क्या अम्बेडकरनगर नगर में भी स्कूलों प्रबन्धन की मनमानी पर लग सकेगा नियंत्रण?

कान्वेण्ट स्कूलों के प्रबन्धतंत्र होशियार! शोषण के विरूद्ध अभिभावक जा सकते हैं अदालत

अम्बेडकरनगर। दिनों-दिन बढ़ती महंगाई, प्राकृतिक आपदाओं से त्रस्त आम आदमी, साथ ही अनेकानेक समस्याओं से घिरा हर आम-खास ऐसे में कुकुरमुत्तों की मानिन्द फैले निजी कान्वेण्ट स्कूलों के प्रबन्धतन्त्रों द्वारा हर सत्र में बढ़ाई जा रही फीस, बदले जा रहे ड्रेस और किताबों से अभिभावकों की डगमगाती अर्थव्यवस्था। कहाँ से आये पैसे, कैसे पढ़ाये जाएँ नौनिहाल… आदि चिन्ताओं से घिरा अभिभावक। ऐसे हालात मात्र यहीं नहीं हैं अपितु इसका संक्रमण देश के हर प्रान्त एवं जनपदों में है, जहाँ हिन्दी, इंग्लिश मीडियम स्कूलों द्वारा मनमानी करके प्रतिमाह फीस वसूली जाती है, और हर सत्र में ड्रेस व किताबें बदलकर अप्रत्याशित ढंग से फीस भी बढ़ाई जाती है, जिससे अभिभावकों का मानसिक संतुलन बिगड़ने के साथ-साथ महंगाई के बोझ तले दबकर उनकी कमर टूटने लगी है।

ऐसा इसलिए होता है कि इसमें अच्छी कमीशनखोरी का सुअवसर मिलता है, जिसके चलते विद्यालय एवं उसके अनुसार कॉपी, किताब व ड्रेस की बिक्री करने वाले प्रतिष्ठानों की साठ-गाँठ से उभय पक्ष मालामाल होते हैं, जबकि अभिभावक कंगाल। अम्बेडकरनगर जिले की सभी पाँचों तहसीलों में कुकुरमुत्ते की तरह खुले कान्वेण्ट टाइप के स्कूलों द्वारा अभिभावकों का हर तरह से शोषण किया जा रहा है। आर्थिक व मानसिक शोषण से त्रस्त्र लोग अपनी मजबूरी किससे बांटे यह बात उनके समझ में ही नहीं आ रही है। क्या जिला प्रशासन अथवा शिक्षा विभाग निजी स्कूलों की इस तरह की निरंकुशता पर नियंत्रण लगा पाएगा? अथवा अभिभावकों को इन्दौर-मध्यप्रदेश की तरह अपने निजी स्कूलों द्वारा किए जा रहे हर तरह के शोषण के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा।

यहाँ बताना जरूरी है कि अम्बेडकरनगर के जिला मुख्यालयी शहर अकबरपुर व शहजादपुर में कान्वेण्ट स्कूलों की भरमार है, जिसमें दो-चार को छोड़कर शेष सभी हालिया स्थापित/संचालित हैं। अकबरपुर में संचालित मिशनरी के दो स्कूलों में आपसी प्रतिस्पर्धा होने की वजह से इसका खामियाजा आए दिन अभिभावकों को अपनी जेबें ढीली करके भुगतना पड़ता है। अब नया सत्र प्रारम्भ हो चुका है। बच्चों का वार्षिक परीक्षाफल भी आ चुका है। ग्रीष्मकालीन अवकाश होने के पूर्व बच्चों ने अपने-अपने अभिभावकों को इस बात की सूचना दे दिया है कि आने वाली जुलाई से ड्रेस बदले जाएँगे साथ ही फीस भी बढ़ाई जाएगी। जिससे अभिभावकों का बजट गड़बड़ाने से उनकी मानसिक स्थिति बिगड़ने होने लगी है।

चूँकि इसके पूर्व बच्चों के प्रवेश शुल्क, प्रतिमाह की फीस अदा कर नवीन सत्र के उपयोगार्थ पुस्तकें, स्टेशनरी आदि खरीदकर अभिभावक अपनी जेबें ढीली कर चुका है, उस पर ड्रेस बदलने व फीस में बढ़ोत्तरी की जानकारी से उसका अवसादग्रस्त होना लाजिमी है। इन्दौर-मध्यप्रदेश से ‘‘ड्रेस, कॉपी, किताबों के सम्बन्ध में नहीं चलेगी स्कूलों की मनमानी’’ शीर्षक से प्रकाशित एक समाचार ने अम्बेडकरनगर जिले के स्कूली शोषण से पीड़ित लोगों में नई आस जगा दी है। उक्त संवाद से यहाँ के लोगों को जानकारी प्राप्त हुई है कि न्यायालय ही एक मात्र विकल्प है जो उन्हें स्कूली प्रबन्धतंत्र द्वारा किए जा रहे शोषण से मुक्ति दिला सकता है। हम यहाँ उक्त संवाद को हुबहू प्रकाशित कर रहे हैं।

रीता विश्‍वकर्मा

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