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इतिहास के पन्नों से

कालागढ़ में हुए मजदूर आंदोलन के दमन को इतिहास में क्यों नहीं मिली जगह ?

 अशोक मधुप

वर्कचार्ज कॉलोनी में पूरब और बिहार के मजदूर थे। इनके परिवार प्रायः यहां नहीं रहते थे। फायरिंग होने के बाद ये मजदूर पहाड़ों में भाग गए। पहाड़ों में जाने वालों का क्या हुआ, कुछ पता नहीं चला। कितने मरे कितने बचे, किसी ने पता लगाना गंवारा नहीं किया।

देश के विकास की गाथा लिख रहे कालागढ़ उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखंड) के श्रमिकों को 55 साल पूर्व आज ही के दिन पुलिस ने गोली ने छलनी किया था। उन्हें बूटों से कुचला गया था। श्रमिकों के परिवारों पर बर्बर जुल्म हुए थे। इस घटना को कहीं दर्ज नहीं किया गया। कौन मरे? कितने मरे? ये भी आज तक कोई नहीं जानता। कालागढ़ के पुराने लोग सिर्फ इतना ही कहते हैं कि वर्कचार्ज कॉलोनी घायलों और लाशों से पट गई थी। पीएसी ने शवों को ट्रकों में भरकर ले जाकर रामगंगा में बहा दिया। पीएसी के आतंक से भयभीत श्रमिक पहाड़ों पर चढ़ गए। जो पहाड़ों पर चढ़ गए, वे वापस नहीं लौटे। कहा जाता है कि उन्हें जंगली जानवर खा गए। या वहीं भूख−प्यास में एड़ियां रगड़ते मर गए। आंदोलन ठंडा पड़ने पर श्रमिकों ने अपने साथियों की खोज की, तो पहाड़ों में कंकाल मिले।

एशिया के सबसे बड़े मिट्टी के डाम कालागढ़ बांध का निर्माण का काम सन 1961 में शुरू हुआ। 1966 में पूरे जोर−शोर से काम जारी था। देशभर के लगभग दस हजार श्रमिक दिन−रात खून पसीना एक कर विकास का एक नया तीर्थ बना रहे थे। यहां के नियमित कर्मचारियों के वेतन भी अधिक थे। सुविधांए भी ज्यादा। वर्कचार्ज कर्मचारी टेम्परेरी थे। इनके लिए कुछ ही निम्न स्तर के क्वार्टर बने थे। बाकी कोई झोंपड़ी डाल कर रह रहा था, कोई किसी दीवार के सहारे कपड़ा डाले रहता था। पेड़ के नीचे भी श्रमिक पड़े आराम करते रहते थे।
वरिष्ठ पत्रकार और वामपंथी लेखक स्वर्गीय बाबूसिंह चौहान इस पूरे आंदोलन और घटना क्रम के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं। उन्होंने 24 अगस्त 1976 को बिजनौर टाइम्स का रामगंगा विशेषांक छापा। इसमें इन्होंने रामगंगा परियोजना के श्रमिक आंदोलन और कालागढ़ गोलीकांड पर लंबा लेख लिखा।
स्वर्गीय बाबूसिंह के इस परिशिष्ठ के लेख के अनुसार जीने लायक वेतन, सेवा शर्तों में सुधार और कालागढ़ में जीवनोपयोगी सुविधाओं की पूर्ति के लिए श्रमिक 1964 से लामबंद होने शुरू हो गए। अपनी मांगों की ओर ध्यान दिलाने को 31 दिसंबर 1964 को एक दिन की हड़ताल भी की। परियोजना प्रशासन मांग पूरी कम करता, टालता ज्यादा। इस दौरान पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया। देश हित में श्रमिकों ने आंदोलन का रास्ता छोड़ा दिया। वे एशिया के सबसे बड़े डाम को बनाने में पूरे जीजान से लग गए। फरवरी 1966 में त्रुटिपूर्ण होने के कारण एक मशीन दुर्घटनाग्रस्त हो गई। इसके लिए मुहम्मद समी नामक कर्मचारी को उसका पक्ष सुने बिना बर्खास्त कर दिया गया। समी की बहाली और अन्य मांगों को लेकर मजदूर संघ ने एक दिन की हड़ताल की। लेकिन परियोजनाधीश ने उनकी न सुनकर लॉक आउट कर दिया। लगभग पांच हजार श्रमिकों ने इस लॉक आउट के विरुद्ध सांकेतिक हड़ताल शुरू कर दी। कई बार वार्ता हुई। 13 मार्च को वार्ता चल रही थी। वार्तास्थल फील्ड होस्टेल पर हजारों श्रमिक एकत्र थे। शाम वार्ता स्थगित कर दी गई। इस दौरान धारा 144 लगा दी गई। वार्ता से लौटते श्रमिकों के प्रतिनिधिमंडल को धारा 144 तोड़ने का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया। वार्तास्थल से लौटते श्रमिकों को अपने नेताओं की गिरफ्तारी का पता चला। वह नेताओं की रिहाई की मांग को लेकर प्रदर्शन करने लगे। प्रदर्शन करते श्रमिकों पर पुलिस ने पहले अश्रु गैस छोड़ी। फिर लाठीचार्ज किया। बाद में गोली चलाई।
स्वर्गीय चौहान लिखते हैं कि इसमें आठ कर्मचारी गंभीर रूप से घायल हुए। 16 को मामूली चोट आई। 14 मार्च 1966 को लगभग पांच हजार कर्मचारियों ने वार्तास्थल फील्ड होस्टल को घेरे रखा। स्थिति विस्फोटक होते देख बिजनौर से पूर्व विधायक कुंवर सत्यवीर, धामपुर और नगीना के संभ्रांत नागरिक पंहुचे और समझौता कराया। 13 मार्च के गोलीकांड की जांच सहारनपुर के डीएम से कराना तय हुआ। 14 मार्च को श्रमिक काम पर लौट गए।

