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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

विपक्ष इतिहास बनाएगा या इतिहास दोहराएगा ?

भारत की राजनीति में नेहरू और इंदिरा के समय में विपक्ष में राम मनोहर लोहिया और बाद में अटल बिहारी वाजपेई जैसे दिग्गज हुआ करते थे। वे ऐसे कद्दावर नेता थे जो सरकार का गिरेबान पकड़कर उसे हिलाने की क्षमता रखते थे । सदन में इन जैसे नेताओं के रहते प्रधानमंत्री भी सोच समझकर बोला करते थे।
यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि आज के विपक्ष के पास ऐसा कोई दिग्गज नेता नहीं है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस समय विपक्ष के कुछ नेता मोदी के विकल्प के रूप में तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं। यह कोई बुरी बात नहीं है कि विपक्ष किसी नेता को प्रधानमंत्री मोदी के विकल्प के रूप में तैयार करे । संविधान के अंतर्गत विपक्ष का यह संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार है कि वह देश की सत्ता में बैठी पार्टी को उखाड़ कर अपना शासन स्थापित करने के लिए अपना नेता भी तैयार करे। पर आपत्ति इस बात पर है कि विपक्ष सत्ता में बैठे मोदी को उखाड़ने के लिए उनसे बड़े किसी पुरुषार्थी मोदी को तैयार नहीं कर रहा है बल्कि चले चलाए कारतूसों को प्रयोग करने की कोशिश कर रहा है।
हम सभी जानते हैं कि चले चलाए कारतूस कभी कारगर नहीं होते हैं और यदि कोई उन्हें चलाने का प्रयास करता है तो वह उपहास का पात्र बनता है। नीतीश कुमार को इस समय बिहार की जनता भी नकार चुकी है। यदि वह इस समय बिहार के मुख्यमंत्री हैं तो जनता के आशीर्वाद के कारण नहीं हैं बल्कि लोकतंत्र की उस मजबूरी के कारण बिहार के मुख्यमंत्री बने हुए हैं जिसे इस देश में सिरों की गिनती का खेल कहा जाता है। राजद के नीतीश कुमार को राजद के लोग और विशेष रूप से तेजस्वी यादव चुनावों के समय “पलटू राम” के नाम से पुकारा करते थे।
आज उन्होंने अपने इसी नाम का परिचय देते हुए एक बार फिर पलटी मार कर तेजस्वी यादव के साथ मिलकर सरकार बना ली है। इस सरकार का मुखिया उन्हें बिहार पर अंतिम बार शासन करने के लिए बनाया गया है। तेजस्वी यादव भी नहीं चाहेंगे कि वह देश के प्रधानमंत्री बनें या उनका कद इतना बड़ा हो कि बिहार की जनता उन्हें अगली बार फिर मुख्यमंत्री बना ले। सिरों की गिनती के खेल में सबसे बड़ी समस्या यही होती है कि इसमें साथ – साथ रहने वाले लोग भी आपकी जड़ खोदने वाले होते हैं।
नीतीश बाबू भी सच को जानते हैं। उन्हें राजनीति करते हुए बहुत लंबी अवधि हो चुकी है। उन्हें भली प्रकार ज्ञात है कि यदि वह प्रधानमंत्री पद की दौड़ में मुख्यमंत्री के पद को छोड़ गए तो “धोबी का कुत्ता घर का रहा ना घाट का” वाली कहावत चरितार्थ हो जाएगी। अतः वह बिहार के मुख्यमंत्री बने रहकर अपने आप को “बड़ी चर्चा” में बनाए रखने तक ही सीमित है। हमारे देश में सबसे पहले 1967 में पंडित जवाहरलाल नेहरु की मृत्यु के पश्चात इंदिरा गांधी के शासन के शुरुआती दौर में विपक्ष ने एक होने की हुंकार भरी थी। यह अलग बात है कि अपनी पहली हुंकार में विपक्ष ने एकता का झूठा नाटक तो किया था परंतु उसके इस नाटक का परिणाम शीघ्र ही सामने आ गया और आपसी टकराव के कारण उसकी एकता बिखराव में प्रकट हो गई।
