28 फरवरी बीजेपी की घर वापसी की तारीख!

बतंगड़

हर्षवर्धन त्रिपाठी 

भारतीय जनता पार्टी के लिए इससे तगड़ा झटका कुछ नहीं हो सकता। वो भी ऐसे समय में जब कुछ ही समय पहले अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को भारत बुलाकर और उन्हें अपना बचपन टाइप का दोस्त बताकर नरेंद्र मोदी ने सबको चकाचौंध कर दिया था। लग रहा था कि नरेंद्र मोदी ने जग जीत लिया है। लेकिन, ये क्या जगत छोड़िए, नरेंद्र मोदी और उनके सफलतम अध्यक्ष अमित शाह की अगुवाई वाली भाजपा दिल्ली ही हार गई। ये वो दिल्ली है, जिसे आप कितना भी नकारने की कोशिश करें। देश को समझ में यही दिल्ली आती है। ये दिल्ली चुनावी सर्वे के सैंपल साइज की तरह है। हालांकि, चुनावी सर्वे की ही तरह कई बार दिल्ली के चुनावी नतीजे भी गलत साबित होते हैं। लेकिन, सच्चाई ये भी है कि गलत साबित होने तक अबब इसी दिल्ली के चुवनावी नतीजे देश की दशा-दिशा बताएंगे। इस लिहाज से तो भारतीय जनता पार्टी की दशा-दिशा बेहतर खराब हो गई। लेकिन, क्या ऐसा सचमुच है। मेरी नजर में ऐसा बिल्कुल नहीं है। भारतीय जनता पार्टी की इतनी करारी हार की ढेर सारी समीक्षाएं हो रही हैं, होती रहेंगी। लेकिन, मैं समीक्षा नहीं करूंगा। मैं वो बात करने जा रहा हूं जो, देश के तौर पर भारत के लिए और उसी देश की मजबूती के लिए भारतीय जनता पार्टी के लिए बेहद जरूरी हैं।

 फरवरी के महीने में दिल्ली की जबरदस्त हार भाजपा के सामने आई है। और हार क्या पूरी सफाई हो गई है। उस पर दिल्ली की इस हार के लिए जिम्मेदार जो भी ठहराया जाए। सच्चाई यही है कि दिल्ली की चुनावी कमान पूरी तरह से इस समय की भाजपा की शीर्ष तिकड़ी मोदी-शाह-जेटली के ही हाथ में था। और ये सब अच्छे से जानते हैं। इसलिए इस चुनाव के नतीजे सिर्फ विपक्षी दलों को ही नहीं भारतीय जनता पार्टी के भीतर का भी संतुलन बिगाड़ेंगे। लेकिन, ये बीजेपी के लिए घर वापसी का शानदार मौका है। बीजेपी के लिए घर वापसी मतलब आजकल चर्चा में आई घर वापसी नहीं बल्कि, लोगों का बीजेपी में 2014 की गर्मियों जैसा भरोसा वापस लौटने का है। जब दिल्ली के चुनाव हो रहे थे तो आम आदमी पार्टी एक बात बहुत जोर शोर से चिल्ला रही थी। वो ये था कि जब देश का वित्त मंत्री दिल्ली विधानसभा के चुनाव में ही सारी ऊर्जा, समय लगाएगा तो देश के बजट का क्या होगा। सीधे तौर पर ये बात लोगों को समझ में भी आती है। और भारतीय जनता पार्टी को भी ये बात समझनी होगी। क्योंकि, दिल्ली विधानसभा के चुनाव भले ही नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी  की नीतियों की हार न हों। लेकिन, अगर देश का बजट उस रास्ते पर जाता न दिखा तो देश का भरोसा निश्चित तौर पर नरेंद्र मोदी और पूर्ण बहुमत की भारतीय जनता पार्टी की सरकार से डिग सकता है। इसलिए इस फरवरी महीने के आखिर में पेश होने वाले बजट को अगर वित्त मंत्री अरुण जेटली संभाल पाए तो महीने के दूसरे हफ्ते में मिली हार आखिरी हफ्ते तक जीत में बदल सकती है। और ये बेहद आसान है। आसान इसलिए कि देश का संवैधानिक ढांचा ऐसा है जिसमें राष्ट्रीय नीतियों के क्रियान्वयन में राज्यों की हिस्सेदारी भले महत्वपूर्ण हो लेकिन, इसे बनाने का काम पूरी तरह से राष्ट्रीय सरकार यानी संसद को ही करना होता है। और अगले साल भर के लिए देश की दुनिया में छवि क्या होगी, इसी को पुख्ता करने का काम नरेंद्र मोदी-अरुण जेटली को 28 फरवरी को पेश होने वाले बजट के जरिए करना है। दिल्ली के चुनावों में अरविंद केजरीवाल ने भले ही मुफ्त बिजली, पानी, वाई-फाई का ऐसा हल्ला किया है कि लग रहा है दिल्ली ने मुफ्तउवा मूड में ही आम आदमी पार्टी को इतनी शानदार जीत दे दी है। लेकिन, ऐसा है नहीं। सच्चाई ये है कि आम आदमी पार्टी की शानदार जीत में पिछले विधानसभा से इस विधानसभा चुनाव के दौरान जुड़े दस लाख नए मतदाता (सीधा मतलब 18 साल के नौजवान) और पहले से ही नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल दोनों को एक साथ नायक मानने वाले नौजवान का ही पूरा योगदान है।

