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विशेष संपादकीय

प्रधानमंत्री जी, आवश्यकता है प्रशासन तंत्र को सक्रिय करने की

modi11-10दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम चौंकाने वाले रहे हैं,  इन चुनाव परिणामों को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। इनसे स्पष्ट संकेत मिला है कि जनसमस्याओं का ढेर देश के हर क्षेत्र में बड़ी तेजी से बढ़ता जा रहा है। उनका समाधान प्रस्तुत करने में सरकारी तंत्र पूर्णत: निष्फल रहा है। इसलिए जनता मतदान करते समय जल्दी-जल्दी सत्ता परिवर्तन करती है, उसे अपनी समस्याओं का समाधान चाहिए, इसलिए वह किसी राजनीतिक दल को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए लंबा समय देने के लिए तैयार नही है।

हमने यह समझने का प्रयास नही किया कि जनसमस्याओं का ढेर निरंतर क्यों बढ़ता जा रहा है? और देश में क्यों निरंतर सामाजिक विसंगतियां उत्पन्न होती जा रही हैं?

हमारा मानना है कि जिस अनुपात में स्वतंत्रता के बाद देश की जनसंख्या में वृद्घि हुई है, हमने उसी अनुपात में अपना प्रशासनिक तंत्र विकसित नही किया। हमारे देश की वर्तमान जनसंख्या इस समय लगभग सवा अरब है, इस जनसंख्या को नियंत्रित करने और इसकी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने के लिए हमारे पास आज भी केवल 644 जिलों के कुल 644 जिलाधिकारी हैं और इतने ही वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक हैं। स्पष्ट है कि एक जिलाधिकारी और एक एसएसपी के क्षेत्र में लगभग बीस लाख लोग निवास करते हैं। पहाड़ी जिलों की जनसंख्या बहुत थोड़ी हो सकती है तो उनका क्षेत्रफल उसी अनुपात में बहुत बड़ा है, जिससे लोग अपने अधिकारियों से मिलने में कठिनाई महसूस करते हैं, और जितनी शीघ्रता से मैदानी क्षेत्रों के लोग अपने अधिकारियों से मिल लेते हैं उतनी शीघ्रता से पहाड़ी क्षेत्रों के लोग अपने अधिकारियों से नही मिल पाते।

इतनी बड़ी जनसंख्या को नियंत्रित करने और उनकी समस्याओं का समाधान देने के लिए एक जिलाधिकारी और एक एसएसपी कम हैं। यदि इन दो अधिकारियों से मिलने के लिए इतनी बड़ी जनसंख्या का आधा प्रतिशत भाग भी निकले तो लगभग एक हजार व्यक्ति प्रतिदिन जिलाधिकारी व एसएसपी से मिलेंगे, जिनसे मिलने के लिए अधिकारियों को केवल दो घंटे का समय दिया जाता है। उस दो घंटे के समय में अधिकारी कितने लोगों से संतोषजनक बातचीत कर सकता है, या उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुनकर उनका निस्तारण कर सकता है?  यह विचारणीय बात है।

जब समस्यायें लेकर लोग अधिकारियों के पास पहुंचते हैं तो ये अक्सर उन समस्याओं को अपने अधीनस्थ अधिकारियों के पास भेजते जाते हैं, और अधीनस्थ अधिकारी पहले से ही कार्याधिक्य से उत्पीडि़त रहते हैं। इसलिए उनके पास नये-नये कामों के आते जाने से, काम का केवल ढेर लगता जाता है। कार्य का निस्तारण नही हो पाता है। तब साधन संपन्न लोग अपने काम को शीघ्रता से कराने के लिए पैसे का लेन-देन करते हैं, जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। इस लेन-देन के चक्कर में एक गरीब व्यक्ति या साधन विहीन व्यक्ति पिसकर रह जाता है, उसकी समस्याओं का कोई समाधान नही मिल पाता और निचले स्तर का कर्मचारी या तो उसका शोषण करता रहता है या उसे यूं ही चक्कर कटवाता रहता है। इससे ‘आम आदमी’ का शासन प्रशासन से मोहभंग होता है और वह किसी ऐसी पार्टी की ओर मुड़ता है जो उसे काम करवा करके दे। तब हम देखते हैं कि किसी प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हो जाता है। ‘आप’ ने अपनी छवि ऐसी बनाई कि हम ‘आम आदमी’ के लिए संघर्ष करेंगे और उसका काम भी कराकर देंगे। जनता इसी बात पर ‘आप’ की ओर मुड़ गयी और ‘आप’ ने एक इतिहास बना दिया। ‘आप’ की सफलता का अर्थ यह नही कि लोगों का मोदी से मोह भंग हो गया है, इसका अर्थ केवल यह है कि जनता अपनी समस्याओं का समाधान चाहती है और उसके लिए उसने किरण बेदी के मुकाबले केजरीवाल को अपने लिए उपयुक्त समझा।

