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सत्याग्रह के प्रथम पथिक ‘पथिक’ ही हो सकते थे यहां,
भला उनके समान वीर योद्धा हमको मिलता है कहां ?
जब तक जिये संसार में सम्मान पूर्वक ही जिए,
सर्वत्र ‘विजय’ ही मिली, कदम रख दिए थे जहां।।

विजयसिंह ‘पथिक’ भारतीय स्वाधीनता संग्राम के काल में सत्याग्रह का सबसे पहले प्रयोग करने वाले सफल राजनेता थे। उन्हीं के विचारों से प्रेरित होकर आगे चलकर गांधी जी ने इसी सत्याग्रह को अपना राजनीतिक हथियार बनाकर काम किया।   वीरता और देशभक्ति की भावना विजय सिंह ‘पथिक’ जी के जीवन में कूट-कूटकर भरी हुई थी। अपनी निराली देशभक्ति और निराले व्यक्तित्व के कारण वह गांधीजी के भी आदर्श और प्रेरणा स्रोत रहे।
  होली के दूसरे दिन अर्थात दुल्हेंडी को 27 फरवरी, 1884 को उनका जन्म उत्तर प्रदेश के गुलावठी शहर के एक गांव गुठावली कलां में हुआ था। उनका बचपन का नाम भूप सिंह था। यही भूपसिंह आगे चलकर विजय सिंह ‘पथिक’ के नाम से विख्यात हुआ ।
    उनके दादा इन्द्रसिंह बुलन्दशहर स्थित मालागढ़ रियासत के दीवान (प्रधानमंत्री) रहे थे। इंद्रसिंह एक बहादुर योद्धा थे, जिन्होंने 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की थी। उनकी वीरगति और बलिदान की भावना परिवार के ही नहीं बल्कि संपूर्ण समाज के लिए गर्व और गौरव का विषय थी, जिसका अनुकरण करना हर किसी के लिए संभव नहीं होता। अपने पिता का अनुकरण करते हुए पथिक जी के पिता हमीर सिंह गुर्जर भी क्रान्ति में भाग लेने वाले सक्रिय क्रांतिकारी कार्यकर्ता रहे थे। जिसके चलते ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार भी किया था। पथिक जी पर उनकी माँ कमल कुमारी का भी बहुत अधिक प्रभाव पड़ा था क्योंकि वह भी क्रांतिकारी विचारों की महान महिला थीं। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि पथिक जी के परिवार की लगातार तीन पीढ़ियों ने देश भक्ति के झंडे गढ़ने में ऐतिहासिक काम किया।

क्रांतिकारी बन गए थे आग का गोला

जहां चाह होती है वहां राह अपने आप बन जाती है। जब भीतर की प्रतिभा किसी व्यक्ति को किसी क्षेत्र विशेष में उतरकर क्रांति मचाने के लिए प्रेरित करती है तो उसे अपने जैसे लोगों की आवश्यकता पड़ती है। जिनकी खोज में वह निकल पड़ता है। उस समय के भूप सिंह अर्थात विजयसिंह ‘पथिक’ भी जब अपनी किशोरावस्था को पार कर रहे थे तो उनके भीतर की प्रतिभा उन्हें देश के लिए कुछ कर गुजरने के लिए प्रेरित कर रही थी। उनकी नजरें किसी ऐसे हीरे को खोज रही थीं जो उनकी योजनाओं में उनका साथी हो सके। उनकी प्रतिभा जिस प्रकार परवान चढ़ती जा रही थी उसमें पारिवारिक पृष्ठभूमि का बहुत बड़ा योगदान था ।उनके रक्त में देशभक्ति और बलिदान की भावना प्रवाहित हो रही थी, जो उन्हें देश के लिए समर्पित होकर काम करने की प्रेरणा दे रही थी।

