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विशेष संपादकीय

हमारे जीवन की हैं चार गतियां

01_04_2013-prayppयज्ञ अपने आप में एक व्यवस्था का नाम है। किसी याज्ञिक परिवार में यज्ञ करते समय जितनी सुंदर व्यवस्था से या अव्यवस्था से लोग बैठे हों, उसे देखकर ही अनुमान लगाया जा सकता है कि ये लोग परिवार में कैसी व्यवस्था को लागू करके रहते हैं। ‘सूय्र्याचन्द्रमसाविव’ का आदर्श यदि किसी परिवार ने अपना लिया है तो कोई किसी के कार्य में हस्तक्षेप नही करता है, और अपने-अपने मर्यादा पथ में सब शांति से भ्रमण करते हैं-अर्थात अपने-अपने कार्यों का संपादन करते रहते हैं, सर्वथा वैसे ही जैसे सूर्य और चंद्रमा अपने-अपने मर्यादा पथ में भ्रमण करते हैं। ऐसा याज्ञिक परिवार यज्ञ पर भी शांति से बैठता है। पर जहां एक दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति लोगों की होती है, वहां यज्ञ पर भी लोग ब्रह्मा के नेतृत्व में न चलकर यज्ञ की मर्यादा को तोड़ते रहते हैं। विपरीत दिशा में बैठा व्यक्ति याज्ञिक व्यक्ति के कार्य घृतादि डालने में कमी निकालेगा, तो दूसरी ओर से कोई मंत्रोच्चारण में कमी निकालेगा, तो तीसरी ओर से कोई समिधाओं के रखने-रखाने या घृत व सामग्री आदि के कार्यों में नियत व्यक्ति के अधिकार में हस्तक्षेप करेगा। ऐसे व्यक्ति व्यक्तिगत जीवन में भी किसी दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप करने के अभ्यासी होते हैं।

यज्ञ में हम जब जल प्रसेचन करते हैं तो उस समय भी कई बार याज्ञिकों को जल प्रसेचन को लेकर गलती करते देखा जाता है। कुछ लोग चम्मच से जल लेकर फटाफट मंत्रोच्चारण करते हुए नियत दिशाओं में यज्ञ कुण्ड के बाहर जल छिडक़ते चले जाते हैं। उनकी शीघ्रता बताती है कि वह केवल याज्ञिक औपचारिकता की पूर्ति कर रहे हैं, उनके भीतर यज्ञ के लिए कोई श्रद्घाभावना नही है, जबकि यज्ञ का मूल श्रद्घा है। इसी प्रकार कुछ लोग जल को एक साथ एक स्थान पर पहले पूरब में फिर पश्चिम में और उसके पश्चात उत्तर में फिर यज्ञ कुण्ड के चारों ओर डाल देते हैं। जल प्रसेचन की यह विधि और प्रक्रिया भी दोषपूर्ण है।

वास्तव में मनुष्य स्वयं एक यज्ञ है, जिसका शरीर एक कुण्ड है और उस कुण्ड में आत्मा एक ज्योति है। इस आत्मा रूपी ज्योति को निरंतर चमकाये रखने के लिए ही यज्ञ किया जाता है। अर्थात यज्ञ आत्मा के आसपास एकत्र हो गये मलादि दोषों को जलाकर नित्य प्रति भस्म करने की एक पावन परंपरा है।

ऋषि-महर्षियों की मान्यता रही है कि मनुष्य जीवन की चार गतियां हो सकती हैं। पहली गति है-अंधकार से प्रकाश की ओर  चलना। अंधकार से  प्रकाश की ओर चलना व्यक्ति को अपना जीवन ध्येय सुनिश्चित करना चाहिए, क्योंकि मनुष्य जीवन की यह सर्वोत्तम गति है। ‘तमसो मा ज्योर्तिगमय’ में उपनिषद का ऋषि इसी उत्तम गति के अपनाने के लिए मानव समाज को प्रेरित करता है। इसके पश्चात दूसरा मार्ग है-प्रकाश से अंधकार में चलना। यह पहले मार्ग का विपरीत मार्ग है। संसार में ऐसे लोग भी होते हैं जो पहले अच्छे मार्ग पर चलते रहे-परंतु किसी भी कारण से कालांतर में मार्ग भटक गये और प्रकाश से अंधकार की ओर चले गये। पहले बीड़ी, सिगरेट, शराब आदि का सेवन  नही करते थे, परंतु कुसंगति के कारण कालांतर में करने लगे-और फिर सुधर नही पाये।

