Categories
इतिहास का विकृतिकरण और नेहरू

इतिहास का विकृतिकरण और नेहरु – अध्याय 6

इतिहास का विकृतिकरण और नेहरु (डिस्कवरी ऑफ इंडिया की डिस्कवरी) पुस्तक से ..

नेहरू जी की भाषाशैली और भारत माता संबंधी ज्ञान

  • डॉ राकेश कुमार आर्य

हिंदू और हिंदुस्तान की जानकारी देते हुए वीर सावरकर जी अपनी पुस्तक हिंदुत्व में लिखते हैं कि-

“कश्मीर से कन्याकुमारी तक का तथा अटक से कटक पर्यंत का प्रदेश इसी नाम से ज्ञात था। सिंधुओं की अथवा हिंदुओं की जाति तथा भूमि की भौगोलिक मर्यादा इसी नाम से संचलित भी थी तथा ‘राष्टमार्यस्य चोत्तमम्’ के अनुसार हम लोगों को सबसे भिन्न प्रकार से स्वतंत्र पहचान प्रदान करनेवाले नाम भी यही थे। इन्हीं नामों के कारण शत्रुओं के मन में हम लोगों के लिए द्वेषभाव विद्यमान था और इन्हीं नामों के लिए शालिवाहन से लेकर शिवाजी महाराज तक हजारों वीर युद्ध में कूद पड़े तथा उन्होंने शतकों तक इन युद्धों को जारी रखा। यही नाम पद्मिनी तथा चित्तौड़ की चिता भस्म पर प्रकट हुए थे। तुलसीदास, तुकाराम, रामदास तथा रामकृष्ण आदि को इसी हिंदू शब्द पर अभिमान था। हिंदू पदपादशाही ही गुरु रामदास का स्वप्न था। शिवाजी का वह जीवन कार्य बन गया। बाजीराव तथा बंदा बहादुर, छत्रसाल और नानासाहब, प्रताप और प्रतापादित्य आदि सभी की ध्येय-आकांक्षाओं का वह अचल लक्ष्य था। जिस ध्वज पर ये शब्द अंकित थे, उस ध्वज की रक्षा करने के लिए हाथों में खड्ङ्ग लेकर हजारों हिंदुओं ने भीषण संग्राम किए। पानीपत की युद्धभूमि पर उन्हें वीरोचित मृत्यु प्राप्त हुई। इतने बलिदान तथा संहार के पश्चात् अथवा इसी के कारण हिंदू पदपादशाही के लिए नाना और महादजी ने अपने राष्ट्र की नाव चट्टानों से तथा गहरे पानी से बचाते हुए इच्छित स्थान तक सुरक्षित पहुँचाई। नेपाल के सिंहासन पर आसीन सम्राट् से लेकर हाथों में भिक्षापात्र लेकर भीख माँगनेवाले भिखारी तक लक्षावधि लोग इसी हिंदू अथवा हिंदुस्थान नाम के प्रति अपना भक्तिभाव तथा निष्ठा प्रेमपूर्वक अर्पण करते रहे हैं। इन्हीं नामों का त्याग करना, हमारे राष्ट्र का हृदय ही विदीर्ण करने के समान होगा। परंतु तुम ऐसा करने से पूर्व ही निश्चित रूप से मृत हो जाओगे। यह कृत्य न केवल तुम्हारे लिए मारक सिद्ध होगा बल्कि वह अर्थहीन भी समझा जाएगा। हिंदू तथा हिंदुस्थान नामों को विस्थापित करना, हिमालय को उसके मूल स्थान से हटाने का प्रयास करने के समान है! भयंकर घटनाएँ तथा उथल-पुथल करनेवाला कोई भूकंप ही यह काम करने की सामर्थ्य रखता है।”

