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संपूर्ण भारत कभी गुलाम नही रहा

‘हिन्दू शौर्य’ ने ही तुगलक को राजधानी परिवर्तन के लिए विवश किया था

मौहम्मद बिन तुगलकपिछले लेख में हमने मौहम्मद बिन तुगलक के दोआब में कर वृद्घि की योजना पर प्रकाश डाला था। इसी प्रकार की अपनी कई योजनाओं के कारण मौहम्मद बिन तुगलक को इतिहास में कई लोगों ने महाविद्वान तो कई ने महामूर्ख माना है।
तुगलक सदा भयाक्रांत रहा
मौहम्मद बिन तुगलक ने 1325 ई. में एक गहरे षडयंत्र के अंतर्गत अपने पिता गयासुद्दीन की हत्या करा दी थी, और दिल्ली के राज्यसिंहासन पर ‘पिता’ का हत्यारा बनकर बैठ गया। भारतीय दृष्टि से कोई भी ‘पितृहन्ता’ कभी भी ‘महाविद्वान’ नही हो सकता , साथ ही वह ‘महामूर्ख’ भी नही कहा जा सकता। हां वह ‘भयाक्रांत’ शासक अवश्य हो सकता है, जिसे हर क्षण अपने पिता की छाया दीखती थी और जिससे वह भयभीत रहता था। कहने का अभिप्राय है कि पाप करके चाहे आप कितना ही बड़ा पद पा लें पर पाप आपका पीछा नही छोड़ता। पाप के भय से भयाक्रांत व्यक्ति स्वाभाविक रूप से शंकालु और क्रूर होता है। क्योंकि वह हर व्यक्ति को शंका की दृष्टि से देखता है कि कहीं वह मेरा हत्यारा न हो, और उसे जहां भी ऐसी शंका होती है वह वहीं अपने संभावित किसी भी शत्रु से निपटने के लिए क्रूर हो उठता है। वह अत्याचारों से जितना ही अधिक अपने पाप का बोझ शांत करने का प्रयास करता है, उसका ‘पापबोध’ उतना ही उसे अपनी काली छाया में घेरता चला जाता है। ऐसा व्यक्ति संसार में दिखने के लिए जीता अवश्य है, पर वह जीते जी कितनी बार मरता है, इसे केवल वही जानता है।
डा. शाहिद अहमद कहते हैं
मौहम्मद बिन तुगलक के इस द्वंद्व भरे जीवन की पहेली पर प्रकाश डालते हुए डा. शाहिद अहमद अपनी पुस्तक ‘तुगलक कालीन भारत’ में लिखते हैं :-‘‘इसके (मौहम्मद बिन तुगलक) शासन काल में सफलता और असफलता का ऐसा क्रम दिखलाई देता है कि न तो उसको एक असफल सम्राट कह सकते हैं, न ही सफल मान सकते हैं। …एक के बाद एक असफलता के कारण यह योग्य सुल्तान चिड़चिड़ा हो गया और उसके तथा जनता के मध्य एक खाई सी बनती चली गयी। एक समय ऐसा आया कि जब विद्रोह की ज्वाला फूट पड़ी। छोटे बड़े मिलाकर 20 से अधिक विद्रोह इस सुल्तान के विरूद्घ हुए और विद्रोहियों का पीछा करते करते मृत्यु ने उसको जनता से तथा जनता को उससे छुटकारा दिलाया।’’
मौहम्मद बिन तुगलक का शासन काल 1325 ई. से 1351 ई. तक माना गया है। इसके शासन काल में हिंदुओं के स्वतंत्रता आंदोलनों की झड़ी लग गयी थी। जिन्हें बीस से अधिक विद्रोह कहा गया है, उनमें से अधिकांश हिंदू स्वतंत्रता आंदोलन थे।
दिल्ली से देवगिरि राजधानी का परिवर्तन
सुल्तान मौहम्मद बिन तुगलक ने जिन योजनाओं को समय-समय पर लागू करके अपनी योग्यता-अयोग्यता का परिचय दिया था, उनमें से एक राजधानी दिल्ली को उठाकर देवगिरि ले जाने की योजना भी थी।
