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जब अंग्रेजों ने डॉ हेडगेवार को डाला था जेल में , भाग – 2

कांग्रेस लाने वाली थी क्रांतिकारियों के लिए निंदा प्रस्ताव

संघ की नीति के अनुसार, डॉ हेडगेवार ने व्यक्तिगत तौर पर अन्य स्वयंसेवकों के साथ इस सत्याग्रह में भाग लेने का निर्णय लिया। और संघ कार्य अविरत चलता रहे इस हेतु उन्होंने सरसंघचालक पद का दायित्व अपने पुराने मित्र डॉ परांजपे को सौंप कर बाबासाहब आप्टे और बापू राव भेदी को शाखाओं के प्रवास की जिम्मेदारी दी। इस सत्याग्रह में उनके साथ प्रारंभ में 21 जुलाई, को 3-4 हजार लोग थे। वर्धा, यवतमाल होकर पुसद पहुँचते-पहुँचते सत्याग्रह स्थल पर 10,000 लोग इकट्ठे हुए। इस सत्याग्रह में उन्हें 9 महीने का कारावास हुआ।

वहाँ से छूटने के पश्चात् सरसंघचालक का दायित्व पुन: स्वीकार कर वे फिर से संघ कार्य में जुट गए। 1938 में भाग्य नगर (हैदराबाद) में निजाम के द्वारा हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ हिन्दू महासभा और आर्य समाज के तत्वावधान में ‘भागानगर नि:शस्त्र प्रतिकार मंडल’  के नाम से सत्याग्रह का आह्वान हुआ उसमें सहभागी होने के लिए जिन स्वयंसेवकों ने अनुमति माँगी, उन्हें डॉक्टर ने सहर्ष अनुमति दी। जिन पर केवल संघ का प्रमुख दायित्व था उन्हें केवल संगठन के कार्य की दृष्टि से बाहर ही रहने के लिए कहा था।

उन्होंने स्पष्ट कहा था कि सत्याग्रह में जिन्हें भाग लेना है वे व्यक्ति के नाते अवश्य भाग ले सकते हैं। भागनगर सत्याग्रह के संचालकों के द्वारा प्रसिद्धि पत्रक में ‘संघ’ ने सहभाग लिया, ऐसा बार-बार आने पर डॉक्टर ने उन्हें पत्र लिखकर संघ का उल्लेख न करने की सूचना उनके प्रसिद्धि विभाग को देने को कहा था। राजकीय आंदोलन का तात्कालिक, नैमित्तिक व संघर्षमय स्वरूप और संघ का नित्य, अविरत (अखंड) व रचनात्मक स्वरूप इन दोनों की भिन्नता को समझ कर आंदोलन भी यशस्वी हो, परन्तु उस समय भी चिरंतन संघकार्य अबाधित रहे इस दूरदृष्टि से विचारपूर्वक यह नीति डॉक्टर ने अपनाई थी।

इसीलिए जंगल सत्याग्रह के समय भी सरसंघचालक का दायित्व डॉ परांजपे को सौंप कर व्यक्ति के नाते वे अनेक स्वयंसेवकों के साथ सत्याग्रह में सह्भागी हुए थे। 8 अगस्त, 1942 को मुंबई के गोवलिया टैंक मैदान पर कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गाँधी जी ने ‘अंग्रेज! भारत छोड़ो’ यह ऐतिहासिक घोषणा की। दूसरे दिन से ही देश में आंदोलन ने गति पकड़ी और जगह जगह आंदोलन के नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हुई। विदर्भ में बावली (अमरावती), आष्टी (वर्धा) और चिमूर (चंद्रपुर) में विशेष आन्दोलन हुए। चिमूर के समाचार बर्लिन रेडियो पर भी प्रसारित हुए।

यहाँ के आन्दोलन का नेतृत्व कांग्रेस के उद्धवराव कोरेकर और संघ के अधिकारी दादा नाईक, बाबूराव बेगडे, अण्णाजी सिरास ने किया। इस आन्दोलन में अंग्रेज की गोली से एकमात्र मृत्यु बालाजी रायपुरकर इस संघ स्वयंसेवक की हुई। कांग्रेस, श्री तुकडो महाराज द्वारा स्थापित श्री गुरुदेव सेवा मंडल एवं संघ स्वयंसेवकों ने मिलकर 1943 का चिमूर का आन्दोलन और सत्याग्रह किया। इस संघर्ष में 125 सत्याग्रहियों पर मुकदमा चला और असंख्य स्वयंसेवकों को कारावास में रखा गया।