उस समय समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया की विपक्ष में तूती बोल रही थी और वे पंडित जवाहरलाल नेहरू का भी चलती हुई संसद में गिरेबान पकड़ने की ताकत रखते थे। राम मनोहर लोहिया का उस समय विचार था कि देश की जनता को यह बताना आवश्यक है कि विपक्षी दल सत्ता प्राप्त कर उसे कांग्रेस से भी बेहतर ढंग से चलाना जानते हैं। निश्चित रूप से डॉ राम मनोहर लोहिया का यह प्रयास एक सकारात्मक प्रयास था परंतु जो विपक्ष अलग-अलग विभिन्न दलों में बंटा हुआ था, वह दिली रूप से भी बंटा हुआ ही सिद्ध हुआ, इसलिए उसके लिए दिल्ली दूर हो गई।
1967 में जनसंघ व कम्युनिस्ट भी 9 राज्यों में बनी गैर कांग्रेसी सरकारों में शामिल हो गए थे, पर यह प्रयोग पूर्णतया असफल सिद्ध हुआ। अपने आपको एक भरोसेमंद विपक्ष सिद्ध करने के लिए उस समय विपक्ष का यह प्रयास निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक प्रयास सिद्ध हो सकता था, यदि वह अपनी एकता को कायम करके कांग्रेस का सशक्त विपक्ष बनने की भूमिका में आ जाता। पर ऐसा हुआ नहीं, लोगों की निजी महत्वाकांक्षाऐं विपक्ष की एकता में घुन लगा गई। इसके पश्चात 1977 में फिर विपक्ष ने एकता के लिए प्रयास किया। उस समय इमरजेंसी के कारण देश में कांग्रेस के विरुद्ध बने नकारात्मक परिवेश को विपक्ष भुनाने में सफल हो गया । यह अलग बात है कि उसकी यह एकता भी केवल 2 वर्ष तक के लिए ही चल पाई।
उस समय विभिन्न विचारधाराओं के 5 बड़े राजनीतिक दल एक हुए और उन्होंने सत्ता में आने के लिए अपेक्षित बहुमत लोकसभा चुनावों में प्राप्त किया। इसके पश्चात मोरारजी देसाई को देश का पहला गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। परंतु अगले 2 वर्ष में ही निजी महत्वाकांक्षाओं को पाले बैठे विपक्षी नेताओं के भीतर का अहंकार जाग गया और उन्होंने चलती हुई सरकार को गिरा कर यह सिद्ध कर दिया कि भारतवर्ष में विपक्ष का दूसरा प्रयोग ही असफल हो चुका है।
उसके बाद जनसंघ ने अपने आप को “एकला चलो रे” की डगर पर डाल लिया और सभी पुराने जनसंघी नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी नाम का एक नया राजनीतिक दल गठित किया। इस राजनीतिक दल को इन लोगों ने प्रारंभ से ही हिंदू राष्ट्र और हिंदूवादी राजनीति के अलंबरदार के रूप में प्रस्तुत किया। कुछ देर पश्चात देश के लोगों ने कांग्रेस के और उस जैसे अन्य सेकुलर राजनीतिक दलों के विकल्प के रूप में भाजपा की ओर देखना आरंभ किया। इस प्रकार भारतीय राजनीति में राजनीतिक दल “सेकुलरिस्ट” और “हिंदू राष्ट्रवादी” नामक दो विचारधाराओं में विभक्त हो गए। यहीं से धीरे-धीरे यूपीए और एनडीए का स्वरूप आकार लेने लगा। यद्यपि इस प्रकार के स्वरूप की स्पष्ट तस्वीर कुछ समय बाद ही जाकर सामने आई।
1989 में कांग्रेस से विद्रोह करके कांग्रेस के ही एक नेता और केंद्रीय मंत्री वीपी सिंह ने उत्तर भारत के मध्य मार्गी राजनीतिक दलों को एक झंडे के नीचे इकट्ठा करके गैर भाजपा और गैर कांग्रेसी पार्टियों का “भानुमति का कुनबा” बनाने का राजनीति में एक नया प्रयोग किया। उन्होंने अपने राजनीतिक कुनबे का नाम जनता दल रखा। मात्र 11 महीने बाद ही वी0पी0 सिंह का यह कुनबा बिखर गया और “एक दिल के टुकड़े हजार हुए कोई यहां गिरा कोई वहां गिरा” वाली कहावत को चरितार्थ करता हुआ यह जनता दल खंड खंड हो गया।
