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आज का चिंतन

“प्रातः सायं ईश्वर की उपासना करना मनुष्य का अनिवार्य धर्म है”

ओ३म्
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मनुष्य मननशील प्राणी को कहते हैं। हम मननशील हैं, अतः हमारा प्रमुख कार्य मननपूर्वक सभी कार्यों को करना है। मनुष्य संसार में आता है तो वह संसार को देख कर जिज्ञासा करता है कि यह संसार किसने बनाया है? सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, ग्रह-उपग्रह तथा लोक लोकान्तर किसने बनाये हैं? पृथिवी पर वायु, जल, अन्न, गाय आदि नाना प्रकार के प्राणी व पशु-पक्षी, नदियां, समुद्र, पर्वत, रेगिस्तान, वृक्ष, वनस्पतियां, ओषधियां व वन आदि को किसने बनाया है वा यह कैसे व कब बने हैं? कौन इनका पालन, धारण व पोषण कर रहा है? मनुष्य यह भी सोचता है कि वह कौन है जिसने उसे अपने माता-पिता व परिवार के लोगों के पास भेजा है। यह अपने आप हुआ या इसके पीछे कोई बुद्धि व ज्ञान से युक्त सत्ता की कोई भूमिका है? अधिकांश व्यक्तियों को इनका उत्तर नहीं मिलता। वह कुछ समय बाद उत्तर न मिलने पर इन प्रश्नों के उत्तर खोजना छोड़ देते हैं। यह बात सत्य है कि संसार में प्रचलित प्रमुख मत-मतान्तरों के बड़े-बड़े आचार्यों, विद्वानों, वैज्ञानिको व उच्चशिक्षितों को भी इन प्रश्नों के उत्तर ज्ञात नहीं हैं। इनका उत्तर मिलता है वेद व वैदिक साहित्य सहित ऋषि दयानन्द जी के सत्यार्थप्रकाशादि ग्रन्थों में। इन सभी प्रश्नों का उत्तर है कि इस सृष्टि का उत्पत्तिकर्ता, पालन व प्रलयकर्ता ईश्वर है। ईश्वर की शाश्वत प्रजा अनन्त संख्या में चेतन अल्पज्ञ जीव हैं जो कर्म-फल के बन्धन में बन्धे हुए हैं। उनको कर्मों का सुख व दुःख रूपी फल भोगना होता है। इन जीवों को कर्मफलों का सुख व दुःखरूपी भोग प्रदान करने के लिए ईश्वर सृष्टि के उपादान कारण सत्व, रज व तम गुणों वाली सूक्ष्म प्रकृति से इस सृष्टि वा जड़ जगत की रचना करते हैं। प्राणी जगत की सृष्टि भी परमेश्वर जड़ प्रकृति के पंच महाभूतों से जीवात्माओं के शरीर बनाकर चेतन अल्पज्ञ जीव का उन शरीरों से संयोग कराकर करते हैं। हम मनुष्यों व सभी पशु-पक्षियों आदि प्राणी जगत को परमात्मा ने ही अपनी अथाह विद्या व शक्ति से रचा है और वही इसका पालन कर रहा है। हमें माता-पिता व परिवार के सभी सदस्यों सहित हमारा शरीर व इसके सभी अंग-प्रत्यंग जिसमें हमारी रूप, रस, गन्ध, स्पर्श व शब्दोच्चार की शक्तियां वा यन्त्र जो हमारे शरीर में हैं, वह सब हमें ईश्वर से ही प्राप्त हुए हैं। ईश्वर ने यह शरीर व इसके सभी बहुमूल्य अंग-प्रत्यंग हमें दिये परन्तु कभी हमसे इनका मूल्य नहीं मांगा। अतः मननशील होने के कारण हमारा कर्तव्य है कि हम परमेश्वर का ध्यान करें, उसे जाने, उसके कार्यों को भी जानें व स्मरण करें और भली प्रकार से स्तुति व प्रार्थना वचनों से उसका धन्यवाद करें। ऐसा करने से हम ईश्वर के सभी उपकारों के प्रति धन्यवाद करके कृतघ्नता के पाप से मुक्त होते हैं। सभी मनुष्यों का कर्तव्य है कि वह ईश्वर को जानें और इस सृष्टि पर सब मनुष्यों व प्राणियों के उपभोग के अधिकार को जानकर अपने लिये केवल न्यूनातिन्यून आवश्यकता के पदार्थ लेकर जीवन का निर्वाह करें। प्रकृति के उपयोगी व मूल्यवान पदार्थों का अधिक मात्रा में संग्रह न करें जिससे संसार के किसी भी प्राणी को क्षुधा व पिपासा सहित निवास, वस्त्र व शिक्षा-चिकित्सा आदि का दुःख व्यथित न करे। ऐसा करने पर ही हम मनुष्य व मननशील कहे जा सकते हैं।

