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कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर बढ़ रही है मांग


 प्रशांत बाजपेई

कांग्रेस पिछले 8 साल से केंद्र की सत्ता से बाहर है। एक-एक कर राज्य भी इसके हाथ से फिसलते जा रहे हैं। लगातार सिमट रही कांग्रेस में निराशा है और नेतृत्व परिवर्तन को लेकर गुटबाजी है। बड़े नेता पार्टी छोड़ कर जा रहे हैं। इस बीच, नेशनल हेराल्ड घोटाले में पूछताछ के लिए सोनिया-राहुल को तलब कर ईडी ने मुश्किल और बढ़ा दी है

कांग्रेस को उदयपुर से दरी समेटे ज्यादा समय नहीं हुआ है। वहां चिंतन कम, चिंता ज्यादा रही। पार्टी की चिंता अब और बढ़ गई है। उसके कुछ कारण हैं। पहला, कद्दावर नेता साथ छोड़ रहे हैं। हाल ही कपिल सिब्बल ने पार्टी छोड़ी। पार्टी के असंतुष्ट गुट जी-23 के वे सबसे मुखर नेता थे। राहुल गांधी पर सीधे सवाल करने के बाद से वे पार्टी में अलग-थलग पड़े थे। उन्होंने चिंतन शिविर में भी हिस्सा नहीं लिया। जी-23 के प्रमुख नेता गुलाम नबी आजाद चिंतन शिविर में गए तो, परंतु निष्क्रिय दिखे। कपिल सिब्बल के अलावा इस वर्ष चार बड़े नेता पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार, आरपीएन सिंह, सुनील जाखड़ और हार्दिक पटेल कांग्रेस छोड़ चुके हैं।
दूसरा, आलाकमान खुद को पार्टी नेताओं के साथ दिखाने की कोशिश कर रहा है, परंतु रुष्ट लोगों की सुनवाई नहीं हो रही। इससे नेहरू-गांधी परिवार के प्रति कड़वाहट और ज्यादा बढ़ रही है। परिवार यह बात जानता है, परंतु उसके पास कोई चारा नहीं है। ताजा उदाहरण पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा, प्रमोद कृष्णन और नगमा का है, जो राज्यसभा टिकट वितरण पर पार्टी को खरी-खरी सुना चुके हैं।
तीसरा, चाटुकारों का प्रेम परिवार की जान के लिए आफत बना हुआ है। कुछ लोग राहुल गांधी को छोड़कर प्रियंका गांधी वाड्रा को आगे बढ़ाना चाहते हैं, कुछ चाहते हैं कि खराब स्वास्थ्य के बावजूद सोनिया गांधी ही नेतृत्व करें। इससे कांग्रेस के भीतर एक नई विभाजक रेखा खिंच गई है। राजनीति शास्त्री प्रो. कौशल किशोर मिश्र कहते हैं कि इससे कांग्रेस के शीर्ष परिवार में भी झुंझलाहट और अविश्वास के छींटे कभी-कभार दिख जाते हैं। चौथी, सबसे बड़ी चिंता नेशनल हेराल्ड मामले में जांच एजेंसियों की सक्रियता है, जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी, दोनों सीधे-सीधे फंसे हुए हैं।

