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मेघदूतम, कालिदास व भारतीय संस्कृति की अनमोल कृति …

लोग कहते हैं कि किसी कहानी या काव्य को लिखना अलग बात है लेकिन उसकी स्क्रिप्ट राइटिंग अलग होती है …

लेकिन यदि आप प्राचीन भारतीय साहित्य पढ़ते हैं तो कई बार लिखे हुए अक्षर जीवंत नजर आते हैं …

ख़ासकर महान कवि कालिदास की रचनाओं को पढ़ने पर आंखों के सामने चलचित्र चलने लगता है। उसमें भी मेघदूतम ऐसी अद्भुत रचना है जो प्रकृति की महानता का अद्भुत वर्णन करती है …

मेघदूतम्‌ एक ऐसा आख्यान है जिसमें श्रृंगार रस के साथ भारतीय संस्कृति, प्रकृति का सौंदर्य अपने उत्कृष्टतम, रूप में प्रकट होता है।

अलकापुरी के राजा कुबेर के यहाँ प्रतिदिन मानसरोवर से स्वर्णकमल लाने के कार्य में नियुक्त एक यक्ष अपनी पत्नी के प्रेम में इस क़दर डूबा था कि एक दिन वह अपने काम में प्रमाद कर गया।

कुबेर ने उसे एक वर्ष के लिए अलकापुरी से निष्कासित कर दिया। शाप की यह अवधि बिताने के लिए उसने रामगिरि (हिमालय के निकट) के आश्रम में शरण ली, जो जलाशयों और सघन छायादार वृक्षों की प्राकृतिक सुषमा से भरा हुआ था।

आषाढ़ के पहले दिन हाथी व हथिनी के झुंडों के समान श्वेत बादलों को देखकर उसकी विरह-वेदना असह्य हो उठी।

वियोग-विकल उस यक्ष ने चलायमान मेघों के माध्यम से अलकापुरी में उसके वियोग से तड़प रही पत्नी को संदेश भेजने का निश्चय किया।

बादल को रामगिरि से अलकापुरी तक का मार्ग बताने के क्रम में कालिदास ने पूरे भारत देश का इतना अद्भुत वर्णन किया है कि सारा दृश्य आंखों के सामने आ जाता है।

और वैसे भी प्रकृति के वर्णन में कालिदास से बड़ा कवि दुनिया में कोई नहीं है।

इसी प्रकार का वर्णन वे रघुवंशम्‌ में पुष्पक विमान से लंका से अयोध्या तक की यात्रा के दौरान सीता को अपने वनवास-काल के दृश्यों का वर्णन भगवान राम ने किया है।

सांस्कृतिक इकाई के रूप में समग्र भारत वर्ष का बिंब कालिदास के मानस पटल पर गहराई से अंकित था।

रामगिरि से अलकापुरी की ओर बढ़ते हुए कालिदास सबसे पहले ‘सिद्धों’ के प्रदेश का ज़िक्र आता है,

“सिद्धों की भोली-भाली स्त्रियाँ आँखें फाड़-फाड़कर तुम्हें देखेंगी कि कहीं ये मेघ पहाड़ की चोटी ही तो नहीं उड़ाए ले जा रहे हैं।”

“फिर तुम्हे मिलेंगी मालव प्रांत की मासूम कृषक बालाएँ, जिन्हें भौंहें नचाकर रिझाने की कला तो नहीं आती है, पर वे तुम्हें ताकेंगी बहुत आदर और प्रेम से, क्योंकि उनकी फ़सलों का होना, न होना तुम्हारे ऊपर ही निर्भर करता है। इस कृषि-प्रांत में खेतों के जोते जाने से सोंधी गंध उठ रही होगी।हे मेघ वहाँ तुम वर्षा अवश्य करना। ”

“उसके आगे थोड़ा-सा पश्चिम की ओर मुड़कर फिर उत्तर की दिशा में बढ़ोगे तो मिलेगा “आम्रकूट पर्वत”, जो पके हुए आम के वृक्षों से घिरा होने के कारण पीला-पीला नज़र आएगा।

उसके जंगलों में ग्रीष्म ऋतु में अमूमन दवानल होता है। वहाँ तो तुम मूसलाधार बारिश ही कर देना, वे पर्वत तुम्हारा बड़ा उपकार मानेगा।

“इन आम्रकूट के कुंजों में तुम्हें वनवासी स्त्रियाँ घूमती दिखेंगी, वहाँ तनिक रुक जाना और मद्धिम सा जल बरसा देना और उनके कोमल अंगों को छूते हुए आगे बढ़ जाना हुए।”

