तुलसी की रामचरितमानस में कटहल की महिमा

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 सुधीर मिश्र

तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है-
जनि कल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा ।
संसार महँ पुरुष त्रिबिध पाटल, रसाल पनस समा ।।
एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहिं।
एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहन न बागहीं।।
इन पंक्तियों में रामचन्द्र जी रावण से मुखातिब हैं। रावण की हुंकार सुनकर राम जी कहते हैं-सुनो संसार में तीन तरह के आदमी होते हैं। पटल यानी गुलाब की तरह, रसाल यानी आम की तरह और पनस यानी कटहल की तरह। गुलाब किस्म के लोग सिर्फ बात करते हैं यानी इनमें सिर्फ फूल ही होता है। दूसरे आम की तरह होते हैं जिनमें फल भी होता है और फूल भी। यानी यह कहते भी हैं और करते भी हैं। तीसरे होते हैं कटहल की तरह जिनमें सिर्फ फल होता है। यानी वह कहते कुछ नहीं, सिर्फ करते हैं। इसलिए कटहल जैसे बनो, बोलो मत, कुछ करो।
मानस की इन पंक्तियों का यह जिक्र सिर्फ कटहल की महिमा के बखान के लिए है। वैसे रामचरित मानस लिखे जाने से भी सैकड़ों साल पहले बौद्ध ग्रन्थों में इसका जिक्र मिलता है। दक्षिण भारतीय राज्यों में इस फल की खेती किए जाने का करीब छह हजार साल पुराना इतिहास बताया जाता है। घरों में नानी दादी से कटहल से जुड़ी एक कहानी भी याद आती है। कहानी कुछ यूं है कि जब रामचंद्र जी लंका फतह करके अयोध्या लौटे तो उन्हें एक बार ससुराल से आमंत्रण मिला। मिथिला वालों ने कहा कि अब आपको ससुराल आना ही पड़ेगा। राम जी चलने की तैयारी करने लगे तो उनके साथ आए वानर भी उत्साहित हो गए कि राम जी की ससुराल जाएंगे। यह देखकर लक्ष्मण जी को चिंता हुई कि न जाने वानर वहां क्या उत्पात मचा दें। उन्होंने राम जी से चिंता जाहिर की तो उन्होंने साफ कह दिया कि जब युद्ध में वानर हमारे साथ थे तो अपनी ससुराल जाने के लिए उन्हें कैसे मना किया जा सकता है।

फिर भी लक्ष्मण जी ने थोड़ी सतर्कता बरती और हनुमान जी से गुजारिश करते हुए कहा कि आप समझदार और विद्वान हैं। वानरों से कहिएगा कि वहां ज्यादा उत्साहित न हो जाएं। जैसा व्यवहार हम करें, बस उसी का अनुसरण करें। अब खाने में कटहल की सब्जी आई तो लक्ष्मण जी ने कोए से बीज निकालने के लिए उसे दबाया तो बीज ऊपर हवा में उछल गया, जैसे तैसे लक्ष्मण जी ने उसे हवा में लपका और खा लिया। इस देखकर वानरों ने भी यही करना शुरू कर दिया और पूरी दावत में अफरातफरी मच गई। कहानी सिर्फ यह समझाने के लिए थी कि नकल में भी अकल लगानी चाहिए। बहरहाल हम बात तो कटहल की कर रहे थे। कटहल बहुमुखी प्रतिभा का धनी है। इसके फल से कोफ्ता, कोरमा, सूखी सब्जी, बिरयानी और चिप्स बनते हैं। पके हुए फल को दक्षिण भारत में बहुत चाव से खाया जाता है। हालांकि उत्तर भारतीयों को पका कटहल पसंद नहीं आता। गंगा यमुना के दोआबे में तो कबाब, पकौड़ी, कटलेट, अचार और मुरब्बा बनाए जाने की ही जानकारी अपने पास थी पर आश्चर्य तो कुछ दिन पहले हुआ। एक ईटिंग प्वाइंट के मेन्यू में दिखाई पड़ा कटहल हलवा, कटहल केक और कटहल मफिन। सिर्फ इतना ही होता तो गनीमत थी। मेन्यू पलटा तो उसमें थी कटहल कोल्ड कॉफी, कटहल हॉट कॉफी, बर्गर, चाप, पाव भाजी और स्टफ्ड पराठा। कटहल के फ्राई मोमो, स्टीम्ड मोमो और मंचूरियन भी थे। इनोवेशन का जमाना है। खान-पान में भी तरह तरह के नए प्रयोग हो रहे हैं। पर कटहल यानी जैकफ्रूट भी इतना इनोवेटिव हो सकता है, इसका अंदाज नहीं था।
कटहल पसंदीदा है। पराठों के साथ सूखे कटहल के क्या कहने। गांव कस्बों की शादियों में रसीले कटहल का प्रचलन तो हमेशा से ही रहा है। कुछ साल पहले गैंग ऑफ वासेपुर में एक पात्र के कटहल खरीदने पर उसे मारने आया व्यक्ति कहता है, अबे यह तो कटहल खरीद रहा है। फोन पर दूसरा आदमी पूछता है कि कटहल क्या होता है तो जवाब मिलता है, यह ब्राह्मण लोगों का मटन होता है। याद आया कि हम लोगों के घरों में भी कटहल के बारे में ऐसे जिक्र होते थे। इसे शाकाहारियों का नॉनवेज माना जाता रहा है। अब तो अमेरिका में भी जो लोग वीगन हो रहे हैं, उन्हें मांस के विकल्प के तौर पर कटहल के व्यंजन खिलाए जा रहे हैं। उनके रोल, पिज्जा और बर्गर में कटहल की घुसपैठ काफी तेज हो चुकी है। यानी अब यह सिर्फ भारतीय शाकाहारियों का ही नहीं बल्कि हर तरह का एनिमल फैट छोड़ने वाले वीगन लाोगों का आहार भी है। मलेशिया में दो महीने तक जैक फ्रूट यानी कटहल की आइसक्रीम बनाई जाती हैं। भारत में भी अब कृषि विज्ञानी कटहल को उन इलाकों में उगाने की कोशिश कर रहे हैं, जहां अब तक इसके पेड़ नहीं थे। राजस्थान और बुंदेलखंड में कटहल उगाने के नए प्रोजेक्ट जल्द ही शुरू होने की उम्मीद है। जिस तरह से दुनिया भर के लोग सेहतमंद रहने के लिए तेजी से शाकाहारी हो रहे हैं, उसमें कटहल का जलवा बढ़ता दिख रहा है। चलते-चलते कटहल की शान में ग़ुलाम दस्तगीर शरर का यह शेर और बात खत्म कि-
बुरे पहचाने जाते हैं फलों के साथ ही अक्सर
चमन में हों न गर काँटे गुलों को कौन पहचाने

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