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पर्यावरण

राजस्थान के पाली में हुई जल संकट को लेकर एक अनोखी पहल की शुरुआत

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

राजस्थान देश का सबसे बड़ा प्रदेश है तो यहां देश की 5.40 प्रतिशत आबादी और 19 प्रतिशत पशुधन है। एक समय कहा जाता था कि घी ढुल जाए तो गम नहीं पर पानी नहीं ढुलना चाहिए, यह कहावत पानी के महत्व को दर्शाती है।

मौसम विभाग का इस बार भी देश में सामान्य मानसून का संदेश राहत भरा है। दरअसल गर्मियों का मौसम आते आते देश के बहुत से हिस्सों में पेयजल का संकट बढ़ जाता है। पिछले कुछ सालों से सामान्य मानसून के बावजूद भूगर्भीय जल स्तर में लगातार गिरावट देखी जा रही है। भूगर्भीय जल के अत्यधिक दोहन और लाख प्रयासों के बावजूद वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के सकारात्मक परिणाम प्राप्त नहीं होने के कारण देश के अधिकांश हिस्सों में भूगर्मीय जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। डार्क जोन बढ़ते जा रहे हैं। इसके जो कारण है वह भी किसी से छिपे नहीं हैं। एक तो अत्यधिक दोहन, दूसरा पानी का अत्यधिक उपयोग और परंपरागत जल संग्रहण व्यवस्था के लगभग समाप्त हो जाने से हालात दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होते जा रहे हैं। ऐसे में राजस्थान के पाली मारवाड से सुकुन भरा संदेश आया है। पाली में पेयजल संकट के दौरान एकाएक ध्यान पाली से मात्र दस से पन्द्रह किलोमीटर दूर की खदान में भरे पानी की ओर गया और जब उस पानी का आकलन किया गया तो आश्चर्यजनक तथ्य सामने आया कि इन खदानों से पाली को प्रतिदिन 3 एमएलडी यानी कि 30 लाख लीटर पानी की आपूर्ति की जा सकती है और वो भी एक दो दिन नहीं बल्कि आरंभिक आकलन के अनुसार पूरे दो माह यानी की जून के अंत तक।

जलदाय विभाग के नए अतिरिक्त मुख्य सचिव डॉ. सुबोध अग्रवाल स्वयं पाली से 10 किमी दूर सुवानियां और मानपुर की खदान पर गए और जिला प्रशासन, खान विभाग व जलदाय इंजीनियरों से समन्वय बनाते हुए पाली के जल फिल्टर प्लांट तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था सुनिश्चित की। मजे की बात यह कि पाली के लिए अभी दो खदानें ही जलापूर्ति में सहभागी बन रही थीं कि जाड़न खदान से भी पानी लाने की कार्ययोजना बन गई।
देखा जाए तो देश के सबसे बड़े प्रदेश राजस्थानवासी ही सही मायने में पानी का मोल समझते हैं। हालांकि कहावतों में पानी के मोल होने का सामान्य अर्थ बहुत सस्ता होना होता है पर राजस्थान के संदर्भ में यदि कोई सबसे अधिक कीमती है तो राजस्थान में पानी ही है। गर्मियों के मौसम में तो पानी को लेकर प्रशासन जिस तरह से पसीने पसीने हो जाता है वह इन दिनों की मीडिया रिपोर्टस से देखा जा सकता है। इन दिनों पाली की प्यास वाटर स्पेशल ट्रेन से बुझाई जा रही है तो एक समय भीलवाड़ा के लिए भी वाटर स्पेशल ट्रेन से पानी की आपूर्ति की जाती रही है। हालांकि अप्रैल के दूसरे पखवाड़े से जोधपुर भगत कोठी से पाली मारवाड के लिए चल रही वाटर स्पेशल ट्रेन के सौ फेरे पूरे कर लेने की मीडिया में यह खबर पिछले दिनों प्रमुखता से छाई रही है। इस सबके बीच पाली वासियों की प्यास बुझाने में खदानों में भरे पानी की आपूर्ति को अपने आप में किसी सराहनीय नवाचार से कम नहीं आंका जा सकता। सामान्यतः मीडिया में खदानों में भरे पानी में नहाते हुए डूबने के समाचार तो आते रहते हैं पर जीवनदायी बनती खदानों में भरी बरसात की एक एक बूंद का महत्व पाली में जलापूर्ति से आसानी से समझा जा सकता है। यह सही है कि पाली की जलापूर्ति की पूरी आवश्यकता इन खदानों में भरे पानी से नहीं हो सकती पर इस मायने में यह सराहनीय हो जाता है कि वाटर ट्रेन से आ रहे पानी के बाद भी कम पड़ रहे पानी की मांग इन खदानों के पानी से आसानी से हो सकती है।