“आगे तुम्हें विंध्य के पठार पर कई-कई धाराओं में बँटकर फैली नर्मदा नदी दिखाई पड़ेगी, ऐसे लगेगा जैसे किसी विशाल हाथी का शरीर भभूत से चित्रित कर दिया गया हो।”

“हाथियों के मद से सुगंधित और जामुन के झुरमुटों से होकर बहती नर्मदा का पवित्र जल तुम ज़रूर पी लेना ताकि फिर से भारी हो जाओ और हवा तुम्हें इधर-उधर भटका न दे।”

कालिदास ने नर्मदा के इस वन-प्रांत के विशद मनोहारी वर्णन के बाद आगे पड़ने वाले “दशार्ण देश का उल्लेख किया है जिसके उपवन में केतकी (केवड़ा) के फूलों से उज्वल रेखा-सी दिखाई पड़ती है।

“दशार्ण की राजधानी “विदिशा” विलास की सामग्रियों से ऐसी भरपूर दिखेगी कि जब तुम वहाँ से गुज़रती चंचल लहरों वाली वेत्रवती (बेतवा) का मीठा जल पीने लगोगे तो प्रतीत होगा जैसे कटीली भौहों वाली कामिनी के होंठों का रस पी रहे हो।”

जंगली नदियों के किनारे के उपवनों में जूही की कलियों को अपनी फुहार से सींचते हुए और वहाँ फूल उतारने वाली मालिनों के उन मुखड़ों पर छाया करते हुए तुम निकल जाना जिनके गालों पर बहते पसीने से लगकर कमल की पंखुड़ियों के कर्णफूल मलिन हो गए होंगे।

हे मेघ तुम्हें वहाँ से उत्तर जाना है और उज्जयिनी पश्चिम तुम्हारे मार्ग से हटकर है, पर उस नगरी के भवनों लेकिन यदि तुम वहाँ की स्त्रियों की चंचल चितवन को बिना देखे निकल गए तो तुम्हारा जन्म ही निरर्थक जाएगा।

फिर तो कालिदास यक्ष के माध्यम से उज्जयिनी की समृद्धि का इतना अद्भुत वर्णन करते हैं जैसे लगता है कि पाठक उज्जैनी में ही पहुँच गया है।

अतः यदि सावन के माह में मेघदूतम को नही पढा तो भारतीय संस्कृति में मेघों के उत्सव को समझ ही नही जा सकता …

और बिना कालिदास को पढे भारतीय संस्कृतिव महान को भी नही समझा जा सकता है …
✍🏻ध्रुव कुमार

आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्टसानुं
वप्रकीडापरिणतगज प्रेक्षणीयं ददर्श।।
( मेघदूत : पूर्वमेघ २)
आज आषाढ़ लग गया। कृष्णपक्ष। चंद से चंद होता जाएगा चांद… प्रतिपदा से अमावस्या तक… मराठी मान्यताओं में शुक्ल पक्ष से होगा।

दो नक्षत्र है : पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़। कालिदास ने दो ही मेघ लिए : पूर्वमेघ और उत्तरमेघ। दो ही स्थान। दो ही मन। दो टूक बात और भारत भूमि के दर्शनीय स्थलों की यात्रा! विरह कथाओं की जननी यक्ष संस्कृति की सुंदर स्मृति। शाप और उसके मोचन का निरूपण। जनार्दन ने अपनी व्याख्या में कहते हैं : आषाढस्य प्रथमदिवसे प्रधान दिवसे, प्रधानश्चेति दिवसश्च। प्रबोधिन्यामेकादश्या कथयंति, तत्समीचीनम्।
💧
आषाढस्य प्रथमदिवसे…
💦
इक ही ख़त के बाद खड़ा
हो गया प्रतीक्षा का पहाड़।
कभी – कभी पोथी में पढ़ती :
आशा बरसाए आषाढ़।।
🌄
आषाढ़… आशाओं का आषाढ़,
क्रीड़ाशैल का आषाढ़,
यक्षेश्वरपुरी का आषाढ़,
रामगिरि का आषाढ़,
आलेखों का आषाढ़,
गर्जनाओं और वर्जनाओं का आषाढ़,
स्वभावोक्तिरलंकार, लुप्तोपमालंकार, हेतुरलंकार, व्यतिरेकालंकार जैसे कितने अलंकारों का आषाढ़,
कालिदास का आषाढ़,
शकुनों का आषाढ़,
“मेघदूत” मनोरथ सिंचित करें
और अनुकूल स्वास्थ्य बनाए रखे… 💐🌺

