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संपादकीय

‘क्या तुम्हें मिठाई नही दिखती’

8710200भारत में घोटाले खुलते हैं और अनुसुलझे रहस्यों की भांति अतीत के गर्भ में समाहित हो जाते हैं। हत्याकांड सामने आते हैं और एक अनकहे से किस्से की भांति अदृश्य हो जाते हैं। समय तेजी से दौड़ता है। अगली घटनाएं घटित होती हैं, तो दस बीस पहले घटी घटना को मीडिया में परोसना बंद कर देता है और हम नई घटना को पकडक़र उसका शवोच्छेदन करने में लग जाते हैं।

यदि हम सूक्ष्मता से थोड़ा समझने का प्रयास करें तो ना तो समय तेजी से दौड़ता है ना घटनाएं ऐसी होती हैं कि उन्हें दस-बीस दिन पश्चात ही मीडिया भूल जाए। समय को तेजी से दौड़ाया जाता है और मीडिया कभी-कभी जान बूझकर स्वयं घटना को भुलाती है तो कभी-कभी उसे घटनाओं  को भूलने के लिए विवश किया जाता है।

पाठकों को स्मरण होगा, कि पिछले दिनों नोएडा विकास प्राधिकरण में कार्यरत एक अभियंता यादव सिंह का घोटाला सामने आया था। घोटाला इतना बड़ा था कि लोगों को अनुमान रहा कि इतने बड़े घोटाले से एक ग्रेटर नोएडा और बसाया जा सकता था। अब बात साफ है कि घोटाले में अकेला यादव सिंह तो सम्मिलित नही था, कुछ और ‘मगरमच्छ’ भी उसमें सम्मिलित थे। उन ‘मगरमच्छों’ ने ‘यादव सिंह घोटाला’ को शांत करने की सारी योजना को क्रियात्मक रूप देने का दायित्व अपने ऊपर लिया और सब कुछ अरेंज हो गया। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से एकसमारोह में किसी पत्रकार ने यादव सिंह घोटाले के विषय में पूछ लिया कि इस घोटाले के विषय में आप क्या कहेंगे? इस पर मुख्यमंत्री ने उस पत्रकार से कहा कि क्या आपको इस आयोजन में मिठाई नही दीख रही है। यदि हां तो खाते क्यों नही? हंसी का एक फव्वारा तो छूटा पर ‘व्यवस्था’ और ‘व्यवस्थापक’ की कार्य शैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया।

इसी प्रकार घटनाओं को दबा देने का क्रम चलता रहता है, लोग समझते हैं कि समय तेजी से व्यतीत हो रहा है और ऐसे में घटनाओं को पकड़े रखना बड़ा कठिन है। अब तो घटनाओं से रहस्य का पर्दा उठाया ही इसलिए जाता है कि कहीं से कोई जुगाड़ बने। पर्दा उठते ही जुगाड़ की तिकड़में प्रारंभ हो जाती हैं। सडक़ों पर रहस्य खुलते हैं और वे बंद होटलों में बैठकर सिल दिये जाते हैं जो रहस्य खोलते हैं वे मौन साध जाते हैं और चोर बड़ी सरलता से कानून के दांव पेंचों से निकलकर हमारे मध्य विजय का प्रतीक चिह्न बनाकर आ उपस्थित होता है। तब चोर करे फूलमालाएं डाली जाती हैं।

कुछ समय पूर्व नोएडा का ‘निठारी काण्ड’ सामने आया था। जिसमें अनेकों बच्चों के हत्यारे सामने आये थे। जिसका मुख्य अभियुक्त सुरेन्द्र कोली था। जिसे न्यायालय ने मृत्यु दण्ड दिया। अभियुक्त ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका प्रस्तुत की। कोली ने उत्तर प्रदेश सरकार के समक्ष दया याचिका प्रस्तुत की। दोषी को समय पर फांसी नही दी जा सकी।

