कलियुग में है नाम आधारा।सुमरि-सुमरि जन उतरैं पारा ।।

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बिना भक्ति के मानव जीवन सफल नहीं हो सकता। अनेक संतों ने भक्ति से मिलने वाली शक्ति का गुणगान किया है। इस संबंध में
कलाम हज़रत सुल्तान बाहू का कथन है :-

कर इबादत पच्छोतासें उम्र चार दिहाड़े हूँ।
थी सौदागर कर लै सौदा , जा तक हटटन तोडे हूँ ।

परमपिता परमेश्वर के नाम की भक्ति यदि एक बार चढ़ जाए तो फिर दुनिया के सारे रस पी के नजर आते हैं :-

जो दम ग़ाफ़िल सो दम काफ़िर मुर्शिद रह पढ़ाया हूँ।
सुणया सुखन गइयां खल अक्खीं चित मौला वल लाया है।
कीती जान हवाले रब दे, ऐसा इश्क कमाया हूँ।
मरन तो आगे मर गये बाहू , ता मतलब नू पाया हूँ।

रमण महर्षि – आत्मा में लीन होना ही ईश्वर की शरण जाना है। आत्मा परमात्मा का मिलन ही योग कहलाता है। जिसके जीवन में ऐसा योग समाविष्ट हो जाता है वह संसार का बिरला पुरुष कहलाता है। ऐसा संयोग भी केवल मानव तन को पाकर ही मिल सकता है। क्योंकि अन्य योनियों में ऐसा शरीर नहीं है।

वाणी तुलसीदास जी –
बड़े भाग मानुस तन पावा,सुर दुर्लभ सब ग्रंथीह गावा।
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा , पाई न जेहिं परलोक संवारा।।

कलियुग में है नाम आधारा।सुमरि-सुमरि जन उतरैं पारा ।।

स्वामी विवेकानन्द जी परमपिता परमेश्वर के प्रति समर्पण को लक्ष्य बनाकर हमें चेताते हुए कहते हैं कि :-

“ध्यान और वन्दना में अलौकिक शक्ति है । ”
“प्रबल आत्म विश्वास के समीप कोई बाधा नहीं टिक सकती है।’

स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं कि वत्स ! उत्तिष्ठत: जाग्रत: प्राप्य वरान्निबोधयति – उठो ! जाग जाओ लक्ष्य तक पहुँचे बिना ठहरो मत। “आजकल की पाश्चात्य सभ्यता लोगों में प्रति दिन अभाव और हाय – हाय को ही बढ़ावा दे रही है । चांदी के चमकते रुपये और स्त्रियों के क्षणभंगुर सौन्दर्य से मोहित होकर इस दुर्लभ मनुष्य जन्म को मनुष्य कैसे खो रहे हैं। Weekness is sin . सब प्रकार की दुर्बला को ही पाप कहते हैं।”
संसार में माता-पिता भी हमको बड़े सौभाग्य से प्राप्त होते हैं। प्रत्येक माता-पिता हमको अच्छे से अच्छा इंसान बनाने के सपने संजोता है। कहा जाता है कि जननी और जन्म भूमि स्वर्ग से भी महान है।
इस दुनिया या भवसागर में आने के लिए मनुष्य को माता – पिता , जन्मदाता तथा माता-पिता, गुरु के रूप में परमात्मा की महान कृपा से ही मिलते हैं।
वे मनुष्य भाग्यशाली हैं , जिन्हें ईश्वरीय भक्ति, संस्कार व भक्ति भावना से ओत-प्रोत माता पिता प्राप्त हैं।
जननी जणे तो भक्त जण,या दाता या सूर।
या जननी तू बांझ रहे , क्यों व्यर्थ गवाये नूर॥

प्रारब्ध पहले बना , पोछे बना शरीर।
कह ‘ तुलसी ‘ यह अचरज़ है मन नहि बांधे धीर॥
माता – पिता हमें जन्म तो देते ही हैं साथ में वे हमारे गुरु के रूप में मार्ग – दर्शक , जीवन पृथ – प्रदर्शक आरम्भ से ही बनते हैं । वे मनुष्य भाग्यशाली हैं , जिन्हें जीवित माता- पिता का साथ मिलता है , अन्यथा माता – पिता के बिना जीवन जीना दूभर हो जाता है , और बच्चा जीवन जीने में काफी कठिनाई महसूस करता है । फिल्म में गाना आता है –

माँ तू कितनी अच्छी है , प्यारी – प्यारी है,ओ माँ..ओ माँ..

(अन्त में)….. वो होते हैं , किस्मत वाले जिनके माँ होती है।
क्रमशः

ऋषिराज नागर एडवोकेट

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