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वराहमिहिर का जलान्वेषण विज्ञान आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर


लेखक:- डॉ. मोहन चंद तिवारी
भारतीय जलविज्ञान की पिछली पोस्टों में बताया जा चुका है कि वराहमिहिर के भूमिगत जलान्वेषण विज्ञान द्वारा वृक्ष- वनस्पतियों,भूमि के उदर में रहने वाले जीव-जन्तुओं की निशानदेही और भूमिगत शिलाओं या चट्ठानों के लक्षणों और संकेतों के आधार पर भूमिगत जल को कैसे खोजा जा सकता है? आज इस पोस्ट के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया जा रहा है कि वर्त्तमान विज्ञान और टैक्नौलौजी के इस युग में भी वराहमिहिर के जलवैज्ञानिक सिद्धांत कितने प्रासंगिक और उपयोगी हैं? जिनकी सहायता से आज भी पूरे देश की जलसंकट की समस्या का हल निकाला जा सकता है तथा अकालपीड़ित और सूखाग्रस्त इलाकों में भी हरित क्रांति लाई जा सकती है.

अब देश विदेश के आधुनिक भूवैज्ञानिकों ने भी वराहमिहिर के इन फार्मूलों की वैज्ञानिक धरातल पर जांच पड़ताल और अनुसंधान का कार्य प्रारम्भ कर दिया है और उन्हें सत्य पाया है. दीमक से जुड़ी वराहमिहिर की जलवैज्ञानिक मान्यता के बारे में तो यह बताया ही जा चुका है कि जहां दीमक की बांबी होती है,उसके आस पास भूमिगत जलस्रोत अवश्य मिलेगा. इसकी वैज्ञानिक पुष्टि करते हुए 1965 में पाश्चात्य वैज्ञानिक डब्ल्यू. वैस्ट ने और 1972 में वाट्सन ने दीमक के 70 मीटर लम्बे जलमार्गों को खोजने में सफलता प्राप्त की है. सन् 1963 में जर्मनी के प्रोफेसर जी.वेकर ने दीमक के जलमार्गों पर परीक्षण करते हुए यह सिद्धांत स्थापित किया है कि दीमकें पृथिवी की चुम्बकीय शक्ति से प्रभावित होते हुए उत्तर से दक्षिण की ओर या पूर्व से पश्चिम की ओर जल ले जाने के लिए मार्ग बनाती हैं.
इसी संदर्भ में भारतीय वैज्ञानिकों के द्वारा भी विशेष अनुसंधान कार्य किए गए हैं. एस. वी.युनिवर्सिटी के भूवैज्ञानिक प्रो. ई. आर. वी.प्रसाद ने दीमक के द्वारा जलान्वेषण से जुड़ी वराहमिहिर की मान्यताओं पर उच्चस्तरीय अनुसंधान कार्य किया है. इस विषय पर उनका शोधपत्र- “BIO INDICATORS OF GROUND WATER IN VARAHA MIHIRA’S BRIHAT SAMHITA” शीर्षक से ‘Groundwater’ (Volume 24, Issue 6, pages 824-828, November, 1986) नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है.

सूखाग्रस्त क्षेत्रों में भी पैदा हो सकते हैं भूमिगत जलस्रोत
प्रो.ई.आर.वी.प्रसाद ने 1980 में गुजरात स्थित जामनगर के सूखाग्रस्त इलाकों में वराहमिहिर के द्वारा बताए गए फार्मूलों के आधार पर वृक्ष-वनस्पतियों की निशानदेही करते हुए ताड़ वृक्ष (Palm tree) के साथ सटे हुए बरगद के वृक्ष (Banyan tree) के उत्तर की ओर 15फिट नीचे खुदाई की तो उसमें से 75000 लीटर प्रति घंटे की दर से पानी का स्रोत फूटने लगा. इसी तरह हरिपुर गांव में भी उन्होंने हरियाली से युक्त दीमक की बांबी के उत्तर की ओर 10फिट नीचे खुदाई की तो उससे भी तेज पानी का स्रोत निकला जिसकी गति 11,000 लीटर प्रति घंटा थी.
भूवैज्ञानिक प्रो.प्रसाद ने 15 दिनों की अवधि में गुजरात के 30 गांवों में 51 जल से भरे कुओं की निशानदेही करते हुए यह सिद्ध कर दिखाया है कि वराहमिहिर के द्वारा बताए गए जलान्वेषण के फार्मूले आज भी कितने वैज्ञानिक, प्रासंगिक और जलसंकट की समस्या के समाधान के लिए बहुत उपयोगी भी हैं?

