कश्मीरी आतंकवाद : जैनुलाब्दीन और पंडित श्रीभट्ट का काल

images (10)

जैनुलाब्दीन और पंडित श्रीभट्ट का काल

हिंदू अस्मिता की रक्षा के लिए भारत भूमि पर अलग-अलग कालखंडों में कितने ही शूरवीरों ने जन्म लिया है। जिन्होंने अपने प्राणों की चिंता न करते हुए देश व धर्म की रक्षा के लिए अपना प्राणोत्सर्ग तक करने में किसी प्रकार की हिचक नहीं दिखाई। मां भारती के इन शूरपुत्रों में कश्मीर के वैद्यराज पंडित श्रीभट्ट नामक इतिहासपुरुष का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जिन्होंने हिंदूहित का ध्यान रखते हुए और वैदिक धर्म की रक्षा के लिए अपने जीवन में अनेक कार्य किए। उनका सर्वाधिक प्रशंसनीय कार्य यह रहा कि उन्होंने कश्मीर छोड़ कर चले गए हिंदुओं को फिर से कश्मीर में लाकर बसाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अपने प्रभाव और वाक्चातुर्य से उन्होंने तत्कालीन मुस्लिम हुकूमत को अपने अनुसार चलाने में सफलता प्राप्त की। जिससे यह कहा जा सकता है कि उनके इस प्रकार के कार्य से कितने ही मुसलमानों को उनसे ईर्ष्या हुई होगी। मुस्लिम हुकूमत में बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोगों ने उनसे घृणा और शत्रुता का बर्ताव किया होगा, परंतु उन्होंने इस सबकी चिन्ता न करते हुए देश व धर्म की रक्षा के लिए निरंतर कार्य करते रहने को ही उचित समझा।

पण्डित श्रीभट्ट का त्याग पूर्ण कार्य

यदि श्रीभट्ट चाहते तो अपने लिए सुल्तान से कुछ भी मांग सकते थे और ऐश्वर्य का जीवन जी सकते थे। उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसका कारण केवल एक ही था कि भारत की चरक जैसे महान आयुर्वेदाचार्य की परंपरा के लोग कभी भी वैद्यक को धन कमाने का माध्यम नहीं बनाते थे, वह सेवा की भावना से इस कार्य को करते थे । ऐसी पवित्र भावना से काम करने वाले लोगों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे किसी सुल्तान से अपने लिए कुछ मांग कर ऐश्वर्य संपन्न जीवन जिएंगे। उनसे त्याग की ही अपेक्षा की जा सकती है ।यही कारण था कि श्रीभट्ट ने त्याग का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपने देश व धर्म की रक्षा करने को उचित माना। उनका यह कार्य मानवता की सेवा से प्रेरित होकर किया गया महान कार्य था।
ज्ञात रहे कि उस समय का कश्मीर हिंदुओं की शिकारगाह बन चुका था। हिंदू महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार और उसके उपरांत भी उनके सम्मान से खेलते नरपिशाचों को देखकर हर पिता का या पति का या पुत्र का कलेजा निकल जाता था। ऐसे ही अमानवीय और पाशविक अत्याचारों से उस समय का हिंदू समाज जिस प्रकार चीख और चिल्ला रहा था उसे देखकर पाषाण हृदय भी पिघल जाता था, पर मुस्लिम अत्याचारी थे कि उनको तनिक भी दया नहीं आती थी।
आज का ‘मुगलिया छाप’ इतिहास चाहे उन अत्याचारों के बारे में पूर्णतया मौन हो पर तत्कालीन साहित्य और अन्य लेखकों के लेख एक साक्षी के रूप में यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि उस समय मुस्लिम नरपिशाचों के अत्याचार अपने चरम पर थे।

