‘नौला फाउंडेशन’ : लुप्त होते जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने का अभियान

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लेखक :- डॉ. मोहन चंद तिवारी
उत्तराखण्ड में जल-प्रबन्धन-8
लेखमाला के बारे में किंचित्वक्तव्य

(‘हिमांतर‘ ई पत्रिका में प्रकाशित ‘भारत की जल संस्कृति’ के धारावाहिक लेख माला का यह 37 वां और ‘उत्तराखंड जल प्रबंधन’ का 8वां लेख है. मेरे छात्रों, सहयोगी अध्यापकों और अनेक मित्रों का परामर्श है कि ये जल विज्ञान से सम्बंधित सभी लेख पुस्तकाकार के रूप में प्रकाशित हों. पिछले दस वर्षों में एक शोधकर्त्ता और जल संकट की विभिन्न समस्याओं के प्रति गम्भीरता और संवेदनशीलता की भावना से लिखे गए इन लेखों में यथा सामर्थ्य जल संस्कृति के ज्ञान-विज्ञान और उसके परम्परागत इतिहास को समेटने का यथा सामर्थ्य प्रयास किया गया है. मेरे छात्रवर्ग, सहयोगी अध्यापकगण और विद्धान् मित्रों द्वारा समय समय पर इन लेखों का जो संज्ञान लिया गया और अपने महत्त्वपूर्ण विचार प्रकट किए गए, उन सब के प्रति मैं अपना हार्दिक आभार प्रकट करता हूं. बताना चाहुंगा कि दिल्ली विश्वविद्यालय के बी.ए.(आनर्स) संस्कृत के स्नातक पाठ्यक्रम के अंतर्गत ‘साईंटिफिक हैरिटेज’ पेपर में प्राचीन भारतीय जलविज्ञान और मानसून विज्ञान के छात्रों के लिए भी मेरे ये लेख उपयोगी सिद्ध होते रहे हैं. इन सभी कारणों से इन लेखों के संग्रह को पुस्तकाकार देने का प्रयास किया जा रहा है. किन्तु लेख माला में उत्तराखंड की परम्परागत जलस्रोतों पर चार लेख और जोड़ कर चालीस लेखों के संग्रह के साथ फिलहाल ‘भारत की जल संस्कृति’ की वर्त्तमान लेखमाला को विराम देना चाहता हूं.इसी परम्परा में ‘नौला फाउंडेशन’से सम्बंधित प्रस्तुत लेख प्रस्तुत है. आशा है विद्वानों को उत्तराखंड में वर्त्तमान जल संकट की समस्या, दशा और दिशा के बारे में इस लेख से उपयोगी और ज्ञानवर्धक जानकारी मिल पाएगी.)

नौला फाउंडेशन: लुप्त होते जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने का राष्ट्रीय अभियान
यह हर्ष का विषय है कि कुमाऊं उत्तराखंड के जल पर्यावरण अभियान से जुड़ा ‘नौला फाउंडेशन’ अब ‘पहाड़-पानी-परम्परा’ को पुनर्जीवित करने वाला राष्ट्रीय अभियान बन गया है. जमीनी स्तर पर निरन्तर रूप से चलाया जाने वाला जल संरक्षण का यह अभियान, दरअसल, लुप्त होते परम्परागत जलस्रोतों को बचाने का एक ऐसा राष्ट्रीय अभियान है, जिसकी आज पहाड़ में रह कर जीवन यापन करने वाले उत्तराखंडवासियों को ही नहीं बल्कि समूचे देशवासियों को भी बहुत जरूरत है.
आम जनता के सहयोग से जमीनी स्तर पर चलाए जाने वाले इस जल संरक्षण अभियान को मैं इसलिए भी ‘राष्ट्रीय’ कहता हूं, क्योंकि भले ही इस संस्था की गतिविधियां उत्तराखंड के कुछ इलाकों खासकर द्वाराहाट,रानीखेत गगास घाटी के कुछ चुनिंदा संवेदनशील जलागम क्षेत्रों तक सीमित रहीं हों और बिना किसी सरकारी अनुदान के आर्थिक संसाधनों के अभाव में भी वहां के लुप्त नौलों,धारों और गाड़ गधेरों में इस संस्था द्वारा अपनी कार्य योजनाएं संचालित की जा रही हों, किन्तु पिछले चार पांच वर्षों से इस ‘नौला फाउंडेशन’ ने सोशल मीडिया के माध्यम से और जमीनी धरातल पर भी जन जागरण का जो निरन्तर रूप से राष्ट्रीय अभियान चलाया है, वह केवल उत्तराखंड के लिए ही नहीं बल्कि समूचे देश के लिए भी प्रेरणादायी और अभूतपूर्व है.