तमिलनाडु के भू वैज्ञानिक प्रो.टी.एस.बद्री नारायणन ने भी अपने शोधपूर्ण लेख “TERMITE MOUNDS AS HYDROLOGIC INDICATORS – SOME CASE STUDIES FROM PARTS OF PALLADAM, POLLACHI AND UDUMALPET TALUKS OF COIMBATORE DISTRICT,TAMIL NADU.” के माध्यम से दीमकों के द्वारा जलान्वेषण की प्रक्रिया को आधुनिक विज्ञान के धरातल पर परखने का प्रयास किया है. प्रो.बद्रीनारायणन के अनुसार दीमकों से जुड़े जलवैज्ञानिक परिणाम इतने उपयोगी तथा उत्साहवर्धक सिद्ध हुए हैं कि इनका उपयोग अब कोयम्बतूर के कई सूखा पीडित जिलों में कृषि की पैदावार बढ़ाने के लिए भी किया जाने लगा है.

प्रो. बद्रीनारायणन ने बताया है कि पुराने कोयम्बतूर जिले का इलाका अधिकांश रूप से सूखाग्रस्त है किंतु जब यहां वराहमिहिर की मान्यताओं के अनुसार 24 ‘बोर वैल’ कुएं खोदे गए तो उनमें से केवल 3 को छोड़ कर शेष 21 कुओं में 130 से 500 लीटर प्रति मिनट की दर से भूमिगत जल प्रवाहित होने लगा.
आधुनिक युग में वनस्पति विज्ञान की एक शाखा ‘इकोलाजी’ कहलाती है. इसके जानकार विद्वान् बताते हैं कि प्रकृति में कुछ ऐसे वृक्ष मौजूद हैं जो जमीन में पानी की मौजूदगी की जानकारी देते हैं. प्रोसोपिस-स्पाइसिजेरा,अकेसिया अरेबिका और साल्वेडोरा ओलीवायडिस नामक वृक्षों की जड़ें, मरुस्थलीय परिस्थितियों में भी, पानी तक पहुंचने की क्षमता रखती हैं.इसी तरह जामुन और टरमिनेलिया स्पाइसिजेरा के वृक्ष भी सामान्यतः नम और घाटियों के निचले भाग में ही पाए जाते हैं.आधुनिक खोजों से भी यह पता चला है कि बलुआ, ग्रिटी तथा पीली, धूसर,प्रकृति वाली मिट्टियों के नीचे अक्सर पानी मिलता है. वराहमिहिर ने भी अनेक ऐसे वृक्षों की पहचान की है जिनमें भूमिगत जल को ऊपर उठाने की विशेष क्षमता होती है. इकोलॉजी पारिस्थितिकी और वराहमिहिर के परंपरागत जलविज्ञान के बीच गहरा संबंध स्थापित हो सकता है इसलिए वैज्ञानिक आधार पर दोनों विज्ञानों के बीच आज तालमेल बिठाने की बहुत आवश्यकता है.

