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इतिहास के पन्नों से

दूरदूरदृष्टा सावरकर जी और भारत की आजादी का आंदोलन ———-इंजीनियर श्याम सुन्दर पोद्दार,महा मन्त्री,वीर सावरकर फ़ाउंडेशन

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आजकल दूरदर्शन पर डिबेट हो रहे हैं। जिसमें बड़े नामी लोग भाग लेते हैं। उनमें यह ही प्रश्न उठता है कि सावरकर ने जेल से छूटने के बाद कुछ नही किया,जेल में थे तो बार बार माफ़ी माँगते थे , इस प्रकार के बे सिरपैर के आरोप कई ऐसे सिरफिरे वीर सावरकर जी पर लगाते हैं जिनका आजादी के इतिहास से किसी प्रकार का कोई सरोकार नहीं रहा। यह वही लोग होते हैं जो केवल कॉन्ग्रेस की तुष्टीकरण की नीति के चलते एक वर्ग विशेष को खुश करने के लिए ऐसा बोलते रहते हैं।
वास्तव में ऐसे लोगों के द्वारा भारत के क्रांतिवीर सावरकर जैसे लोगों को इतिहास से उपेक्षित करने का षडयंत्र रचा गया। मैं ऐसे लोगों को जवाब देना चाहता हूं कि भारतवर्ष के स्वतंत्रता समर का सही इतिहास लिखा जाता तो सावरकर ने जेल से छूटने के बाद अंग्रेजों को देश को आज़ाद करने के लिये मजबूर किया, यह इतिहास पढ़ाया जाता। लोगों को यह सवाल नही पूछना पड़ता कि आजादी के लिए सावरकर जी ने क्या किया ?
१९३७ में ज़िला बन्दी व राजनीति करने पर प्रतिबंध से मुक्त होने पर सावरकर ने हिन्दु महासभा के अध्यक्ष का भार सम्भाला। उसी समय विश्वयुद्ध लग गया। उस समय अंग्रेजों को अपनी २ लाख की सेना को १० लाख बनाना था। उन्होंने सावरकर से इस कार्य में मदद माँगी।
सावरकर बहुत बड़े दूर दृष्टा थे। वह समझ गए कि अंग्रेजों के विरुद्ध उनके साथ रहकर माहौल बनाने का यह सबसे बड़ा अवसर है। सावरकर ने इस स्वर्णिम अवसर का लाभ उठाया। हिन्दुओं के सैनिकीकरण के नाम पर हिन्दु युवकों को सेना में भर्ती करवाया व जिन हिन्दु सैनिकों की संख्या ३२ प्रतिशत सेना में होती थी उसको ६५ प्रतिशत पर पहुँचा दिया। ६ लाख हिन्दु युवक थल सेना,वायु सेना,नौसेना में भर्ती हो गए। सावरकर की हिन्दु युवकों को नसीहत थी कि ”एक बार सेना का प्रशिक्षण ले लो,फिर समय आने पर तुम स्वयम समझ जाओगे कि बंदूक़ की नाल किधर घुमानी है ?”
सावरकर की इस योजना को बहुत कम लोगों ने उस समय समझा था। यह दुर्भाग्य का विषय है कि देश के इतिहासकारों ने उनकी इस योजना को आजादी मिलने के बाद भी पहचानने से इंकार कर दिया। इतना ही नहीं आज भी उनके इस प्रकार के दूरदृष्टि भरे निर्णय और बहुत कम लोगों की कलम उठ रही है। सावरकर के हिन्दु महासभा के अध्यक्ष बनने पर क्रांतिकारी लोग हिन्दु महासभा से जुड़ने लगे। क्रांतिकारी रास बिहारी बोस जापान हिन्दु महासभा के अध्यक्ष बने। कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिलाने के बाद गाँधी ने सुभाष बाबु को कांग्रेस से भी निकाल दिया। तब सुभाष बाबु सावरकर से मिलने बम्बई उनके सावरकर सदन पहुँचे। यहां सावरकर के सैनिकीकरण अभियान को समझ पाए व अपना फ़ारवर्ड ब्लॉक का रास्ता परित्याग कर देश से अंग्रेजों को चकमा देते हुवे जर्मनी होते हुवे जापान रास बिहारी बोस के पास पहुँचे। जिन्होंने सावरकर को पत्र लिखा था कुछ दिन में जापान बिश्वयुद्ध में सम्मिलित होगा, आप एक नौजवान मेरे पास भेजो, मेरी उम्र बहुत हो गई है। रास बिहारी बोस ने जापान के हाथ लगे ५००० भारतीय युद्ध बंदी सिपाहियों को लेकर भारतीय राष्ट्रीय सेना का गठन किया। जब सिंगापुर में अंग्रेजों की सेना से जापानी सेना के साथ भारतीय राष्ट्रीय सेना लड़ रही थी। रास बिहारी बोस ने युद्ध को रोक कर भारतीय सैनिकों से निवेदन किया कि उन्हें भारत की आज़ादी के लिये लड़ना चाहिये । अंग्रेजो के लिये नही। रासबिहारी बोस की अपील का उन पर असर हुआ। पूरे के पूरे अंग्रेजों के ४५००० भारतीय सैनिक व ३०० अफ़सर भारतीय राष्ट्रीय सेना में शामिल हो गये व इसके सैनिकों की संख्या ५००० से बढ़ कर ५०००० हो गई। सावरकर का सैनिकीकरण अभियान अपना स्वरूप दिखलाने लगा। सैनिकों ने बंदूक़ की नाल की दिशा अंग्रेजों की तरफ़ घुमा दीं।(Two great Indians in Japan, Writer-Mr. J.G.Oshawa ,page-47-48)तथा सिंगापुर का पतन हो गया।
भारतीय राष्ट्रीय सेना में सावरकर के इसी अनुदान पर आज़ाद हिन्द रेडीओ सिंगापुर से २५ जून १९४४ को सुभाष बाबू ने कहा,”कांग्रेस के प्रायः अदूरदर्शी नेता ब्रिटिश हिन्दी सेना को केवल भाड़े के टट्टू तथा पेटपेपसुए कह कर आते जाते निंदा करते थे,फिर भी उत्साहजनक बात यह कि वीर सावरकर निर्भयतापूर्वक हिन्दी युवकों को सशत्र सेना में प्रवेश करने के लिये सतत प्रोत्साहित कर रहे हैं,ब्रिटिश हिन्दी सेना में प्रविष्ट इन्ही युवकों से हमारी हिन्दी राष्ट्रीय सेना को,I.N.A.को समरकला में प्रवीण और मुरब्बी प्रशिक्षितों (Trained men) का तथा सैनिकों का संभरण हो रहा है।”
जिन लोगों ने वीर सावरकर जी जैसे क्रांति पुरुष और दूरदृष्टि वाले नेता को इतिहास के पन्नों पर उचित स्थान नहीं दिया है उन्होंने मां भारती के साथ बहुत बड़ी गद्दारी की है। आज आवश्यकता है कि इस प्रकार के गद्दारों को पहचान कर उनकी गद्दारी को समाप्त किया जाए।

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