भारत भर में चले इस आंदोलन में स्थान-स्थान पर संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता, प्रचारक स्वयंप्रेरणा से कूद पड़े। अपने जिन कार्यकर्ताओं ने स्थान-स्थान पर अन्य स्वयंसेवकों को साथ लेकर इस आंदोलन में भाग लिया उनके कुछ नाम इस प्रकार हैं- राजस्थान में प्रचारक जयदेवजी पाठक, जो बाद में विद्या भारती में सक्रिय रहे। आर्वी (विदर्भ) में डॉ अण्णासाहब देशपांडे। जशपुर (छत्तीसगढ़) में रमाकांत केशव (बालासाहब) देशपांडे, जिन्होंने बाद में वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की।

दिल्ली मेें श्री वसंतराव ओक जो बाद में दिल्ली के प्रान्त प्रचारक रहे। बिहार (पटना), में वहां के प्रसिद्ध वकील कृष्ण वल्लभप्रसाद नारायण सिंह (बबुआजी) जो बाद में बिहार के संघचालक रहे। दिल्ली में ही श्री चंद्रकांत भारद्वाज, जिनके पैर में गोली धँसी और जिसे निकाला नहीं जा सका। बाद में वे प्रसिद्ध कवि और अनेक संघ गीतों के रचनाकार हुए। पूर्वी उत्तर प्रदेश में माधवराव देवडे जो बाद में प्रान्त प्रचारक बने और इसी तरह उज्जैन (मध्य प्रदेश) में दत्तात्रेय गंगाधर (भैयाजी) कस्तूरे का अवदान है जो बाद में संघ प्रचारक हुए।

अंग्रेजों के दमन के साथ-साथ एक तरफ सत्याग्रह चल रहा था तो दूसरी तरफ अनेक आंदोलनकर्ता भूमिगत रहकर आंदोलन को गति और दिशा देने का कार्य कर रहे थे। ऐसे समय भूमिगत कार्यकर्ताओं को अपने घर में पनाह देना किसी खतरे से खाली नहीं था। 1942 के आंदोलन के समय भूमिगत आंदोलनकर्ता अरुणा आसफ अली दिल्ली के प्रान्त संघचालक लाला हंसराज गुप्त के घर रही थीं और महाराष्ट्र में सतारा के उग्र आन्दोलनकर्ता नाना पाटील को भूमिगत स्थिति में औंध के संघचालक पंडित सातवलेकर ने अपने घर में आश्रय दिया था। ऐसे असंख्य नाम और हो सकते हैं। उस समय इन सारी बातों का दस्तावेजीकरण (रिकार्ड) करने की कल्पना भी संभव नहीं थी।

डॉ हेडगेवार के जीवन का अध्ययन करने पर ध्यान में आता है कि बाल्यकाल से आखिरी साँस तक उनका जीवन केवल और केवल अपने देश और उसकी स्वतंत्रता इसके लिए ही था। उस हेतु उन्होंने समाज को दोषमुक्त, गुणवान एवं राष्ट्रीय विचारों से जाग्रत कर उसे संगठित करने का मार्ग चुना था। संघ की प्रतिज्ञा में भी 1947 तक संघ कार्य का उद्देश्य ‘हिन्दू राष्ट’ को स्वतंत्र करने के लिए’ ऐसा ही था। भारतीय राष्ट्रीय जीवन में ‘एक्सट्रीम पोजीशंस’ लेने की स्थिति दिखती थी।

डॉक्टर जी के समय भी समाज कांग्रेस-क्रांतिकारी, तिलक-गाँधी, हिंसा-अहिंसा, हिन्दू महासभा-कांग्रेस ऐसे द्वन्द्वों में उलझा हुआ था। एक दूसरे को मात करने का वातावरण बना था। कई बार तो आपसी भेद के चलते ऐसा बेसिर का विरोध करने लगते थे कि साम्राज्यवाद के विरोध में अंग्रेजों से लड़ने के बदले आपस में ही भिड़ते दिखते थे। 1921 में मध्य प्रान्त कांग्रेस की प्रांतीय बैठक में लोकनायक अणे की अध्यक्षता में क्रांतिकारियों की निंदा का प्रस्ताव आने वाला था।