विडंबना यह भी है कि आधुनिक वैज्ञानिकों की ओर से वराहमिहिर के परंपरागत विज्ञान के तुलनात्मक शोध तथा अध्ययन को राष्ट्र की मुख्यधारा में प्रोत्साहन कभी नहीं मिला और न ही संस्कृत विद्वानों की ओर से ही ऐसी कोई पहल की गई कि जिससे कि ‘बृहत्संहिता’ जैसे संस्कृत ग्रन्थों में उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान का प्रचार-प्रसार और परिष्कार वर्तमान भूजल विज्ञान की नई खोजों के परिप्रेक्ष्य में किया जा सके. छात्रवर्ग और आम जनता दोनों को ही आज पूर्व और पश्चिम के ज्ञान-विज्ञान के अंतर को समझने समझाने की और उसमें आपसी तालमेल स्थापित करके जलसंकट का समाधान खोजने की विशेष आवश्यकता है.किंतु इस दिशा में पहल संस्कृत जगत् से जुड़े विद्वानों को ही करनी होगी.
नई शिक्षानीति में पर्यावरण व जलवायु विज्ञान का भी पाठ्यक्रम होना चाहिए
आज नई शिक्षा नीति के नए संकल्पों के सन्दर्भ में भी प्राचीन भारतीय जलविज्ञान, जलवायु विज्ञान और पर्यावरण विज्ञान के पाठ्यक्रम को देश की मुख्य शिक्षा धारा में प्रोत्साहित करने की विशेष आवश्यकता है. हालांकि दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग द्वारा स्नातक स्तर के पाठ्यक्रम के तहत प्राचीन भारतीय जलविज्ञान,जलवायु विज्ञान,मानसून विज्ञान के मौलिक सिद्धांतों के अध्ययन अध्यापन की शुरुआत एक दशक पहले ही की जा चुकी है.छात्रों और अध्यापकों के बीच यह कार्यक्रम काफी लोकप्रिय भी रहा.
रामजस कालेज के संस्कृत विभाग द्वारा प्राचीन जलवायु विज्ञान पर सन् 2013 में द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भी आयोजन किया गया था, जिसमें देश के लब्धप्रतिष्ठ विद्वानों सुप्रीमकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति डॉ.मुकुंदकाम शर्मा, महामहोपाध्याय प्रो.दयानन्द भार्गव, प्रो.देवी प्रसाद त्रिपाठी आदि विद्वानों ने अपने विद्वतापूर्ण वक्तव्य दिए और शोधपत्रों का वाचन किया गया. संगोष्ठी में सभी विद्वानों की सर्वसम्मत राय थी कि आज जलसंकट और ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निपटने के लिए प्राचीन भारतीय ऋतुविज्ञान, वृष्टिविज्ञान और जलविज्ञान के सिद्धांतों और मान्यताओं पर गम्भीरता से विचार करना बहुत आवश्यक है. तभी पर्यावरण प्रदूषण से ग्रस्त इस पृथ्वी को जल संकट और ग्लोबल वार्मिंग जैसे भीषण के संकटों से बचाया जा सकता है.
आज देश में सरकार द्वारा संस्कृत विद्याओं के उन्नयन के लिए कई केंद्रीय संस्कृत विश्विद्यालय स्थापित किए जा चुके हैं.वर्त्तमान जल संकट और पर्यावरण संकट के दौर में उनका मुख्य राष्ट्रीय दायित्व होना चाहिए,कि वे भारतीय जनजीवन की मौलिक समस्याओं से जुड़े इन भारतीय जलविज्ञान, मौसम विज्ञान,जलवायु विज्ञान से सम्बंधित प्राच्यविज्ञान की शाखाओं के अध्ययन, अध्यापन और शोध अनुसंधान को वरीयता देकर इन्हें प्रोत्साहित करने की दिशा में भी देश का समुचित मार्गदर्शन करें. क्योंकि इस वैज्ञानिक विषय पर अधिकांश ग्रन्थ संस्कृत में ही लिखे गए हैं,इसलिए संस्कृत में निबद्ध भारत की इन लुप्त होती ज्ञान-विज्ञान की प्राचीन धरोहर की रक्षा करना और शोध,अनुसंधान आदि का मुख्य दायित्व भी इन्हीं संस्कृत विश्वविद्यालयों का है. आशा है कि प्राचीन जलविज्ञान के मौलिक ग्रन्थों का सरल भाषानुवाद से जनसामान्य को भी इस जलविज्ञान के गूढ़ रहस्यों की जानकारी मिल सकेगी.
✍🏻डॉ मोहन चंद तिवारी, हिमान्तर में प्रकाशित लेख।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

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