इसके पश्चात तीसरा मार्ग है- प्रकाश से प्रकाश में चलते रहना। ऐसे लोग भी संसार भी होते हैं जो शुभकार्यों में लगे रहते हैं और प्रकाशोपासक बने रहकर ही जीवन को व्यतीत कर देते हैं, ऐसी पुण्यात्माएं संसार में मनुष्य के रूप में महात्मा कहलाती हैं, और संसार के लोगों के लिए जीवन पुष्प बिखेरती चलती हैं। ये महान आत्माएं जिन लोगों के जीवन में अंधकार होता है, उनके जीवन से अंधकार को मिटाकर प्रकाश भरती चलती हैं। संसार को सन्मार्ग पर चलाने के लिए प्रेरित करने वाली ये दिव्यात्माएं अपने सत्कार्यों से जाने के पश्चात भी लोगों का मार्गदर्शन करती रहती हैं।

चौथी गति है-अंधकार से अंधकार में चलना। ऐसे लोग भी संसार में होते हैं, जो दुष्टता के कार्यों से जीवन का आरंभ करते हैं और   उन्हीं में  लगे रहकर जीवन पार कर देते हैं। ये दुष्टात्माएं संसार में विध्वंस का खेल खेलती हैं, और शांति प्रिय लोगों के जीवन को भी समाप्त करने या उनमें अशांति का विष घोलने में इन्हें कोई आपत्ति नही होती।

यज्ञ में जब हम जल प्रसेचन करते हैं, तो उसमें हमें यही बताया जाता है कि हम हर स्थिति परिस्थिति में प्रकाश के पुजारी बनें। जल शांति और शीतलता का प्रतीक है, शांति व्यवस्था का दूसरा  नाम है, और शीतलता हमारी विवेकशक्ति को बढ़ाती है। इस प्रकार जल प्रसेचन का अर्थ है कि हम शांतिपूर्वक विवेकशक्ति के उपासक बनें। मेधाशक्ति वाले हों। कहा भी गया है-‘‘बुद्घिर्यस्य बलं तस्य’’ अर्थात जिसके पास बुद्घि है, बल उसी के पास है। अपने बुद्घि बल से ए.पी.जे. कलाम जैसे लोग देवता की श्रेणी में पहुंच जाते हैं और उनके बुद्घिबल के सामने लोग झुकते हैं। इसलिए शांतिपूर्वक विवेक शक्ति बढ़ाकर प्रकाशोपासक होकर हम अपने जीवन में प्रकाश करें-यह जल प्रसेचन का अर्थ है। प्रसेचन का अर्थ सींचना है-छिडक़ना नही। इसलिए जल को यज्ञ कुण्ड के बाहर फेंककर छिडक़ना नही है अपितु यज्ञ कुण्ड को सींचना है, उसी में जल प्रसेचन करना है।

हमारे लिए पूर्व दिशा प्रकाश की दिशा है, इसी प्रकार उत्तर की दिशा भी प्रकाश की दिशा है। इसी दिशा में सप्तऋषि मण्डल तथा धु्रव तारा स्थित होते हैं। दक्षिण की दिशा घोर अंधकार की दिशा है, जबकि यज्ञ कुण्ड में पश्चिम की दिशा का एक कोना दक्षिण के घोर अंधकार से तथा दूसरा उत्तर के प्रकाश से जुड़ा है, पर फिर भी पश्चिम को अंधकार की दिशा ही माना जाता है।