डॉ हेडगेवार ने उन्हें समझाया कि क्रांतिकारियों के मार्ग पर आपका विश्वास भले ही ना हो पर उनकी देशभक्ति पर शंका नहीं करनी चाहिए। ऐसी स्थिति में डॉ जी का जीवन राजनीतिक दृष्टिकोण, दर्शन एवं नीतियाँ, तिलक-गांधी, गाँधी-अहिंसा, कांग्रेस-क्रांतिकारी, इन संकीर्ण विकल्पों के आधार पर निर्धारित नहीं थी। व्यक्ति अथवा विशिष्ट मार्ग से कहीं अधिक महत्वपूर्ण स्वातंत्र्य प्राप्ति का मूल ध्येय था। भारत को केवल राजनीतिक इकाई मानने वाला एक वर्ग हर प्रकार के श्रेय को अपने ही पल्ले में डालने पर उतारू दिखता है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए दूसरों ने कुछ नहीं किया, सारा का सारा श्रेय हमारा ही है ऐसा (‘प्रोेपगंडा’) एकतरफा प्रचार करने पर वह आमादा दिखता है। यह उचित नहीं है। सशस्त्र क्रांति से लेकर अहिंसक सत्याग्रह, सेना में विद्रोह, आजाद की हिन्द फौज इन सभी के प्रयासों का एकत्र परिणाम स्वतंत्रता प्राप्ति में हुआ है। इसमें द्वितीय महायुद्ध में जीतने के बाद भी इंग्लैंड की खराब हालत और अपने सभी उपनिवेशों पर शासन करने की असमर्थता और अनिच्छा के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। स्वतंत्रता के लिए भारत के समान दीर्घ संघर्ष नहीं हुआ, ऐसे उपनिवेशों को भी अंग्रेजों ने क्रमश: स्वतंत्र किया है।

1942 का सत्याग्रह, महात्मा गाँधी द्वारा किया हुआ आखिरी सत्याग्रह था और उसके पश्चात 1947 में देश स्वतंत्र हुआ, यह बात सत्य है। परन्तु इसलिए स्वतंत्रता केवल 1942 के आंदोलन के कारण ही मिली, और जो लोग उस आंदोलन में कारावास में रहे उनके ही प्रयास से भारत स्वतंत्र हुआ यह कहना हास्यास्पद, अनुचित और असत्य है। एक रूपक कथा है। एक किसान को बहुत भूख लगी। पत्नी खाना परोस रही थी और वह खाए जा रहा था। लेकिन, तृप्ति नहीं हो रही थी, दस रोटी खाने के बाद जब उसने ग्यारहवीं रोटी खाई तो उसे तृप्ति की अनुभूति हुई। उससे नाराज होकर वह पत्नी को डाँटने लगा कि यह ग्यारहवीं रोटी जिससे तृप्ति हुई, उसने पहले क्यों नहीं दी। इतनी सारी रोटियाँ खाने की मेहनत बच जाती और तृप्ति जल्दी अनुभूत होती। यह कहना हास्यास्पद ही है।

इसी तरह यह कहना कि केवल 1942 के आन्दोलन के कारण ही भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई, हास्यास्पद बात है। इसके बारे में अन्य इतिहासकार क्या कहते हैं जरा देखिए- भारत को आजाद करते समय ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने कहा था, ‘‘महात्मा गाँधी के अहिंसा आंदोलन का ब्रिटिश सरकार पर असर शून्य रहा है।’’ कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और पश्चिम बंगाल के कार्यकारी गवर्नर रहे पी़ एम़ चक्रवर्ती के शब्दों में, ‘‘जिन दिनों मैं कार्यकारी गवर्नर था, उन दिनों भारत दौरे पर आए लॉर्ड एटली, जिन्होंने अंग्रेजों को भारत से बाहर कर कोई औपचारिक आजादी नहीं दी थी, दो दिन के लिए गवर्नर निवास पर रुके थे। भारत से अंग्रेजी हुकूमत के चले जाने के असली कारणों पर मेरी उनके साथ लंबी बातचीत हुई थी। मैंने उनसे सीधा प्रश्न किया था कि चूंकि गाँधी जी का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ तब तक हल्का पड़ चुका था और 1947 के दौरान अंग्रेजों को यहां से आनन-फानन में चले जाने की कोई मजबूरी भी नहीं थी, तब वह क्यों गए? इसके जवाब में एटली ने कई कारण गिनाए, जिनमें से सबसे प्रमुख था भारतीय सेना और नौसेना की ब्रिटिश राज के प्रति वफादारी का लगातार कम होते जाना। इसका मुख्य कारण नेताजी सुभाषचंद्र बोस की सैन्य गतिविधियाँ थीं। हमारी बातचीत के अंत में मैंने एटली से पूछा कि अंग्रेजी सरकार के भारत छोड़ जाने में गाँधी जी का कितना असर था। सवाल सुनकर एटली के होंठ व्यंग्यमिश्रित मुस्कान के साथ मुड़े और वह धीमे से बोले- न्यूनतम (मिनिमल)।’’ (रंजन बोरा, ‘सुभाषचंद्र बोस, द इंडियन नेशनल आर्मी, द वार ऑफ़ इंडियाज लिबरेशन’। जर्नल ऑफ़ हिस्टोरिकल रिव्यू, खंड 20,(2001), सं 1, संदर्भ 46)
अपनी पुस्तक ‘द इंडियाज स्ट्रगल’ में नेताजी ने लिखा है, “कांग्रेस और महात्मा जी को स्वयं अपने द्वारा प्रतिपादित योजना के प्रति स्पष्टता नहीं थी और भारत को उसकी स्वतंत्रता के अमूल्य लक्ष्य तक ले जाने से जुड़े अभियान के क्रमबद्ध चरणों से संबंधित कोई साफ विचार भी नहीं था।’’

