कश्मीरियत बचेगी तभी कश्मीर बच सकेगा

stone pelters kashmirतनवीर जाफरी

जम्मू-कश्मीर राज्य का विशेषकर कश्मीर घाटी का राजनैतिक विवाद देश की उन सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है जिसे विवादित एवं जटिल समस्याओं के लिए उदाहरण के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। यानी न सुलझ सकने वाली समस्या की तुलना मसल-ए-कश्मीर से की जाती है। सीमांत प्रांत तथा मुस्लिम बाहुल्य राज्य होने के नाते यह विवाद प्राय: बड़ा राजनैतिक रूप धारण कर लेता है। खासतौर पर उस समय जबकि पड़ोसी देश पाकिस्तान कश्मीर के अलगाववादी नेताओं के प्रति हमदर्दी जताता हुआ दिखाई देता है और उनके अलगाववादी मिशन को अपना समर्थन देता है। इससे भी बड़ी समस्या उस समय खड़ी हो जाती है, जबकि कश्मीर में अक्सर पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगते दिखाई देते हैं तथा ऐसी रैलियों में पाकिस्तानी झंडे बुलंद होते नज़र आते हैं। समूचा कश्मीर अथवा पूरी की पूरी कश्मीर घाटी पाक परस्त है अथवा अलगाववादी विचारधारा रखती है ऐसा भी नहीं है। इसी कश्मीर में जहां पाक परस्त अलगाववादी हैं, वहीं ऐसी विचारधारा रखने वाले लोग भी हैं जो कश्मीर की स्वतंत्रता के पक्षधर हैं तो स्वयं को भारतीय समझने वाले लोग भी इसी घाटी में विराजमान हैं। परंतु जब कभी कश्मीर में मौजूद भारतीय सेना के हाथों अथवा स्थानीय पुलिस की गोली से किसी प्रदर्शनकारी अथवा साधारण कश्मीरी नागरिक की मौत हो जाती है उस समय कश्मीर में भारत विरोधी वातावरण बनने में ज़्यादा देर नहीं लगती। ज़ाहिर है कश्मीर में मौजूद अलगाववादी तत्व तथा पड़ोसी देश पाकिस्तान व इनका समर्थक मीडिया ऐसी परिस्थितियों का लाभ उठाने की कोशिश करता है।

कश्मीर की इस उठापटक के बीच वहां के अलगाववादी नेताओं अथवा अन्य विचारधारा रखने वाले राजनीतिज्ञों को भले ही उतना अधिक नुकसान न उठाना पड़ा हो परंतु कश्मीर की साझी सभ्यता व तहज़ीब का प्रतिनिधित्व करने वाले कश्मीरी पंडितों को गत् तीन दशकों से भी अधिक समय से इन हालात की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कश्मीर में सक्रिय अलगाववादी समर्थक उग्रवादियों के हाथों 219 कश्मीरी पंडित मारे जा चुके हैं जबकि कश्मीरी पंडितों द्वारा यह आंकड़ा लगभग 8700 का बताया जाता है। इसी प्रकार लगभग 36,000 कश्मीरी पंडित कश्मीर में अपना घर द्वार, ज़मीन जायदाद छोडक़र देश के विभिन्न राज्यों में विस्थापितों का जीवन बसर कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त हज़ारों लोग कश्मीर में तैनात सेना व पुलिस के हाथों मारे जा चुके हैं जबकि सैकड़ों सैनिक व स्थानीय पुलिस के सिपाही भी अलगाववादियों की गोली का शिकार हो चुके हैं। ऐसे तनावपूर्ण वातावरण में जहां अलगाववादी नेता बार बार कश्मीर के मुद्दे को गर्म रखने के लिए कभी भारतीय कश्मीर में प्रदर्शन का सहारा लेते रहते हैं तो कभी पाकिस्तान में मौजूद कई आतंकी संगठन कश्मीरी मुसलमानों की हमदर्दी के नाम पर इनके समर्थन में रैलियां निकालते रहते हैं। कभी पाकिस्तान कश्मीर के मसले को संयुक्त राष्ट्र संघ में खींचने की कोशिश कर इसे अन्तर्राष्ट्रीय विवाद का मुद्दा बनाने की कोशिश करता है। इन सबके बीच भारत में विस्थापित कश्मीरी पंडितों को कश्मीर में पुर्नस्थापित करने की चर्चाएं भी चलती रहती हैं।