ईश्वर का धन्यवाद करने के लिए हमें सबसे पहले ईश्वर के स्वरूप व उसके गुण, कर्म व स्वभाव पर विचार करना है। इसके लिये हमें सुखासन या पद्मासन आदि किसी भी आसन में बैठ जाना चाहिये जिसमें अधिक देर तक हम बिना थके व पाद पीड़ा से मुक्त रह सकें। इस आसन में बैठ कर हमें ओ३म् नाम के जप व गायत्री मन्त्र आदि से अपने मन को संसार के पदार्थों व चिन्तन से हटा कर ईश्वर की ओर लगाना चाहिये। ईश्वर के सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अनादि, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान स्वरूप व गुणों का चिन्तन व विचार कर हमें सन्ध्या के मन्त्रों का मन ही मन अर्थपूर्वक पाठ करना चाहिये। आरम्भ में जब तक अर्थ ज्ञान दृण न हो, हम अपने साथ पुस्तक रख सकते हैं। मन्त्र व मन्त्रार्थ दोनों को मन में बोलकर व उस पर चिन्तन कर हम आगे बढ़ते जायें। इस प्रकार जब मन्त्र और मन्त्रार्थ पूरे हो जायें तो कुछ देर तक पुनः ईश्वर, अपनी जीवात्मा के स्वरूप व अपने कर्मों पर भी विचार करें और सत्कार्यों को करने का संकल्प लें। बाद में हम आर्याभिविनय, वेदभाष्य व स्वाध्याय के ग्रन्थ स्वाध्याय सन्दोह, वेद मंजरी, ऋग्वेद ज्योति, यजुर्वेद ज्योति, अथर्ववेद ज्योति, वैदिक विनय आदि का अध्ययन करें। इसके साथ ही हम कुछ समय उपनिषद या दर्शन आदि ग्रन्थों का अध्ययन वा पाठ भी कर सकते हैं जिससे इन ग्रन्थों में निहित सामग्री से हम अर्थ-ज्ञान सहित परिचित हो जायें। सन्ध्या के अन्तिम मन्त्र को नमस्कार मन्त्र कहते हैं। इसमें ईश्वर व उसकी विभिन्न गुणों तथा उसकी मनुष्यों आदि पर कृपाओं को नमन किया गया है। नमस्कार मन्त्र का अर्थ है ‘जो सुखस्वरूप और संसार के उत्तम सुखों को देनेवाला, कल्याण का कत्र्ता, मोक्षस्वरूप और धर्म के कामों को ही करनेवाला, अपने भक्तों को धर्म के कामों में युक्त करनेवाला, अत्यन्त मंगलरूप और धार्मिक मनुष्यों को मोक्ष देनेहारा है, उसको हमारा बारम्बार नमस्कार हो।’

सन्ध्या के स्वरूप पर विचार करें तो यह भी ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना ही है। ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश के सातवें समुल्लास में वेदों के आधार पर स्तुति, प्रार्थना व उपासना पर प्रकाश डाला है। स्तुति की चर्चा करते हुए ऋषि दयानन्द जी कहते हैं कि वह परमात्मा सब में व्यापक, शीघ्रकारी और अनन्त बलवान् जो शुद्ध, सर्वज्ञ, सब का अन्तर्यामी, सर्वोपरि विराजमान, सनातन, स्वयंसिद्ध, परमेश्वर अपनी जीवरूप सनातन अनादि प्रजा को अपनी सनातन विद्या से यथावत् अर्थों का बोध ‘‘वेद” द्वारा कराता है। यह सगुण स्तुति अर्थात् जिस-जिस गुण से सहित परमेश्वर की स्तुति करना वह सगुण, ‘अकाय’ अर्थात् वह कभी शरीर धारण व जन्म नहीं लेता, जिस में छिद्र नहीं होता, नाड़ी आदि के बन्धन में नहीं आता और कभी पापाचरण नहीं करता, जिस में क्लेश, दुःख, अज्ञान कभी नहीं होता, इत्यादि जिस-जिस राग, द्वेषादि गुणों से पृथक् मानकर परमेश्वर की स्तुति करना है वह निर्गुण स्तुति है। इसका फल यह है कि जैसे परमेश्वर के गुण हैं वैसे गुण, कर्म, स्वभाव अपने भी करना। जैसे वह न्यायकारी है तो हम भी न्यायकारी होवें। और जो केवल भांड के समान परमेश्वर के गुणकीर्तन करता जाता है और अपने चरित्र को नहीं सुधारता उसका स्तुति करना व्यर्थ है।