जैनुलाब्दीन की उदारता

इतिहासकार श्रीवर से हमें जानकारी मिलती है कि जब सिकंदर का दूसरा पुत्र सुल्तान जैनुल आब्दीन सन 1420 ईस्वी में कश्मीर का शासक बना तो उसने अपने पिता के द्वारा हिंदुओं के विरुद्ध किए गए अत्याचारों के लिए प्रायश्चित किया। यह एक उदार और दयालु शासक था । वास्तव में यह सुल्तान भारत में मुस्लिम इतिहास में हुए बहुत से बादशाहों, नवाबों व सुल्तानों में से एक अपवाद है । इतिहासकार श्रीवर ने भी इस उदार मुस्लिम शासक के विषय में लिखा है कि :- ‘(इसे ऐसे मानो) जैसे रेगिस्तान की गर्मी के विदा हो जाने के पश्चात किसी ने चंदन का लेप लगा दिया हो।’
यह एक अच्छी बात थी कि कश्मीर के इस नए शासक ने कश्मीर को उसका पुराना वैभव और गौरव लौटाने का निर्णय लिया। जो लोग अबसे पहले कश्मीर छोड़कर इधर – उधर जाकर बस गए थे या इधर-उधर बिखर गए थे, इस शासक ने उन सबको बुलाने का निर्णय लिया। सुल्तान के इन उदारतापूर्ण कार्यों का हिंदुओं ने ह्रदय से स्वागत किया। कश्मीर की घाटियों में लगी आग के बीच उन्हें सुल्तान के इस प्रकार के आचरण से ठंडी-ठंडी वायु के झोंके आते हुए प्रतीत हुए। स्मरण रहे कि सुल्तान को इस प्रकार के आचरण करने के लिए वैद्यराज पंडित श्रीभट्ट ने विशेष रूप से प्रेरित किया था।
इस बात पर सभी इतिहासकार सहमत हैं कि सुल्तान को हिंदुओं के प्रति इस प्रकार के उदारतापूर्ण आचरण को करने के लिए उस समय के एक प्रसिद्ध हिंदू वैद्य श्री भट्ट ने भी बहुत अधिक प्रभावित किया था। हुआ यूं था कि शासन सूत्र संभालने के 2 वर्ष पश्चात ही जैनुल- आब्दीन को सीने में एक खतरनाक फोड़ा बन गया था। मुस्लिम हकीमों के द्वारा जब उसका कोई उपचार नहीं किया जा सका तो श्रीभट्ट वैद्य ने उनके इस फोड़े का सफलतापूर्वक उपचार किया। वैद्यराज पंडित श्रीभट्ट आयुर्वेद के महान ज्ञाता थे।

वैद्यराज श्रीभट्ट ने सुल्तान का किया उपचार

इतिहासकार जोननराज ने हमें बताया है कि – ‘जिस प्रकार बर्फ की शरारत के कारण माघ मास में पुष्प दिखाई नहीं देते, सरकारी दमन के कारण उसी प्रकार देश में विष के ज्ञाता वैद्य नहीं मिलते थे । राज्यकर्मचारियों ने अंततः विष का प्रभाव दूर करने वाले श्रीभट्ट नामक व्यक्ति को ढूंढ निकाला। वह घाव भरने का उपचार भी भली प्रकार जानता था। परंतु भय के कारण श्रीभट्ट ने आने में देर लगा दी। जब वह पहुंचा तो राजा ने उसका उत्साह बढ़ाया। श्रीभट्ट ने राजा के विषैले फोड़े को पूर्णतया ठीक कर दिया।”
जब सुल्तान ठीक हो गया तो उसने हीरे, जवाहरात आदि देकर वैद्यराज को पुरस्कृत करना चाहा। परंतु वैद्यराज पंडित श्रीभट्ट ने ऐसा कोई पुरस्कार लेने के स्थान पर सुल्तान से आग्रह किया कि वह उदार होकर शासन करें और अपनी हिंदू प्रजा के साथ भी न्याय करने का प्रयास करें । श्रीभट्ट ने राजा को उसका राजधर्म समझाया और बताया कि किस प्रकार हिंदू परंपरा में राजा अपनी प्रजा के कल्याण को ही अपना सर्वोपरि कर्तव्य और धर्म मानता है ? यदि आप भी इस प्रकार शासन करेंगे तो निश्चय ही आपका हिंदू प्रजा स्वागत व सम्मान करेगी । अपने इस महान कार्य के माध्यम से आप यश और कीर्ति को प्राप्त करेंगे। राजा पर पंडित श्रीभट्ट की इस प्रकार की उपदेशात्मक बातें बड़ी अच्छी लगीं। उसने उपकार भरे हृदय से उसकी बातों को बड़े ध्यान से सुना और उन पर कार्य करने का भी मन बना लिया । श्रीभट्ट के इस राष्ट्रवादी चिंतन की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है ।