जब 1989 में यह जनता दल अस्तित्व में आया था तो इसे 160 सीट सरकार बनाने के लिए देश के लोगों ने दी थीं। यद्यपि कांग्रेस के राजीव गांधी के पास उस समय भी लगभग सवा 200 सांसद थे, परंतु उन्होंने सरकार बनाने से इंकार कर दिया और देश की जनता के जनादेश को स्वीकार कर वी0पी0 सिंह को प्रधानमंत्री बनने दिया। राजीव गांधी जानते थे कि विभिन्न महत्वाकांक्षाओं के सिरों को जोड़कर बनाया गया यह जनता दल शीघ्र बिखर जाएगा और ऐसा ही हुआ भी।
मोरारजी देसाई की चलती सरकार को गिराने में जहां उस समय चौधरी चरण सिंह ने सक्रिय भूमिका निभाई थी वहीं वीपी सिंह की चलती सरकार को गिराने में एक दूसरे ठाकुर अर्थात चंद्रशेखर ने सक्रिय भूमिका निभाई और जैसे कांग्रेस का समर्थन लेकर चरण सिंह ने मोरारजी सरकार को गिरा कर सरकार बनाने में सफलता प्राप्त की थी वैसे ही चंद्रशेखर ने भी कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने में सफलता प्राप्त की। यह अलग बात है कि जहां चौधरी चरण सिंह कांग्रेस के समर्थन से एक दिन भी सरकार के मुखिया के रूप में संसद का सामना नहीं कर पाए थे, वहीं चंद्रशेखर लोकसभा में एक बार अपना बहुमत सिद्ध करने में सफल हो गए थे।
कांग्रेस ने शीघ्र ही चंद्रशेखर की चलती हुई सरकार गिरा कर 1991 में नए चुनावों का मार्ग प्रशस्त कर दिया। नए चुनाव हुए तो चुनावों के दौरान ही राजीव गांधी की हत्या हो गई। जिसके फलस्वरूप देश की सत्ता कांग्रेस के परिवार के पास न जाकर नरसिम्हा राव के सिर पर जा सजी। उस समय कांग्रेस को लगभग 225 सांसद लोकसभा चुनावों के माध्यम से मिले। 1996 तक नरसिम्हा राव अपनी सरकार को चलाने में सफल हुए ।1996 के चुनावों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई। उस समय भाजपा ने पहली बार केंद्र में अपनी सरकार बनाई, परंतु यह सरकार मात्र 13 दिन ही चल पाई। विपक्ष ने सिरों की गिनती का खेल खेल कर सत्ता में बैठे अटल बिहारी वाजपेई को उखाड़ फेंक कर राष्ट्रीय मोर्चा के नाम से एक नया राजनीतिक गठबंधन तैयार कर अपनी सरकार बनाने में सफलता प्राप्त की।
उस समय कांग्रेस के कारण ही विपक्ष की सरकार फिर गिरी और 1998 में हुए लोकसभा चुनावों में लोगों ने भाजपा को फिर अपना सबसे बड़ा राजनीतिक दल बनाकर संसद में भेजा। इस बार भाजपा ने फिर सरकार बनाई परंतु उसकी यह सरकार भी मात्र 13 महीने ही चल पाई और 13 महीने के पश्चात एक वोट से सरकार गिर गई। 1999 में हुए नए चुनावों के समय जनता ने फिर भाजपा को साधारण बहुमत दिया और अटल बिहारी बाजपेई अपने अन्य राजनीतिक सहयोगियों के साथ मिलकर सरकार बनाने में सफल हुए।
इसके पश्चात वे पूरे 5 वर्ष तक अपनी सरकार चलाने में सफल हुए। जब 2004 में लोकसभा के चुनाव हुए तो उसमें भाजपा की अटल सरकार को जनता ने परास्त कर दिया। इस बार के चुनावों में हालात ऐसे बने कि कांग्रेस अपने कुछ राजनीतिक सहयोगियों के साथ केंद्र में सरकार बनाने में सफल हुई। कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी ने उस समय डॉ मनमोहन सिंह को देश का प्रधानमंत्री बनवा कर अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता की चाबी अपने हाथों में ले ली। इसके बाद उन्होंने देश पर अप्रत्यक्ष रूप से 10 वर्ष तक शासन किया।