पिछले दिनों एक बार फिर घाटी में कश्मीरी पंडितों को पुनर्स्थापित करने की चर्चा ने उस समय ज़ोर पकड़ा जबकि देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने यह बयान दिया कि कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों को फिर से बसाने हेतु उनके लिए अलग सुरक्षित टाऊनशिप बनाई जाएगी। हालांकि कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद का कहना है कि प्रस्तावित टाऊनशिप कश्मीरी पंडितों के लिए ही नहीं बल्कि एक कम्पोजि़ट अथवा संयुक्त लोगों की ऐसी टाऊनशिप होगी जिसमें सभी धर्मों के लोग रह सकेंगे। जबकि अलगाववादी नेताओं का मत है कि कश्मीरी पंडितों को घाटी में अपने पुश्तैनी मकानों में ही आकर रहना व बसना चाहिए। इन लोगों को इस बात का संदेह है कि कश्मीरी पंडितों को अलग सुरक्षित टाऊनशिप के नाम पर केंद्र की भाजपा सरकार कश्मीर में फि़लिस्तीन जैसा नफरत फैलाने वाला वातावरण बनाना चाह रही है। अलगाववादी नेता हालांकि कश्मीरी पंडितों के कश्मीर पुर्नवास के लिए उनकी सुरक्षा की गारंटी भी ले रहे हैं। परंतु जिन पंडित परिवारों ने अलगाववाद समर्थक उग्रवादियों का आतंक व $कहर देखा है तथा जिनके सामने उनके परिवार के लोग कत्ल किए गए अथवा अपमानित किए गए वे पुन: उन्हीं शक्तियों के किसी भी आश्वासन पर आसानी से यक़ीन करने को तैयार नहीं हैं। इस संदर्भ में एक मज़े की बात यह भी है कि हज़ारों कश्मीरी पंडितों के कश्मीर से विस्थापित होने के बावजूद अभी भी लगभग 560 परिवारों के करीब 3640 लोग कश्मीर घाटी में सुरक्षित तौर पर रह रहे हैं। यह कश्मीरी पंडित भी यह नहीं चाहते कि उनके समाज के लोग किसी अलग टाऊनशिप में रहें। जबकि विस्थापित कश्मीरी पंडितों का एक वर्ग केंद्र सरकार के प्रस्ताव का समर्थन करता हुआ अलग सुरिक्षत टाऊनशिप में रहने का पक्षधर है।

ऐसे वातावरण में यह सोचना भी ज़रूरी है कि कश्मीरी पंडितों की जान व माल की पूरी सुरक्षा के साथ-साथ न सिर्फ कश्मीर बल्कि कश्मीरियत की भी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए। जिन अलगाववादियों की बदसुलूकी व उनके द्वारा की गई खूनरेज़ी व हिंसा के चलते कश्मीरी पंडितों को अपनी व अपने परिवार की जान बचाने के लिए कश्मीर से पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा हो और आज वही कश्मीरी, भारतीय नागरिक होने के बावजूद अपने ही देश में शरणार्थी बनकर अपने बच्चों की परवरिश करने को मजबूर हों उनके दिलों में उन्हीं अलगाववादियों के प्रति विश्वास की भावना आखिर कैसे पैदा हो, यह विषय अलगाववादियों के सोचने का है। दूसरी बात यह भी की कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा के नाम पर प्रस्तावित पंडित बाहुल्य टाऊनशिप से क्या कश्मीर की उस सांझी तहज़ीब को जिसे कश्मीरियत व कश्मीरी तहज़ीब के नाम से जाना गया है, उसे बरकरार रखा जा सकेगा? शम्स फक़ीर जैसे कश्मीरी सूफी-संत जोकि कश्मीर के सभी धर्मों व समुदायों के लोगों के लिए समान रूप से श्रद्धा व आस्था के पात्र थे तथा संयुक्त कश्मीरी तहज़ीब के प्रतीक थे, उनसे व उनके जैसे और भी कई कश्मीरी संतों फकीरों व विभिन्न धर्मों के धर्मस्थलों से प्रेरित सांझी कश्मीरी संस्कृति की सुरक्षा की जा सकेगी? इसी के साथ-साथ एक सवाल यह भी विचारणीय है कि कश्मीर में गत् 4 दशकों से पड़ी भारतीय सेना जिसकी संख्या इस समय एक अनुमान के मुताबिक़ लगभग सात लाख है, क्या कश्मीर के लोगों का भरोसा जीत पाने में सफल रही है? बावजूद इसके कि गत् वर्ष कश्मीर में आई भयानक बाढ़ में भारतीय सेना के जवानों को बाढ़ प्रभावित लोगों ने एक फरिश्ते के रूप में बाढ़ पीड़ितों को बचाते व उनके जान व माल की रक्षा करते हुए देखा, कश्मीरी अवाम क्या उसी भारतीय सेना पर पूरा विश्वास कायम कर पा रही है और यदि नहीं तो क्यों?