परियोजना अधिकारियों ने इस समझौते का तो पालन किया ही नहीं। अपितु सितंबर 1966 में 150 श्रमिकों की छंटनी कर दी। आंदोलन और वार्ता चलती रही। समझौते होते किंतु उन्हें लागू नहीं किया जाता। उधर देश में भयंकर महंगाई हो गई। इस मंहगाई को देख केंद्र और राज्य सरकार ने अपने कर्मचारियों के वेतन में भारी वृद्धि कर दी। वर्कचार्ज कर्मचारियों का वेतन 72 रुपये से बढ़ाकर मात्र 80 रुपये ही किया गया। 
विवश होकर वर्कचार्ज श्रमिकों के संगठन मजदूर संघ ने 19 अप्रैल 67 को हड़ताल का नोटिस दे दिया। इस हड़ताल को रोकने के लिए सरकार ने आवश्यक सेवा अनुश्रवण अधिनियम लागू कर हड़ताल पर रोक लगा दी। मजदूरों ने इसके विरोध में दो मई को दो घंटे की सांकेतिक हड़ताल की।
स्वर्गीय बाबू सिंह चौहान कहते हैं कि इस समय प्रदेश में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाली संविद सरकार थी। यह सरकार किसी भी कीमत पर मजदूरों के किसी संघर्ष को सहने को तैयार नहीं थी। मजदूरों ने सरकार के बदले रूख को भांप तीन मई 1967 से पूर्ण हड़ताल कर दी। सरकार ने मजदूरों की एकता को तोड़ने का बहुत प्रयास किया। पर कुछ न हुआ। न मजदूरों की एकता भंग हुई, न ही हड़ताल टूटी। अचानक रूहेलखंड के आयुक्त ने मजदूर संघ के प्रतिनिधिमंडल को वार्ता के लिए 15 मई 67 को लखनऊ बुलाया। इस वार्ता में श्रमिकों की समस्या पर विचार हुआ। श्रमिक नेताओं को आश्वासन दिया गया कि कमेटी गठित कर मांग पर विचार कर बताएंगे। प्रतिनिधिमंडल इस समझौते को लेकर कालागढ़ लौटने को था कि यहां कालागढ़ खून से सराबोर हो गया।
पुराने लोग बताते आए हैं कि 16 मई 1967 को इंजीनियर वगैरह काम पर जाना चाहते थे। हड़ताली वर्कचार्ज कर्मचारी उन्हें रोक रहे थे। इसी पर कुछ विवाद हुआ। स्वर्गीय चौहान साहब के अनुसार बाजार में पुलिस ने श्रमिक कार्यकर्ता रमा राजू के साथ बुरी तरह मारपीट की। अनेक श्रमिकों के साथ अभद्र व्यवहार किया। इससे हड़ताली मजदूरों में रोष फैल गया। पुलिस के कई हजार जवान आंदोलन का कुचलने को तैयार बैठे थे। इधर पुलिस की उत्तेजनात्मक कार्र्वाई चल रही थीं। उधर मजदूरों के नेता लखनऊ में थे। मजबूरन श्रमिक एकत्र होकर पुलिस का विरोध करने लगे।
कालागढ़ के वरिष्ठ पत्रकार विरेंद्र अग्रवाल अपने एक लेख में कहतें हैं कि 16 मई 1967 को गुरुवार का दिन था। पुराना कालागढ़ में साप्ताहिक पैंठ लगी हुई थी। लोग रोजमर्रा की जरूरत के सामान की खरीददारी कर रहे थे। पुलिसबल द्वारा कर्मचारियों की प्रमुख केन्द्र केन्द्रीय कॉलोनी सहित कर्मचारी नेताओं के आवासों की नाकेबंदी शुरू कर दी गई। दोपहर करीब साढ़े बारह बजे आईजी पुलिस और कर्मचारी नेता राजाराम मिश्रा के बीच किसी बात को लेकर झड़प हो गई। आंदोलनकारियों ने नारेबाजी शुरू कर दी। आंदोलनकारीयों को शांत करने के स्थान पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। पुलिस के लाठीचार्ज ने आग में घी का काम किया। आंदोलन हिंसक हो गया। पत्थरों के जवाब में पुलिस ने गोली चलानी शुरू कर दी। स्वर्गीय चौहान साहब कहते हैं कि मजदूरों को पीछे धकेलते पुलिस वर्कचार्ज कॉलोनी के उनके क्वार्टरों में घुंस गई। परिवारों का अपमान किया। लूटमार की। मजदूर अपनी जान बचाने का पहाड़ों में चले गए। कुछ दिन कालागढ़ पुलिस की छावनी बना रहा। वर्कचार्ज कॉलोनी के कवार्टर की बिजली काट दी गई। पानी बंद कर दिया गया। 16 मई को ही घटना के दिन ओमपाल नामक एक युवक अपने रिश्तेदार से मिलने कालागढ़ आया था। पुलिस ने उसे पीट−पीटकर मार डाला। इस मामले में 600 श्रमिक गंभीर रूप से घायल हुए। 288 गिरफ्तार हुए।