जब 2014 में लोकसभा के चुनाव हुए तो उस समय देश की जनता ने एक क्रांतिकारी इतिहास लिखा और लगभग 3 दशक के बाद केंद्र में पहली बार स्पष्ट बहुमत के साथ एक सशक्त सरकार सत्ता में आई। इस सरकार का नेतृत्व प्रधानमंत्री मोदी ने संभाला। 2014 और 2019 में हुए चुनावों में कांग्रेस ने 44 और 52 सीटें प्राप्त कर अपना बहुत ही निराशाजनक प्रदर्शन किया है। इन दोनों चुनावों में कांग्रेस की हुई फजीहत के बाद देश का विपक्ष कांग्रेस को अब अपने साथ किसी मूल्य पर भी लेने को तैयार नहीं है। कांग्रेस भी इस समय विपक्ष के साथ लगकर केवल अपना राजनीतिक गीत प्रस्तुत करने का प्रयास मात्र कर रही है। उसके पास अपना गीत संगीत नहीं है। वह सब के साथ मिलकर गाने को ही अपना गीत संगीत मान बैठी है।
जिसके पास अपना सुर नहीं हो, अपना गीत और संगीत नहीं हो, वह प्रतिस्पर्धा के दौर में अधिक देर तक जीवित नहीं रह पाता है। पता नहीं, कांग्रेस इस सच को क्यों स्वीकार नहीं कर पा रही है ?
इस समय विपक्ष कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को विपक्ष का नेता मानने को तैयार नहीं है। विपक्ष की राजनीति इस समय संक्रमण काल से गुजर रही है। इसी संक्रमण के दौर में कांग्रेस अपने साथी खोज रही है तो केजरीवाल अपनी राजनीतिक भूमि चालाकी के साथ तैयार करते जा रहे हैं। उधर ममता बनर्जी इस मौके का अपने लिए लाभ लेना चाहती हैं। मायावती इस समय शांत हो चुकी हैं और उन्हें अपनी दुर्गति का एहसास हो चुका है। पर इसी स्थिति को अपने लिए एक अवसर के रूप में अखिलेश भी देख रहे हैं।
जहां इस समय कुछ राजनीतिक दल नितीश बाबू को देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं वही अखिलेश से चलकर पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी तक कई लोग देश के अगले प्रधानमंत्री की रेस में हैं। इस समय देश की कम्युनिस्ट पार्टियां पूर्णतया हाशिए पर जा चुकी हैं। केंद्र की राजनीति में उनका हस्तक्षेप इस समय नगण्य है। विपक्ष की जूतों में बंटती हुई दाल को देखकर भाजपा मन ही मन प्रसन्न है। उसे पता है कि अगला मैदान भी उसके लिए ही सज चुका है।
इसी समय मराठा क्षत्रप शरद पवार भी कुछ लोगों की नजरों में अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखे जा रहे हैं पर वह इस फजीहत में नहीं पड़ेंगे। न्यूनाधिक उन्हीं के नक्शे कदम का अनुकरण देर सवेर नीतीश कुमार जी करेंगे। तब मैदान में ममता बनर्जी ,अखिलेश यादव, राहुल गांधी और केजरीवाल रह जाएंगे। इन सब को देश की जनता कितना चाहती है ? यह हम सभी जानते हैं। परंतु इसके उपरांत भी केजरीवाल को जितना कुछ मिलेगा वह उनकी राजनीति को और बढ़ाने वाला ही होगा। इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री की रेस में दौड़ने वाले अखिलेश को भी इस दौड़ में रहने से बल मिलेगा। जबकि राहुल गांधी यदि पार्टी को 100 सीटों के करीब ले जाने में असफल रहे तो उनकी राजनीति और भी ‘डैड’ हो जाएगी। जहां तक ममता बनर्जी की बात है तो वे अपने आप को यदि पश्चिम बंगाल से बाहर कुछ सिद्ध कर पाईं तो देश की भविष्य की राजनीति के लिए यह उनके लिए भी सुखद होगा। इन सब परिस्थितियों का लाभ प्रधानमंत्री मोदी को मिलना निश्चित है।
कुल मिलाकर वर्तमान परिस्थिति में विपक्ष के इतिहास को देखकर यही कहा जा सकता है कि विपक्ष इतिहास दोहराने जा रहा है ना कि इतिहास बनाने जा रहा है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक उगता भारत

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