यदि निष्पक्षता से ध्यानपूर्वक देखा जाए तो पता चलता है कि सावरकर जी ने थोड़े से शब्दों में “भारत की खोज” को बहुत ही सार्थक मूर्त रूप देने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। इन थोड़े से शब्दों में हमारा गौरवबोध, राष्ट्रबोध, इतिहास बोध, जातिबोध आदि सभी कुछ झलकता है। यह स्पष्ट होता है कि कौन सा चिंतन हमें देश के लिए मर मिटने हेतु प्रेरित करता रहा? जिसे हम जितना अधिक पढ़ते जाते हैं, उतना ही हमें गौरवानुभूति होती जाती है। सावरकर जी के लेखन में हिंदी भाषा के प्रति भी असीम अनुराग झलकता है। उनकी संस्कृतनिष्ठ हिंदी हम सबके लिए बहुत ही गौरव प्रदान करने वाली है।

इधर नेहरू जी हैं, जिनकी हिंदी हिंदी है ही नहीं। उसमें उर्दू के प्रति निष्ठा दिखाई देती है। उनके द्वारा अपनाई गई हिंदी में विदेशियों की भाषाओं के शब्दों को लेकर हमारे ऊपर एक नई भाषा को अवैज्ञानिक ढंग से थोपने का प्रयास किया गया है।

जिसमें राष्ट्रभक्ति न होकर विदेशियों के प्रति भक्ति भावना दिखाई देती है। नेहरू जी की ‘हिंदुस्तानी’ की नकल करते-करते ही आज ‘हिंग्लिश’ प्रचलन में आ गई है। जिसकी कोई व्याकरण नहीं है। कोई वैज्ञानिकता नहीं है। नेहरूवादी दृष्टिकोण के चलते लोगों ने भाषा को मात्र अभिव्यक्ति का माध्यम मान लिया है, जबकि भाषा इससे कहीं अधिक बढ़कर है।

नेहरू जी हिंदुस्तान की खोज नामक अध्याय के पृष्ठ 65 पर लिखते हैं-

“1920 के बाद के कुछ सालों में मेरा काम ज्यादातर अपने ही सूबे तक महदूद रहा और मैंने संयुक्त प्रान्त (यू.पी.) के 48 जिलों में गांव और शहरों में लंबी यात्राएं कीं और मैं काफी घूमा। यह सूबा बहुत जमाने से हिंदुस्तान का दिल समझा जाता रहा है और कदीम और बीच के दोनों ही जमानों की तहजीबों का मरकज रहा है। यहां कितनी ही संस्कृतियां और कौमें आपस में मिली-जुली हैं। (भारत की वैदिक हिंदू संस्कृति स्वाभाविक रूप से सभी के साथ समन्वय स्थापित करने में सक्षम रही है। यदि भारत में कहीं सामाजिक समरसता दिखती है तो वह वैदिक हिंदू समाज के लोगों के कारण ही दिखाई देती है। क्योंकि इस्लाम दूरी बनाकर रहता है। वह इस दांव में रहता है कि समन्वय बनाए रखने वाले का मूर्ख बनाया जाए और जैसे ही यह किसी भी कारण से आंखें बंद करे तो तुरंत इसका शिकार कर लो। इस वास्तविकता के रहते किसी काल्पनिक मिली जुली संस्कृति की बात करना उचित नहीं है।) यह यह प्रदेश है जहां 1857 में बगावत की आग भड़की थी और जिसका बाद में बड़ी बेरहमी से दमन हुआ था। रफ्ता-रफ्ता मेरा परिचय उत्तरी और पश्चिमी जिलों के जाटों से हुआ, जो धरती के सच्चे बेटे हैं। जो बहादुर और आजाद दिखाई देते हैं और औरों के मुकाबले में खुशहाल हैं। राजपूत किसानों और छोटे जमींदारों से मेरी जान पहचान हुई और मैंने जाना कि उन्हें अब भी अपनी जाति का और पुरखों का गुमान है। उन्हें भी जिन्होंने इस्लाम मजहब अख्तियार कर लिया है। मैंने गुनी कारीगरों और घरेलू धंधों में लगे हुए लोगों, हिंदुओं और मुसलमान से परिचय किया और बड़ी तादाद में जानकारी हासिल की। उन गरीब रियाया और किसानों से खासकर अवध में और पूरबी जिलों में जो पीढ़ियों के जुल्म और गरीबी से पिस रहे थे और जिन्हें यह उम्मीद करने की हिम्मत नहीं होती थी कि उनके दिन फिरेंगे, लेकिन फिर भी जो आशा लगाए बैठे थे और जिनके मन में विश्वास था।”