समूचे राजस्थान में बेशकीमती खनिजों के भण्डार भरा है। कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में भी राजस्थान की समूची दुनिया में विशिष्ठ पहचान हो गई है। इन सबके बीच सकारात्मकता यह है कि पाली में खदानों से पानी की आपूर्ति नवाचार अवश्य है और एसीएस डॉ. सुबोध अग्रवाल ने इन खदानों के पानी को आधुनिकतम तकनीक से फिल्टर कर पेयजल के पाली तक पहुंचाने का विवेकपूर्ण निर्णय कर एक नई दिशा दे दी है। राजस्थान खनिज प्रधान प्रदेश होने से खदानों की प्रचुरता भी है। ऐसी खदानें जिनमें अब खनन नहीं हो रहा है और कोई वैकल्पिक उपयोग नहीं दिखता तो इन खदानों में भरे बरसात के पानी की एक एक बूंद का उपयोग जलापूर्ति में किए जाने की कार्ययोजना बनाई जा सकती है। इस पानी को पेयजल व सिंचाई के लिए भी उपयोग में लिया जा सकता है। राजस्थान में पेयजल आपूर्ति के लिए चित्तोड़ की खदान और उदयपुर के रॉकफास्फेट की खदानों से किया जा रहा है। इस तरह से खदान का पानी जीवनदायी होने के साथ ही पानी की एक एक बूंद के लिए तरसते प्रदेश के लिए अति उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
राजस्थान देश का सबसे बड़ा प्रदेश है तो यहां देश की 5.40 प्रतिशत आबादी और 19 प्रतिशत पशुधन है। एक समय कहा जाता था कि घी ढुल जाए तो गम नहीं पर पानी नहीं ढुलना चाहिए, यह कहावत पानी के महत्व को दर्शाती है। प्रदेश के 239 उपखण्डों में से 195 उपखण्ड डार्कजोन की श्रेणी में हैं। बरसात कम या छितराई होती है तो सतही पानी का केवल 1.16 प्रतिशत ही राजस्थान में है। ऐसे में पानी का सही मोल राजस्थानवासी या गर्मियों में जूझते जलदाय विभाग के अधिकारी कर्मचारी व जिला प्रशासन ही समझ सकता है। ऐसे में खदानों के पानी के उपयोग का जो प्रयोग पाली में किया है उसे विस्तारित कर गर्मियों में पानी की आवश्यकता को कुछ मात्रा में तो पूरा किया ही जा सकता हैं वहीं बरसात में जल संग्रहण की चैन विकसित भी की जा सकती है कि बरसात से पहले खदानों का पानी उपयोग में ले लिया जाए ताकि बरसात में पुनः पानी भरने से उसका उपयोग किया जा सके। इससे करोड़ों लीटर पानी की बचत हो सकेगी, समय पर जरूरत पूरी हो सकेगी और जल संरक्षण से भूजल के स्तर को भी बनाए रखने में सहायता मिल सकेगी। पाली की पहल को एक उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है और देश के अन्य प्रदेशों की खदानों में भरने वाले वर्षा जल का उपयोग बेहतर तरीके से किया जा सकता है। इससे जहां पेयजल या सिंचाई की आवश्यकता पूरी करने में सहयोग मिलेगा वहीं वर्षांत में पुनः भरने से वाटर हार्वेस्टिंग की बेहतरीन प्रक्रिया तय हो सकेगी। पाली के नवाचारी प्रयोग को उदाहरण के रूप में लेते हुए वर्षा जल का संग्रहण और उसका बेहतर उपयोग सुनिश्चित हो सकता है।

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