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पर्व – त्यौहार

“श्रावणी पर्व एवं कृष्ण जन्माष्टमी”

ओ३म्
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श्रावण का महीना वर्षा ऋतु का सबसे अधिक वर्षा वाला महीना होता है। आजकल तो देश में बड़े-बड़े नगर बस गये हैं। सुविधाजनक सड़के हैं व सड़को पर विद्युत से मिलने वाले प्रकाश की व्यवस्था है। नगरों व ग्रामों में भी बसे एवं कारें चलती हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए रेलगाड़ियों एवं वायुयान की सेवायें भी हैं परन्तु प्राचीन काल में ऐसा नहीं था। तब हमारे देश में रथ होते थे। ऐसा अनुमान होता है कि वह घोड़ों से चलते थे। यांत्रिक रथ भी हो सकते हैं परन्तु उनका विस्तार नहीं मिलता। वेदों के अध्ययन से प्रतीत होता है कि उनमें यात्रिंक विमान, रथ व वाहन तथा समुद्रीय यान बनाने और देश-विदेश की यात्रा करने का उल्लेख है। प्राचीन काल में जब वर्षा होती थी तो नदियों में जल भरा होता था। वर्षा से लोगों का आवागमन अवरुद्ध हो जाता था। गांवों में तो आवागमन अत्यन्त कठिन होता होगा, ऐसा अनुमान होता है। प्राचीन साहित्य में ऐसे संकेत नहीं मिलते कि रामायण और महाभारत काल में भारत में फोन व मोबाइल की सेवायें उपलब्ध थी जैसी वर्तमान में हैं। अतः हमारे पूर्वज प्राचीन काल में वर्तमान की तरह का जीवन व्यतीत नहीं कर पाते होंगे, ऐसा हमारा अनुमान है। यह भी अनुमान है कि वह ऐसी कोई सुविधा नहीं चाहते थे जिससे सत्कर्मों व ईश्वर की प्राप्ति में बाधा आये। इसलिए वह तप व त्याग का जीवन जीना ही उचित मानते थे। आजकल अनेक सुविधायें होने के बावजूद देश के अनेक भागों में बाढ़ आ जाया करती है जिससे अनेक गांव व नगर प्रभावित होते हैं। अतः इन सब परिस्थितियों में हमारे मनीषि पूर्वज इन दिनों स्वाध्याय व विद्वानों के प्रवचन सुनने के लिए उपयुक्त अवसर जानकर पूरे माह विद्वानों के प्रवचनों का श्रवण करने सहित स्वाध्याय आदि किया करते थे।

श्रावण मास के अन्तिम दिन पूर्णमासी को ‘श्रावणी पर्व’ का उत्सव मनाया जाता था। अनुमान से कह सकते हैं कि इस दिन वृहद यज्ञ किये जाते थे और विद्वानों के द्वारा मनुष्यों को ईश्वर व जीवात्मा के स्वरूप व गुण, कर्म व स्वभाव का परिचय कराकर उन्हें जीवात्मा के जन्म-मरण व बन्धन और मोक्ष का ज्ञान कराया जाता था। पाप व पुण्य के विषय में भी बताया जाता था और पुण्य से जन्म जन्मान्तर में उन्नति और पाप से इस जन्म में दुःख व परजन्म में पतन के कारण दुःखों से ग्रस्त होने का ज्ञान कराया जाता था। यह भी ज्ञातव्य है कि प्राचीन काल में लोगों की आवश्यकतायें बहुत कम थी। कृषि से जो अन्न, शाक सब्जियां, फल तथा पशुपालन से जो गोदुग्धादि पदार्थ उपलब्ध होते थे उसी से मनुष्य सन्तुष्ट रहते थे। लोग अपना ध्यान भौतिक उन्नति में कम तथा आध्यात्मिक उन्नति में अधिक दिया करते थे। अब यह स्थिति उलटी हो गई है। वर्तमान में लोग सांसारिक उन्नति को अधिक महत्व देते हैं तथा आध्ण्यात्मिक उन्नति की चिन्ता शायद किसी को नहीं है। कुछ आर्यसमाजी इसका अपवाद हो सकते हैं। वस्त्र व वेशभूषा भी बहुत साधारण होती थी। वेद और आयुर्वेद सहित विस्तृत वैदिक साहित्य के विद्वान अधिक होते थे जिससे रोग हो जाने पर आयुर्वेदिक उपचार मिल जाया करता था। यज्ञ से पर्यावरण की शुद्धि, सामान्य जीवन, शुद्ध गोदुग्ध, शुद्ध अन्न व अन्य भक्ष्य पदार्थों के सेवन से मनुष्य रोगी तो अपवाद स्वरूप ही होते थे। अतः इन सब कारणों से मनुष्यों का जीवन बहुत प्रसन्नता, सुख एवं सन्तुष्टि के साथ व्यतीत होता था। लोग वेद व शास्त्रों के अध्ययन तथा अपने कर्तव्यों वा धर्म के पालन में अधिक रूचि रखते थे। ऐसे ही समय में हमारे ऋषियों व विद्वानों ने श्रावणी पर्व का विधान किया था जिनका उल्लेख गृह्य सूत्रों में उपलब्ध होता है।

