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आतंकवाद

कश्मीर फाइल्स और छद्म अम्बेडकरवादी

#डॉ_विवेक_आर्य

विवेक रंजन अग्निहोत्री द्वारा निर्देशित फिल्म कश्मीर फाइल्स का सेकुलरवादी, शांतिदूत, साम्यवादी, लिब्रान्डु, जेनयू के अधेड़ों की जमात द्वारा सोशल मीडिया में विरोध लाजमी हैं। पर हैरानी तब हुई जब विरोध करने वालों में छद्म अम्बेडकरवादी भी शामिल थे। कुछ वर्षों से महान विचारक श्री पुष्पेंदर कुलश्रेष्ठ जी द्वारा सार्वजनिक मंचों से कश्मीर में पिछले 70 वर्षों से शांति-दूतों का दलितों पर किये जा रहे अत्याचारों का वर्णन हम सुन रहे है। इस अत्याचार का कोई भी छद्म अम्बेडकरवादी कभी वर्णन नहीं करता।

1940 के दशक में पंजाब से अनेकों दलित परिवारों को ले जाकर कश्मीर में बसाया गया था। इन परिवारों से केवल शांति-दूतों के घर-ऑफिस आदि की सफाई का काम लिया जाता था। यह दस्तूर तीन पीढ़ियों तक जारी था। 70 साल गुजर जाने के बाद भी इन परिवारों को सफाई कर्मचारी के अतिरिक्त अन्य किसी सरकारी नौकरी करने का, किसी बड़े कॉलेज में उच्च शिक्षा लेने का अधिकार नहीं था। उन्हें कश्मीर का मूल निवासी ही नहीं समझा जाता था। यह तो धारा 370 के समाप्त होने के बाद ही उन्हें समान अवसर मिलना आरम्भ हुआ। जय भीम-जय मीम का नारा लगाना वाले सभी नेताओं के मुंह में इस विषय पर दही जैम जाती हैं। यही नेता कश्मीर फाइल्स का पुरजोर विरोध करते मिलते हैं। उसका कारण इनका इतिहास के एक सत्य से अपरिचित होना भी है। कश्मीरी में रहने वाले हिन्दू को कश्मीरी पंडित कहा जाता है। उन्हें कश्मीरी हिन्दू नहीं कहा जाता। क्यों? इसका उत्तर आपको जानने के लिए कश्मीर के इतिहास में जाना पड़ेगा जो राजतरंगिणी में मिलता हैं।

कश्मीर के इतिहास में अन्धकार के अनेक काल है। एक दौर में यहाँ के मुस्लिम शासक का नाम सिकंदर था। वो हिन्दुओं के प्रति इतना द्वेष रखता था कि हिन्दू मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ना दीन की सेवा समझता था। इसीलिए उसका नाम सिकंदर ‘बुतशिकन’ अर्थात मूर्तियों का संहार करने वाला प्रसिद्ध हो गया। उस समय का कश्मीर हिंदुओं की शिकारगाह बन चुका था। हिंदू महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार और उसके उपरांत भी उनके सम्मान से खेलते नरपिशाचों को देखकर हर पिता का या पति का या पुत्र का कलेजा निकल जाता था। ऐसे ही अमानवीय और पाशविक अत्याचारों से उस समय का हिंदू समाज जिस प्रकार चीख और चिल्ला रहा था उसे देखकर पाषाण हृदय भी पिघल जाता था, पर मुस्लिम अत्याचारी थे कि उनको तनिक भी दया नहीं आती थी। यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि उस समय मुस्लिम नर-पिशाचों के अत्याचार अपने चरम पर थे। जबरन मुसलमान बनाना आये दिन की बात थी। इन अत्याचारों से तंग आकर कश्मीर के हिन्दू घाटी छोड़कर इधर उधर विस्थापित हो गए। कश्मीर की जनसंख्या में भारी कमी हुई। विद्या, व्यापार, कला आदि गुणों से सुशोभित जनता विस्थापित होने से राज्य उजड़ गया।
समय ने फेर खाया। सिकंदर का दूसरा पुत्र सुल्तान जैनुल आब्दीन सन 1420 ईस्वी में कश्मीर का शासक बना, तो उसने अपने पिता के द्वारा हिंदुओं के विरुद्ध किए गए अत्याचारों के लिए प्रायश्चित्त किया। यह एक उदार और दयालु शासक था । वास्तव में यह सुल्तान भारत में मुस्लिम इतिहास में हुए बहुत से बादशाहों, नवाबों व सुलतानों में से एक अपवाद है । इतिहासकार श्रीवर ने भी इस उदार मुस्लिम शासक के विषय में लिखा है कि :- ‘(इसे ऐसे मानो) जैसे रेगिस्तान की गर्मी के विदा हो जाने के पश्चात किसी ने चंदन का लेप लगा दिया हो।’

शासन सूत्र संभालने के 2 वर्ष पश्चात ही जैनुल- आब्दीन को सीने में एक खतरनाक फोड़ा बन गया था। मुस्लिम हकीमों के द्वारा जब उसका कोई उपचार नहीं किया जा सका। सरकारी दमन के कारण कश्मीर से विष के ज्ञाता वैद्य पलायन कर चुके थे। राज्य के कर्मचारियों ने अंततः विष का प्रभाव दूर करने वाले श्रीभट्ट नामक व्यक्ति को ढूंढ निकाला। वैद्य राज पंडित श्रीभट्ट आयुर्वेद के महान ज्ञाता थे। वह घाव भरने का उपचार भी भली प्रकार जानता जानते थे। परंतु भय के कारण श्रीभट्ट ने आने में देर लगी। जब वह पहुंचा तो राजा ने उनका उत्साह बढ़ाया। श्रीभट्ट ने अपनी चिकित्सा राजा के विषैले फोड़े को पूर्णतया ठीक कर दिया।”

