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पर्यावरण

‘खादर , खजूर और घरबरा गांव का खजूरस्तान’

खजूर के पेड़ की ऊंचाई 25 से लेकर 30 फीट तक हो जाती है…… संत कबीर के इस दोहे ने खजूर को अनाहक ही बदनाम किया है।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर ।
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ।।

संत कबीर यदि जनपद गौतम बुध नगर के यमुना व हरनन्दी( हिन्डन) नदी के खादर मे भौगोलिक तौर पर स्थित आबाद गांवो के प्राचीन स्थानीय ग्रामीणो के जीवन में खजूर के पेड़ की उपयोगिता प्रयोज्यता को देख समझ लेते तो वह इस दोहे को ना रचते । खादर में खेती में ट्रैक्टर आधुनिक मशीनरी के आगमन से पूर्व खजूर के पेड़ बहुतायात में पाए जाते थे…. कोई ऐसा गाँव नहीं था जिसमें हजारों की संख्या में खजूर के पेड़ ना हो…. खादर की जमीन में खेती करना हल आदि के माध्यम से भी आसान नहीं रहा है अक्सर बैल हल से चोटिल हो जाते थे क्योंकि खादर की मिट्टी ढेलेदार होती है हल् का धातु का नुकीला हिस्सा जिसे स्थानीय लोग ‘पढ़ोथा’ बोलते थे वह भूमि से फिसलकर उछलकर बैल के पिछले पैरों को चोटिल कर देता था… रही सही कसर यमुना जैसी नदियों के पानी की प्रलयंकारी बाढ़ कर देती थी खेत महीनों तक जलमग्न रहते थे…. नतीजा अनाज का बहुत कम उत्पादन होता था ऐसी विकट परिस्थिति में खादर के स्थानीय बुद्धिमान निवासियों ने खजूर के पेड के बहुत से प्रयोग खोज निकाले खजूर की लकड़ी के तने को मकान की झोपड़ियों में शहतीर( सेंट्रल बीम) के तौर पर प्रत्येक घर में इस्तेमाल किया जाता था. पके हुए खजूर के विकसित तने को दो हिस्सों में काटकर उसका ‘ मैडा’ बनाकर खेतों को समतल करने के लिए प्रयोग में लाया जाता था……… चारे के अभाव में खजूर के पेड़ की हरी-भरी टहनी को काटकर पशुओं को खिलाया जाता था।स्थानीय लोग इस चारे को ‘गोभ’ बोलते थे। इससे चारों को खाकर पशु अधिक दूध देते थे … पशुओं के लिए वह भारी सुपाच्य आहार होता था ऐसा इस कारण है की खजूर की पत्तियों में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है…। मौसमी परंपरागत चारे की अपेक्षा खजूर के चारे खपत कम होती थी साथ ही दुग्ध उत्पादन दोगुना मिलता था…. यह तो रही खजूर के आवासीय, पशु आहार, कृषि यांत्रिक प्रयोग की बात…. मई जून के महीने में नदियों का पानी भी सूखने लगता था तब खजूर के पेड़ पर फल लगते थे जिन्हें ‘खजुरा’ कहा जाता है बहुत मधुर पोस्टिक बलवर्धक है… स्वास फेफड़ों के रोग नाशक बल वर्धक वात पित्त कफ नाशक प्रकृति में शीतल खजूर फल को आयुर्वेद मे माना गया है…. खजूर के पेड़ से एक मन के लगभग खजूर के फल प्राप्त लोग कर लेते थे…. गर्मी के भीषण महीने में भी लोगों को गर्मी से जनित बीमारी नहीं हो पाती थी…. कोई अभागा ही होता होता था जिसे गर्मी के मौसम में खजूर के मीठे स्वादिष्ट पौष्टिक विपाक मे शीतल फल खाने को ना मिलते हो। खजूर का पेड़ शुष्क मौसमी जलवायु में भी आसानी से हो जाता है बेहद नमकीन भूमि जल से भरी भूमि में भी यह वृद्धि करता है शुष्क मौसम अधिक गर्मी अधिक जाड़ा किसी का भी प्रभाव नहीं पड़ता….। खजूर के पेड़ की जीवंतता प्रतिकूल मौसम में भी इसका अडिग खड़े रहने जैसे गुण इसके फल का सेवन करने वाले लोगों खादर के ग्राम वासियों में भी आ गये…….. प्रलयंकारी बाढ़ भी उनके हौसले नहीं डिगा पायीं लेकिन जब से दिल्ली एनसीआर में कथित विकास की बयार चलने लगी है खेतों में ऊंची ऊंची अटालीका बन गई है यमुना हिंडन के आंचल में कंक्रीट के जंगल बस गए हैं। अब इक्का-दुक्का खजूर के पेड़ खादर में दिखाई देते हैं। ग्रेटर नोएडा नोएडा जैसा शहर हिंडन व यमुना के खादर में बसा दिया गया है……. सदियों से उपयोगी पेड़ खजूर को जबरन रेत समाधि दे दी गई। लेकिन खजूर के वृक्ष के प्रति सम्मान सरंक्षण का भाव ग्रेटर नोएडा के घरबरा गाँव के धार्मिक स्थल ‘भूमिया बाबा मंदिर’ में दिखाई देता है 10 बीघे में फैले हुए इस धार्मिक स्थल में सैकड़ों की संख्या में 50 से 60 वर्ष पुराने खजूर के पेड़ हैं जिन्हें कभी भी काटा नहीं जाता…. उन्हें काटना महापाप माना जाता है… वर्षो से ग्रामीण उनका संरक्षण कर रहे हैं। ऐसा अनुपम अपरिमेय उदाहरण बहुत कम देखने सुनने को मिलता है… गौतम बुध नगर विश्वविद्यालय की ओर से जब घरबरा गाँव में प्रवेश करते हैं तो खजूर के पेड़ों का यह समूह हिंडन नदी के तट के पास खजूरस्तान की तरह मनोहर दिखाई देता है….. जहां कुदरत कुछ कुछ छीन लेती है वही वह ऐसा कुछ भी दे देती है जिसे पाकर इंसान सब कुछ छिनने के दुख को भुला देता है, गौतम बुध नगर के खादर के ग्रामीण वासियों के लिए खजूर का पेड़ भी कुदरत (ईश्वर ) द्वारा प्रदत अनेकों सौगातो में से एक ऐसी ही सौगात रहा था।

आर्य सागर खारी

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