स्वर्गीय बाबू सिंह चौहान के अनुसार 17 मई को जब लखनऊ गए श्रमिकों के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री चरण सिंह से मिलना चाहा तो उन्होंने यह कह कर मिलने से मना कर दिया कि मैं कालागढ़ के लोगों से बात नहीं करूंगा, वहां कम्युनिस्ट रहते हैं। वे हमारी सरकार को गिराना चाहते हैं। 26 जून को विधान सभा में स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा ने कालागढ़ कांड को लेकर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव रखा। घटना बताई और मजदूरों के प्रति सहानुभूति बरतने का अनुरोध किया। सरकार ने न मजदूरों की मांगें मानीं, न ही इस गोलीकांड की जांच को तैयार हुई। आंदोलन में भाग लेने वाले अनेक मजदूरों की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। मजदूरों का यह संकट काल चार माह तक चला। मजदूर संघ और पीड़ित श्रमिकों को एटक की ओर से आर्थिक सहायत दी गई। सरकार के शांति बहाल करने के अनुरोध पर 26 सितंबर 1967 को हड़ताल वापस ले ली गई।
   
पत्रकार वीरेंद्र अग्रवाल कहते हैं कि गोलीकांड के बीच भागे श्रमिक नेता कृष्णमूर्ति पाठक ने दर्जन भर से अधिक कर्मचारियों के साथ कालागढ़ की केन्द्रीय कॉलोनी स्थित दुकानदार जयप्रकाश अग्रवाल के पिता कस्बा अफजलगढ़ निवासी प्रसिद्ध वैद्य बांकेलाल के घर शरण ली। एक पखवाड़े के बाद मामला शांत होने पर कालागढ़ वापस लौटे।
गोली कांड की मौत पर खामोशी
इस कांड में कितनी मौत हुईं, कुछ पता नहीं। संभवतः रिकार्ड न होने के कारण चौहान साहब ने उनका जिक्र नहीं किया। कालागढ़ में उस समय कार्यरत रहे व्यक्ति बताते आए हैं कि मरे कितने ये तो पता नहीं, किंतु पीएसी मरने वालों के शव ट्रक में भरकर ले गई। शवों को रामगंगा में बहा दिया। काफी श्रमिक पीएसी के डर से ऊपर पहाड़ो में चले गए। वहां मर−खप गए। पीएसी और पुलिस का तांडव कई माह चला। वार्ता में लखनऊ गए नेता तो बच गए। कालागढ़ में मौजूद नेता फरार हो गए। उनका क्या हुआ, पता नहीं चला। झालू के होराम सिंह निर्भय यहां से भागकर पहाड़ों में चले गए। कई साल बाद पता चला कि वह उत्तरकाशी के एक मंदिर में पुजारी बन कर रह रहे हैं। बिजनौर के बिजली विभाग से सेवानिवृत चौधरी बिजेंद्र सिंह बताते हैं कि वह घटना के दो साल बाद कालागढ़ में नियुक्त हुए। लोगों ने बताया कि पुलिस ने  इस घटना के लिए श्रमिक नेता राजाराम मिश्रा को जिम्मेदार माना। पुलिस इन्हें पकड़कर सबक सिखाना चाहती थी। ये कालागढ़ से बुर्का पहनकर फरार हुए थे। कालागढ़ में लंबे समय तक इनके प्रवेश पर रोक लगी रही। बाद में ये बिजली विभाग के कमर्चारियों के बाद में प्रदेश के बड़े नेता बने। श्रमिकों के दूसरे नेता बीजी प्रकाशम कालागढ़ परियोजना पूरी होने पर अपने आंध्र प्रदेश वापस लौट गए। वहां ये प्रदेश सरकार में मंत्री रहे। संभल के रहने वाले मुकीमुर्रहमान ठाकुरद्वारा से एमएलए बने। 