यदि ‘नौला फाउंडेशन’ की तरह समूचे उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में और दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश आदि विभिन्न प्रान्तों में भी इस तरह के जल जागरूकता के क्षेत्रीय अभियान चलाए जाएं तो वह दिन दूर नहीं जब जल संकट की समस्या से जूझता समूचा देश जल आपूर्ति की दृष्टि से आत्मनिर्भर हो सकता है.

प्राचीन भारतीय जल संस्कृति का एक शोधकर्त्ता होने के नाते पिछले एक दशक से प्राचीन भारतीय जलविज्ञान को मैंने अपनी सारस्वत साधना का विशेष अंग बनाया है और फेसबुक तथा सोशल मीडिया के माध्यम से इस लुप्त होती ज्ञान विज्ञान की परम्परा पर अपने शताधिक धारावाहिक लेखों द्वारा प्राचीन भारतीय जलविज्ञान और उसके जलप्रबंधन के स्वर्णिम इतिहास को जन जागरण के समक्ष लाने का जो प्रयास किया है, उस अभियान में भी मुझे ‘नौला फाउंडेशन’ का निरन्तर रूप से उत्साहवर्धन मिलता रहा है.
पिछले कई सालों से उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के परंपरागत जलस्रोतों- नौलौं,धारों को संरक्षित, संवर्धित करने के लिए नौला फाउंडेशन बहुत सक्रिय हो कर कार्यरत है.

नौला फाउंडेशन ने पूरे उत्तराखंड में मध्य हिमालयी क्षेत्र विशेषकर प्रथम चरण में गंगास नदी घाटी क्षेत्र में प्राकृतिक एवं भूजल, हिमालयी क्षेत्र की नदियों एवं गधेरों के संरक्षण, हिमालयी जैव विविधता के रक्षण, जंगल, जमीन का वैज्ञानिक विधि से संवर्धन एवं शोध (रिसर्च) पर भी कार्य योजना शुरू कर रखी है. इस प्रकार नौला फाउंडेशन प्रतिबद्धता के साथ क्षेत्र के निवासियों के सहयोग और भागीदारी से मृतप्राय पेयजल स्रोतों के पुनर्निर्माण संरक्षण, संवर्द्धन और निरंतर विकास के लिए समर्पित भाव से जो कार्य कार्य कर रहा है,उसकी सर्वत्र सराहना हुई है.

दो वर्ष पूर्व नौला फाउंडेशन’ द्वारा दिनांक 11 तथा 12 अगस्त, 2019 को द्वाराहाट में द्विदिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड के पर्वतीय जनपदों में पेयजल के स्रोत नौलों, धारों (झरनों) और गधेरों आदि से जुड़ी जानकारियों का आदान प्रदान करना था. इस कार्यशाला के तहत 11अगस्त को द्वाराहाट के निकट ‘असगोली’ गांव में परंपरागत जलस्रोतों के निकट जलसंवर्धन तथा पौधारोपण कार्य से इस द्विदिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ. देश के जाने माने पुरातत्त्वविद और उत्तराखंड की पुरातन जल संस्कृति के जानकार पद्मश्री यशोधर मठपाल जी ने अपने ओजस्वी वक्तव्य से इस कार्यशाला का उद्घाटन किया, जिसके समाचार को सभी समाचार पत्रों ने बड़ी बड़ी सुर्खियों में विस्तार पूर्वक प्रकाशित किया.