दूसरा मतदाता वर्ग तो नौजवानों के साथ लगे-लगे पांच साल केजरीवाल के संयुक्त गान में शामिल हो गया। और कम से कम ये नौजवान मतदाता मुफ्तउवा नहीं देश की तरक्की के सपने देखने वाला है। इसका कतई ये मतलब नहीं है कि महंगाई पर सरकार काबू न करे। महंगाई पर काबू तो जरूरी है लेकिन, अगर ये मतदाता मुफ्त और सस्ते के चक्कर वाला होता तो बीजेपी को शानदार सफलता दिल्ली में मिलनी चाहिए थी। पेट्रोल-डीजल वैसे तो सस्ता हो ही रहा था। लेकिन, दिल्ली चुनावों के दौरान कच्चे तेल के चढ़ते भाव के बीच भी केंद्र ने तेल कंपनियों को इशारा करके शायद इसी नीयत से पेट्रोल-डीजल सस्ता कराया था। इसका सीधा सा मतलब है कि नए भारत को मुफ्त या सस्ता नहीं चाहिए। उसे अपनी जेब की ताकत बबढ़ती हुई दिखनी चाहिए। इसके लिए उसे रोजगार के मौके, कारोबार के मौके चाहिए। इसके उसे दस प्रतिशत की तरक्की सपना सच होने का रास्ता तेजी से तय होता दिखना चाहिए। इसके लिए उसे अपने भारत की ताकत दुनिया में बढ़ती हुई दिखनी चाहिए। इसके लिए उसे दिखना चाहिए कि देश की कंपनियां दुनिया की बड़ी कंपनियों के मुकाबले में बराबरी से खड़ी हैं। इसके लिए उसे दिखना चाहिए कि देश के बड़े प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों की गिनती दुनिया के बड़े शिक्षा संस्थानों के आसपास हो। इसके लिए उस नौजवान को ये दिखना चाहिए कि देश का बुनियादी ढांचा दुनिया के दूसरे देशों के बुनियादी ढांचे के मुकाबले में जरा सा भी कमजोर नहीं है।

अब ये सब एक बजट में आखिर होगा कैसे। ये हो सकता है। बल्कि, सही मायने में हो रहा है। पिछले 9 महीने में नरेंद्र मोदी की सरकार ने देश की ताकत बढ़ाने वाला हर काम किया है। चाहे वो विदेश कूटनीति का मोर्चा हो या फिर देश की कारोबारी इज्जत दुनिया में बढ़ाने का मसला हो। दुनिया भारत की बढ़ती ताकत देख रही है और इस बढ़ती ताकत वाले भारत के साथ खड़ी हो रही है, दिखना चाह रही है। दुनिया का संतुलन भारत के लिहाज से तय हो रहा है। चीन के अखबार, थिंकटैंक ये बताने में लगे हैं कि अमेरिका के साथ भारत के कौन से विरोधाभास हैं जिनकी वजह से भारत का चीन के नजदीक आना ज्यादा स्वाभाविक है। ऐसा ही तर्क पश्चिमी मीडिया भारत और चीन के गठजोड़ पर दे रहा है। इसका मतलब सबको भारत चाहिए। इसलिए भारत अपनी शर्तें भी तय कर सकता है। ये अद्भुत समय है जब दुनिया में भारत अपनी शर्तें मनवाने की स्थिति में है और भारत का नौजवान देश की पहचान बदलने के लिए सरकार के हर उस फैसले के साथ खड़ा होता दिख रहा है जो देश की ताकत बढ़ाए। इसलिए नरेंद्र मोदी-अरुण जेटली का बजट इस दिशा में कड़े और बड़े फैसलों वाला बजट होना चाहिए। पिछला बजट तो कामचलाऊ था। ये अरुण जेटली का पहला पूर्ण बजट है। दुनिया में कारोबारी संतुलन ने अवसर दिया है कि सरकारी खजाने का घाटा बहुत कम हो गया है। डॉक्टर मनमोहन सिंह की ढेर सारी नीतियों को अच्छे से लागू करने से उन कड़वे फैसलों के सिर्फ अच्छे असर इस सरकार के हिस्से में आए हैं। अभी पूरे चार साल से ज्यादा इस सरकार के पास हैं। बजट ऐसा हो जिसकी अगली कड़ी अगले साल के बजट में दिखे। बजट साफ-साफ बताए कि कैसे पुरानी सरकार में नीतियों के रुके रहने की वजह से भारत की तरक्की की रफ्तार पर दुनिया की बड़ी संस्थाओं को संदेह था। बजट बताए कि कैसे अब इस सरकार में तेजी से फैसले लेने से दुनिया को भारत की ही तरक्की सबबसे तेज होती नजर आ रही है। ये बजट बताए कि बुनियादी सुविधाओं के मामले में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के फैसलों को तेज रफ्तार तरक्की के हाईवे पर ले जाने का ही काम ये सरकार कर रही है। और पहले से तेजी से कर रही है। 28 फरवरी ये भी तय करेगा कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की हार हुई है या फिर देश अभी भी नरेंद्र मोदी के साथ है। विश्व गुरू जैसा शब्द सीधे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दिया हुआ नजर आनने लगेगा। लेकिन, सच्चाई यही है कि बीजेपी और नरेंद्र मोदी के लिए 28 फरवरी की तारीख मजबूती से घर वापसी की तारीख है।

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