रक्त संबंधों में अब उत्तर प्रदेश में हो सकेंगे 5000 के स्टांप पर बैनामे

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अजय कुमार 

स्वर्णिम भविष्य बनाने के लिए उसके सामने तमाम क्षेत्रों में रोजगार से लेकर व्यवसाय तक के अवसर खुले होते हैं। फिर आती है घर की जिम्मेदारी उठाने की समय यानी मां-बाप की सेवा करना और अपनी गृहस्थी बनाना।

इस दुनिया में जो आया है, उसे जाना भी है। यह अटल सत्य है। मगर आने और जाने के बीच जीवनकाल के करीब सत्तर वर्ष (आम भारतीय की औसत आयु) काफी महत्वपूर्ण होते है। इन सत्तर वर्षो में इंसान की जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव आते हैं। बाल काल और किशोरा अवस्था जब मां-बाप बच्चे का लालन-पालन करते हैं, उन्हें जिंदगी का पाठ पढ़ाते हैं। संस्कार देते हैं, इन्हीं शिक्षाओं के सहारे यह किशोर यौवन काल में घर से बाहर अपनी जिंदगी का नया सफर शुरू करता है। पढ़ाई-लिखाई करता है और उसके बाद जीवनयापन के लिए तमाम माध्यमों से पैसा कमाता है। स्वर्णिम भविष्य बनाने के लिए उसके सामने तमाम क्षेत्रों में रोजगार से लेकर व्यवसाय तक के अवसर खुले होते हैं। फिर आती है घर की जिम्मेदारी उठाने की समय यानी मां-बाप की सेवा करना और अपनी गृहस्थी बनाना। वैसे भी हिन्दू धर्म में गृहस्थ आश्रम को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। फिर उसे भी उसी प्रक्रिया का हिस्सा बनना होता है, जिस पर चलकर कभी उसके मां-बाप ने उसे इस योग्य बनाया था कि वह समाज में मान-सम्मान हासिल कर सके। अपने और अपने परिवार का जीवनयापन  और अन्य जिम्मेदारियों का निर्वाहन कर सके। इसके बाद एक समय ऐसा भी आता है जब कोई भी शख्स (मॉ-बाप) अपनी सभी जिम्मेदारियों से निवृत हो जाता है। बच्चे अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्थ हो जाते हैं तो मॉ-बाप को चिंता इस बात की रहती है कि उन्होंने पूरी जिंदगी मेहनत करके जो धन-सम्पदा एकत्र की है उसको बच्चों में कैसे बांटा जाए। किसे स्व अर्जित सम्पति में हिस्सा दिया जाए और किसे नहीं, यह भी उसे तय करना होता है।

अक्सर होता यह है कि मां-बाप अपनी सम्पति का बंटवारा करने की वसीयत कर देते हैं और यह लिख देते हैं कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी सम्पति में उनके बच्चे सम्पति के किस हिस्से के कितने मालिक होंगे, लेकिन वह महंगे स्टाम्प शुल्क के चलते अपनी सम्पति को अपने जीते जी बच्चों के बीच इस लिए बांट नहीं पाते हैं क्योंकि इस पर लगने वाला स्टाम्प शुल्क काफी ज्यादा होता है, जिसको वहन करने के हालात में मॉ-बाप नहीं रहते हैं। अक्सर बच्चे भी इस स्थिति में नहीं होते हैं कि वह स्टांप शुल्क अदा कर पाए। इस लिए कई बार सम्पति का बंटवारा वसीयत में सिमट कर रह जाता है और मां-बाप की मौत के बाद यह वसीयत विवाद का कारण भी बन जाती है।