इसमें कोई शक नहीं कि भारत की केंद्रीय सत्ता परअब तक शासन करने वाली कांग्रेस सहित दूसरे धर्मनिरपेक्ष दलों के तथा वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की सरकार के एजेंडे तथा इनकी विचारधारा में का$फी अंतर है। इसलिए कश्मीरी पंडितों के लिए अलग टाऊनशिप बनाए जाने का भाजपा सरकार के गृहमंत्री का प्रस्ताव उसकी किसी दूरदर्शी योजना का हिस्सा है, या कश्मीर को दूसरा फि़ लिस्तीन बनाए जाने की कोशिश है अथवा नहीं, इन बातों का उत्तर तो भविष्य के गर्भ मेें छुपा हुआ है। परंतु यदि अलगाववादियों का इस प्रकार का संदेह सही भी है तो भी इसके जि़म्मेदार भी वे स्वयं ही हैं। यदि वे कश्मीर में पंडितों के लिए अलग टाऊनशिप बनाने का विरोध कर रहे हैं तथा उन्हें उन्हीं के पुश्तैनी घरों में वापस बुलाना चाहते हैं तो निश्चित रूप से यह उनकी एक सकारात्मक व सराहनीय सोच ज़रूर है। परंतु इसके लिए उन्हें केवल ज़ुबानी नहीं बल्कि कई रचनात्मक कदम उठाने होंगे। एक तो उनके जान व माल की तथा उनके मान-सम्मान की शत-प्रतिशत सुरक्षा की ज़मानत लेनी होगी। दूसरी बात यह है कि जिन कश्मीरी पंडितों के घरों अथवा उनकी ज़मीनों व बाग-बगीचों पर उग्रवादियों, अलगाववादियों अथवा स्थानीय बाहूबलियों या सरकार द्वारा कब्ज़ा किया गया है, उसे पूरी इज़्ज़त के साथ उनके वारिसों के हवाले करना होगा। इतना ही नहीं, बल्कि जिन कश्मीरी पंडितों के मकानों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया हो, या उन्हें गिरा दिया गया हो उन्हें पुन: निर्मित करने का जि़म्मा भी इन्हीं अलगाववादियों को उठाना होगा। कश्मीरी अलगाववादियों का यदि भारतीय सेना की कश्मीर में तैनाती को लेकर या सेना द्वारा कश्मीर में मारे गए प्रदर्शनकारियों या अन्य बेगुनाह कश्मीरियों की मौत को लेकर किसी प्रकार का विरोध है भी तो वे अपना रोष भारत सरकार अथवा राज्य सरकार पर ज़ाहिर कर सकते हैं और करते भी रहते हैंं। परंतु जिस प्रकार कश्मीर घाटी में अल्प संख्या में रह रहे कश्मीरी पंडितों को अलगाववादियों व इनके समर्थक आतंकियों द्वारा मात्र धर्म के आधार पर सताया जा चुका है उसे किसी भी कीमत पर जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। पाकिस्तान के वर$गलाने पर अथवा अलगाववाद व उग्रवाद का माहौल पैदा करने पर कश्मीर की सुरक्षा की कल्पना करना कतई मुमकिन नहीं है। जब कश्मीर की सांझी तहज़ीब यानी कश्मीरियत बचेगी तभी कश्मीर बच सकेगा।

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