प्रधानमंत्री मोदी यदि दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणामों से असंतुष्ट हैं तो उन जैसे कुशल प्रशासक के अपेक्षित है कि वे देश के वर्तमान जिलों की संख्या सीधे दो गुनी करें और यह सुनिश्चित करायें कि एक जिले की जनसंख्या दस लाख से अधिक ना हो, जिससे अधिकारियों को जनसमस्याओं के सुनने और उनका निस्तारण करने में सुविधा होगी। हमारे देश की संसद के संसदीय क्षेत्रों का भी पुनर्गठन इस प्रकार होना चाहिए कि एक संसदीय क्षेत्र में बीस लाख से अधिक जनसंख्या निवास न करती हो। वर्तमान 543 संसदीय क्षेत्रों में बहुत से क्षेत्र ऐसे हैं जिनकी जनसंख्या 25-30 लाख से भी अधिक है। इतनी बड़ी जनसंख्या में सत्ता के दलाल पैदा होते हैं।

प्रशासनिक अधिकारियों से काम कराके लाने वाले बिचौलिये और दलाल बीच में आते हैं और वे काम कराने के बहाने से लोगों से मोटी रकम ऐंठते रहते हैं। इस सारी व्यवस्था की धुलाई के लिए एक स्वच्छता अभियान प्रशासनिक क्षेत्र में भी चलना चाहिए। निर्णय क्रांतिकारी हो सकता है, यदि इस पर अमल किया जाए और ‘आम आदमी’ और सत्ता शीर्ष पर बैठे लोगों के बीच व आम आदमी एवं उच्चाधिकारियों के बीच की दूरी को समाप्त कर दिया जाए।  हरियाणा जैसा प्रांत केवल इसलिए उन्नति करता है कि वहां के सरपंच और मुख्यमंत्री के बीच भी संवाद हो सकता है, परंतु यही स्थिति राजस्थान, यूपी, मध्य प्रदेश जैसे अन्य प्रांतों में नही है। इसलिए बड़े राज्यों में सत्ता के दलाल आज भी बैठे हैं। हम छोटे-छोटे जिलों का निर्माण करें और उनके प्रशासन तंत्र को मजबूती दें और सक्रियता दें कि वह हर व्यक्ति से सीधा जुडऩे का प्रयास करे और हर व्यक्ति अपनी हर समस्या को लेकर उच्चाधिकारियों के पास पहुंच सके। प्रशासनिक क्षेत्र में बैठे अधिकारी कई बार अपनी निष्क्रियता और भ्रष्टाचार के कारण सत्ताओं का परिवर्तन करा देते हैं, क्योंकि जनता उनसे त्रस्त होती है। दिल्ली में शीला दीक्षित की सरकार ऐसे अधिकारियों के कारण ही चली गयी, जनता उस सरकार से असंतुष्ट थी जिसके अधिकारी उसे संतुष्ट नही कर पा रहे थे। इसी बात को ‘आप’ ने समझा और मैदान मार लिया। हमें आशा करनी चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी देश में प्रशासनिक तंत्र को चुस्त-दुरूस्त बनाने के लिए निश्चित ही कोई ऐसी ठोस योजना प्रस्तुत करेंगे जिससे लोगों की समस्याओं का निस्तारण और निवारण समय से हो सके। इसी दृष्टिकोण से यह लेख लिखा गया है।

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