प्रतिभा चढ़ने लगी ‘पथिक’ की परवान।
बलिदानी परिवार भी था उनकी पहचान।।

      अपनी इसी खोज के अनुक्रम में 1905 में ‘पथिक’ जी प्रसिद्ध क्रांतिकारी देशभक्त शचीन्द्र नाथ सान्याल के सम्पर्क में आये। उस समय क्रांतिकारियों के तार एक दूसरे से जब जुड़ जाते थे तो वे एक दूसरे के लिए भाई से बढ़कर सहयोग करने की भावना रखते थे। एक-दूसरे पर अटूट विश्वास करते थे और यदि किसी एक को कहीं कांटा भी चुभ जाए तो उसके लिए वे सारी सुविधाएं उपलब्ध कराते थे जिन्हें परिजन भी नहीं करा सकते।
  विजय सिंह ‘पथिक’ जी के भीतर देश भक्ति और क्रांति की ज्वाला को देखकर शचिंद्र नाथ सान्याल ने उन्हें रासबिहारी बोस से मिलाया। पथिक जी ने अपने कई क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध कई कार्यवाहियों को पूर्ण किया। अंग्रेजों के विरुद्ध उस समय क्रांतिकारी गतिविधियों को करना अपने आपको आग के सुपुर्द करने जैसा होता था। परंतु हमारे क्रांतिकारी तो क्रांतिकारी ही थे। उन्हें आनंद ही आग के साथ खेलने में आता था। वह आग को चाटते थे, आग को ही खाते थे और आग को ही पानी के स्थान पर पीने में प्रयोग करते थे। वह आग का गोला बन चुके थे, जिसे देखकर अंग्रेज आगे-आगे भागते थे।

आग चाटना चाव था फैला दी थी आग।
व्यवहार ऐसा देखकर गए फिरंगी भाग।।

    विजय सिंह ‘पथिक’ भी अब आग का गोला बन चुके थे वैसे तो वह जन्मजात ही आग का गोला थे । जब इस आग के गोले को अपना अस्तित्व दिखाने का अवसर उपलब्ध हुआ तो अपनी पूर्ण प्रतिभा के साथ उसने तत्कालीन संसार के लोगों का ध्यान आकृष्ट करने का कार्य आरंभ किया।      वर्ष1912 में अंग्रेज दिल्ली को अपने भारतीय साम्राज्य की राजधानी बनाने के कार्यक्रम में व्यस्त थे। नई राजधानी के उद्घाटन के लिए ब्रिटेन से तत्कालीन राजा को बुलाया गया था। जहां-जहां भी अंग्रेजों का वर्चस्व था, वहां-वहां पर इस भव्य कार्यक्रम की तैयारियां बड़े उत्साह के साथ की जा रही थीं। राजा की सुरक्षा व्यवस्था इस प्रकार की की गई थी कि कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता था।
  भारतवर्ष के सभी राजे-रजवाड़े उस कार्यक्रम में आमंत्रित किए गए थे। चित्तौड़ के महाराणा को छोड़कर देश के सभी राजाओं ने ब्रिटिश राजा के लिए सिर झुका कर बैठने में उस समय आनंद की अनुभूति की थी। कुल मिलाकर अंग्रेजों ने इस कार्यक्रम को इस प्रकार आयोजित करने का प्रयास किया था कि उनका राजा यहां से ऐसा संदेश लेकर जाए कि सारा भारतवर्ष उसका गुणगान कर रहा है। ब्रिटेन के राजा की भव्य आरती उतारते हुए ब्रिटिश राज भक्त संस्था कांग्रेस ने भी उस समय ‘जन-गण-मन अधिनायक जय हे …’ गीत विशेष रूप से तैयार करवाया था और उसे बड़ी श्रद्धा के साथ  सिर झुकाकर गाया था।

क्रांतिकारियों ने लिया सही निर्णय

   जिस समय ब्रिटिश राजा जॉर्ज पंचम के लिए चारों ओर ऐसा परिवेश बनाया जा रहा था, उसी समय हमारे क्रांतिकारी नेता विजय सिंह पथिक जी और उनके साथी राजा को यह आभास कराने की योजनाओं में व्यस्त थे कि भारत ना तो पराधीन रहा है और ना पराधीन है,  वह पराधीनता को कभी स्वीकार नहीं कर सकता।ऐसे में यदि भारतवर्ष की भूमि पर आप आए हो तो भारत के एक अतिथि तो हो सकते हो परंतु भारत के शासक नहीं हो सकते। एक उपनिवेशवादी राजा के रूप में भारत आपका पुरजोर विरोध करता है।