अब उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपना निर्णय देते हुए कोली के मृत्युदण्ड को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि कोली को यदि अब मृत्युदण्ड (फांसी) दिया जाता है तो वह असंवैधानिक होगा। न्यायालय ने राज्य सरकार की ओर से दया याचिका के निस्तारण में अनावश्यक देरी को आधार मानते हुए कोली के मृृत्युदण्ड को आजीवन कारावास में परिवर्तित किया। इससे उत्तर प्रदेश सरकार की कार्यशैली भी संदिग्ध हो गयी।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हो सकता है अब भी कोली प्रकरण में स्वयं से प्रश्न पूछने पर किसी पत्रकार से पुन: यही कह दें कि क्या तुम्हें मिठाई नही दिखती? यदि हां तो खाते क्यों नही हो? यहां घटनाओं को मिठाई की प्लेट की ओर ध्यान देकर या दिलाकर भुला दिया जाता है। न्याय की आशा क्या दीवारों से करोगे?

कोली की माता शांति और उसकी पत्नी के आंसुओं का मूल्य समझा जा सकता है पर उनके आंसुओं का मूल्य आज भी उन बच्चों के माता-पिता और परिजनों के आंसुओं से अधिकमूल्यवान नही हो सके हैं, जिनके बच्चों के कंकाल मात्र निठारी काण्ड के लोमहर्षक घटनाकांड में हमें मिल सके थे। उनके आंसू आज तक सूखे नही हैं और अब हमें उनके आंसुओं से अधिक मूल्यवान कोली की मां और उसकी पत्नी के आंसू दिखाये जा रहे हैं। घटना को भुलाने के लिए परिस्थितियों को भ्रामक बनाया जा  रहा है। सारे समाज की ‘इमोशनल ब्लैकमेलिंग’ की जा रही है।

कोली की मां और पत्नी का कहना है कि उनका पुत्र या पति निर्दोष है, वह षडयंत्र का शिकार हो गया है। उनकी इस बात को हल्का करके लिया जा रहा है या जानबूझ कर उसे सुलझाने का प्रयास नही किया जा रहा है। जो सामाजिक संगठन कोली को बचाने का प्रयास करते रहे हैं, हो सकता है कि उनकी दृष्टि में यह स्पष्ट हो गया हो कि कोली निर्दोष है और इसलिए वह कोली को बचाने का प्रयास कर रहे हों। पर उनका कार्य भी पूर्णत: शुद्घ नही है। यदि उनको इस बात का पूर्ण विश्वास है कि कोली निर्दोष है तो उन्हें उसे निर्दोष बताकर वास्तविक दोषी को सामने लाना चाहिए। एक व्यक्ति के प्रति उदारता दिखाकर आप वास्तविक दोषी को बचा लें यह भी अन्याय है। पर उस वास्तविक दोषी को सामने लाने का साहस कोई भी संगठन नही करेगा।

एक तर्क दिया जा सकता है कि क्या कोली को फांसी देने से उसके द्वारा मारे गये बच्चे लौट आएंगे? यदि नही तो फिर क्यों एक और व्यक्ति को यातनापूर्ण ढंग से मारने मरवाने का काम करते हो? इस तर्क के उत्तर के लिए हमें प्राकृतिक नियमों का अध्ययन करना अपेक्षित है, प्रकृति में जहां क्रिया की प्रतिक्रिया अवश्य होती है, वहीं अन्याय और अत्याचार करने वाले को उसके किये का दण्ड भी अवश्य ही मिलता है। प्रकृति मौन रहकर आपके अत्याचार सहती है, पर जितना उसके सहन करने में मौन रहता है, उतना ही अपनी प्रतिक्रिया में वह आपको रूलाने में भी सक्षम होती है। मनुष्य ने अहंकारी होकर यह मान लिया है कि उसने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली है, पर प्रकृति उसके लिए अविजित ही रही है और अविजित ही रहेगी।