श्रीधर भट्ट के प्रस्ताव

‘राजतरंगिणी’ से हमें ज्ञात होता है कि वैद्यराज पंडित श्रीभट्ट ने सुल्तान के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वह किसी भी हिंदू को मात्र धार्मिक विद्वेष के आधार पर किसी प्रकार का दंड ना दे। जितने हिंदू मंदिर तोड़े गए हैं उन्हें फिर से बनवाने का प्रयास करे, जो हिंदू अपने मूल धर्म में लौटना चाहते हैं- उन्हें लौटने की आज्ञा दे, इसके अतिरिक्त जो हिंदू कश्मीर को छोड़कर अन्य प्रदेशों में चले गए हैं उन्हें भी वहां से अपने घरों के लिए वापस लाने का प्रबंध किया जाए, हिंदू छात्रों को विकास और उन्नति के सभी अवसर उपलब्ध कराये जाएं, जिन हिंदुओं पर ‘जजिया’ लगाया गया है उनसे वह भी हटा दिया जाए, गोवध पर पूर्ण पाबंदी लगाई जाए, इसके अतिरिक्त हिंदुओं को अपने धार्मिक अनुष्ठान करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की जाए और जिन – जिन पुस्तकालयों को जला दिया गया है उनका जीर्णोद्धार कराया जाए।
इस प्रकार उस समय दर-दर की ठोकरें खाने वाले हिंदू समाज के लोगों के लिए वैद्यराज पंडित श्रीभट्ट ईश्वर का रूप बनकर प्रकट हुए। जिन हिंदुओं के घावों पर कोई मरहम लगाने के लिए तैयार नहीं था, उनका भी पूर्ण उपचार करने का निर्णय श्रीभट्ट ने लिया। इस प्रकार उन्होंने न केवल चरक की परंपरा से लोगों का शारीरिक उपचार ही किया अपितु उन्होंने समाज की विकृत हुई दशा को भी सुधारने का अर्थात उसका उपचार करने का भी ऐतिहासिक कार्य किया ।
बताया जाता है कि सुल्तान ने वैद्यराज पंडित श्रीभट्ट के इन सभी प्रस्तावों को सहर्ष स्वीकार कर लिया। जिससे कश्मीर में फिर से नई हवा बहती हुई प्रतीत होने लगी।
मुस्लिम इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी पुस्तक ‘आईने अकबरी’ में श्रीभट्ट के विषय में लिखा है कि – ‘कश्मीर के स्वर्णिम इतिहास में विशेषकर मध्यकालीन इतिहास के संदर्भ में जिस गौरव के साथ सुल्तान जैनुल आबदीन का यश चिरस्मरणीय बना, अगर श्रीभट्ट का समागम उसे नहीं मिलता तो संभवतः वह भी इतिहास की उसी धारा में बह जाता जिस कलंकित धारा में उसके बाप – दादा बह गए थे। यही कारण है कि इतिहासकार जोनराज यह लिखने के लिए बाध्य होते हैं कि सुल्तान जैनुल आबदीन श्रीभट्ट की प्रत्येक बात को उदारवादी ऐतिहासिक प्रथा में कार्यान्वित करने के लिए सदा ही मुखापेक्षी होकर रहे हैं।’

