सम्पादक जी! छूंछ पैलगी जिव झन्न…

Bhupendra Singh Gargvanshi-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

मेरा आलेख आप अपने लोकप्रिय समाचार-पत्रों में प्रकाशित करते रहते हैं, देखता-पढ़ता हूँ, बड़ा आनन्द मिलता है। कभी-कभार मेरी फोटो भी छाप दिया करें, तब इस उम्र में जीने की चाहत और भी बढ़ जाएगी। जवानी की फोटो तो तत्समय के पाठकों ने देखा है, वर्तमान के लिए आपकी मेहरबानी चाहिए। डियर एडिटर सर- आप को बैठे बिठाए मुझ जैसा पृष्ठ पोषक फ्री-फोकट में मिल जाता है। हाँ जी मुझे अच्छी तरह मालूम है कि जितने भी लेखक/समीक्षक हैं वह अपना नाम और प्रकाशित आलेख देख/पढ़कर खुश हो जाते होंगे। लेकिन एक मैं ही हूँ, जिसे आप से ढेर सारी अपेक्षाएँ हैं।
आप का मूड अपसेट भी हो सकता है मेरे द्वारा प्रेषित आलेखों का प्रकाशन ठप्प करवा सकते हैं, मैं क्यों बुरा मानूँ, यह तो आप का अधिकार है। आप अपना काम करें और मैं बतौर कलमघसीट अपना। आप के बारे में बहुत सुनता हूँ, कि आप विद्वान व्यक्ति हैं, स्वाभिमानी हैं। आप की गणना धाकड़ सम्पादकों में की जाती है। यही सब सुनकर मुझे यह आस बँधी है कि चार दशक के लेखन काल में अब मेरे भी अच्छे दिन आने वाले हैं। मेरा आलेख मेरी फोटो के साथ प्रकाशित होगी, साथ ही आप द्वारा निर्धारित नीति के तहत मुझे पारिश्रमिक भी मिल सकता है, ऐसी स्थिति में मैं यह नहीं कहूँगा कि सम्पादक जी! छूंछ पैलगी जिव झन्न।
हे धाकड़, स्वाभिमानी, निडर, निर्भीक, निष्पक्ष सम्पादक मेरी जाति पर मत जाना। जातिवाद से ऊपर उठकर बस इतना समझो कि मैं एक पत्रकार/मीडिया परसन हूँ यही मेरी जाति है। यदि ऐसा सोचोगे तो मुझे अपना स्वजातीय ही मानोगे। कृपा कर कुछ उल्टा-सीधा अर्थ मत लगाना। मैं वही हूँ जो तुम हो। मैं ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र नहीं मैं तो एक कलमकार हूँ। तुम भी एक कलमकार ही हो मेरे स्वजातीय। रहम करो, भेदभाव मत रखो।
समाचार-पत्र के सम्पादकीय पृष्ठ पर मेरे आलेखों को स्थान देने से कम से कम एक प्रति का ग्राहक तो बढ़ेगा, वह मैं स्वयं हूँगा। वैसे वर्तमान के पाठक सम्पादकीय पृष्ठ बहुत कम ही देखते हैं। इन्हें कथित विद्वानों के चिन्तन, समीक्षात्मक लेखों के प्रति कम ही रूचि होती है। व्यंग्यादि लेख बड़ी रोचकता से पढ़े जाते हैं। हालाँकि मेरा लेखन किस स्तर का है, इसे या तो पाठक या फिर आप ही समझ सकते हैं। असली-आलोचक/विश्लेषक तो पाठक ही होता है। बुरा न मानें चूँकि आप सम्पादक हैं, तो छापने के पहले आप का नजरिया भी जरूरी है।
मैं और मेरे जैसे अन्य भाई/बिरादर यदि पाठकों की अभिरूचि का ध्यान नहीं देंगे तो समझिए कि किसी भी प्रकाशन का बेड़ा गर्क हो सकता है। क्लिष्ट भाषा और शैली में लिखे आलेखों को पढ़ने का समय किसी के पास नहीं है। तनावभरी जिन्दगी में पाठकगण सीधा सरल भाषा में लिखा हल्का-फुल्का आलेख जिस के पढ़ने के लिए मस्तिष्क पर ज्यादा बोझ/दबाव न डालना पड़े वही पसन्द करते हैं। बड़े-बड़े कथित नामचीन लेखकों के दिन लद चुके हैं। मीडिया/समाचार-पत्रों में यदि क्लिष्ट भाषा शैली का प्रयोग करके लेखकगण अपनी विद्वता प्रदर्शित करने का मोह नहीं छोड़ेंगे, तब तो समझिए कि वह लोग अनर्थ कर रहे हैं, जिसे क्लिष्ट भाषा शैली पढ़नी होगी, वह अखबार न पढ़कर हिन्दी के प्राचीन लेखकों को पढ़ेगा।