श्रावणी श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन सभी वेद प्रेमियों को कुछ समय वेदों का स्वाध्याय करना चाहिये। इस वर्ष यह पर्व बृहस्पतिवार दिनांक 11-8-2022 को है। इस अवसर पर निकटवर्ती किसी स्थान पर जहां श्रावणी पर्व मनाया जा रहा हो और वेद कथा, व्याख्यान एवं यज्ञ आदि हो रहा हो, तो उसमें सम्मिलित होना चाहिये। समय निकालकर सत्यार्थप्रकाश के सातवें समुल्लास का पाठ करना चाहिये। हमारे पास सत्यार्थप्रकाश का आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट का प्रचार संस्करण है। इस सप्तम समुल्लास में कुल 25 पृष्ठ हैं। इसे लगभग 2 या ढाई घंटे में पढ़ा जा सकता है। इससे ईश्वर, जीव व वेद विषयक अनेक नवीन बातों का ज्ञान होने सहित इन विषयों से संबंधित सभी शंकाओं का निवारण भी होता है। इस समुल्लास के स्वाध्याय से इसके पाठकों में वेद प्रचार करने की क्षमता का विकास भी होगा। अतः सत्यार्थप्रकाश के स्वाध्याय को श्रावणी पर्व मनाने का आधुनिक तरीका कह सकते हैं। इस कार्य को संकल्पपूर्वक करना चाहिये। कुछ लोग इस दिन को रक्षा बन्धन के नाम से मनाते हैं। जहां जो लोग इस पर्व को मनाते हैं, वह इसे मना सकते हैं। इसे मनाने से भी परिवारों में सौहार्द उत्पन्न होता है। सभी वैदिक धर्मियों को इस दिन अपने निवास पर यज्ञ अवश्य करना चाहिये और अर्थाभाव वाले वैदिक गुरुकुलों को कुछ धनराशि दान भी देनी चाहिये।