इसी विवाद को खत्म करने के लिए उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने पारिवारिक सदस्यों के मध्य अचल सम्पति के बंटवारे के लिए स्टाम्प शुल्क लाखों रूपए से कम करके मात्र पांच हजार रूपए कर दिया है। उत्तर प्रदेश स्टाम्प पंजीयन विभाग के स्वतंत्र प्रभार के मंत्री रविन्द्र जायसवाल कहते हैं कि यूपी देश का पहला राज्य है जहां पिता द्वारा अपने बेटे, विधवा बहू, बेटी इत्यादि के भविष्य को ध्यान में रखते हुए स्व अर्जित अचल सम्पति के खून के रिश्तों के बीच बंटवारे के लिए स्टाम्प शुल्क में इतनी कमी की गई है। जायसवाल ने कहा प्रदेशवासियों के व्यापक हित को ध्यान में रखते हुए अचल संपत्तियों के पारिवारिक हस्तांतरण को अत्यधिक सुगम बना दिया है। यदि प्रदेश का कोई व्यक्ति अपनी अर्जित संपत्ति अपने रक्त संबंधियों के नाम करना चाहे तो उसे इसके लिए अब अधिकतम सीमा 5000 रुपये कर दी गई है, जबकि इससे पूर्व इसी कार्य के लिए रजिस्ट्री के समान ही शुल्क देना पड़ता था। इस निर्णय से पारिवारिक संपत्तियों के हस्तांतरण में सुविधा होगी और कोई विवाद भी उत्पन्न नहीं होगा। फिलहाल यह व्यवस्था छहः माह के लिए की गई है, बाद में इसकी समीक्षा करने के बाद इसे आगे बढ़ाया जाएगा।
उत्तर प्रदेश के स्टाम्प मंत्री रविन्द्र जायसवाल ने कहा यह फैसला उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से प्रेरणा लेकर किया है। क्योंकि योगी जी हमेशा जनहित की बात करते हैं। वर्तमान में पिता द्वारा अपने माता, पिता, पति, पत्नी, पुत्र, पुत्री, पुत्रवधू, दामाद, सगा भाई, सगी बहन, पुत्र तथा पुत्री के पुत्र, पुत्रियां को अपनी स्वः अर्जित अचल संपत्ति हस्तांतरित करनी हो तो वह उसे अधिकतम 5000 रुपये का शुल्क देकर आसानी से अपने बच्चों को दे सकते है। 
ज्ञातव्य हो, अब तक अर्जित संपत्ति को परिजनों को दान करने पर संपत्ति को बेचने पर लगने वाले शुल्क के बराबर राशि जमा करनी पड़ती थी। अभी तक इस भारी भरकम शुल्क के कारण राज्यवासियों को रक्त संबंधों में अचल संपत्ति दान करने में कठिनाई होती थी। इसके विकल्प के रूप में लोग वसीयत का सहारा लेते थे। यह वसीयत बड़े पारिवारिक विवादों का कारण बनती थी तथा भूमि अनुपयोगी पड़ी रहती थी। जायसवाल ने बताया कि प्रारंभ में यह छूट केवल 06 माह के लिए दी जाएगी, उसके बाद समीक्षा करके इसकी अवधि को बढ़ाया जा सकता है। अचल संपत्ति के दान विलेख पर दी गई इस छूट से भूमि की उपयोगिता को बढ़ाया जा सकेगा तथा अदालतों में दायर होने वाले संबंधित मुकदमों में भी भारी कमी आएगी।

उक्त निर्णय को लेकर कहा जा रहा है कि योगी सरकार एक तरफ एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की ओर अग्रसर है तो दूसरी ओर वहीं सामाजिक  सरोकार की मिसाल बनाते हुए उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख राजस्व प्राप्ति विभाग अपने राजस्व प्राप्ति के स्रोतों में कटौती का प्रस्ताव भी स्वतः उपलब्ध करा रहा है। यह छूट मोदी-योगी सरकार के नीतिगत फैसले लेने के सामर्थ्य और सबका साथ,सबका विकास के मंत्र को चरितार्थ करता है। उत्तर प्रदेश स्टाम्प एवं पंजीयन विभाग ने प्रथम श्रेणी के रक्त संबंधों जैसे पिता, माता, पति, पत्नी, पुत्र, पुत्री, पुत्र वधू दामाद, सगा भाई, सगी बहन, पुत्र/पुत्री/पुत्री का पुत्र/पुत्री के मध्य सम्पति हस्तांतरण पर लगने वाले स्टाम्प शुल्क को घटाकर मात्र पांच हजार कर दिया है, जो योगी सरकार का एक बड़ा फैसला माना जा सकता है। इससे सम्पति को लेकर सामाजिक सौहार्द भी खराब नहीं होगा और लड़ाई-झगड़े की नौबत भी नहीं आएगी।
खैर, बात स्टाम्प एवं पंजीयन विभाग के मंत्री रविन्द्र जायसवाल के इस साहसिक फैसले की कि जाए तो इसको लेकर लोग यह भी कह रहे हैं कि इससे राजकोषीय घटा बढ़ेगा,लेकिन स्टाम्प मंत्री सामाजिक सौहार्द के लिए इस घाटे को काफी कम करके आकते हैं। वह कहते हैं कि हम जनता से जुड़े निर्णय लेते हैं। गौरतलब हो जायसवाल योगी सरकार के ऐसे एक मात्र मंत्री हैं जो वेतन के रूप में मात्र एक रूपया लेते हैं। सरकारी सुविधाओं से भी उन्होंने किनारा कर रखा है।

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