फिर हंगामे की तैयारी
इस घोटाले में बीते 7 साल से नेहरू-गांधी परिवार के मां-बेटे यानी सोनिया गांधी और राहुल गांधी जमानत पर बाहर घूम रहे हैं। ये चाहते थे कि अदालत उस फाइल को नहीं खोले, जिसमें एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड के पैसों के लेन-देन का ब्यौरा दर्ज है। इनका कहना है कि यह आरोप ‘राजनीति से प्रेरित’ है। इस मामले में 10 सितंबर, 2016 को फैसला आना था। कांग्रेस ने उसी दिन देशव्यापी बंद का आह्वान किया। लेकिन ये पैंतरे काम नहीं आए। अदालत ने मामले की सुनवाई को आगे बढ़ाते हुए कहा कि आरोपों के राजनीति से प्रेरित होने के कोई प्रमाण नहीं हैं। अब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) नेशनल हेराल्ड घोटाले से जुड़े धन शोधन मामले की जांच कर रहा है। ईडी ने आरोपी मां-बेटे को पूछताछ के लिए हाजिर होने को कहा है। लिहाजा, कांग्रेस शक्ति प्रदर्शन की कवायद में जुट गई है, ताकि ‘विक्टिम कार्ड’ खेल सके। कांग्रेस की यह परंपरा रही है कि जब भी गांधी-नेहरू परिवार पर कोई मुसीबत आई, इसने वितंडा खड़ा करने की कोशिश की। चाहे इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय हो या जीप घोटाले में उनकी गिरफ्तारी।
राहुल गांधी को ईडी ने 2 जून को पूछताछ के लिए बुलाया था, लेकिन देश से बाहर होने के कारण उन्होंने पेशी के लिए दूसरी तारीख देने का अनुरोध किया तो जांच एजेंसी ने 13 जून को पेश होने के लिए समन भेजा है। वहीं, सोनिया गांधी को 8 जून को ईडी के समक्ष पेश होना था, लेकिन कोरोना संक्रमित होने के कारण वे पेश नहीं हुर्इं। उधर, शीर्ष नेतृत्व को संकट में देखकर कांग्रेस एक बार फिर वही कर रही है, जैसा उसने 2016 में किया था। राहुल गांधी के पेशी के दौरान कांग्रेस देशव्यापी प्रदर्शन करेगी। इसमें भारतीय युवा कांग्रेस, छात्र इकाई एनएसयूआई तथा पार्टी से जुड़े अन्य संगठनों के पदाधिकारी व कार्यकर्ता शामिल होंगे। कांग्रेस मुख्यालय से इसकी शुरूआत भी हो चुकी है।

नेशनल हेराल्ड घोटाले में 7 साल से जमानत पर बाहर घूम रहे मां-बेटे को प्रवर्तन निदेशालय ने पूछताछ के लिए हाजिर होने को कहा है। इसलिए 2016 की तरह इस बार भी कांग्रेस शक्ति प्रदर्शन की कवायद में जुट गई है, ताकि ‘विक्टिम कार्ड’ खेल सके। कांग्रेस की यह परंपरा रही है कि जब भी गांधी-नेहरू परिवार पर कोई मुसीबत आई, उसने वितंडा खड़ा करने की कोशिश की। चाहे इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय हो या जीप घोटाले में उनकी गिरफ्तारी।

