघर्ष कर रहा है। “स्व” आधारित दृष्टिकोण के अभाव में भारत को आज जिस स्थान पर पहुंच जाना चाहिए था, वहां नहीं पहुंच सका है। अतः भारत को यदि पुनः विश्व गुरु बनना है तो अपने नागरिकों में “स्व” का भाव जगाना ही होगा। यह संकल्प आज हम सभी नागरिकों को लेना चाहिए।

भारत की स्वतंत्रता के 25 वर्ष पूर्ण होने पर देश में श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने सम्भवतः किसी प्रकार का भव्य कार्यक्रम आयोजित नहीं किया था। इसी प्रकार भारत की  स्वतंत्रता के 50 वर्ष पूर्ण होने पर श्री नरसिंहराव की सरकार ने भी सम्भवतः किसी भव्य कार्यक्रम का आयोजन नहीं किया था। परंतु अब स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूर्ण होने पर न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व में ही भव्य कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। अब भारतीय विदेशों में भी भारत माता का नमन करने लगे हैं। धीमे धीमे ही सही, भारतीयों में “स्व” की भावना जागृत हो रही है। देश के नागरिकों में अब अपने पैरों पर खड़ा होने का भाव जागा है। इसके चलते भारत अब विकसित राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर हुआ है।

कुछ समय पूर्व ग्वालियर में आयोजित स्वर साधक शिविर में पधारे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक माननीय डॉ. मोहन भागवत जी ने एक कार्यक्रम में कहा था कि दुनिया विभिन्न क्षेत्रों में आ रही समस्याओं के हल हेतु कई कारणों से अब भारत की ओर बहुत उम्मीद भरी नजरों से देख रही है। यह सब भारतीय नागरिकों में भारतीयता के “स्व” के भाव के जागने के कारण सम्भव हो रहा है और अब समय आ गया है कि भारत के नागरिकों में “स्व” के भाव का बड़े स्तर पर अबलंबन किया जाय क्योंकि हमारा अस्तित्व ही भारतीयता के “स्व” के कारण है।

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