नेहरू जी ने अपनी यह पुस्तक इसी भाषा शैली में लिखी है। लोगों से मिलना और संवाद स्थापित करना अच्छी बात है। किसी भी राजनीतिज्ञ के लिए यह आवश्यक भी होता है। परंतु “हिंदुस्तान की खोज” के लिए जनसंवाद ही पर्याप्त नहीं है।

भारत माता पर नेहरू जी का अधकचरा ज्ञान

भारत माता क्या है? इस पर भी नेहरू जी बहुत अधिक स्पष्ट नहीं थे या कहिए कि बहुत अधिक गहरा ज्ञान नहीं रखते थे।

इस संबंध में नेहरू जी लिखते हैं कि जब मैं कहीं जाता तो लोग ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाकर मेरा स्वागत सत्कार करते। तब मैं उन लोगों से पूछता कि यह भारत माता कौन है? तो वह मौन साध लेते। तब मैं उन्हें बताता कि हिंदुस्तान वह सब कुछ है, जिसे उन्होंने समझ रखा है, लेकिन वह इससे भी बहुत ज्यादा है। हिंदुस्तान के नदी और पहाड़, जंगल और खेत जो हमें अन्न देते हैं, यह सभी हमें अजीज हैं। लेकिन आखिरकार जिनकी गिनती है, वह हैं हिंदुस्तान के लोग। उनके और मेरे जैसे लोग, जो सारे देश में फैले हुए हैं। भारत माता दरअसल यही करोड़ों लोग हैं और भारत माता की जय से मतलब हुआ इन लोगों की जय का। मैं उनसे कहता कि तुम इस भारत माता के अंश हो, एक तरह से तुम भी भारत माता हो और जैसे-जैसे यह विचार उनके मन में बैठते, उनकी आंखों में चमक आ जाती। इस तरह मानी, उन्होंने कोई बड़ी खोज कर ली हो।”

सावरकर जी लिखते हैं कि-

“हिंदू वही होता है जो सिंधु से सागर तक फैली हुई इस भूमि को अपनी पितृभूमि मानता है। इसी प्रकार वैदिक सप्तसिंधु के प्रदेश में जिस जाति का प्रारंभ होने का प्रथम तथा स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध है तथा जिस जाति ने नए-नए प्रदेशों पर अधिकार करते हुए लोगों को स्वीकार किया और उन्हें अपना लिया, अपनों में समाविष्ट कर लिया और उन्हें परमोच्च अवस्था पर पहुंचाया, उस जाति का रक्त हिंदू नाम के लिए योग्य कहलाने वाले मनुष्यों के शरीर में होता है। समान इतिहास, समान वाड्मय, समान कला, एक ही निर्बंध विधान, एक ही धर्मव्यवहार शास्त्र, मिले-जुले महोत्सव तथा यात्राएँ, मिली-जुली धार्मिक आचार विधि, त्योहार तथा संस्कार आदि विशिष्ट गुणों से ज्ञात हिंदुओं की संस्कृति का परंपरागत उत्तराधिकार उसे प्राप्त होता है। इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है उसके पूजनीय ऋषि-मुनि, संत-महंत, गुरु तथा अवतारी पुरुष, जहाँ जनमे हैं तथा जहाँ उनके पुण्यकारक यात्रास्थल हैं यह आसिंधु, सिंधु भारत जिसकी पितृभूमि व पुण्यभूमि है, वही हिंदू है! यही हिंदुत्व के आवश्यक अभिलक्षण हैं। समान राष्ट्र, समान जाति, समान संस्कृति-इन अभिलक्षणों को सारांश में इस प्रकार दरशाया जा सकता है। हिंदू वही है जो इस भूमि को केवल अपनी पितृभूमि ही नहीं मानता, इसे वह अपनी पुण्यभूमि भी मानता है। हिंदुत्व के प्रथम दो प्रमुख लक्षण हैं- राष्ट्र तथा जाति। पितृभूमि शब्द से स्पष्ट दिखाई देता है तथा हिंदुत्व का तीसरा लक्षण है-संस्कृति; उसका बोध पुण्यभूमि शब्द से होता है, क्योंकि संस्कृति में ही धार्मिक आचार, रीति-रिवाज तथा संस्कार आदि का अंतर्भाव होता है। इसी कारण यह भूमि हम लोगों की पुण्यभूमि (भारत माता) बन जाती है। हिंदुत्व की यही परिभाषा अधिक संक्षिप्त करने हेतु उसे अनुष्टुप में ग्रथित करने का हमने प्रयास किया तो वह अनुचित नहीं होगा, ऐसा हमें विश्वास है-