अब जब हम पूर्व दिशा में ‘ओ३म् अदिते अनुमन्यस्व’ से जल प्रसेचन करते हैं तो जल को पूरब दिशा के दक्षिणी कोने से उत्तर की ओर डालना चाहिए। इसका अभिप्राय है कि अंधकार से प्रकाश की ओर चलना। इससे जीवन की एक गति पूर्ण होती है, जो हमें हमारे जीवन ध्येय के प्रति समर्पित करती है। हमारी संस्कृति का मूलाधार है अंधकार से प्रकाश की ओर चलना। इसलिए हमारे जल प्रसेचन की क्रिया में भी पहले यही कहा जाता है कि हम अंधकार से प्रकाश की ओर चलें। दूसरी बार हम यज्ञ कुण्ड की पश्चिम दिशा में ‘अनुमते अनुमन्यस्व’ से जल प्रसेचन करते हैं। यहां भी हम दक्षिण से उत्तर की ओर चलते हैं। बात साफ है कि यहां भी हम अंधकार (दक्षिण) से प्रकाश  (उत्तर) की ओर बढ़ रहे हैं। इसी प्रकार उत्तर में भी पश्चिम (अंधकार) से पूरब (प्रकाश) की ओर चलते हैं। अब चौथी बार हम केवल दक्षिण में जल नही डालते, क्योंकि हमें अंधकार से अंधकार में नही रहना है। इस बार हम पूरब दिशा में यज्ञ कुण्ड के मध्य से आरंभ कर दक्षिण की ओर बढ़ते हैं और पश्चिम से उत्तर होते हुए पूरब के उसी मध्य बिन्दु पर आ जाते हैं जहां से जल प्रसेचन प्रारंभ किया था। इसका अभिप्राय है कि हमें जीवन में प्रकाश से प्रकाश में ही रहना है। हमें किसी भी स्थिति में दक्षिण के घोर अंधकार का उपासक नही बनना है। यदि चूकें कहीं हो भी गयीं हैं तो पूरब के प्रकाश को पकडक़र उसी के सहारे दक्षिण (अंधकार काल) से निकलकर पुन: उसी मार्ग पर आ जावें, जहां से मार्ग भटके थे। किन्हीं कारणों से बीड़ी, सिगरेट, मद्यमांस अण्डे आदि का सेवन करने,  जुआ खेलने या अन्य प्रकार के दुव्र्यसन हमारे भीतर प्रवेश कर भी गये हैं तो उन्हें छोडऩे के लिए संकल्पित होकर पूरब से यात्रा प्रारंभ की और पूरब में ही आ गये। मानो दुर्गुणों को छोड़ते जाने के संकल्प का पुन: नवीनीकरण हो गया। इसी को कहते हैं-‘यद भद्रं तन्नासुव’।

किसी कवि ने कहा है-‘‘कवि करोति काव्यानि रसं जानाति पंडित:’’ अर्थात कवि कविता लिखता है और पंडित अर्थात सुधीजन उसका आनंद लूटते हैं। इसी बात को यज्ञ के जल प्रसेचन की प्रक्रिया से सीखा जाता है-विद्वानों ने, कवियों ने हमारे लिए जल प्रसेचन की व्यवस्था करके मानो एक कविता लिख दी है उसका आनंद लूटना हमारे वश में है। हम उसे लूटें और जितना चाहें लूटें। इस लूट से लाभ ही लाभ होगा। कहीं भी किसी को तनिक भी कष्ट नही होगा, अपितु आनंद बढ़ता जाएगा, जीवन पुष्प कभी मुरझाएगा नही। विवेकशाक्ति का दीपक कभी बुझेगा नही। हम औपचारिकता से निकलें और श्रद्घा के साथ यज्ञ करें, हमारे हृदय के आनंद में वृद्घि होती जाएगी। जल प्रसेचन का यही याज्ञिक अर्थ है।

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