ताइवान पर तनाव, अमेरिका का चाव, भारत के भाव

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अमेरिका और चीन के बीच तनाव के जो मुद्दे हैं वो बने हुए हैं, चाहें वो ताइवान हों, दक्षिण चीन सागर में बढ़ता चीन का प्रभाव हो या फिर दोनों देशों के बीच चल रहा ट्रेड वॉर हो इन सभी से परे ताइवान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भी साख का सवाल बनता जा रहा है. चीन की आर्थिक हालत इस समय ख़राब है. शी जिनपिंग ऐसे समय में कमजोर नहीं दिखना चाहेंगे, इसलिए वो राष्ट्रवाद का सहारा लेंगे और ताइवान की तरफ जाएंगे. इसलिए चीन ताइवान को लेकर आक्रामक है और भड़काऊ भाषा का इस्तेमाल कर रहा है.

-सत्यवान ‘सौरभ’

अमेरिकी कांग्रेस की स्पीकर नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा को लेकर दोनों देशों के बीच तीखा तनाव पैदा हो गया है। मंगलवार को जब अमेरिकी कांग्रेस की स्‍पीकर ताइवान पहुंची तो अमेरिकी फाइटर जेट्स भी पीछे-पीछे सुरक्षा में रवाना हुए। इससे नाराज चीन ने ताइवान के आसपास सैन्य युद्ध अभ्यास का ऐलान कर दिया। चीन भड़का हुआ है। अमेरिका ने भी साफ कर दिया कि सुरक्षा के मुद्दे पर अमेरिका ताइवान के साथ खड़ा है। नैंसी पेलोसी के दौरे पर चीन क्यों खफा है। क्या रूस और यूक्रेन की तरह चीन और ताइवान के बीच युद्ध की संभावना है। अमेरिकी स्पीकर नैन्सी पेलोसी की ताइवान यात्रा का चीन ने स्वागत नहीं किया है। इसने दो शक्तिशाली देशों- चीन और अमेरिका के बीच तीव्र तनाव पैदा कर दिया है क्योंकि चीन ताइवान को एक अलग प्रांत के रूप में देखता है।

ताइवान, जो खुद को एक संप्रभु राष्ट्र मानता है, मगर चीन ताइवान को अपना अलग प्रांत मानता है। फिर भी ताइवान अमेरिका को अपना सबसे बड़ा सहयोगी मानता है और अमेरिकी स्पीकर नैन्सी पेलोसी की ताइवान यात्रा के बाद दुनिया एक नए टकराव की ओर बढ़ रही है. यात्रा के बाद अमेरिका और चीन के बीच तनाव बढ़ गया है, जिसके केंद्र में ग्लोबल सेमीकंडक्टर ट्रेड पर वर्चस्व बनाना है. ऐसा अनुमान है कि ग्लोबल सेमीकंडक्टर कैपेसिटी में अकेले ताइवान की 20 फीसदी हिस्सेदारी होगी. दूसरी ओर अमेरिका और चीन सेमीकंडक्टर के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से हैं. बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की एक रिपोर्ट के अनुसार, सेमीकंडक्टर दुनिया में चौथा सबसे ज्यादा ट्रेड होने वाला प्रोडक्ट है. इसमें दुनिया के 120 देश भागीदार हैं. सेमीकंडक्टर से ज्यादा ट्रेड सिर्फ क्रूड ऑयल, मोटर व्हीकल व उनके कल-पुर्जों और खाने वाले तेल का ही ट्रेड होता है।

ताइवान, आधिकारिक तौर पर चीन गणराज्य, पूर्वी एशिया में एक देश है, और उत्तर पश्चिमी प्रशांत महासागर में पूर्वी और दक्षिण चीन सागर के जंक्शन पर जापान और फिलीपींस के बीच है। अर्धचालकों की अधिकांश वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला ताइवान पर निर्भर है। वर्तमान में, केवल 13 देश (प्लस वेटिकन) ताइवान को एक संप्रभु देश के रूप में मान्यता देते हैं। चीन और ताइवान की अर्थव्यवस्थाएं अटूट रूप से जुड़ी हुई हैं। 2017 से 2022 तक 515 बिलियन डॉलर के निर्यात मूल्य के साथ चीन ताइवान का सबसे बड़ा निर्यात भागीदार है, जो अमेरिका से दोगुना से अधिक है। ताइवान अन्य द्वीपों की तुलना में मुख्य भूमि चीन के बहुत करीब है, और बीजिंग इसे अपना समझता है क्योंकि 1949 में चीनी क्रांति के दौरान राष्ट्रवादियों को वहां से खदेड़ दिया था।

अमेरिका और चीन के बीच जिन मुद्दों को लेकर तनाव है, उनमें है ट्रेड वॉर- दोनों ने एक-दूसरे के उत्पादों पर आयात कर बढ़ाया है. हाल के सालों में एक-दूसरे पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध भी लगाए हैं. समंदर में बढ़ते चीन के प्रभाव और दक्षिण चीन सागर में चीन के पैर फैलाने से अमेरिका और पश्चिमी मुल्क नाराज़ हैं. इसे लेकर कई बार दोनों के बीच तनाव चेतावनी तक भी बढ़ा है. चीन की घेराबंदी कर अमेरिका पेसिफिक के देशों के साथ संबंध बढ़ाना चाहता है. यहां वो अपने सहयोगी ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर चीन के प्रभाव को रोकने की कोशिश कर रहा है. अमेरिका, यूके और ऑस्ट्रेलिया के बीच हाल में ऑकस सुरक्षा गठबंधन बना है. अमेरिका चीन पर वीगर अल्पसंख्यक मुसलमानों के मानवाधिकारों के उल्लंघन का भी आरोप लगाता है, हालांकि चीन इससे इनकार करता रहा है.