इस योजना को कई इतिहासकारों ने महिमामंडित करते हुए इस प्रकार स्थापित करने का प्रयास किया है कि राजधानी के देवगिरि जाने से वह सुल्तान के राज्य के मध्य में हो जाती, जिससे शासन करने में सुविधा हो जाती। दूसरे सुल्तान ने जिस प्रकार अपने सभी दिल्लीवासियों को एक साथ देवगिरि चलने का निर्देश दिया, उसको भी एक मूर्खता न मानकर इतिहास में उसे इस प्रकार महिमामंडित किया गया है कि सुल्तान को चूंकि अपनी प्रजा से (विशेषत: दिल्ली वासियों से) असीम स्नेह था, इसलिए उसने उन सबको दिल्ली से देवगिरि चलने का आदेश दे दिया। देवगिरि का नाम सुल्तान ने दौलताबाद रख दिया था।
वास्तविक उद्देश्य कुछ और था
दिल्ली से दौलताबाद राजधानी ले जाने का वास्तविक उद्देश्य क्या था, इस पर प्रचलित इतिहास की पुस्तकें हमारा उचित समाधान न करके हमें भ्रमित करती हैं। इस प्रश्न का सही उत्तर पी.एन. ओक महोदय ने अपनी पुस्तक ‘भारत में मुस्लिम सुल्तान भाग-1’ पृष्ठ 287 पर समकालीन इतिहास लेखक इब्नबतूता को उदृत करके दिया है। अपनी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 613 पर इब्नबतूता हमें बताता है-‘‘उसका (मौहम्मद बिन तुगलक) उद्देश्य था कि दिल्ली के निवासी अपमान एवं गालियों से भरा हुआ पत्र सुल्तान को लिखते थे। वे उसे (गोंद से) बंद कर और ‘राजा के अलावा कोई न पढ़ें’ लिखकर रात में सभा हॉल में फेंक देते थे। जब सुल्तान उसे खोलते थे, तो उन्हें ज्ञात होता था कि उन पत्रों में उनका अपमान कर उन्हें गालियां दी गयी हैं। बस, उन्होंने दिल्ली को नष्ट करने का निश्चय कर लिया। उन्होंने दिल्ली निवासियों को देवगिरि जाने की आज्ञा दे दी। सुल्तान के ढिंढोरची ने ढोल बजा दिया कि तीन दिन के बाद कोई भी दिल्ली में न रहे। भली प्रकार निरीक्षण किया गया कि कोई रह तो नही गया है। उनके गुलामों ने गली में दो व्यक्तियों को खोज निकाला-एक कोढ़ी था, दूसरा अंधा। उन दोनों को सुल्तान के समक्ष प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कोढ़ी को मारने की आज्ञा दी, तथा अंधे को दिल्ली से दौलताबाद घसीटकर ले जाने की। यह चालीस दिन का यात्रा मार्ग था। रास्ते में इस बेचारे गरीब के अंग प्रत्यंग बिखर गये। सिर्फ उसका एक पैर ही दौलताबाद पहुंचा। दिल्ली सर्वथा सुनसान हो गयी, अब लोगों द्वारा छोड़ा गया माल असबाब ही वहां पड़ा था। एक संध्या को, महल की छत पर चढक़र और दिल्ली के चारों ओर देखकर, जिसमें न प्रकाश था, न धुंआ, सुल्तान ने कहा अब मेरा हृदय संतुष्ट हुआ है, मेरी इच्छा पूर्ण हुई है।
एक मूर्ख की भांति मुहम्मद ने दूसरे प्रांतों के निवासियों से दिल्ली को आबाद करने की राजाज्ञा जारी कर दी।’’
इस उद्घरण से स्पष्ट होता है कि सुल्तान ने दिल्ली से दौलताबाद जाने का या नई राजधानी बसाने का निर्णय केवल दिल्ली के उन स्वतंत्रता प्रेमी हिंदुओं का विनाश करने के लिए लिया था जो उसे नित्य पत्र भेजकर दुखी करते रहते थे। उसने एक स्वतंत्रता आंदोलन को, उस स्वतंत्रता आंदोलन के अगुआ हिंदुओं को सदा-सदा के लिए समाप्त करने के लिए यह योजना बनायी। जिसमें वह इस सीमा तक तो सफल भी रहा कि दिल्ली से दौलताबाद गयी अधिकांश जनता मर गयी थी। परंतु उसके इस कृत्य से भी हिंदू स्वतंत्रता संघर्ष पर विराम नही लग पाया।
दौलताबाद में भडक़ा स्वतंत्रता आंदोलन
