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पर्यावरण

जल संकट के लिए मनुष्य स्वयं उत्तरदायी है,

अभी नहीं संभले तो हालात विकट होंगे

 डॉ. सौरभ मालवीय

प्राचीन काल में जल संरक्षण पर विशेष बल दिया जाता था। तालाब बनाए जाते थे एवं कुएं खोदे जाते थे। वर्षा का जल तालाबों आदि में एकत्रित हो जाता था। इन तालाबों से मनुष्य ही नहीं, जीव-जंतु भी लाभान्वित होते थे।

मनुष्य का शरीर पंचभूत से निर्मित है। पंचभूत में पांच तत्त्व आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी सम्मिलित हैं। सभी प्राणियों के लिए जल अति आवश्यक है। प्रत्येक प्राणी को जीवित रहने के लिए जल चाहिए। नि:संदेह जल ही जीवन है। जल के बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। जल के पश्चात मनुष्य को जीवित रहने के भोजन चाहिए। भोजन के लिए अन्न, फल एवं सब्जियां उगाने के लिए भी जल की ही आवश्यकता होती है। कृषकों को अपनी फसल की सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता है। पर्याप्त वर्षा न होने पर उनकी फसल सूख जाती है। अधिकांश क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पर वर्षा नाममात्र की ही होती है। जलवायु परिवर्तन एवं जल के अत्यधिक दोहन के कारण भू-जल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। इस गिरते भू-जल स्तर के कारण सिंचाई जल संकट उत्पन्न हो गया है। इसके अतिरिक्त जिन क्षेत्रों में जल की आपूर्ति नहीं है अथवा जल की पर्याप्त आपूर्ति नहीं है, वहां के निवासी भी पेयजल के लिए संकट में रह रहे हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों में जल संकट बना हुआ है।

वास्तव में इस जल संकट के लिए मनुष्य स्वयं उत्तरदायी है। प्राचीन काल में लोग प्राकृतिक वस्तुओं का उतना ही उपयोग करते थे, जितनी उनकी आवश्यकता होती है। भारतीय संस्कृति के अनुसार ईश्वर कण-कण में विद्यमान है। इसलिए प्रत्येक वस्तु में भगवान का वास माना जाता है। हमारी प्राचीन गौरवमयी संस्कृति में जल को जीवन माना गया है-

जलमेव जीवनम्।
ऋग्वेद में भी जल के गुणों का वर्णन करते हुए कहा गया है-
अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेषजम्।। 
अर्थात जल में अमृत है, जल में औषधि है।
महाभारत में भी जल के महत्त्व का वर्णन करते हुए इसे सर्वोत्तम दान कहा गया है-
अद्भिः सर्वाणि भूतानि जीवन्ति प्रभवन्ति च।
तस्मात् सर्वेषु दानेषु तयोदानं विशिष्यते।।
अर्थात संसार के समस्त प्राणियों की उत्पत्ति जल से हुई है तथा इसी से वे जीवित रहते हैं। अत: सभी प्रकार के दानों में जल-दान सर्वोत्तम माना गया है। महाभारत में यह भी कहा गया है-
पानीयं परमं लोके जीवानां जीवनं समृतम्।
पानीयस्य प्रदानेन तृप्तिर्भवति पाण्डव।
पानीयस्य गुणा दिव्याः परलोके गुणावहाः।। 
अर्थात जल से ही संसार के समस्त प्राणियों को जीवन प्राप्त होता है। जल का दान करने से प्राणियों को तृप्ति प्राप्त होती है। जल में दिव्य गुण हैं, जो परलोक में भी लाभ प्रदान करते हैं। 
विष्णु पुराण में जल-चक्र का वर्णन किया गया है कि किस प्रकार वह वाष्प बनता है तथा वर्षा के रूप में भूमि को तृप्त करता है। इसी जल से कृषि होती है अर्थात अन्न उत्पन्न होता है-
विवस्वानर्ष्टाभर्मासैरादायापां रसात्मिकाः।
वर्षत्युम्बु ततश्चान्नमन्नादर्प्याखिल जगत्।  
अर्थात सूर्य आठ मास तक अपनी किरणों से रस स्वरूप जल को ग्रहण करता है। तत्पश्चात चार मास में उसे वर्षा के माध्यम से बरसा देता है। इससे अन्न उत्पन्न होता है, जिससे संपूर्ण जगत का पोषण होता है।
वर्षा का जल अत्यंत उपयोगी है। अर्थवेद में भी इस विषय में कहा गया है- 
शिवा नः सन्तु वार्षिकीः।
अर्थात वर्षा का जल कल्याणकारी है।
प्राचीन ग्रन्थों में जल संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है। ऋग्वेद के अनुसार- 
अप्स्वडन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये देवा भक्त वाजिनः।
अर्थात अमृत के समान एवं गुणकारी जल का उचित उपयोग करने वाले बनो। जल की प्रशंसा के लिए सदैव तत्पर रहो।   
प्राचीन काल में जल संरक्षण पर विशेष बल दिया जाता था। तालाब बनाए जाते थे एवं कुएं खोदे जाते थे। वर्षा का जल तालाबों आदि में एकत्रित हो जाता था। इन तालाबों से मनुष्य ही नहीं, जीव-जंतु भी लाभान्वित होते थे।