1969 में मध्यावधि चुनाव हुए। कमलापति त्रिपाठी मुख्यमंत्री बने। 22 अगस्त 1969 को वे कालागढ़ आए। उन्होंने श्रमिकों की सभी मांग स्वीकार कर लीं। किंतु इस गोलीकांड की जांच कराना किसी ने गंवारा नहीं किया। और यह कांड राजनीति के अंधेरे में गुम हो गया।
कितने मरे, कुछ पता नहीं
वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय बाबू सिंह चौहान पुलिस पिटाई से एक व्यक्ति के मरने और 600 के गंभीर घायल होने की बात कहते हैं। छह सौ गंभीर घायल में कितने मरे, कितने बचे इसका कहीं जिक्र नहीं। कालागढ़ में उस समय शिक्षक रहे केएन सिंह बताते हैं कि उस समय पीएसी ने वर्कचार्ज कॉलोनी में घुसकर जमकर लाठी चार्ज किया। इसमें लगभग सात सौ लोग घायल हुए। एक दर्जन से अधिक लोग मरे। जिंदा बचे भागकर पहाड़ों में चले गए। मरने वालों के शवों का कुछ पता नहीं चला।
चौधरी बिजेंद्र सिंह बताते हैं कि वर्कचार्ज कॉलोनी में पूरब और बिहार के मजदूर थे। इनके परिवार प्रायः यहां नहीं रहते थे। फायरिंग होने के बाद ये मजदूर पहाड़ों में भाग गए। पहाड़ों में जाने वालों का क्या हुआ, कुछ पता नहीं चला। कितने मरे कितने बचे, किसी ने पता लगाना गंवारा नहीं किया। कालागढ़ के पत्रकार वीरेंद्र अग्रवाल के पिता स्वर्गीय जगदीश अग्रवाल और कुछ ही समय पहले स्वर्गवासी हुए पहलवान परशुराम के मस्तिष्क से आखिर तक तक ये घटना नहीं निकली। दोनों कहते थे मरने वालों के शव ट्रकों में भरकर राम गंगा में फेंक दिए गए। बाकी पहाड़ों में भाग गए। किसी ने मरने और पहाड़ों में जाने वालों का पता करना गवांरा नहीं किया। इस कांड में एक हजार से ज्यादा घायल हुए। 600 तो गंभीर घायल ही थे। श्रमिकों को कुचलने पर तुले प्रशासन ने इनके उपचार पर भी ध्यान नहीं दिया। इतने घायलों की तो पूरे मंडल में उस समय उपचार की व्यवस्था नहीं थी। इनमें कितने मरे, इसका भी कहीं कोई हिसाब नहीं रहा। वे खुद गरीब थे, इलाज क्या हुआ होगा, ये अंदाज किया जा सकता है। पत्रकार वीरेंद्र अग्रवाल लेख में कहते हैं कि पुलिसिया तांडव के चलते जान बचाने के लिए आन्दोलनकारी केन्द्रीय कॉलोनी के पीछे पहाड़ों पर चढ़ गए। भारी संख्या में भूखे-प्यासे आंदोलकारियों की जंगल में मौत हो गई। इसके बाद लापता आंदोलनकारी कर्मचारियों को ढूंढ़ना शुरू किया। पुराने वृद्ध लोगों द्वारा बताया जाता था कि खोज में जंगलों में काफी मानव कंकाल पड़े मिले थे।

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