दिल्ली की स्वतंत्रता प्रेमी जनता से दुखी होकर उसे नष्ट करने के उद्देश्य से सुल्तान ने दौलताबाद भेज दिया पर वहां की हिंदू जनता ने जब मुस्लिमों के महिलाओं पर अत्याचार और अनाचार को देखा तो दिल्ली ने दौलताबाद में भी स्वतंत्रता का ‘वाइरस’ छोड़ दिया। फलस्वरूप चारों ओर हिंदू जनता आक्रामक होकर मुस्लिमों पर आक्रमण करने लगी। स्वयं बरनी ने लिखा है-‘‘देवगिरि के चारों ओर जो एक काफिर जमीन (हिंदुओं की आबादी) थी उसमें मुसलमानों की बहुत सी कब्रें तैयार हो गयीं। (अर्थात उस हिंदू बहुल क्षेत्र में बड़ी संख्या में मुसलमान मार दिये गये) उन लोगों ने काफिर जमीन (हिंदू बहुल क्षेत्र) में अपना सिर दफना दिया और प्रवासियों की बहुत बड़ी जनसंख्या में से केवल थोड़े बहुत ही अपने-अपने घर लौटने के लिए जीवित बच सके।’’
एक छोटी सी कहानी
यहां पर मुझे एक छोटी सी कहानी स्मरण आ रही है, प्रसंगवश उसका उल्लेख आवश्यकता समझता हूं। किसी गांव में कोई कौआ रहता था, कौआ जिस घर में भी जाकर कांव-कांव करता, उसी घर में उस पर लोग ईंट-पत्थर मारते और उसे भगा डालते । कौआ बहुत दुखी था। अंतत: उसने एक दिन उस गांव को ही छोडऩे का निर्णय ले लिया।
जब कौआ उस गांव को छोडक़र चला, तो पड़ोस में रहने वाली एक कोयल ने पूछा-‘कौए भैया, आज तुम कहां जा रहे हो?’
कौए ने कहा-‘‘इस गांव के लोग बड़े दुष्ट हैं, मैं जिस स्थान पर भी जाता हूं, वही ईंट पत्थर मारते हैं, मेरा अपमान करते हैं। इसलिए मैं अब इस गांव में रहना नही चाहता। अत: किसी अन्य गांव में अपना निवास बनाने के लिए यहां से जा रहा हूं।’’
कोयल ने कौए की बात बड़े ध्यान से सुनी। तब वह बोली-‘‘कौए भैया! स्थान परिवर्तन करो और निस्संकोच करो, यह तुम्हारा अधिकार है, पर जाते-जाते एक बात तो बताते जाओ, कि जहां तुम जा रहे हो, वहां जाकर अपनी कांव-कांव बंद कर दोगे क्या?’’
कौए ने कोयल की बात सुनकर कहा-‘‘कांव-कांव करना तो मेरा स्वभाव है, इसलिए मैं अपनी कांव-कांव बंद नही कर सकता।’’ तब कोयल ने कहा-‘‘कौए भैया! जब तक तुम अपनी कांव-कांव बंद नही करोगे, तब तक चाहे कितने ही स्थान परिवर्तन कर लेना, कितनी ही नई राजधानी बना लेना, पत्थर तो तुम पर पड़ेंगे ही।’’
बात स्पष्ट है कि सुल्तान ने राजधानी का परिवर्तन किया- हिंदू प्रतिरोध के कारण। वह समझता था कि मेरे लोगों के आतंक तो यथावत जारी रहें, पर हिंदू कुछ ना कहें। सुल्तान कौए की भांति अपने स्वभाव में परिवर्तन करने को तैयार नही था। अत: उसे दूसरे स्थान पर भी हिंदुओं के प्रतिरोध रूपी पत्थर खाने को मिले।
दूसरा मूर्खतापूर्ण निर्णय
जब सुल्तान ने देखा कि दौलताबाद में भी उसे भयंकर हिंदू प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है, तो उसने अपनी प्रजा को (जो अब बहुत कम बची थी) दौलताबाद से दिल्ली लौटने का आदेश दे दिया। अचानक लिए गये इस निर्णय से लोग आनन फानन में दिल्ली के लिए चल दिये। समकालीन इतिहासकारों की साक्षी है कि दौलताबाद से दिल्ली आते-आते सुल्तान के शेष लोग समाप्त हो गये। दिल्ली से दौलताबाद गया तो एक अंधे व्यक्ति का एक पांव ही वहां पहुंच पाया था, परंतु दौलताबाद से दिल्ली आया तो किसी का पैर भी साथ नही ला सका।
एक बड़ी जनसंख्या को यदि सोची समझी रणनीति के अंतर्गत सुल्तान ने समाप्त कराया या होने दिया तो उससे बड़ा प्रजाघातक और कौन हो सकता है? पाठक स्वयं निर्णय करें।
देवगिरि के इतिहास की उपेक्षा
