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इतिहास के पन्नों से

कांग्रेस द्वारा भारत के विभाजन का दुखद इतिहास


डा. राधे श्याम द्विवेदी
आज ही के दिन कांग्रेस ने 1947 में 14-15 जून को नयी दिल्ली में हुए अपने अधिवेशन में बंटवारे के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी।इसे देश के बंटवारे को इतिहास की सबसे दुखद घटनाओं में शुमार किया जाता है। यह सिर्फ दो मुल्कों का नहीं बल्कि घरों का, परिवारों का, रिश्तों का और भावनाओं का बंटवारा था। रातोरात लाखों लोगों की तकदीर बदल गई। कोई बेघर हुआ तो किसी को नफरत की तलवार ने काट डाला। किसी का भाई सीमापार चला गया तो कोई अपने परिवार को छोड़कर इस ओर चला आया। एक रात पहले तक भाइयों की तरह रहने वाले दो समुदायों के लोग हमसाए से अचानक दुश्मन बन गए और इस बंटवारे ने दोनो समुदायों के लोगों के दिलों में नफरत की ऐसी खाई खोद दी, जिसे पाटने की कोई कोशिश आज तक कामयाब नहीं हो पा रही है।
दुखद इतिहास का महत्वपूर्ण दिन
बंटवारे के उस दुखद इतिहास में 15 जून का दिन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस ने 1947 में 14-15 जून को नयी दिल्ली में हुए अपने अधिवेशन में बंटवारे के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। आजादी की आड़ में अंग्रेज भारत को कभी न भरने वाला यह जख्म दे गए।15 जून. यह वही तारीख है जिस दिन कुछ लोगों के ‘निजी स्वार्थ’ के लिए एक सियासी लकीर खींचने पर सहमति बनी थी. वही लकीर जिसने सबकुछ तक़सीम कर दिया था. तकसीम मुल्क़ को, क़ौम को, रिश्तों को, मुहाफ़िज़ों को, नदिओं-तलाबों को और सबसे ज़रूरी इंसानों को. एक खूनी खेल खेला गया. हिन्दुस्तान नाम का जिस्म बंट गया और एक हिस्सा पाकिस्तान बन गया. इक़बाल की पेशीन गोई और जिन्ना का ख़्वाब ताबीर की जुस्तजू में भटकता हुआ पंजाब के उस पार पहुंच गया. कई कारवां अपने अनजाने मंजिल की तरफ रवाना हो गए.
15 जून 1947 ही वो तारीख है जब अखिल भारतीय कांग्रेस ने नई दिल्ली में भारत के विभाजन वाली ब्रितानिया सरकार की योजना को स्वीकार किया था. इस विभाजन की योजना को माउंटबेटन योजना के रूप में भी जाना जाता है. इस योजना की घोषणा भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा की गई थी. अगस्त 1947 में भारत का विभाजन निस्संदेह सबसे दुखद और हिंसक घटनाओं में से एक है. दरअसल पाकिस्तान के निर्माण की वकालत ऑल इंडिया मुस्लिम लीग जिसे 1906 में ढाका में स्थापित किया गया था, उसने की थी. इसके मुसलमान सदस्यों की राय थी कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुस्लिम सदस्यों को हिंदू सदस्यों के जैसे समान अधिकार प्राप्त नहीं हैं. कांग्रेस उनके साथ भेदभाव करती है.
विभाजन की पृष्ठभूमि
1930 में मुसलमानों के लिए एक अलग राज्य की मांग करने वाले पहले व्यक्ति अल्लामा इकबाल थे, जिनका उस वक्त मानना था कि ‘हिंदू बहुल भारत’ से अलग मुस्लिम देश बनना महत्वपूर्ण है.अल्लामा इकबाल ने मुहम्मद अली जिन्ना और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर एक नए मुस्लिम राज्य के गठन के लिए एक प्रस्ताव तैयार किया. 1930 तक, मुहम्मद अली जिन्ना, जो लंबे समय से हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए प्रयासरत थे, अचानक भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति के बारे में चिंतित होने लगे. इसके लिए वो कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराने लगे, जिसके एक वक्त पर वो खुद भी सदस्य थे. उन्होंने कांग्रेस पर देश के मुसलमानों के साथ भेदभाव का आरोप लगाया. 