जी नहीं मैं कोई नसीहत नहीं दे रहा, आपसे आशा/प्रत्याशा की चर्चा करते हुए विषयान्तर करने की गलती नहीं करूँगा। मैं तो मात्र इतना ही कहूँगा कि आप के प्रकाशन का पोषण मैं बहैसियत एक कलमकार करूँगा और आप से अपेक्षा करता हूँ कि उसके एवज में कुछ मुझे भी प्रदान करें ताकि लेखन के क्षेत्र में जीवित रहकर पाठकों और आपकां खुश रख सकूँ। आप बोर हों और मुझसे कुपित हो जाएँ ऐसा कदापि नहीं चाहता हूँ। यह समझिए कि हम दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों हाथों से ही ताली बजती है। तालियाँ बजती रहें इसके लिए दोनों हाथों को एक्टिव होना पड़ेगा।

मानव हूँ, भोजन तो करूँगा ही- ऐसा न कर पाने की स्थिति में प्राणहीन हो जाऊँगा। सम्पादक एक संवेदनशील प्राणी माना जाता है। आप में सभी गुण हैं। आप के प्रकाशन से सम्बद्ध मुझ जैसों की समस्या एक सी हो सकती है, परन्तु मेरे बारे में विस्तृत जानकारी करने पर आप को हकीकत पता चल जाएगी कि मेरा कथन कितना सत्य और असत्य है। मैंने महसूस किया है कि लाखों रूपए प्रतिमाह कमाने वाले शौकिया लेखन कार्य कर रहे हैं। इसके पीछे उनकी मंशा सुस्पष्ट है कि शोहरत अर्जित करें- मैं तो खाँटी कलमकार हूँ, जिसे आप जैसों की कृपादृष्टि ही स्वस्थ और जीवित रख पाएगी। सर्वे कर डालिए आपके प्रकाशन में छपने वाले लोग कितने अमीर-गरीब हैं (आर्थिक रूप से)?

हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या? आप को यह सब बताने की आवश्यकता नहीं है। आप तो सर्वज्ञाता हैं। यह नवनीत लेपन नहीं, अपितु एक तंगहाल तंगदस्ती का शिकार कलमकार की व्यथा-कथा है। आप ने अपने पुरूषार्थ से आज यह मुकाम हासिल किया है, जिसके कायल हम सभी हैं। मेरे कहने का लब्बो-लुआब यह कि थोड़ा रहमदिल होकर मुझे भी अर्थ का स्वाद चखवाइए ताकि मेरा कलमघिसना व्यर्थ न जाए। 40 साल फ्री-फोकट में बहुत घिस डाला कलम। अब चाहता हूँ कि लिखने/छापने की एवज में आप जैसा रहमदिल कुछ ही सही पर मेरे हाथ पर जरूर रखे ताकि मैं कुछ दिन और जीकर कलम घिस सकूँ। प्रतीक्षा में………….

(लेखक रेनबोन्यूज डॉट इन में प्रबन्ध सम्पादक  हैं)

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