आगे की रणनीति तय करने के लिए कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल की अध्यक्षता में 9 जून को महासचिवों, प्रभारियों और प्रदेशाध्यक्षों की एक वर्चुअल बैठक बुलाई गई। इसमें राहुल की पेशी के दौरान पूरे देश में ईडी कार्यालयों के बाहर प्रदर्शन करने का फैसला लिया गया, जिसे ‘सत्याग्रह’ नाम दिया गया है। इस दिन पार्टी ने सभी सांसदों और वरिष्ठ नेताओं को दिल्ली में मौजूद रहने का निर्देश दिया है। 13 जून को सांसद और कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य दिल्ली में ईडी मुख्यालय तक मार्च करेंगे।
यह घपला 2,000 करोड़ रुपये का है। इसका मुख्य आरोपी रसूखदार परिवार है। यह गोलमाल कैसे किया गया? आमजन को समझाने के लिए हम इसे थोड़ा आसान कर देते हैं। यह घोटाला कुछ इस तरह का है कि किसी ने 5,000 रुपये देकर किसी की 2 करोड़ रुपये की संपत्ति हड़प ली। चूंकि ‘शाही खानदान’ मामूली रकम की हेराफेरी नहीं करता, इसलिए इस आंकड़े को हम 1,000 से गुणा कर देते हैं। अब यह हो गया नेशनल हेराल्ड घोटाला। शाही खानदान यूं ही जांच के घेरे में नहीं आया है। इसमें हवाला रैकेट है, फर्जी कंपनियां हैं, आंकड़ों की हेराफेरी है और ताक पर धर दिए गए नियम-कानून हैं।
ऐसे किया घोटाला
जवाहर लाल नेहरू ने 1938 में एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड नाम से कंपनी बनाई थी, जिसमें कांग्रेस के कई नेताओं को शामिल किया गया। इसके तहत तीन अखबारों हिंदी में ‘नवजीवन’, उर्दू में ‘कौमी आवाज’ और अंग्रेजी में ‘नेशनल हेराल्ड’ का प्रकाशन शुरू हुआ। कंपनी को कई अंशधारकों की हिस्सेदारी और आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी को जनता से मिले चंदे से खड़ा किया गया था, जिसमें 5,000 स्वतंत्रता सेनानियों को कंपनी का शेयरधारक बनाया गया। कंपनी को दशकों तक सरकारी जमीन उपहार स्वरूप दी गई। किस अखबार के साथ ऐसा होता है कि उसे अखबार छापने के लिए एक के बाद एक, शहर दर शहर, बेशकीमती सरकारी जमीन भेंट में दी जाए? खैर, अखबार छापने वाली कंपनी को बाद में हजारों करोड़ रु. की रियल एस्टेट कंपनी में बदल दिया गया और इसे कौड़ियों के भाव सोनिया और राहुल को सौंप दिया गया।
संप्रग-2 के कार्यकाल में सोनिया-राहुल सत्ता के चरम पर थे। एसोसिएटेड जर्नल्स को हड़पने के लिए 23 नवंबर, 2010 को 5 लाख रुपये की पूंजी से एक नई कंपनी बनाई गई, जिसका नाम रखा गया- यंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड। कंपनी में सोनिया, राहुल और उनके करीबियों ने 5 लाख रुपये की पूंजी लगाई थी। इसे चैरिटेबल कंपनी यानी लाभरहित कंपनी के तौर पर पंजीकृत किया गया, जिसके 76 प्रतिशत शेयर मां-बेटे के पास थे और बाकी परिवार के दो शुभचिंतकों-मोतीलाल वोरा (12 प्रतिशत) और आॅस्कर फर्नांडीस (12 प्रतिशत) के पास थे। इस लिहाज से यह गांधी परिवार की जेबी कंपनी हुई। 3 महीने बाद 26 फरवरी, 2011 को कांग्रेस ने इस कंपनी को बिना ब्याज के 90 करोड़ रुपये का कर्ज दिया, जबकि कोई राजनीतिक दल किसी को कर्ज नहीं दे सकता। इस 90 करोड़ रु. के कर्ज से (यंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से) मां-बेटे ने 2,000 करोड़ रु. की स्वामित्व वाली कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स को अधिग्रहीत कर लिया या खरीद लिया। इसके बाद यंग इंडिया प्रा. लि. ने 90 करोड़ रुपये में से 50 लाख रुपये कांग्रेस पार्टी को लौटा दिया। बची हुई 89 करोड़ 50 लाख रुपये की राशि कांग्रेस ने ‘माफ’ कर दी। कांग्रेस के वकील नेता कुतर्क करते हैं कि यह अंदरूनी मामला है। इसमें कोई बाहरी हस्तक्षेप नहीं कर सकता। बता दें कि मार्च 2010 तक एसोसिएडेड जर्नल्स में 1057 अंशधारक थे।
अखबार की आड़ में एजेंडा
9 सितंबर, 1938 को लखनऊ से नेशनल हेराल्ड का प्रकाशन शुरू हुआ। दरअसल, आजादी से पहले कांग्रेस के गरम दल के नेताओं से निबटने के लिए नेहरू ने अखबार का सहारा लिया। उन्होंने इसके माध्यम से अपना एजेंडा आगे बढ़ाया, ताकि पार्टी में कोई उनका सीधा विरोध न कर सके। आजादी के बाद उन्होंने अपनी विचारधारा और नीतियों के प्रचार के लिए इसका खूब उपयोग किया। वे परोक्ष रूप से अखबार के संपादक ही नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री बनने से पहले तक कंपनी के निदेशक मंडल के अध्यक्ष भी बने रहे। 1954 में परमाणु परीक्षण पर चिंता जताते हुए उन्होंने ‘डेथ डीलर’ लेख लिखा, जो उनके प्रधानमंत्रित्व काल में ही प्रकाशित हुआ। नेहरू के बाद हेराल्ड की कमान उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने संभाली। 1968 में लखनऊ के साथ दिल्ली से भी इसका प्रकाशन होने लगा। 2008 में बंद होने से पूर्व एसोसिएटेड जर्नल्स तीनों अखबारों का प्रकाशन करता रहा।

