इजराइल में नेतनयाहू का अजूबा

इजराइल में बेंजामिन नेतनयाहू की लिकुद पार्टी को आम चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें मिली हैं। 120 में से 30 सीटें जीतने वाली यह सबसे बड़ी पार्टी है। जाहिर है कि नेतनयाहू ही तीसरी बार लगातार सरकार बनाएंगे। नेतनयाहू की जीत ने फिलस्तीन और ईरान में तो हड़कंप पैदा किया ही है, अमेरिका के ओबामा प्रशासन को भी परेशान कर दिया है। ओबामा कभी नहीं चाहते थे कि नेतनयाहू जीते। अमेरिकी विदेश नीति के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी देश के प्रधानमंत्री को अमेरिका के राष्ट्रपति या विदेश मंत्रालय ने निमंत्रित नहीं किया हो और इसके बावजूद उसने सीनेट को संबोधित किया हो। रिपब्लिकन बहुमत वाली सीनेट ने अभी कुछ हफ्तों पहले अपनी सरकार को बताए बिना ही इजराइली प्रधानमंत्री को आमंत्रित कर लिया था।

नेतनयाहू ने चुनाव के दौरान काफी आक्रामक प्रचार किया और इजराइली मतदाताओं से कहा कि वह फिलस्तीनियों का अलग राज्य कभी नहीं बनने देंगे जबकि पिछले 20 साल से अमेरिकी इजराइल और फिलस्तीन, दो राज्य बनाने की नीति का समर्थक रहा हे। ओबामा बड़े जोश-खरोश से इस नीति का समर्थन करते रहे हैं। नेतनयाहू की जीत से वे इतने नाखुश हैं कि उन्हें बधाई देने की जिम्मेदारी भी उन्होंने विदेश मंत्री जान केरी पर डाल दी है। इजराइल के प्रति अब अमेरिकी नीति के बारे में तरह-तरह के अंदाज लगाए जा रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि अब ओबामा शायद फिलस्तीनियों को सलाह देंगे कि वे फिलहाल एक स्वतंत्र और सार्वभौम फिलस्तीनी राज्य की मांग को ढील दे दें।

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि नेतनयाहू बहुत ही चतुर नेता हैं। उन्होंने जीत के तुरंत बाद कह दिया कि इजराइल में रहनेवाले गैर-यहूदियों का वे पूरा ध्यान रखेंगे। फिलस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने नेतनयाहू की निंदा नहीं की है। वे उनसे बातचीत करने को तैयार हैं। लेकिन ईरान ने कहा है कि इजराइल के सभी नेता एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। वे किसी से भी सही नीति की उम्मीद नहीं करते। लेकिन हम यह नहीं भूल सकते कि इन्हीं उग्रवादी नेतनयाहू ने 2009 में अलग फिलस्तीनी राज्य की बात मानी थी।

भारत के साथ नेतनयाहू के संबधं काफी मधुर हैं। भारत सरकार को नेतनयाहू पर अपनी दोस्ती का प्रभाव कायम करना चाहिए और उनसे फिलस्तीनियों के प्रति मानवीय रुख अपनाने की अपील करनी चाहिए। भारत चाहे तो इजराइल और ईरान की बीच खिंची दुश्मनी की खाई को भी काफी हद तक पाट सकता है। ये सब बड़े काम हैं। इनके लिए हमारे नेताओं में गहरी समझ और दूरंदेशी हो तो विश्व राजनीति में भारत का विलक्षण स्थान बन सकता है।

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