जब सुल्तान ठीक हो गया तो उसने हीरे, जवाहरात आदि देकर वैद्यराज को पुरस्कृत करना चाहा। परंतु वैद्यराज पंडित श्रीभट्ट ने ऐसा कोई पुरस्कार लेने के स्थान पर सुल्तान से आग्रह किया कि वह उदार होकर शासन करें और अपनी हिंदू प्रजा के साथ भी न्याय करने का प्रयास करें । श्रीभट्ट ने राजा को उसका राजधर्म समझाया और बताया कि किस प्रकार हिंदू परंपरा में राजा अपनी प्रजा के कल्याण को ही अपना सर्वोपरि कर्तव्य और धर्म मानता है ? यदि आप भी इस प्रकार शासन करेंगे तो निश्चय ही आपका हिंदू प्रजा स्वागत व सम्मान करेगी । अपने इस महान कार्य के माध्यम से आप यश और कीर्ति को प्राप्त करेंगे। राजा पर पंडित श्रीभट्ट की इस प्रकार की उपदेशात्मक बातें बड़ी अच्छी लगीं। उसने उपकार भरे हृदय से उसकी बातों को बड़े ध्यान से सुना और उन पर कार्य करने का भी मन बना लिया।

कश्मीर के शासक ने कश्मीर को उसका पुराना वैभव और गौरव लौटाने का निर्णय लिया। जो लोग अब से पहले कश्मीर छोड़कर इधर – उधर जाकर बस गए थे या इधर-उधर बिखर गए थे, इस शासक ने उन सबको बुलाने का निर्णय लिया। सुल्तान के इन उदारता पूर्ण कार्यों का हिंदुओं ने ह्रदय से स्वागत किया। कश्मीर की घाटियों में लगी आग के बीच उन्हें सुल्तान के इस प्रकार के आचरण से ठंडी-ठंडी वायु के झोंके आते हुए प्रतीत हुए। स्मरण रहे कि सुल्तान को इस प्रकार के आचरण करने के लिए वैद्य राज पंडित श्रीभट्ट ने विशेष रूप से प्रेरित किया था।

‘राजतरंगिणी’ से हमें ज्ञात होता है कि वैद्यराज पंडित श्रीभट्ट ने सुल्तान के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वह किसी भी हिंदू को मात्र धार्मिक विद्वेष के आधार पर किसी प्रकार का दंड ना दे। जितने हिंदू मंदिर तोड़े गए हैं उन्हें फिर से बनवाने का प्रयास करे, जो हिंदू अपने मूल धर्म में लौटना चाहते हैं- उन्हें लौटने की आज्ञा दे, इसके अतिरिक्त जो हिंदू कश्मीर को छोड़कर अन्य प्रदेशों में चले गए हैं उन्हें भी वहां से अपने घरों के लिए वापस लाने का प्रबंध किया जाए, हिंदू छात्रों को विकास और उन्नति के सभी अवसर उपलब्ध कराये जाएं, जिन हिंदुओं पर ‘जजिया’ लगाया गया है उनसे वह भी हटा दिया जाए, गोवध पर पूर्ण पाबंदी लगाई जाए, इसके अतिरिक्त हिंदुओं को अपने धार्मिक अनुष्ठान करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की जाए और जिन – जिन पुस्तकालयों को जला दिया गया है उनका जीर्णोद्धार कराया जाए। इस प्रकार उस समय दर-दर की ठोकरें खाने वाले हिंदू समाज के लोगों के लिए वैद्यराज पंडित श्रीभट्ट उद्धारक का रूप बनकर प्रकट हुए। बताया जाता है कि सुल्तान ने वैद्यराज पंडित श्रीभट्ट के इन सभी प्रस्तावों को सहर्ष स्वीकार कर लिया। जिससे कश्मीर में फिर से नई हवा बहती हुई प्रतीत होने लगी।

शुद्ध होकर अपने पूर्वजों के वैदिक धर्म में वापिस आने वाले कश्मीरी हिन्दुओं के सामने एक समस्या आई। उन्हें कौन सा वर्ण दिया जाये। तब वैद्यराज पण्डित श्रीभट्ट ने उन सबको एक ही वर्ण स्वीकार करने हुए ‘पंडित’ नाम से सुशोभित किया। पंडित श्रीभट्ट की उदारता, दूर-दृष्टि और विशाल-हृदयता से प्रभावित होकर उस समय के सारे हिंदू समाज ने उनकी बात को स्वीकार किया। उन लोगों ने अपने जातीय स्वरूप या पहचान को समाप्त कर अपने आपको पंडित ही कहना और लिखना आरंभ किया। आज भी हम कश्मीर के रहने वाले हिन्दू लोगों को कश्मीरी हिंदू ना कहकर ‘कश्मीरी पंडित’ के नाम से पुकारते हैं। आज के आन्दोलनजीवी इस इतिहास से अनभिज्ञ होकर पंडित उपनाम देखकर कश्मीर हिन्दू का विरोध आरम्भ कर देते है। उन्हें लगता है कि वे इस प्रकार से ब्राह्मणवाद, मनुवाद का विरोध कर रहे है। खैर सत्य देर से ही सही सामने अवश्य आता है। ईश्वर सभी को सद्बुद्धि दे।

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