आर्य पर्व पद्धति में कहा गया है कि आर्य पुरुषों को उचित है कि श्रावणी पर्व के दिन बृहद् हवन और विधिपूर्वक उपाकर्म करके वेद और वैदिक ग्रन्थों के विशेष स्वाध्याय का उपाकर्म करें और उस को यथाशक्ति और यथावकाश नियमपूर्वक चलाते रहें। हम यहां शतपथ ब्राह्मण के 11/5/7/1 वचन का हिन्दी भावार्थ भी प्रस्तुत कर रहे हैं। इसमें स्वाध्याय की प्रशंसा करते हुए कहा गया है कि स्वाध्याय करने वाला सुख की नींद सोता है, वह युक्तमना होता है, अपनी कायिक, मानसिक व इतर सभी समस्याओं का परम चिकित्सक होता है, स्वाध्याय से इन्द्रियों का संयम और एकाग्रता आती है और प्रज्ञा की अभिवृद्धि होने से विद्या की प्राप्ति होती है। श्रावणी पर्व के दिन यज्ञ करने के साथ पुराने यज्ञोपवीत का त्याग करने व नये यज्ञोपवीत को धारण करने की भी परम्परा है। इसका भी निर्वहन किया जाना चाहिये। यज्ञोपवीत का अपना महत्व है। शिवाजी महाराज ने राज्याभिषेक के अवसर पर यज्ञोपवीत धारण करने के लिए करोड़ों रुपये व्यय किये थे। यज्ञोपवीत के तीन धागे गले में पड़ते ही पितृऋण, देवऋण तथा ऋषि ऋण से जुड़े कर्तव्यों की याद दिलाते हैं। जिस देश में श्रावणी पर्व पर यज्ञोपवीत बदलने व धारण करने की परम्परा होगी तथा जहां वेदों का स्वाध्याय किया जायेगा, वहां मनुष्य अपने तीन ऋणों को स्मरण कर कभी वेद विमुख, नास्तिक व मिथ्या मत-मतान्तरों में नहीं फंसेंगे। अतः श्रावणी पर्व को स्वाध्याय, यज्ञ व यज्ञोपवीत परिवर्तन के साथ व वेदोपदेश आदि का श्रवण करने सहित सत्यार्थप्रकाश के सातवें समुल्लास के अध्ययन का व्रत लेकर मनाया जाना चाहिये।

श्रावणी पर्व के आठवें दिन कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है। सुदर्शनचक्रधारी योगेश्वर कृष्ण वैदिक भारतीय संस्कृति के गौरव हैं। कृष्ण जी का जन्म मथुरा नगरी में हुआ था। महाभारत युद्ध के वह प्रमुख नायक थे। पाण्डव कुल के युधिष्ठिर, अर्जुन आदि ने अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध कृष्णजी के नेतृत्व में महाभारत का युद्ध लड़ा था। इस युद्ध में अनेक अवसरों पर पाण्डवों के सम्मुख अनेक समस्यायें एवं संकट आये जिन सबका समाधान श्री कृष्ण जी ने अपनी प्रखर विवेक बुद्धि से किया। कृष्ण जी ईश्वर भक्त, वेदभक्त, योगी, युद्ध विद्या के मर्मज्ञ, अपराजेय योद्धा, सत्य के पुजारी, देशभक्त व देशरक्षक, अन्याय एवं अधर्म के विरोधी तथा वैदिक धर्म एवं संस्कृति के अनुयायी व रक्षक थे। कृष्णजी अस्त्र शस्त्र की शिक्षा प्राप्त करने पर क्षत्रिय समाज में सर्वश्रेष्ठ वीर समझे जाने लगे थे। उन्हें कभी कोई परास्त न कर सका। कंस, जरासंघ, शिशुपाल आदि तत्कालीन प्रधान योद्धाओं से तथा काशी, कलिंग, गांधार आदि राजाओं से वे लड़ गए और उन्होंने उन सब को पराजित किया था। महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य एवं कर्ण आदि योद्धाओं ने पाण्डव पक्ष में भारी तबाही मचाई थी। जयद्रथ ने धर्म व युद्ध नियमों के विरुद्ध अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का वध किया था। इन सबका कृष्ण जी ने अपनी बुद्धि-चातुर्य से समाधान किया था। श्री कृष्ण जी ने अर्जुन के द्वारा रणभूमि में कौरवपक्ष के प्रमुख योद्धाओं को धराशायी किया था अन्यथा महाभारत युद्ध का परिणाम धर्म में स्थित पाण्डवों के पक्ष में नहीं हो सकता था। महाभारत युद्ध में पाण्डवों की विजय का यदि किसी एक पुरुष को श्रेय देना हो तो वह योगेश्वर कृष्ण ही हैंे। सात्यकि और अभिमन्यु उनके शिष्य थे। यह दोनों भी किसी शत्रु से सहजता से हारने वाले नहीं थे। अर्जुन ने भी युद्ध की अनेक गहन बातों का अध्ययन कृष्ण जी से ही किया था।

आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में श्री कृष्ण जी की प्रशंसा करते हुए लिखा है ‘‘देखो! श्री कृष्ण जी का इतिहास महाभारत (प्रसिद्ध इतिहास ग्रन्थ) में अत्युत्तम है। उनके गुण कर्म-स्वभाव और चरित्र आप्त पुरुषों के सदृश हैं। महाभारत में श्री कृष्ण जी ने जन्म से मरण-पर्यन्त अधर्म का कोई बुरा कुछ भी आचरण किया हो ऐसा नहीं लिखा और इस भागवत वाले ने (उन पर) मनमाने अनुचित दोष लगाए हैं। दूध, दही, मक्खन आदि की चोरी लगाई और कुब्जा दासी से समागम, पर-स्त्रियों से रास मंडल क्रीड़ा आदि मिथ्या दोष श्री कृष्ण जी में लगाए हैं। इसको पढ़-पढ़ा व सुन-सुना के अन्यमत वाले श्री कृष्ण जी की बहुत-सी निन्दा करते हैं। जो यह भागवत (पुराण) न होता तो श्री कृष्ण जी के सद्श महात्माओं की झूठी निन्दा क्योंकर होती?’’ महर्षि दयानन्द के इन शब्दों के अनुसार भागवत पुराण के रचयिता ने कृष्ण जी के उज्जवल चरित्र का हनन किया है। आश्चर्य है कि हमारे कुछ सनातनी बन्धु उसी को महत्व देते हैं।

बकिंग चन्द्र चट्टोपाध्याय ने भी कृष्णजी के उज्जवल चरित्र एवं व्यक्तित्व के विषय में लिखा है। उनके अनुसार ‘श्री कृष्ण आदर्श मनुष्य थे। मनुष्य का आदर्श प्रचारित करने के लिए उनका प्रादुर्भाव हुआ था। वे अपराजेय, अपराजित, विशुद्ध, पुण्यमय, प्रेममय, दयामय, दृढ़कर्मी, धर्मात्मा, वेदज्ञ, नीतिज्ञ, धर्मज्ञ, लोकहितैषी, न्यायशील, क्षमाशील, निर्भय, अहंकारशून्य, योगी और तपस्वी थे। वे मानुषी शक्ति से काम करते थे परन्तु उन में देवत्व अधिक था। पाठक अपनी बुद्धि के अनुसार ही इस का निर्णय कर लें कि जिस की शक्ति मानुषी पर चरित्र मनुष्यातीत था, वह पुरुष मनुष्य या देव था।’ श्री कृष्ण जी न केवल भारत अपितु विश्व के अद्वितीय गौरवमय महापुरुष थे। उन्होंने युद्ध भूमि में अर्जुन का विषाद दूर किया था और उसे अपने कर्तव्य क्षत्रियोचित कर्तव्य पर आरूढ़ किया था। इसका परिणाम यह हुआ कि महाभारत के युद्ध में कौरवों का असत्य पक्ष पराजित हुआ और पाण्डवों के सत्यपक्ष की विजय हुई। गीता के नाम से प्रचलित कृष्ण-उपदेश वा गीता ग्रन्थ में बहुत सी अच्छी बातें हैं, उन्हें भी पढ़ा जा सकता है। आर्यसमाज के अनेक शीर्ष विद्वानों ने महाभारत के आधार पर श्री कृष्ण जी के जीवन चरित लिखे हैं। इनमें पं. चमूपति, लाला लाजपतराय, डा. भवानीलाल भारतीय आदि के जीवन चरित महत्वपूर्ण हैं जिन्हें सबको पढ़ना चाहिये। पं. सन्तराम रचित शुद्ध महाभारत भी पढ़ने योग्य ग्रन्थ है। सम्भवतः अब यह अनुपलब्ध है। स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती जी ने भी एक विशालकाय शुद्ध ग्रन्थ महाभारत का सम्पादन किया था जो वैदिक साहित्य के आर्य प्रकाशक ‘विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द, दिल्ली’ से उपलब्ध होता है। यह सभी ग्रन्थ पठनीय हैं। इन ग्रन्थों की शिक्षा से देश की युवा पीढ़ी के ज्ञान में वृद्धि सहित उनके चरित्र निर्माण में सहायता मिलेगी और वैदिक धर्म की भी रक्षा हो सकेगी। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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