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भारत के रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा

मनोज सिन्हा
मनोज सिन्हा

वक्त ने बना दी जिंदगी इतिहास की धरोहर

रविकांत सिंह

नई दिल्ली। यूं तो राजनीति में सभी लोग पिछड़े हुए समाज को आगे लाकर अंत्योदय भावना के आधार पर उन्नत और अग्रिम समाज की कल्पना को साकार करने की बात कहकर हर राजनीतिज्ञ अपनी राजनीति करने का संकल्प व्यक्त करता है, पर कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो यथार्थ के धरातल पर वैसा ही करते भी दिखते हैं, जैसा वह कहते हैं। भारत के रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा भारतीय राजनीति में अपवाद हंै, वह वही करते हैं जो कहते हैं। वह देश के पिछड़े समाज के लिए और ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को आगे लाने के लिए काम करने वाले राजनीतिज्ञ के रूप में अपनी पहचान रखते हैं। इसलिए राजनीति के कीचड़ में वह ‘कमल’ हैं और यह भी अदभुत संयोग की बात है कि ‘कमल’ वाली पार्टी की सरकार में वह रेल राज्यमंत्री भी हैं।

मई 2014 में जब प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सरकारी बनाई थी तो उस समय यह बहुत महत्वपूर्ण हो गया था कि मंत्री कौन बनेगा? और उसकी क्या योग्यताएं होंगी? क्योंकि मोदी की अपनी छवि के कारण और देश की जनता के द्वारा दिये गये प्रचंड बहुमत के कारण यह स्पष्ट हो गया था कि मंत्री वही बनेगा जो ‘काबिल’ होगा। मंत्री बनने के लिए किसी भी प्रकार के तुष्टीकरण या सिफारिश की आवश्यकता नही थी। लोगों की प्रतिभा और उनका काम-ये दो ऐसी चीजें थीं जिन्हें प्रधानमंत्री मोदी ने किसी मंत्री के मंत्री बनने की सबसे बड़ी योग्यता समझी थी। मनोज सिन्हा का कार्य बोल रहा था, उनका प्रतिभा उनकी योग्यता का डिंडिम घोष कर रही थी, और यही  हुआ कि नरेन्द्र मोदी ने उनकी योग्यता को पुरस्कृत करने का मन बनाया था, और वह देश के रेल राज्यमंत्री बनाये गये।

श्री मनोज सिन्हा का जन्म 1 जुलाई 1959 को भूमिहार ब्राह्मण परिवार में गाजीपुर जिले में हुआ। उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से सिविल इंजीनियरिंग में बी.टैक और एम.टैक की उपाधि प्राप्त की। वह इस समय भारत की संसद के  निचले सदन अर्थात लोकसभा में गाजीपुर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। देश के राष्ट्रपति ने उन्हें भारत की मंत्रिपरिषद में राज्यमंत्री के रूप में 26 मई 2014 को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई थी। वह अपने विद्या-अध्ययन काल में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में छात्र संगठन के अध्यक्ष भी रहे। 1996 में श्री सिन्हा 11वीं लोकसभा के लिए पहली बार चुने गये। इसके पश्चात तेरहवीं लोकसभा में वह दूसरी बार सांसद के रूप में चुनकर संसद में भेजे गये। 1999-2000 में वह स्कूल ऑफ प्लानिंग एण्ड आर्केटैक्चर की जनरल कांउसिल के सदस्य रहे हैं।  इसके अतिरिक्त ऊर्जा समिति और गवर्नमेंट एश्योरेंस समिति के सदस्य भी रहे।

1989-96 के मध्य श्री सिन्हा नेशनल काउंसिल के सदस्य रहे, तेरहवी लोकसभा में उन्होंने एक सांसद के रूप में सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शन किया। वह अधिकतम समय में लोकसभा की कार्यवाही में उपस्थित रहे और जनकल्याण से संबंधित बहुत से प्रश्नों को उठाकर लोकसभा का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में उन्होंने सफलता प्राप्त की। जिससे स्पष्ट होता है कि श्री सिन्हा के अंदर संसद, संसदीय लोकतंत्र और संसदीय मान्यताओं के प्रति असीम श्रद्घा है। जिसे वह शासन की जनता के प्रति प्रतिबद्घता का अमोघ अस्त्र मानते हैं। वह व्यक्तिगत बातचीत में कहते भी हैं कि संसद के प्रति गंभीर होना जनता की समस्याओं के प्रति गंभीर होना है। साथ ही यह भी कि संसद के प्रति हम जितने अधिक गंभीर होंगे उतना ही हम जनकल्याण से जुड़ी नीतियों को सही ढंग से लागू कराने में और लोगों को एक उत्तरदायी सरकार देने में सफल हो पाएंगे।

श्री सिन्हा इसी भावना और उद्देश्य के साथ अपने मंत्रालय में समय देते हैं। उनकी नीतियों में पारदर्शिता होती है और हर कदम पर जनकल्याण परिलक्षित होता है।

श्री सिन्हा की धर्मपत्नी श्रीमती नीलम सिन्हा हैं जिनसे श्री सिन्हा का विवाह 8 मई 1977 को मघारा बिहार शरीफ में हुआ। श्री सिन्हा भारतीय जनता पार्टी के प्रति भी पूर्णत: निष्ठावान रहे हैं। 1989 में श्री सिन्हा भाजपा की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य बनाये गये। उनके अपने गुणों के कारण पार्टी में उनका सम्मान है।

वक्त उन्हीं की ‘वक्त’ करता है जो वक्त की वक्त करते हैं, जो वक्त को यूं ही गंवा देते हैं, एक दिन वक्त आता है कि वक्त उन्हें भी यूं ही गंवा देता है। जो लोग वक्त की लगाम पकडक़र चलते हैं-उनके लिए इतिहास भी सिर झुकाता है, और उन्हें अपनी आगोश में स्थान देकर अपने आपको कृत-कृत्य समझता है।

मनोज सिन्हा को यदि आज वक्त सलाम कर रहा है तो मानना पड़ेगा कि उन्होंने वक्त की कीमत को समझा है और उसी का परिणाम है कि आज उनकी यह अनमोल जिंदगी इतिहास के पृष्ठों की धरोहर बनकर रह गयी है।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं,  चलभाष-09968166030)

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