कश्मीरी लोगों को दिया ‘पंडित’ शब्द

इतिहासकारों का यह भी मानना है कि कश्मीर छोड़कर जो हिंदू लोग दूर देशों में भाग गए थे या बिखर गए थे, उन सबको कश्मीर में बुलाकर और फिर से पुनर्स्थापित करने के पश्चात वैद्यराज पण्डित श्रीभट्ट ने उन सबको एक ही गोत्र – वर्ण स्वीकार करने के लिए भी प्रेरित किया। पंडित श्रीभट्ट की उदारता और विशालहृदयता से प्रभावित होकर उस समय के सारे हिंदू समाज ने उनकी बात को स्वीकार किया। उन लोगों ने अपने जातीय स्वरूप या पहचान को समाप्त कर अपने आपको पंडित ही कहना और लिखना आरंभ किया।
आजकल हम कश्मीर के रहने वाले हिन्दू लोगों को कश्मीरी हिंदू ना कहकर ‘कश्मीरी पंडित’ के नाम से पुकारते हैं। कहा जाता है कि यह नाम इन लोगों को वैद्यराज पण्डित श्रीभट्ट से ही प्राप्त हुआ था। श्री भट्ट की विद्वता, वाक्चातुर्य और बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर कश्मीर के सुल्तान जैनुल आब्दीन ने वैद्यराज पंडित श्रीभट्ट को अपना प्रधानमंत्री बना लिया था। उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में अपने राजधर्म का सम्यक निर्वाह किया और जनता के बीच न्याय करने को अधिमान दिया। हिंदू-मुस्लिम उनके लिए सब समान थे, इसलिए राज्य की जनता को उनसे पूर्ण न्याय की अपेक्षा रहती थी। अपनी उदार और मानवीय नीतियों के कारण प्रधानमंत्री श्रीभट्ट लोगों के बीच बहुत अधिक लोकप्रिय थे । यद्यपि कई कट्टरवादी मुसलमान उनसे घृणा भी करते थे।

दुर्भाग्य के दिन लौट आए

यह एक अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि जब 1474 ई0 में जैनुल-आब्दीन की मृत्यु हुई तो उसके पश्चात उसके पुत्र हैदरशाह ने अपने पिता की हिंदुओं के प्रति उदार नीति को त्याग दिया। इससे वैद्यराज पंडित श्रीभट्ट के प्रयासों को गहरा झटका लगा और कश्मीर फिर से सांप्रदायिकता की आग में झोंक दिया गया।निर्दोष व निरपराध लोगों की फिर से हत्या की जाने लगी।सर्वत्र भय का वातावरण व्याप्त हो गया।
‘राजतरंगिणी’ के हिंदी अनुवाद में डॉक्टर रघुनाथ सिंह लिखते हैं :- ‘ जैनुल – आब्दीन के काल में क्रूरता का दर्शन नहीं मिलता, परंतु उसके अत्यंत दुर्बल हो जाने पर पुत्रों की राज्यलिप्सा के कारण क्रूरता ने फिर पदार्पण किया । आदम खान का उसके अनुज हाजी खान से शूरपुर में संघर्ष हुआ । शूरपुर में बारात लेकर आए बारातियों को निरपराध मार डाला गया।’
इस प्रकार सुल्तान जैनुलाब्दीन के संसार से चले जाने के एकदम पश्चात ही हिंदुओं के प्रति मुस्लिम शासकों की क्रूरता, दमन और अत्याचार का वही क्रम आरंभ हो गया जो जैनुलाब्दीन से पूर्व में चलता रहा था। इन अत्याचारों ने कश्मीरी पंडितों अर्थात हिंदुओं को एक बार फिर आतंकित करना आरंभ कर दिया। उन्हें शांति और व्यवस्था की जो आशा की किरण जैनुलाब्दीन के शासनकाल में फूटती दिखाई दी थी, उस पर अब एक बार फिर ग्रहण लग गया।
‘राजतरंगिणी’ से ही हमें पता चलता है कि ”सुल्तान हैदरशाह ने ब्राह्मणों को पीड़ित करने का आदेश दिया। उसने अजर , अमर , बुद्ध आदि सेवक ब्राह्मणों के भी हाथ व नाक कटवा दिए। इन दिनों भट्ट अपनी जाति के लुटे जाने पर, जातीय देश त्याग कर भागते हुए यह कहते थे – ‘मैं भट्ट नहीं हूं’ ,’ मैं भट्ट नहीं हूं’ – म्लेच्छों की प्रेरणा से राजा ने प्रमुख इष्ट देवों की मूर्तियों को तोड़ने का आदेश दिया। गुण परीक्षा के कारण सुल्तान जैनुल राजा ने जिन लोगों को भूमि दी थी, उनसे उनके अधिकारियों ने अकारण ही छीन ली।”