अमेरिका और चीन के बीच तनाव के जो मुद्दे हैं वो बने हुए हैं, चाहें वो ताइवान हों, दक्षिण चीन सागर में बढ़ता चीन का प्रभाव हो या फिर दोनों देशों के बीच चल रहा ट्रेड वॉर हो; इन सभी से परे ताइवान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भी साख का सवाल बनता जा रहा है. चीन की आर्थिक हालत इस समय ख़राब है. शी जिनपिंग ऐसे समय में कमजोर नहीं दिखना चाहेंगे, इसलिए वो राष्ट्रवाद का सहारा लेंगे और ताइवान की तरफ जाएंगे. इसलिए चीन ताइवान को लेकर आक्रामक है और भड़काऊ भाषा का इस्तेमाल कर रहा है.

आज के वैश्विक परिवेश में अमेरिका की शक्ति कम हो रही है और चीन एक उभरती हुई शक्ति है. जहां तक भारत की बात है, भारत एक अनिश्चित शक्ति है, रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत ने भी वही पक्ष लिया है जो चीन ने लिया है. चीन भारत का पड़ोसी है, दोनों करीब 3488 किलोमीटर की सीमा साझा करते हैं. लेकिन बीते कुछ सालों से भारत और चीन सीमा विवाद में उलझे हैं. जून 2020 में गलवान घाटी में दोनों मुल्कों के सैनिकों के बीच हुई झड़प के बाद दोनों के रिश्तों में तनाव बढ़ा है. भारत ने दर्जनों चीनी मोबाइल ऐप्स प्रतिबंधित किए हैं और कुछ चीनी उत्पादों पर एंटी डंपिंग कर भी लगाया है. वहीं, भारत के अमेरिका के साथ मज़बूत रिश्ते रहे हैं. चीन का मुकाबला करने के लिए एशिया में भारत अमेरिका का अहम सहयोगी है.

अमेरिका ने खुलकर भारत के साथ रिश्ते मजबूत करने के संकेत भी दिए हैं. ऐसे में अगर चीन और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ता है तो उसका असर भारत पर पड़ने की आशंका भी है. भारत और चीन के बीच हाल के सालों में रिश्तों में तनाव आया है. इसी बीच भारत ने ताइवान के साथ अपने संबंधों को निभाने की कोशिश की है. 2020 में गलवान में में हुए विवाद के बाद भारत ने विदेश मंत्रालय में तत्कालीन संयुक्त सचिव (अमेरिका) गौरांगलाल दास को ताइवान में राजनयिक नियुक्त किया. भारत ने अभी तक तक ताइवान के साथ औपचारिक राजनयिक रिश्ते नहीं बनाए है। भारत के लिए अहम ये नहीं है कि चीन और अमेरिका बात कर रहे हैं. भारत के लिए अहम ये है कि चीन ने जिस तरह से अमेरिका को स्पष्ट कहा है कि ताइवान के मामले में वो किसी को दखल नहीं देने देगा. इससे भारत के लिए संकेत ये है कि चीन अपने और भारत के तनाव में भी किसी को दखल नहीं देने देगा.

भारत की एक्ट ईस्ट विदेश नीति के एक हिस्से के रूप में, भारत ने ताइवान के साथ व्यापार और निवेश के साथ-साथ विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण के मुद्दों और लोगों से लोगों के आदान-प्रदान में सहयोग विकसित करने की मांग की है। उदाहरण के लिए, नई दिल्ली में भारत-ताइपे एसोसिएशन और ताइपे आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र। भारत और ताइवान के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं, लेकिन 1995 के बाद से, दोनों पक्षों ने एक-दूसरे की राजधानियों में प्रतिनिधि कार्यालय बनाए रखा है जो वास्तविक दूतावास के रूप में कार्य करते हैं। 1949 से, भारत ने एक चीन नीति को स्वीकार किया है जो ताइवान और तिब्बत को चीन के हिस्से के रूप में स्वीकार करती है।

हालांकि, भारत एक कूटनीतिक बिंदु बनाने के लिए नीति का उपयोग करता है, अर्थात, यदि भारत “एक चीन” नीति में विश्वास करता है, तो चीन को “एक भारत” नीति में भी विश्वास करना चाहिए। भले ही भारत ने 2010 से संयुक्त बयानों और आधिकारिक दस्तावेजों में वन चाइना नीति के पालन का उल्लेख करना बंद कर दिया है, लेकिन चीन के साथ संबंधों के ढांचे के कारण ताइवान के साथ उसका जुड़ाव अभी भी प्रतिबंधित है। आखिरकार, ताइवान का मुद्दा केवल एक सफल लोकतंत्र के विनाश की अनुमति देने के नैतिक प्रश्न के बारे में नहीं है, मगर अंतरराष्ट्रीय नैतिकता के बारे में है, ताइवान पर चीन के आक्रमण के अगले दिन एक बहुत ही अलग एशिया दिखेगा, चाहे कुछ भी हो जाए। ऐसे में ताइवान पर तनाव में, अमेरिका का चाव, भारत के भाव निर्णायक साबित होंगे।

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