अतिथि हो तुम देश के शासक नहीं हो सकते कभी,
सचमुच, भागना तुमको पड़ेगा छोड़ भारत को कभी।
विरोधी रहा भारत सदा दुराचार और आतंक का,
नाश निश्चय जानिए, नहीं चैन मिल सकता कभी।।

वास्तव में उस समय इस प्रकार की योजनाओं को बनाना भारत के पराक्रम का प्रदर्शन करने के समान था। इसके साथ ही साथ भारत के उन आलसी, अकर्मण्य और देशभक्ति की भावना से कोसों दूर खड़े राजे रजवाड़ों को भी संकेत व संदेश देना इसका उद्देश्य था जो उस समय ब्रिटिश राजा के सामने सिर झुकाए खड़े थे। इसके अतिरिक्त ब्रिटिश राजा को यह बताना भी आवश्यक हो गया था कि कांग्रेस भारत की प्रतिनिधि संस्था नहीं है, ना ही कांग्रेस की ब्रिटिश राज-भक्ति भारत की परंपरा का कोई अंग है। भारत की परंपरा उपनिवेशवाद का विरोध है। भारत की परंपरा अधिनायकवाद का विरोध है। भारत की परंपरा अत्याचार का विरोध है और उस परंपरा के वास्तविक उत्तराधिकारी हम हैं।
    अपने इसी उद्देश्य को दृष्टिगत रखते हुए विजय सिंह पथिक जी और उनके क्रांतिकारी साथियों ने उद्घाटन समारोह में वायसराय के जुलूस पर चांदनी चौक में बम फेंका। इस कर्यवाही में पथिक जी की भूमिका बहुत ही सराहनीय और महत्वपूर्ण रही थी। वे अंग्रेजों की चाटुकारिता के विरोधी थे । स्वाभिमानी भारत के निर्माण के लिए कृत संकल्प विजय सिंह ‘पथिक’ किसी भी दृष्टिकोण से अंग्रेजों को यह आभास नहीं होने देना चाहते थे कि भारत उनका गुलाम है। इसके विपरीत वह बता देना चाहते थे कि भारत एक स्वाभिमानी देश है । जिसके अभिमानी – स्वाभिमानी पुत्र के रूप में हमारा यह कर्तव्य है कि हम किसी विदेशी शासक की सत्ता स्वीकार ना करें।

सशस्त्र क्रांति के समर्थक ‘पथिक’ जी

पथिक जी सशस्त्र क्रांति के समर्थक थे और देश को सशस्त्र क्रांति के माध्यम से ही आजाद कराने की कल्पना और सपनों में खोए रहते थे। वह जिस समाज में वे पैदा हुए थे उस समाज की वंश परंपरा भी उन्हें अंग्रेजों और क्रूर तानाशाही के विरुद्ध हथियार उठाने के लिए प्रेरित करती रही थी। यही कारण था कि विजय सिंह पथिक जी को देश को आजाद कराने की निरंतर चिंता सताती रहती थी। फलस्वरूप उन्होंने 1914 में रासबिहारी बोस और शचीन्द्र नाथ सान्याल के साथ सम्पूर्ण भारत में एक साथ सशस्त्र क्रांति के लिए ’अभिनव भारत समिति’ नाम का संगठन बनाया।

हथियार उठा लो हाथ में गोला और बारूद।
दुश्मन का करो अंत भी लिए हाथ बंदूक।।

  इस समिति के कार्य, उद्देश्य और योजना पर यदि विस्तृत चिंतन किया जाए तो पूरी एक पुस्तक बन सकती है । यद्यपि पथिक जी और उनके साथियों के ऐसे सभी प्रयासों पर गांधीवादी इतिहास ने पानी फेर दिया है। इस संगठन में एक प्रमुख नेता के रूप में रहकर उन्होंने राजस्थान में विशेष भूमिका का निर्वाह किया। उन्होंने अपने उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लोगों के साथ गुप्त मंत्रणाएं कीं और उन्हें सशस्त्र क्रांति के लिए तैयारी करने का आह्वान किया।