एसोसिएटेड जर्नल्स को हड़पने के लिए 23 नवंबर, 2010 को 5 लाख रुपये की पूंजी से एक नई कंपनी बनाई गई, जिसका नाम रखा गया- यंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड। कंपनी में सोनिया, राहुल और उनके करीबियों ने 5 लाख रुपये की पूंजी लगाई थी। इसे चैरिटेबल कंपनी यानी लाभरहित कंपनी के तौर पर पंजीकृत कराया गया, जिसके 76 प्रतिशत शेयर मां-बेटे के पास थे और बाकी परिवार के दो शुभचिंतकों-मोतीलाल वोरा (12 प्रतिशत) और आस्कर फर्नांडीस(12 प्रतिशत) के पास।

2 अप्रैल, 2008 को यह फैसला लिया गया कि अखबार केवल वेब पर चलेगा और एसोसिएटेड जर्नल्स रियल एस्टेट कंपनी बन गया। दिल्ली, चंडीगढ़, लखनऊ, भोपाल, इंदौर और मुंबई में अखबार के नाम पर ली गई सरकारी जमीन पर शॉपिंग मॉल और भव्य इमारतें बना कर कंपनी रियल एस्टेट का धंधा करने लगी। दिल्ली के बहादुरशाह जफर मार्ग पर नेशनल हेराल्ड हाउस की इमारत से ही कई कार्यालय संचालित होने लगे, हर कार्यालय का किराया लाखों रुपये था। इधर, मुनाफा आ रहा था, उधर कंपनी को घाटे में दिखाया जा रहा था। कंपनी पर 90 करोड़ रु. का कर्ज भी था। मजे की बात है कि ऊपर बताए गए महानगरों में हजारों करोड़ की संपत्ति एसोसिएटेड जर्नल्स के पास थी, जिसका छोटा सा हिस्सा बेचकर कर्ज चुकाया जा सकता था। लेकिन कंपनी को कर्ज में बनाए रखा गया। वाकई वे दूर की सोच रहे थे।
दिलचस्प बात यह है कि नेहरू के बाद इंदिरा भी जिस अखबार को राष्ट्रीयता से जुड़े होने का तर्क देती थीं, उसमें राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय विचार या मुद्दों पर कभी ऐसी कोई सामग्री प्रकाशित नहीं हुई, जो देश और समाज के लिए उपयोगी हो। आजादी के बाद यह अखबार कांग्रेस का प्रचार-पत्र बन गया। इसमें कैसी खबरें छपती थीं या हैं, इसकी बानगी आपको नेशनल हेराल्ड की वेबसाइट पर देखने को मिल जाएगी। उदाहरण के लिए- ‘भारत में असहिष्णुता बढ़ रही है’, ‘जुल्म बस जुल्म है’, ‘वी आर अंडर दि रूल विच मर्डर्ड गांधी’, ‘इन्टॉलेरेंस एंड एंटरटेनमेंट : सिनेमा इन दि एज आफ डार्कनेस’, ‘पोएट्री आफ प्रोटेस्ट इन द टाइम्स आफ लिंचराज’, ‘क्या लिंच राज का रास्ता यही है’ ‘संयुक्त वाम जेएनयू : ये उनकी जीत है जो हिंदुस्तान को लिंचिस्तान नहीं बनाना चाहते’।
यही नहीं, नेशनल हेराल्ड ने कांग्रेस और वामपंथी इकोसिस्टम के साथ मिलकर भारत की राजधानी के लिए ‘बलात्कार राजधानी’ या ‘रेप कैपिटल’ जैसे शब्द उछाले। जिन-जिन राज्यों में भाजपा शासन था, उन्हें मानो दुश्मन समझकर अपमानजनक संबोधन दिए गए। जैसे- ‘हरियाणा : भारत की बलात्कार राजधानी’, ‘उन्नाव : उत्तर प्रदेश की बलात्कार राजधानी’। स्वाभाविक ही 60 के दशक में ही इस अखबार की बिक्री जल्दी ही नगण्य हो गई थी। परन्तु एसोसिएटेड जर्नल्स को कांग्रेस की राज्य सरकारों ने समय-समय पर महंगी जमीन भेंट कर इसे हजारों करोड़ रु. की कंपनी बना दिया।
कांग्रेस का क्रूर मजाक
सोनिया-राहुल के नेतृत्व वाली कांग्रेस ही मां-बेटे के मालिकाना हक वाले एसोसिएटेड जर्नल्स को 90 करोड़ रुपये देती है और 89.50 करोड़ रुपये माफ कर देती है। फिर यह कंपनी सोनिया-राहुल के वफादार मोतीलाल वोरा की कंपनी यंग इंडिया उसका अधिग्रहण कर लेती है। इस तरह से सोनिया-राहुल हजारों करोड़ की सरकारी जमीन के मालिक बन जाते हैं। यंग इंडिया वास्तव में एसोसिएटेड जर्नल्स से बिल्कुल भिन्न कंपनी है, जिसका अखबार से कोई लेना-देना नहीं है।