हिंदुओं ने प्रतिकार करना आरंभ किया

सुल्तान हैदरशाह ( 1474 ई0 ) के इस प्रकार के अत्याचार पूर्ण आदेशों और कृत्यों का ब्राह्मण वर्ग के प्रतिष्ठित, सम्मानित और प्रभावशाली लोगों की ओर से जोरदार प्रतिकार भी किया गया। उनमें से कइयों ने साहसिक निर्णय लेकर सुल्तान के विरुद्ध आवाज उठाई। मुसलमान इतिहासकार हसन ने इन पंडितों के इस प्रकार के साहसिक निर्णय का उल्लेख करते हुए हमें बताया है कि -‘जब पंडितों के धैर्य का पैमाना भर गया तो वे सब एक साथ उठ खड़े हुए । कभी सिकंदर ने जिन हिंदू मंदिरों को तोड़कर उनके मसाले से मस्जिदें बनवाई थीं, उनमें से कुछेक को इन क्रुद्ध पंडितों ने आग लगा दी। इस विद्रोह को तलवार के जोर से खत्म कर दिया गया। असंख्य लोग दरिया में डुबो दिए गए। लूटमार को रोकने वाला कोई नहीं था।’
किसी भी विदेशी सत्ता के विरुद्ध सामूहिक रूप से प्रतिकार करने का कश्मीर के पंडितों अर्थात हिंदुओं का यह पहला ऐतिहासिक और साहसिक निर्णय था। यदि उनके इस प्रकार के ऐतिहासिक और साहसिक निर्णय की समीक्षा की जाए तो पता चलता है कि उनके भीतर एकता का यह भाव श्रीभट्ट के प्रयासों की ही देन था। यदि श्रीभट्ट इन लोगों को सामूहिक रूप से एक झंडे नीचे लाकर पंडित कहलाने के लिए प्रेरित नहीं करते तो यह विभिन्न जातियों, वर्गों और संप्रदायों में बंटे रहते। जिससे इनके भीतर एकता कभी उत्पन्न ही नहीं होती। यह बहुत बड़ी बात है कि उस समय के कश्मीरी पंडितों ने बिना किसी राजा के नेतृत्व के अथवा बिना किसी महान सेनानायक की उपस्थिति के अपने स्तर पर तत्कालीन क्रूर सत्ता का प्रतिकार किया। यह अलग बात है कि उनका यह प्रतिकार अधिक सफल नहीं हुआ। हमारा मानना है कि सफलता या असफलता का पैमाना केवल यही होना चाहिए कि अत्याचारी और उसकी अत्याचारपूर्ण नीतियों का लोगों ने निडर और निर्भीक होकर सामना किया। उनकी यह निडरता और निर्भीकता उनकी देशभक्ति और धर्म के प्रति समर्पण के भाव को प्रकट करती है और हमें उनके देश प्रेम व धर्म के प्रति समर्पण को ही नमस्कार करना चाहिए। इसी में उनके साहसिक और ऐतिहासिक कार्य की सफलता भी छुपी हुई है।
हैदरशाह के पश्चात 1475 ईस्वी में हसन खान ने सत्ता संभाली ।उसने हिंदुओं के प्रति उदारता का दृष्टिकोण अपनाते हुए शासन करना आरंभ किया। परंतु वह व्यसनी और शराबी शासक था । सैय्यदों ने एक षड़यंत्र के अंतर्गत उसकी उदारता की नीतियों को अधिक देर तक नहीं चलने दिया। फलस्वरूप सैय्यदों की बढ़ती शक्ति के चलते हसन खान हिंदुओं के प्रति अपने उदार दृष्टिकोण और उदार नीतियों को अधिक देर तक लागू नहीं रख सका।