12 अगस्त को राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, द्वाराहाट में जल संरक्षण को लेकर एक राष्ट्रीय कार्यशाला का भी आयोजन किया गया, जिसमें दिल्ली, हल्द्वानी, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, नॉर्थ ईस्ट आदि दूर दराज से आए प्रान्तों के जलवैज्ञानिकों और जलप्रबंधन के विशेषज्ञों ने आम जनता से जुड़ी जल संकट की समस्याओं के साथ संवाद स्थापित करते हुए इस क्षेत्र के परंपरागत जलस्रोतों नौलौं, धारों, गधेरों तथा नदियों के संरक्षण और संवर्द्धन पर गम्भीरता से विचार विमर्श किया. इस अवसर पर वाटर हार्वेस्टिंग, भूमिगत जल को बचाने और इसे रिचार्ज करने आदि जल वैज्ञानिकों के अनुभवों और उनके द्वारा दी गई जानकारी वर्त्तमान जल संकट की समस्याओं को जानने और समझने की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण कही जा सकती हैं.

उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में भीषण जल संकट के साथ साथ नौलों और धारों के लुप्त होते परंपरागत जलस्रोतों को बचाने की दृष्टि से नौला फाउंडेशन की ओर से किया गया कार्यशाला का यह आयोजन राष्ट्रीय धरातल पर भी आयोजित शायद पहला प्रयास था, जब जल प्रबंधन से जुड़े जिम्मेदार राज्य प्रशासन के अधिकारी,क्षेत्र के पर्यावरणविद और जल विज्ञान के क्षेत्र में कार्यरत विशेषज्ञों ने एक मंच पर उपस्थित हो कर आम जनता की जल विषयक समस्याओं और उनके अनुभवों को सांझा करते हुए संवाद स्थापित किया. यह कार्यशाला आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की टेक्नॉलॉजी और हजारों वर्ष प्राचीन जलविज्ञान की मान्यताओं के परिप्रेक्ष्य में सूख रहे जलस्रोतों,नष्ट हो रही जैव विविधता के संरक्षण एवं संवर्द्धन की दृष्टि से भी बहुत विचार प्रधान संगोष्ठी रही थी.
भारत जैसे आध्यात्मिक देश के चहुँमुखी समष्टिमूलक विकास के लिए भी जमीन से जुड़ी इस प्रकार की गोष्ठियों और कार्यशालाओं का जल जागरूकता की दृष्टि से आयोजन आज बहुत आवश्यक है. प्रायः देखने में आया है कि उत्तराखंड में जितने भी परम्परागत ऐतिहासिक नौले,धारे या जलकुंड हैं,वे किसी न किसी देवता या आध्यात्मिक शक्ति को समर्पित हैं. वहां के जलस्रोतों पर अंकित देवमूर्तियों में जल देवता के रूप में किसी न किसी आध्यात्मिक शक्ति का वास रहता है.इसलिए इस जलस्रोत के आसपास शुद्धता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है और इसकी जल मंदिर के रूप में पूजा अर्चना की जाती है.

वर्त्तमान कार्यशाला में कत्यूरी काल के नौलों,विशेषकर द्वाराहाट विभांडेश्वर मार्ग पर मैनोली ग्राम के निकट स्थित गणेश के नौले की विशेष चर्चा की गई. उल्लेखनीय है कि यह नौला कत्यूरी काल से लेकर वर्त्तमान में दस-पन्द्रह वर्ष पहले तक अपने क्षेत्रवासियों को सुस्वादु और निर्मल जल की निर्बाध रूप से आपूर्ति करता आया था. द्वाराहाट से विभांडेश्वर महादेव के दर्शन करने वाले पैदल तीर्थयात्री यहां वृक्षों की छाया में विराजमान इस ऐतिहासिक गणेश नौले का जल पीकर और विश्राम करके आगे की यात्रा करते थे.

मैंने स्वयं अपनी पुस्तक ‘द्रोणगिरि इतिहास और संस्कृति’ नामक पुस्तक लेखन हेतु द्वाराहाट क्षेत्र का परिभ्रमण करते हुए इस गणेश के नौले के सुस्वादु जल का पान किया था. किन्तु इस नौले के निकट दस-पन्द्रह वर्ष पहले जैसे ही हैंडपम्प का निर्माण हुआ, क्षेत्रवासियों ने इस नौले के रख रखाव तथा देखभाल करना बंद कर दिया और मैनोली के निकट इस ऐतिहासिक नौले का जलस्रोत भी अचानक लुप्त हो गया.