आसिंधुसिंधुपर्यंता यस्य भारतभूमिका।
पितृभूः पुण्यभूमिश्चैव स वै हिंदूरितिस्मृतः ॥

सिंधु (ब्रह्मपुत्र नदी को भी उसकी उपनदियों के साथ सिंधु कहते हैं) से सिंधु (सागर) तक फैली हुई यह ‘भारतभूमि, जिसकी पितृभूमि (पूर्वजों की भूमि है तथा पुण्यभूमि, कर्म के साथ संस्कृति की भूमि) है वही हिंदू है!”

(संदर्भ : सावरकर समग्र, खंड 9, पृष्ठ 114)

नेहरू जी भारत माता की इतनी सुंदर और हृदयग्राही परिभाषा कहीं भी नहीं कर पाए।

भारत माता की परिभाषा को सावरकर जी के शब्द कहीं अधिक स्पष्ट करते हैं, जबकि नेहरू जी की भाषा इसे स्पष्ट नहीं कर पाती।

क्रमशः

(आलोक – डॉक्टर राकेश कुमार आर्य के द्वारा 82 पुस्तकें लिखी व प्रकाशित की जा चुकी हैं। उक्त पुस्तक के प्रथम *संस्करण – 2025 का प्रकाशन *अक्षय प्रकाशन दिल्ली – 110052 मो० न० 9818 452269 से हुआ है।
* यदि आप उपरोक्त पुस्तक के माध्यम से पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा भारत के इतिहास के विकृतिकरण में दिए गए योगदान की सच्चाई जानना चाहते हैं तो आप हमसे 9911169917, 8920613273 पर संपर्क कर उपरोक्त पुस्तक को मंगवा सकते हैं । उपरोक्त पुस्तक का मूल्य 360 रुपए है। परंतु आपके लिए डाक खर्च सहित ₹300 में भेजी जाएगी । – निवेदक : अजय कुमार आर्य कार्यालय प्रबंधक )

(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betlike giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betlike giriş
betparibu giriş
betebet giriş
norabahis giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betnano giriş
parmabet giriş
piabellacasino giriş
betovis giriş
casinomilyon giriş
casinomilyon giriş
casinomilyon giriş
milanobet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
betgaranti mobil giriş
parmabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
savoybetting giriş
parmabet giriş
betlike giriş
betcup giriş
hitbet giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betcup giriş
betebet giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
nesinecasino giriş
rekorbet giriş
rekorbet giriş
pumabet giriş
pumabet giriş
nesinecasino giriş
betparibu giriş
betparibu giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betnano giriş
betticket giriş
betticket giriş
restbet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
romabet giriş
romabet giriş
betnano giriş