प्रार्थना कैसे करें, इसके लिये ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश के सातवें समुल्लास में यजुर्वेद के 10 मन्त्र लिखकर उसका भावार्थ प्रस्तुत किया है। हम यहां प्रथम दो मन्त्रों का भावार्थ नमूने के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। प्रथम मन्त्र का भावार्थ है- ‘हे अग्ने! अर्थात् प्रकाशस्वरूप परमेश्वर आप की कृपा से जिस बुद्धि की उपासना विद्वान्, ज्ञानी और योगी लोग करते हैं उसी बुद्धि से युक्त इसी वर्तमान समय में आप हमको बुद्धिमान कीजिये।’ दूसरे मंत्र का भावार्थ है- ‘हे ईश्वर! आप प्रकाशस्वरूप हैं, कृपा करके मुझ में भी प्रकाश स्थापन कीजिये। आप अनन्त पराक्रम युक्त हैं, इसलिये मुझ में भी कृपाकटाक्ष से पूर्ण पराक्रम धरिये। आप अनन्त बलयुक्त हैं इसलिये मुझ में भी बल धारण कीजिये। आप अनन्त सामर्थ्ययुक्त हैं, मुझ को भी पूर्ण सामथ्र्य दीजिये। आप दुष्ट काम और दुष्टों पर क्रोधकारी हैं, मुझ को भी वैसा ही कीजिये। आप निन्दा, स्तुति और स्व-अपराधियों का सहन करने वाले हैं, कृपा से मुझ को भी वैसा ही कीजिये।’ उपासना के विषय में ऋषि दयानन्द लिखते हैं कि जिस पुरुष के समाधियोग से अविद्यादि मल नष्ट हो गये हैं, आत्मस्थ होकर परमात्मा में चित्त जिस ने लगाया है उस को जो परमात्मा के योग (सान्निध्य) का सुख होता है वह वाणी से कहा नहीं जा सकता क्योंकि उस आनन्द को जीवात्मा अपने अन्तःकरण से ग्रहण करता है। उपासना शब्द का अर्थ समीपस्थ होना है। अष्टांग योग से परमात्मा के समीपस्थ होने और उस को सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामीरूप से प्रत्यक्ष करने के लिये जो-जो काम करना होता है वह-वह सब करना चाहिये। विस्तार से जानने के लिए पाठकों को सत्यार्थप्रकाश का सम्पूर्ण सातवंा समुल्लास पढ़ना चाहिये। इससे उन्हें ईश्वर, जीवात्मा और सन्ध्या आदि विषयों का विस्तृत ज्ञान हो जायेगा।

परमात्मा ने सभी जीवों व मनुष्यादि सभी प्राणियों के लिये इस विशाल सृष्टि को रचा है। वही इसका धारण और पालन कर रहा है। हमें भी उस परमात्मा ने ही जन्म दिया और हमने जितने भी सुख भोगे हैं व भविष्य में भोंगेंगे, वह भी हमें ईश्वर से ही मिल रहे है। अतः हमारा कर्तव्य है कि हम उसके गुणों का ध्यान करते हुए उसका बारम्बार कृतज्ञ भाव से धन्यवाद करें। इसके लिये सभी को ऋषि दयानन्द प्रणीत सन्ध्या पुस्तक का अध्ययन व अभ्यास करना चाहिये। सन्ध्या करने से आत्मा के मल नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य को ईश्वर, जीवात्मा व सृष्टि का ज्ञान होकर वह अपने जीवन को पवित्र कार्यों में लगाकर सुखपूर्वक जीवनयापन कर सकता है। उसे जीवन में धर्म, अर्थ व काम की प्राप्ति होती है और मरने पर श्रेष्ठ जन्म व मोक्ष भी मिल सकता है। यह भी जान लें कि जो मनुष्य ईश्वर का ध्यान व सन्ध्या आदि नहीं करते वह कृतघ्न होते हैं। वह ईश्वर प्रदत्त सुख जो ईश्वर के कृपाकटाक्ष से भक्त को मिलता है, उससे वंचित हो जाते हैं। अतः सभी को सन्ध्या अवश्य करनी चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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