रमेश चंद्र मजूमदार कहते हैं, “तीनों का एकजुट असर था जिसने भारत को आजाद कराया। इसमें भी विशेष रूप से आईएनए मुकदमे के दौरान सामने आए तथ्य और इस कारण भारत में उठी प्रतिक्रिया, जिसके कारण पहले से ही युद्ध में टूट चुकी ब्रिटिश सरकार को साफ हो गया था कि वह भारत पर शासन करने के लिए सिपाहियों की वफादारी पर निर्भर नहीं रह सकती। भारत से जाने के उनके निर्णय का यह संभवत: सबसे बड़ा कारण था।’’(मजूमदार, रमेश चंद्र, – थ्री फेजेज ऑफ़ इंडियाज स्ट्रगल फॉर फ्रीडम, बीवीएन बॉम्बे, इंडिया 1967, पृ़ 58-59)

यह सारा वृत्तांत पढ़ने के बाद, यह सोचना कि 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन का स्वतंत्रता प्राप्ति में कुछ भी योगदान नहीं है यह असत्य है। जेल में जाना यही देशभक्त होने का परिचायक है ऐसा मानना भी ठीक नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय लोगों में, आंदोलन कर कारावास भोगने वाले, उनके परिवारों की देखभाल करने वाले, भूमिगत आंदोलन करने वाले, ऐसे भूमिगत आंदोलनकारियों को अपने घरों में पनाह देने वाले, विद्यालयों के द्वारा विद्यार्थियों में देशभक्ति का भाव जगाने वाले, स्वदेशी के द्वारा अंग्रेजों की आर्थिक नाकाबंदी करने वाले, स्वदेशी उद्योग के माध्यम से सशक्त भारतीय पर्याय देने वाले, लोककला, पत्रकारिता, कथा उपन्यास, नाटकादि के माध्यम से राष्ट्र जागरण करने वाले सभी का योगदान महत्व का है। 

भारत केवल एक राजनीतिक इकाई नहीं है। यह तो हजारों वर्षों के चिंतन के आधार पर निर्मित एक शाश्वत, समग्र, एकात्म जीवन दृष्टि पर आधारित एक सांस्कृतिक इकाई है। यह जीवन दृष्टि, संस्कृति ही आसेतु हिमाचल इस वैविध्यपूर्ण समाज को एकसूत्र में गूँथ कर एक विशिष्ट पहचान देती है। इसलिए, भारत के इतिहास में जब-जब सफल राजनीतिक परिवर्तन हुआ है, उसके पहले और उसके साथ-साथ एक सांस्कृतिक जागरण भारत की आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा हुआ दिखता है।

परिस्थिति जितनी अधिक विकट होती दिखती है उतनी ही ताकत के साथ यह आध्यात्मिक शक्ति भी भारत में सक्रिय हुई है, ऐसा दिखता है। इसीलिए मुगलों के शासन के साथ 12वीं शताब्दी से 16वीं शताब्दी तक सारे भारत में एक साथ भक्ति आंदोलन प्रस्फुटित हुआ दिखता है। उत्तर में स्वामी रामानंद से लेकर सुदूर दक्षिण में रामानुजाचार्य तक प्रत्येक प्रदेश में साधु, संत, संन्यासी ऐसे आध्यात्मिक महापुरुषों की एक अखंड परंपरा चल पड़ी है – ऐसा दिखता है।

अंग्रेजों की गुलामी के साथ-साथ स्वामी दयानंद सरस्वती, श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद जैसे आध्यात्मिक नेतृत्व की परंपरा चल पड़ी दिखती है। भारत के इतिहास में सांस्कृतिक जागरण के बिना कोई भी राजनीतिक परिवर्तन सफल और स्थाई नहीं हुआ है। इसलिए सांस्कृतिक जागरण के कार्य का मूल्याकन राजनीति के मापदंड से नहीं होना चाहिए। मौन, शांत रीति से सतत चलने वाले आध्यात्मिक, सांस्कृतिक जागरण का महत्व भारत जैसे देश के लिए अधिक मायने रखता है, यह अधोरेखित होना चाहिए।

‘ इंडिया फर्स्ट’ से साभार

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