जब हमें सुल्तान मौहम्मद बिन तुगलक की महत्वाकांक्षी योजनाओं के विषय में वर्तमान प्रचलित इतिहास जानकारी देता है तो देवगिरि के प्राचीन वैभवपूर्ण इतिहास के विषय में कुछ नही बताया जाता, और हम जानने का प्रयास नही करते। फलस्वरूप दिल्ली से देवगिरि और देवगिरि से फिर दिल्ली के सुल्तान केे उपहासास्पद निर्णय को हम केवल अपने मनोरंजन के लिए पढ़ लेते हैं, और पुस्तकों में लिखी पंक्तियों को पढक़र आगे बढ़ जाते हैं। यह नही सोचते कि देवगिरि का कोई अपना महत्व भी तो होगा, उसका कोई अपना इतिहास होगा। उसकी अपनी निजता और अपनी अस्मिता होगी और उस महत्व पर, इतिहास पर, उसकी अपनी निजता पर और अपनी अस्मिता पर मर मिटने वाले लोग भी वहां होंगे। जब चारों ओर देश में अपनी निजता और अस्मिता की रक्षार्थ स्वतंत्रता आंदोलन चल रहे हों, तो देवगिरि क्या उस आंदोलन से अछूती रह सकती थी? वह सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक की बपौती नही थी कि जिसे वह जैसे चाहे प्रयोग कर लेगा? देवगिरि का अपना सम्मान था और वह अपने सम्मान की रक्षा उसी प्रकार करना चाहती थी, जिस प्रकार देश के अन्य महत्वपूर्ण नगर कर रहे थे।
देवगिरि का गौरवपूर्ण अतीत
जैन मुनि हेमाद्रि के अनुसार देवगिरि दक्षिण भारत के प्रसिद्घ दुर्गों में से एक रही है। इस दुर्ग का निर्माण यादव नरेश मिल्लमा प्रथम ने किया था। 1187 ई. में इस शासक ने चालुक्य राज्य से स्वयं को स्वतंत्र कर अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित किया था। इस प्रकार स्वतंत्रता देवगिरि के मूल स्वभाव में थी। उसके किले पर यूं ही जब कोई चाहे अपना झण्डा नही फहरा सकता था। यदि देवगिरि ने थोड़ी देर के लिए समर्पण भी कभी कर दिया तो ऐसा समर्पण उसकी चेतना को बुझा हुआ नही मानना चाहिए।
एक समय ऐसा भी आया कि जब यादव नरेश मिल्लमा के पौत्र सिंहन ने संपूर्ण पश्चिमी चालुक्य राज्यों को अपने अधिकार में कर लिया था, और अपने राज्य की सीमाओं में पर्याप्त वृद्घि कर यश और कीर्ति प्राप्त की थी। इस दुर्ग को कभी पृथ्वीराज चौहान ने भी विजय करने का प्रयास किया था, कालांतर में कई मुसलमान शासकों ने भी इस दुर्ग पर अपनी पताका फहराने का प्रयास किया। जब पृथ्वीराज चौहान ने इस दुर्ग पर आक्रमण किया था तो वह स्वयं भी युद्घ में घायल हो गया था। यहां के वीर सैनिकों ने अपने दुर्ग की रक्षार्थ पृथ्वीराज चौहान के आक्रमण के समय भी प्राणों की बाजी लगा दी थी। अलाउद्दीन की सेना को कई बार यहां पराजय का मुंह देखना पड़ा था, इसलिए उसके सेनापति मलिक काफूर ने यहां के इस दुर्ग पर कई बार आक्रमण किये थे। उसके हर आक्रमण के समय यहां की वीर हिंदू जनता ने अपने अदम्य साहस और शौर्य का परिचय दिया था। राजा हरफूल सिंह के समय इस दुर्ग का पतन हुआ।
हमारे देश के वीर हिंदुओं ने दुर्ग के या राजा के या अपने सेनापति के पतन को या समर्पण को कभी भी हृदय से स्वीकार नही किया। स्वतंत्रता की ज्योति को सदा सुदृढ़ हाथों से पकड़े रखा और ऐसे कितने ही उदाहरण हैं कि जब जनता बिना दुर्ग के, बिना अपने राजा के और बिना अपने सेनापति के भी शत्रु से लड़ी और शत्रु को परास्त भी किया।