समाचार पत्रों का प्रकाशन

      पथिक जी क्रांतिकारी योजनाओं को लेखनी के माध्यम से भी लोगों तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत रहे। उनकी भाषण शैली तो अच्छी थी ही लेखन शैली भी उतनी मंजी हुई थी। वह एक प्रखर वक्ता के साथ-साथ प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक और लेखक भी थे। अपने राष्ट्रवादी लेखन और चिंतन के माध्यम से उन्होंने लोगों को प्रभावित किया।
   अपने कार्य और कार्यक्रम को अंतिम परिणति तक पहुंचाने के उद्देश्य से पथिक जी ने अजमेर से प्रमुख समाचार-पत्रों का सम्पादन और प्रकाशन प्रारम्भ किया। पथिक जी ने एक से बढ़कर एक ऐसे कार्यक्रम उस समय प्रस्तुत किए जिससे संपूर्ण देश का ध्यान उनकी ओर गया और अंग्रेज सरकार उनके देशभक्ति पूर्ण कार्यों से आतंकित हो उठी।

अखबारों का संपादन कर
चिंतन अद्भुत दिया सदा,
चारों ओर यश गाथा फैली
हाथों में जब ले चले ध्वजा।।

    बिजौलिया का प्रसिद्ध किसान आन्दोलन, बेगू किसान आन्दोलन, सिरोही का भील आन्दोलन, बरार किसान आन्दोलन ये सब बडे किसान आन्दोलन पथिक जी के नेतृत्व में खडे़ हुए। इन सभी आंदोलनों के माध्यम से उनका नेतृत्व उभर कर सामने आया। देश के जन सामान्य को यह पता चला कि विजय सिंह ‘पथिक’ एक क्रांति का नाम है, जो देश को स्वाधीनता की ओर तेजी के साथ ले चलने की शक्ति और सामर्थ्य रखती है।

की राजस्थान सेवा संघ की स्थापना

    राजस्थान के स्वतंत्रता आन्दोलन में उनकी इतनी सक्रिय और विशेष भूमिका रही कि उसे राष्ट्रीय नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ख्याति प्राप्त हुई। जिससे पथिक जी का नाम अंतरराष्ट्रीय जगत में भी प्रमुखता से उभर कर सामने आया । पथिक जी ने अपने कार्यक्रम के प्रति लोगों का ध्यान आकृष्ट करने के लिए 1920 में वर्धा में राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की और सत्याग्रह के प्रयोग करने आरम्भ किए।

चहुँओर अंधकार था,
ना मिलता कोई पार था,
विपदाओं का जंजाल था,
पूरा देश का तब हाल था,
ले ज्योति पथिक आगे बढ़े,
आगे बढ़े और बढ़ते ही गए,
हौंसला ना झुकता था कभी,
ना पग भी रुकता था कभी,

कुछ समय पश्चात पथिक जी की राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र अजमेर बन गया। देश की स्वतंत्रता के लिए उनके भीतर इतनी प्रबल लग्न थी कि वे देशभक्त युवाओं को खोज – खोज कर लाते और अपने संगठन के साथ जोड़ते। उनका उद्देश्य एक बड़ा संगठन खड़ा करके देश को आजाद कराने का था। उनकी जीवनशैली और सशस्त्र क्रांति के प्रति समर्पण की भावना पर यदि चिंतन किया जाए तो पता चलता है कि उनके ऐसे कार्यों के पीछे एक सशस्त्र सेना खड़ी करने का उद्देश्य था । उनका उद्देश्य था कि एक सेना खड़ी हो जो अंग्रेजों को मारे और यहां से भगाए। सशस्त्र क्रांति के प्रति समर्पित आजादी के आंदोलन के इस विनम्र योद्धा की बातों का युवाओं पर भी इतना अधिक प्रभाव होता था कि वे 20 वर्ष देश के लिए काम करने के लिए तैयार हो जाते थे। माणिक्यलाल वर्मा,रामनायारण चौधरी,हरिभाई किंकर,नैनूराम शर्मा और मदनसिंह करौला जैसे देशभक्त और आजाद भारत के बडे नेता पथिक जी के राजस्थान सेवा संघ की ही देन हैं। इन सभी क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।