ऐसा भी नही है कि प्रकृति हमारे अशुभ कार्यों की ही प्रतिक्रिया करती है, अपितु वह हमारे शुभ कार्यों की भी प्रतिक्रिया देती है, इसलिए गीता में कृष्ण जी ने कहा है, कि किये गये प्रत्येक शुभाशुभ कर्म का फल अवश्य मिलता है। प्रकृति हमें हमारे सात्विक कृत्यों के परिणाम स्वरूप हमारी सहयोगी बनकर उनका फल देती है, इसलिए भारत के ऋषियों ने ‘यज्ञ परपंरा’ को अपनी संस्कृति का मूलाधार बनाया। जिससे प्रकृति हमसे रूष्ट ना हो और वह सदा हमारी सहयोगी बनकर हमारे साथ रहे।

अब पुन: निठारी काण्ड पर आते हैं। दुष्ट व्यक्ति को उसकी दुष्टता का परिणाम (फल) मिलना ही चाहिए। यह ठीक है कि जो चले गये वे अब लौटकर नही आएंगे-न्याय का उद्देश्य भी यह नही है कि गये हुओं को लौटा लिया जाए-न्याय का उद्देश्य तो दोषी को दंडित करना है। जिससे कि आने वाले समय में पुन: कोई ‘कोली’ जन्म ना ले सके और जिससे कि लोग कानून के राज में स्वाभाविक रूप से आस्था प्रकट करने वाले बने रहकर सात्विक आचार व्यवहार के अनुसार अपना जीवन यापन करें। अब हम देख रहे हैं कि भारत में कानून के राज से लोगों का विश्वास भंग हो रहा है। जिससे देश में अशांति और अराजकता की स्थिति बन  रही है।

एक समानांतर व्यवस्था देश में खड़ी हो रही है और उस व्यवस्था का उद्देश्य अपराधियों और दोषियों को संरक्षण देना और उससे ‘मौज लूटना’ है। कोली प्रकरण में उत्तर प्रदेश सरकार को माननीय उच्च न्यायालय ने जिस प्रकार आड़े हाथों लिया है वह बहुत कुछ समझा देता है। उसने स्पष्ट कर दिया है कि सरकार ने कोली को फांसी तक पहुंचाने में जानबूझकर देरी की, जिससे कि उसे फांसी से माफी स्वाभाविक रूप से कानून के माध्यम से मिल सके और एक दोषी को बचाने के आरोप से सरकार बच सके। पर इस सबसे भी अधिक विचारणीय बात ये है कि सरकार का ऐसा लचीला दृष्टिकोण अपनाने के लिए बाध्य करने वाला मस्तिष्क किन लोगों का है? उनका इस काण्ड से संबंध क्या था? वे कोली को बचाना क्यों चाहते हैं? ये सारे प्रश्न तो अनुत्तरित ही हैं। लगता है कोली की मां की बात में बल है कि उसका बेटा निर्दोष है? कोली की मां जब ये कहती है कि उसका बेटा मुखौटा बनाया गया है, वह पूर्णत: निर्दोष है, तो वह कहीं न कहीं पूरी व्यवस्था को ही कठघरे में ला रही है और न्यायालय जब कहता है कि सरकार ने कोली को सजा देने में जानबूझकर देरी की है तो वह भी व्यवस्था को कठघरे में ला रहा है, कठघरे में खड़ी व्यवस्था के लिए उचित था कि वह मुखौटे का संरक्षण करे। इसलिए मुखौटा बच गया है। सारे ‘तिकड़मबाजों’ का उद्देश्य भी यही था कि मुखौटा भी बचाया जाए, क्योंकि उनकी विश्वसनीयता का प्रश्न था उन्हें ‘काम’ और भी  कराने हैं और यदि अब वह कोली को नही बचा पाते तो उन पर आगे उनके लोग विश्वास नही करते।

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