अत: देवगिरि के संदर्भ में हिंदू की इस जीवन्तता को कभी भी उपेक्षित नही करना चाहिए। इतिहास के तथ्यों की घोर उपेक्षा करके जो लोग लेखनी के साथ अन्याय करते हुए लिखने का प्रयास करते हैं, और हिंदू शौर्य की अवहेलना कर अपने अनुसार कहानियां गढ़ते हैं, संभवत: उन्हीं के लिए किसी शायर ने उन्हें हिंदू शौर्य को समझाते हुए लिखा है :-
गम तो हो हद से सिवा,
अश्क अफसानी न हो।
उससे पूछो जिसका घर
जलता हो और पानी ना हो।।
‘हिंदू शौर्य’ का इतिहास वही है, जब लोगों के घर जले और उनके पास पानी नही था, परंतु उनके पास अपना धैर्य था, शौर्य था, अपना साहस था और अपने धर्म और संस्कृति के प्रति अटूट आस्था थी, और जलते हुए घरों को बिना पानी के हमने यदि बचाया तो उन्हें बचाने में इन्हीं गुणों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। निस्संदेह मौहम्मद बिन तुगलक को देवगिरि के हिंदुओं ने इन्हीं गुणों के कारण देवगिरि से पुन: दिल्ली भागने के लिए विवश कर दिया था।
दिग्गजों का दर्शन कराता है भारतीय इतिहास
पंडित राज जगन्नाथ ने अपनी रचना ‘भामिनी विलास’ में लिखा है-दिगन्ते श्रूयन्ते मदमलिन गण्डा: करटिन-अर्थात मदोन्मत्त हाथी दिशाओं के अंत (दिक+गज=दिग्गज) सुने जाते हैं, उन्हें आज तक देखा किसी ने नही।’’ इसी प्रकार विश्व में अपने शौर्य, पुरूषार्थ, विजय, वैभव और वीरता के भारतीय दिग्गज सुने जाते हैं, उन्हें देखा किसी ने नही। क्योंकि उन्होंने अपने शौर्य, पुरूषार्थ, विजय और वैभव इत्यादि का बिना मोल लिए अपना बलिदान दे दिया। देवगिरि को राजधानी बनाने के सुल्तान के इस निर्णय को तनिक इस दृष्टि कोण से भी देखने समझने की आवश्यकता है।
यहां तो दुर्योधन भी ‘शान्त बुद्घि’ हो जाता है।
गदा युद्घ में नियम भंगकर भीम ने जब दुर्योधन की हत्या कर दी तो बलराम जी भीम को मारने के लिए उद्यत हुए। तब दुर्योधन ने जो कुछ कहा, उसे कवि भास ने अपने शब्दों में यूं कहा :-
‘जीवन्तु ते कुरूकुलस्य निरापमेघा वैरञ्च विग्रह कथा च वयं च नष्टा:’ अर्थात कुरूकुल को बुझाने वाले पाण्डवरूपी बादल जीवित जाग्रत रहें। अब तो वैर झगड़े की बातचीत और हम सब नष्ट हो गये हैं। (इसलिए आप अब भीम को मारकर पांडवों के रंग में भंग मत करो।) यह कथन दुर्योधन की उदारता शांतबुद्घि और सहन शक्ति का परिचायक है। मृत्यु काल में किसी वीर के मुंह से ही ऐसे शब्द निकला करते हैं। मरते समय शत्रु का अमंगल तो कोई छोटी सोच का छोटा व्यक्ति ही चाहा करता है। परंतु जीते जी वह शत्रु को कुचलने का हर संभव प्रयास करता है।
बस, यही बात देवगिरि के हिन्दुओं की थी, वह जीते जी अपने स्वाभिमान को सुल्तान के यहां गिरवी रखने को तत्पर नही थे। अत: उन्होंने सुल्तान को देवगिरि से भगाकर ही सांस ली। इस प्रकार सुल्तान दिल्ली से देवगिरि भागा तो उसके पीछे भी हिंदू शौर्य था और फिर देवगिरि से दिल्ली भागा तो उसके पीछे भी हिंदू शौर्य था। जीत किसकी हुई, कौन हारा, किसे कितनी हानि हुई? इसे प्रचलित इतिहास तो नही बताएगा, पर इस लेख में उल्लेखित तथ्य तो बता ही रहे हैं। सत्य का मंडन हो और मिथ्यावाद का खण्डन हो, वीरों का अभिनंदन हो, दुष्टों का मान मर्दन हो, तभी बनेगा-भारत महान।

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