सत्याग्रह को बनाया अपना हथियार

पथिक जी ने अपनी कार्यशैली और नेतृत्व के माध्यम से सत्याग्रह को भारतीय स्वाधीनता संग्राम का एक अद्भुत हथियार बनाकर प्रयोग किया। जिसकी काट उस समय की सबसे शक्तिशाली ब्रिटिश सत्ता के पास भी नहीं थी और उसके सामने झुकना ही उसके लिए एकमात्र उपाय था। उनके सत्याग्रह की शक्ति के आगे अंग्रेज झुके और बाद में गांधी जी ने भी उनके इसी प्रकार के सत्याग्रह का अनुकरण कर उन्हें अपना मार्गदर्शक स्वीकार किया था।
   उनके अन्य सामाजिक और राजनीतिक कार्यों पर यदि विचार किया जाए तो पता चलता है कि उन्होंने लगान के सम्बन्ध में, ठिकाने के अत्याचारों के सम्बन्ध में, किसानों की बहादुरी के सम्बन्ध में, गीत और भजन बनाकर उनके द्वारा किसानों में गांव-गांव आन्दोलन का प्रचार करना, सब कुछ सत्याग्रह को साक्षी मानकर ही किया। पथिक जी ने सम्मिलित हस्ताक्षरों से राज्य को किसानों के अभाव अभियोगों के लिए आवेदन देना बन्द करवा दिया। केवल पंचायत के सरपंच के नाम से ही लिखा-पढ़ी की जाने लगी। चेतावनी दी गई कि अब किसान अनुचित लागतें और बेगारें नहीं देंगें।
     पंचायत ने यह निश्चय किया है कि यदि ठिकाना इन्हें समाप्त नहीं करेगा तो पंचायत उन्हें अन्य टैक्स भी नही देगी। राज्य ने अपने कर्मचारियों और ठिकाने के पक्ष में आदेश दिया कि सरपंच या पंचायत के नाम से किसी अर्जी या आवेदन पर कोई कार्यवाही न हो अर्थात राज्य ने पंचायत के अस्तित्व को मानने से इन्कार कर दिया। विजय सिंह पथिक ने किसानों को समझाया कि कोई किसान व्यक्तिगत रुप से या सम्मिलित हस्ताक्षर करके आवेदन न दे। सभी किसानों की ओर से बोलने का अधिकार एकमात्र पंचायत को ही होगा। उनके इस आह्वान से सम्पूर्ण राजस्थान सत्याग्रह की गूंज से जाग्रत हो उठा।
     हमें अपने ऐसे महान क्रांतिकारी वीर योद्धा इतिहास नायक पथिक जी पर गर्व और गौरव की अनुभूति होती है। जिन्होंने भारतीय स्वाधीनता संग्राम तो निर्णायक दिशा प्रदान की और उनके दिखाए हुए रास्ते पर चलकर ही देश एक दिन आजाद हो सका।

महाप्रयाण

   पथिक जी जीवनपर्यन्त बहुत ही तन में था और समर्पण के भाव से देश की सेवा करते रहे। उन्होंने एक अनेकों आंदोलन खड़े किए और उनको सफलतापूर्वक नेतृत्व किया ।जन जागरण के महान कार्य का संपादन किया और पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से देश के युवाओं को नई दिशा देने का भी काम किया। इस प्रकार अनेकों महान कार्यों को करने के पश्चात मां भारती का यह महान सपूत 28 मई 1954 में चिर निद्रा में सो गया। पथिक जी की ईमानदारी और देश भक्ति की मिसाल मिलना कठिन है। जब वह संसार से गए तो उस समय उनके पास कोई विशेष संपत्ति नहीं थी। जबकि तत्कालीन सरकार के कई मंत्री उनके राजनैतिक शिष्य थे। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री श्री शिवचरण माधुर ने बिजौलिया में किसानों के प्रथम सत्याग्रह को चलाने वाले पथिक जी का वर्णन राजस्थान की जागृति के अग्रदूत महान क्रान्तिकारी के रूप में किया है।

( मेरे द्वारा लिखित पुस्तक “इतिहास के गौरव” से )

   

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