किन्तु कालांतर में प्राकृतिक एवं मनुष्य निर्मित जल स्रोत समाप्त होते जा रहे हैं। ऋग्वेद में जल संरक्षण के विषय में यह भी कहा गया है-
आपो अस्मान्मातरः शुन्ध्यन्तु द्यृतेन ना द्यृत्प्वः पुनन्तु।
अर्थात जल हमारी माता के समान है। जल घृत के समान हमें शक्तिशाली एवं उत्तम बनाता है। इस प्रकार का जल जहां कहीं भी हो, उसका संरक्षण करना चाहिए।  
जल संकट के लिए प्रदूषण भी उत्तरदायी है, क्योंकि प्रदूषण के कारण जल अनुपयोगी हो जाता है। वह पीने योग्य नहीं रहता। अत: हमें जल को प्रदूषित होने से बचाना चाहिए। यजुर्वेद में भी जल संरक्षण पर बल दिया गया है-
मा आपो हिंसी। अर्थात जल को नष्ट मत करो।
देश में नदियों की का अभाव नहीं है, परन्तु प्रदूषण के कारण उनका जल पीने योग्य नहीं है। स्थिति इतनी गंभीर है कि कारखानों से निकलने वाले घातक रसायनों एवं सीवर की गंदगी के कारण नदियों का पानी विषैला हो गया है। 
भारतीय संस्कृति में गंगा को पवित्र नदी माना जाता है। इसे मोक्षदायिनी भी कहा जाता है। किन्तु दुख की बात यह है कि सबके पाप धोने वाली यह पवित्र नदी दिन-प्रतिदिन प्रदूषित होती जा रही है। नदियों में शव बहाने से भी यह प्रदूषित हो रही है। इस नदी को साफ करने के लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर प्रयास होते रहते हैं। समय-समय पर कई कार्यक्रम और योजनाएं भी चलाई गईं ऐसे कार्यक्रमों में समाज जीवन से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को लोकमंगल के कार्य में सहयोगी होने की आवश्यकता है।
भारतीय संस्कृति में जल को देवता माना गया है। अत: विभिन्न मांगलिक अवसरों पर जल की पूजा की जाती है अर्थात कुआं पूजन किया जाता है। महिलाएं गीत गाती हुई कुआं पूजने जाती हैं। महानगरों में अब कुएं नहीं हैं। अत: महानगरों से यह परम्परा भी समाप्त हो रही है। गांवों में अभी कुआं पूजन की परम्परा जीवित है। भारतीय संस्कृति में नदियों को देवी स्वरूप माना गया है। नदियों के तट पर धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
नदी, तालाब एवं कुएं आदि अथाह जल के स्रोत हैं। ये अमूल्य हैं। हमें इनका संरक्षण करना चाहिए। यदि वर्षा के जल को तालाबों आदि में एकत्रित किया जाए, तो जल संकट से उबरा जा सकता है। इसके साथ ही हमें जल को व्यर्थ न बहाकर इसका सदुपयोग करना चाहिए।

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