लिथो पर मेघदूत
🎁
कालिदास कृत मेघदूत को मल्लीनाथी टीका के अभाव में आत्मसात करना कठिन होता है। काशी सहित अन्यत्र मेघदूत का पठन पाठन होता आया है। सोमनाथ, गुजरात में कालिदास के काव्य पर विद्वत विचार विमर्श के लिए मठ में व्यवस्था रखी गई थी जिसका शिलालेख कुछ समय पहले हमने पढ़ा था। कालिदास की योगिनी काव्य सिद्धि का प्रामाणिक संदर्भ 1129 में सोमेश्वर ने मानसोल्लास में दिया है।
कभी आषाढ़ से मेघदूत का पठन आरंभ होता और चातुर्मास के समापन, देव प्रबोधिनी पर मुखाग्र कर पूरा किया जाता। यह यक्ष चरित है और कालिदास के काल तक यक्ष की कथाएं अनेक रूप में लिखी पढ़ी जाती थी। यह प्रभाव कथासरितसागर के रास्ते पुराणों पर भी पड़ा। महाभारत में भी यक्ष प्रसंग हैं।

अहमदाबाद के श्री महेशचंद्र पंड्या के संग्रह में इसकी वह प्राचीन प्रति है जो लिथो प्रेस पर छपी थी। आड़े आकार में पोथी रूप में। वैसी ही जैसी हाथ से लिखी जाती थी। यह पुस्तक संवत 1924 में वाराणसी के मोहल्ला घुघुराना श्यामा की गली में बाबू साहेब बाबू हरख चंद के बाड़े में दुर्गा प्रसाद कटारे के गणेश यंत्रालय में छपी। देवी प्रसाद तिवाड़ी ने इसको संपादित किया था।
✍🏻डॉ श्रीकृष्ण जुगनु

“शमीलता”
शमीलता शब्द का प्रयोग कालिदास ने अभिज्ञानशाकुन्तल में किया है-

ध्रुवं स नीलोत्पलपत्रधारया शमीलतां छेत्तुमृषिर्व्यवस्यति ॥

महाभारत की एक वाचना में निम्नलिखित पाठ है, इसमें भी शमीलता शब्द द्रष्टव्य है-
एषा शमी पापहरा सदैव
यात्रोत्सवानां विजयाय हेतुः
अत्रायुधानां कृतसंनिवेशे
कृतार्थकामा जयमङ्गलं च
प्रदक्षिणीकृत्य शमीलतां ते
प्रणम्य ……
…………………..
……………….
शमी शमयते पापं शमी शमयते रिपून्
शमी शमयते रोगाञ्छमी सर्वार्थसाधना
रामः सीतां समादाय त्वत्प्रसादाच्छमीतले
कृतकृत्यः पुरे प्राप्तः प्रसादात्ते तथास्तु मे

__________________

यहाँ समाधान यह है कि लता को शाखा माना गया है।
__________________

परन्तु सोमलता को अब तक एक लता/बेल ही माना जाता रहा है।

वैशेषिक सूत्र -पंचम अध्याय- प्रथम आह्निक.

सुश्रुत संहिता- सूत्र स्थान-
अध्याय २७

कालिदास के कुमारसम्भव में भी चुम्बक का उल्लेख है-
उमारूपेण ते यूयं संयमस्तिमितं
मनः ।
शंभोर्यतध्वम् आक्रष्टुम्
अयस्कान्तेन लोहवत्॥
२.५९॥
कान्तलौह, अयस्कान्त, कान्तायस आदि नाम चुम्बक के हैं ।
पातंजल योग सूत्र , सुश्रुत संहिता में भी वर्णित है.

धातुकर्म से प्राप्त लोहे के प्रयोग के पुरातात्विक प्रमाण 1700 ई.पू. तक के हैं । कमसे कम इस सीमा से पूर्व ही प्राकृतिक चुम्बक पत्थर का ज्ञान हो ही गया होगा ।
दिक्शोधन अथवा दिशा ज्ञान हेतु चुम्बक के प्रयोग के उदाहरणों
की सीमा अधिक पीछे नहीं जा पायेगी ।
दिशा बोध हेतु मानव तारों का सहारा लेता रहा है ।
समुद्री यात्री जो छोटी कनू नौकाओं के सहारे न्यूजीलैण्ड , हवाई द्वीप , ताइवान द्वीप आदि में योरोपिअन से भी पहले पहुँचे. तारों (stars) के सहारे ही यात्रा करने का ज्ञान रखते थे । जहाज पर पक्षियों के रखे जाने का हेतु स्थल भाग की प्राप्ति के लिए था. दिशा बोध के लिए नहीं ।

कालिदास को भी ज्ञात था कि चन्द्रग्रहण किस कारण से होता है , वे तो यह लिखते हैं कि यह बात जन-जन को पता है ।
छाया हि भूमेः शशिनो मलत्वेनारोपिता शुद्धिमतः प्रजाभिः॥ १४-४०॥
रघुवंशम्
✍🏻अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी

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