सन् 2019 में आयोजित कार्यशाला के समय जब मैं, पर्यावरणविद मनोहर सिंह मनराल,संदीप मनराल आदि कार्यशाला के अनेक लोग इस नौले को देखने के लिए गए, तब इसकी निशानदेही ही नहीं हो सकी थी. लेकिन सामने एक कूड़ाघर जरूर चमकता हुआ दिखाई देता था. दरअसल ऐतिहासिक गणेश नौला झाड़ झंकर को ओट में ऐसे ही गुमनाम हो गया था जैसे आधुनिक अन्धविकासवाद की चकाचौंध में हमारे नौले,धारे आज गुमनाम होते जा रहे हैं.
नौला फाउंडेशन’ द्वारा आयोजित इस द्विदिवसीय कार्यशाला में मैंने भी इस गणेश नौले का दृष्टांत देकर वैदिक कालीन ऋषि मुनियों की भाषा में अपना यह विचार रखा कि ‘ऋत’ और ‘सत्य’ स्वरूप इन प्रकृतिप्रदत्त जलस्रोतों की रक्षा करना आज राष्ट्रधर्म है, क्योंकि उत्तराखंड की इस देवभूमि में जहां से गंगा, यमुना, सिंधु, सरस्वती, सरयू आदि जो अधिकांश नदियां प्रवाहित होती हैं,यदि वहां ही भीषण जल का संकट गहरा रहा हो तो समझ लेना चाहिए कि आने वाले समय में न केवल उत्तराखंड में बल्कि समूचे देश में भी जल का भीषण संकट छाने वाला है.और यदि बहुत जल्दी इस जल संकट का समाधान नहीं हुआ तो जल के बिना भौतिक विकास की उपलब्धियां उसी प्रकार निरर्थक सिद्ध होने लगेंगी जैसे वर्त्तमान में ऑक्सीजन के बिना साधन संपन्न महानगरों के बड़े बड़े अस्पताल निरर्थक सिद्ध होने लगे थे.

मैं ‘नौला फाउंडेशन’ द्वारा आयोजित इस द्विदिवसीय कार्यशाला से बहुत उत्साहित था और अनुकूल स्वास्थ्य न होने पर भी इस जल संरक्षण अभियान का हिस्सा बनने के लिए द्वाराहाट पहुंच गया. तब नौला जलसंस्कृति के पुरोधा पद्मश्री डा.यशोधर मठपाल के निर्देशन में चलाया गया यह ‘पहाड़-पानी-परम्परा’ अभियान निस्संदेह कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र के दूसरे इलाकों में भी जल संरक्षण अभियान के प्रति जागरूकता पैदा करने वाला अभियान बन गया था.

वस्तुतः तीन वर्ष पूर्व 2018 में भारत सरकार द्वारा जारी नीति आयोग की रिपोर्ट पर भी ध्यान दें तो देश इस समय इतिहास में जल संकट के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है. रिपोर्ट के अनुसार करीब 60 करोड़ लोग इस समय जबरदस्त जल संकट से जूझ रहे हैं,जबकि हर साल दो लाख लोग साफ पीने का पानी न मिलने से अपनी जान गंवा देते हैं. रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया गया है कि भारत में 70 प्रतिशत पानी दूषित है और पेयजल स्वच्छता गुणांक की 122 देशों की सूची में भारत का स्थान 120 वां है. रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक देश में पानी की मांग उपलब्ध जल वितरण की दर से दोगुनी हो जाएगी,जिसका मतलब है कि करोड़ों लोगों के लिए पानी का गंभीर संकट पैदा हो जाएगा और देश की जीडीपी में छह प्रतिशत की कमी आ जाएगी.