1940 में लाहौर सम्मेलन में, जिन्ना ने एक अलग मुस्लिम देश की मांग करते हुए एक बयान दिया. उस समय के सभी मुस्लिम राजनीतिक दल, जैसे खाकसार तहरीक और अल्लामा मशरिकी धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन के पक्ष में नहीं थे. अधिकांश कांग्रेसी नेता धर्मनिरपेक्ष थे और देश के विभाजन का भी विरोध करते थे. महात्मा गांधी धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन के खिलाफ थे और उनका मानना ​​था कि हिंदुओं और मुसलमानों को एक देश में शांति से एक साथ रहना चाहिए. गांधी ने मुसलमानों को कांग्रेस में बनाए रखने के लिए भी संघर्ष किया, जिनमें से कई ने 1930 के दशक में पार्टी छोड़ना शुरू कर दिया था.
1940 तक पाकिस्तान की परिभाषा अस्पष्ट थी और इसकी दो तरह से व्याख्या की जा रही थी. एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में या संघबद्ध भारत के सदस्य के रूप में. 1946 में, एक कैबिनेट मिशन ने एक विकेन्द्रीकृत राज्य का सुझाव देकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता करने की कोशिश की. इस सुझाव में कहा गया कि स्थानीय सरकारों को पर्याप्त शक्ति दी जाएगी. जवाहर लाल नेहरू ने एक विकेंद्रीकृत राज्य के लिए सहमत होने से इनकार कर दिया और जिन्ना ने पाकिस्तान के एक अलग राष्ट्र की अपनी इच्छा को बनाए रखा.
ब्रितानियां हुकूमत की साजिश
ब्रितानियां हुकूमत ने भारत को दो अलग-अलग भागों में विभाजित करने की माउंटबेटन की योजना को पूरा कर लिया. 3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा स्वतंत्रता की तारीख, 15 अगस्त 1947 तय की गई थी. 15जून 1947 को माउंटबेटन योजना पारित की गई और विभाजन के निर्णय को अखिल भारतीय कांग्रेस के सदस्यों ने स्वीकार कर लिया. पंजाब और बंगाल राज्यों को विभाजित किया गया. पश्चिम पंजाब का अधिकांश मुस्लिम हिस्सा पाकिस्तान का हिस्सा बन गया जबकि पश्चिम बंगाल अपने हिंदू बहुमत के साथ भारत में बना रहा. मुख्य रूप से मुस्लिम बहुल पूर्वी बंगाल पाकिस्तान का हिस्सा बन गया. यही हिस्सा बाद में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बन गया.
हिंसा और अराजकता का बोलबाला
भारत की स्वतंत्रता और रेडक्लिफ रेखा द्वारा देश के दो हिस्सों में विभाजन से बड़े पैमाने पर हिंसा हुई. लाखों लोग बेघर हुए. अधिकतर भारतीय मुसलमान पाकिस्तान में अपने ‘नव निर्मित देश’ जा रहे थे तो वहीं हिंदू और सिख जो अब पाकिस्तान में थे, भारत में आ रहे थे. विभाजन ने लाखों की जिंदगियां तबाह कर दी. लाखों को बेघर कर दिया. साम्प्रदायिक हिंसा का डर हर किसी को सता रहा था. भारत के विभाजन के कारण हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बड़े पैमाने दंगे हुए, जिसके परिणामस्वरूप अंतहीन हत्याएं, बलात्कार और अपहरण हुए.
नफरत की खाई काम होने के बजाय बढ़ती जा रही है। इतना ही नहीं 1947 में दोनों मुल्क़ों के बीच जो नफरत की बीज बो दी गई वो आज एक बड़ा खतरनाक पेड़ बन गया है. पुराने लोगों ने एसी दुश्चक्र रच दिया है और उसकी नीव में इतना जहर घोल दिया है कि भारत के बाहर के साथ यहां रह रहे कुछ सांप्रदायिक शक्तियां निरन्तर अपना दबदबा और एकाधिकार बनाए रखना चाहता है।गंगा जमुनी तहबीज, सेकुलर की मनमानी अवधारणा, कांग्रेसी और कम्यूनिष्ट राजनीति और न्यायपालिका में मजबूत पकड़ अभी भी इस देश के सम्यक विकास में अवरोध उत्पन्न कर रहा है।

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