दिलचस्प बात यह है कि नेहरू के बाद इंदिरा भी जिस अखबार को राष्ट्रीयता से जुड़े होने का तर्क देती थीं, उसमें राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय विचार या मुद्दों पर कभी ऐसी कोई सामग्री प्रकाशित नहीं हुई, जो देश और समाज के लिए उपयोगी हो। आजादी के बाद अखबार कांग्रेस का प्रचार-पत्र बन गया। इसमें कैसी खबरें छपती थीं या हैं, इसकी बानगी आपको नेशनल हेराल्ड की वेबसाइट पर देखने को मिल जाएगी। जिन-जिन राज्यों में भाजपा शासन था, उन्हें मानो दुश्मन समझकर अपमानजनक संबोधन दिए गए।

अब सवाल उठता है कि इन लोगों ने खुल्लमखुल्ला ऐसा कैसे किया? पकड़े जाएंगे क्यों नहीं सोचा? जवाब है, ‘शाही परिवार’ और उसके दरबारियों को लगता था कि वे हमेशा सत्ता में बने रहेंगे। ज्यादा से ज्यादा कोई गठजोड़ सरकार आएगी, जिसमें वामपंथी-राजद-सपा-तृणमूल-डीएमके जैसे कांग्रेस के सहयोगी होंगे। पर 2014 की सुनामी ने सारा गणित उलट दिया। अब न्यायालय, प्रवर्तन निदेशालय सबको जवाब देने हैं. पर कांग्रेस जवाब दे रही है क्या? वह दंगाइयों को ‘मासूम बच्चे’ बता रही है। कश्मीर में हिंदुओं की हत्या के लिए पाकिस्तान को क्लीनचिट देकर सरकार और सुरक्षाबलों पर आरोप लगा रही है। राहुल गांधी विदेश जाकर भारत के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को घमंडी घोषित कर रहे हैं। वे वामपंथियों से उधार लिए अपने इल्म से दुनिया को लाभान्वित कर रहे हैं कि भारत एक राष्ट्र नहीं, बल्कि राज्यों का समूह है। नेशनल हेराल्ड घोटाला सत्ता के मद में चूर, भारत बोध से शून्य, अपनी अभिजात्यता में डूबे, कानून को कुछ न समझने वाले भ्रष्ट तंत्र के घोटालों की शृंखला की एक कड़ी मात्र है।

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