हिंदू फिर कश्मीर से भागने लगे

‘राजतरंगिणी’ से ही हमको पता चलता है कि – ‘किसी को भी कारागार में रख देना साधारण बात थी। क्रोधित होकर सुल्तान हसन ने अवतार सिंह आदि को बिना न्याय किए कारागार में डाल दिया । अनेक प्रतिहारगण सुल्तान का कोप भाजन होने पर कारागार में डाल दिए गए। तत्पश्चात उनकी आंखें फोड़ दी गईं। 2 वर्ष जेल में रहकर वे भी बहराम खान की तरह मारे गए। बहराम खान का पुत्र युसूफ था। वह निर्दोष था । पिता के कारण, राजवंशी होने के कारण, बंदी बना लिया गया । वह निर्दोष होते हुए भी मार डाला गया । अधिकारियों और मंत्रियों को भी इसी प्रकार, बिना विचारे, कारागार में डाल दिया जाता था।’
सुल्तान के इस प्रकार के अत्याचारपूर्ण आचरण के कारण जहां अनेक हिंदू कश्मीर छोड़ने के लिए बाध्य हुए, वहीं कई मुस्लिम भी उसके विरुद्ध विद्रोह पर उतर आए। यद्यपि जब विद्रोह हुआ और सुल्तान की ओर से उसका क्रूरतापूर्वक दमन किया गया तो उसमें भी अधिक क्षति हिंदुओं को ही उठानी पड़ी।
इसी समय कश्मीर पर मुस्लिमों की चाक्क जाति का भी कुछ समय के लिए (33 वर्ष) शासन रहा। उसके अत्याचारों के बारे में जस्टिस जियालाल कलिम ने ‘द हिस्ट्री ऑफ कश्मीरी पंडित’ में लिखा है कि – ‘चाक्क शासकों के आदेश पर प्रतिदिन 1000 गायों की निर्विरोध हत्या होती थी । अंधकार ग्रस्त सूर्य की भांति ब्राह्मणों पर बल प्रयोग किया जाता था।….. जीवन यापन के साधन नहीं रहे इनके लिए। भस्म-वन के हिरणों की तरह ब्राह्मण भी देश में न रहे । देश त्यागने के बाद ब्राह्मणों को भी कभी तो सतर्क रहना पड़ता, कभी उपहास व तिरस्कार का पात्र बनना पड़ता। मुसलमान इतिहासकारों द्वारा पूर्णतया समर्थित यह उल्लेख एक चश्मदीद गवाह का है।’
जब कश्मीर की धरती आग उगल रही थी और खून पी रही थी , उस समय फतहशाह नाम के एक अन्य सुल्तान ने भी अपने शासनकाल में हिंदुओं पर अनेक प्रकार के अत्याचार किए । उसी समय एक धर्म प्रचारक शमसुद्दीन इराकी भी कश्मीर आया। इसके अतिरिक्त एक मुस्लिम नेता मूसारैणा भी कश्मीर लौटा। जो सैय्यदों के साथ हुए संघर्ष में विदेश चला गया था। इन सबने भी हिंदुओं पर अप्रतिम अत्याचार किए। मूसारैणा ने अत्याचारों की सभी सीमाएं पार कर दी थीं।
मुहम्मद दीन फ़ाक ने ‘हिस्ट्री ऑफ़ कश्मीर’ में लिखा है कि :- ‘शिया प्रचारक शमसुद्दीन ईराकी मूसारैणा सहित दुगनी प्रचार भावना के साथ कश्मीर में धर्म प्रचार करने लौटा। जब शांतिमय शिक्षाओं से काम ना चला तो शक्तिशाली उपायों से काम लिया गया। यद्यपि फतहशाह स्वयं एक सुन्नी मुसलमान था। कहते हैं अनेक सुन्नियों को बलपूर्वक शिया धर्म में लाया गया और कईयों को मार डाला गया , परंतु पंडित लोग उसकी कुदृष्टि के विशेष लक्ष बने। अनेक मार डाले गए। असंख्य पंडितों को घर बार छोड़कर कश्मीर से बाहर की ओर भागना पड़ा। लगभग 28000 पंडितों को बलपूर्वक शिया मुसलमान बनाया गया। हिंदुओं की संपत्ति जब्त कर ली गई । जिन्हें जीने की अनुमति मिली उन्हें मूसारैणा द्वारा पुनः लगाया गया जजिया देना पड़ा।’
मूसारैणा नामक यह अत्याचारी यद्यपि मूल रूप में हिंदू ही था परंतु उसने अपने ही सजातीय भाइयों पर अत्याचार करने में जिस प्रकार सीमाओं का अतिक्रमण किया वह भी कश्मीरी पंडितों के लिए इतिहास का एक पीड़ादायक पृष्ठ है।

डॉक्टर राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

Comment:

betgaranti giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
alobet
vegabet giriş
vegabet giriş
restbet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
roketbet giriş
imajbet giriş
ikimisli giriş
roketbet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
begaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
roketbet giriş
vegabet giriş
vegabet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
Safirbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
roketbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
İmajbet güncel
Safirbet resmi adres
Safirbet giriş
betnano giriş
noktabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
nitrobahis giriş