नीति आयोग की इस चिंताजनक सरकारी रिपोर्ट को देखते हुए भी अब चुप नहीं बैठा जा सकता है. केंद्र सरकार और राज्य सरकारें कुछ करें या न करें देश के जलसंकट से मुक्ति पाने के लिए आम जनता और जलसंरक्षण से जुड़ी संस्थाओं को ही आगे आना होगा. पहाड़ में नौले,धारे,गाड़ गधेरे बचाओ अभियान की सफलता के लिए हमें उत्तराखंड के चिपको आंदोलन से भी प्रेरणा लेनी चाहिए और उसी तर्ज पर पहाड़ों के जलस्रोतों को बचाने के लिए ‘नौला फाउंडेशन’ जैसे जन आंदोलन की आज गांव गांव में जरूरत है. यह इसलिए भी जरूरी है ताकि समूचे देश के गांव-गांव और शहर-शहर जल आपूर्ति की दृष्टि से सरकार की पेय जल योजनाओं पर ही निर्भर न रहें,बल्कि अपने परम्परागत जल स्रोतों को पुनर्जीवित कर आत्मनिर्भर बन सकें.

उत्तराखंड में वनों की रक्षा और नदियों को बचाने की दिशा में ‘चिपको आंदोलन’ और ‘रक्षासूत्र आंदोलन’ क्रांतिकारी आंदोलन रहे थे. इन आंदोलनों में जहां दूर-दूर के गांवों ने बढ़-चढ़कर भागीदारी की,उन्हें प्रोत्साहित करने में ‘हिमालयी पर्यावरण शिक्षा संस्थान’ (हिपशिस) ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. महिलाओं ने संकटग्रस्त वृक्षों पर रक्षा-सूत्र बांधे. रक्षा-बंधन त्यौहार की तरह एक तरह से गांव की महिलाओं द्वारा पेड़ों को भाई मानते हुए यह संदेश दिया गया कि तुम हमारे पर्यावरण और जल संसाधनों की रक्षा करते हो अब यह रक्षा सूत्र बांध कर हम तुम्हारी रक्षा करेंगे. रक्षासूत्र आन्दोलन के कारण ही भागीरथी, टौंस,भिलंगना, यमुना,धर्मगंगा,बालगंगा आदि कई नदी जलग्रहण क्षेत्रों में वन निगम द्वारा किए जाने वाले लाखों हरे पेड़ों की कटाई को सफलतापूर्वक रोक दिया गया.
अब यदि पहाड़ों में वर्त्तमान जल संकट की चुनौतियों का सामना करना है तो भूमिगत जलस्रोत को ऊपर उठाने के लिए जहां जहां जलस्रोत लुप्त होने के कगार पर हैं,वहां भारी मात्रा में जलविज्ञान की अपेक्षाओं के अनुरूप वृक्षारोपण की जरूरत है.तभी हम पहाड़ों में सूखते नौलों, धारों और लुप्त होते गाड़-गधेरों के जल को बचा सकेंगे साथ ही जलसंकट की वर्त्तमान चुनौतियों का भी सामना कर सकेंगे.

मैं इस अवसर पर ‘पहाड़-पानी-परम्परा’ संस्था को साधुवाद देना चाहुंगा कि उसने स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन के पावन अवसर से ठीक पहले द्वाराहाट क्षेत्र में असगोली ग्रामवासियों के साझा सहयोग से वृक्षारोपण अभियान के साथ साथ जल के सरोकारों को लेकर दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया. समय की मांग है कि उत्तराखण्ड हिमालय के जलसंकट की समस्या को यदि वास्तविक रूप से सुलझाना है तो सरकार तथा यहाँ के स्थानीय लोगों की साझा भागीदारी से देश की परम्परागत ‘वाटर हारवेस्टिंग’ प्रणाली को पुनःअपनाना होगा तथा प्राचीन भारत के जलवैज्ञानिक फार्मूलों एवं आधुनिक जलसंचयन की तकनीकों के माध्यम से जलसंकट की समस्याओं का समाधान भी खोजना होगा.

आगे भी जारी… जल है तो जीवन है. जल के प्रति जागरूकता ही जलसंकट का समाधान है.
✍🏻डॉ मोहन चंद तिवारी, हिमान्तर में प्रकाशित लेख।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित।)

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