मूर्तिपूजा/शिवलिंगपूजा/तीर्थ पूजा आदि का इतिहास-

ऋषि दयानंद सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं कि यह मूर्त्तिपूजा अढ़ाई तीन सहस्र वर्ष के इधर-इधर वाममार्गी और जैनियों से चली है। प्रथम आर्यावर्त्त में नहीं थी। और ये तीर्थ भी नहीं थे। जब जैनियों ने गिरनार, पालिटाना, शिखर, शत्रुञ्जय और आबू आदि तीर्थ बनाये, उन के अनुकूल इन लोगों ने भी बना लिये। जो कोई इनके आरम्भ की परीक्षा करना चाहें वे पण्डों की पुरानी से पुरानी बही और तांबे के पत्र आदि लेख देखें तो निश्चय हो जायेगा कि ये सब तीर्थ पाँच सौ अथवा सहस्र वर्ष से इधर ही बने हैं। सहस्र वर्ष के उधर का लेख किसी के पास नहीं निकलता, इस से आधुनिक हैं।

हरिद्वार उत्तर पहाड़ों में जाने का एक मार्ग का आरम्भ है। हर की पैड़ी एक स्नान के लिये कुण्ड की सीढ़ियों को बनाया है। सच पूछो तो ‘हाड़पैड़ी’ है क्योंकि देशदेशान्तर के मृतकों के हाड़ उस में पड़ा करते हैं। पाप कभी कहीं नहीं छूट सकते, विना भोगे अथवा नहीं कटते। ‘तपोवन’ जब होगा तब होगा। अब तो ‘भिक्षुकवन’ है। तपोवन में जाने, रहने से तप नहीं होता किन्तु तप तो करने से होता है। क्योंकि वहाँ बहुत से दुकानदार झूठ बोलने वाले भी रहते हैं।

मलेच्छों की फौज ने जब सोमनाथ मन्दिर की मूर्त्ति तोड़ी तब सुनते हैं कि अठारह करोड़ के रत्न निकले। जब पुजारी और पोपों पर कोड़ा पड़े तो रोने लगे। कहा कि कोष बतलाओ। मार के मारे झट बतला दिया। तब सब कोष लूट मार कूट कर पोप और उन के चेलों को ‘गुलाम’ बिगारी बना, पिसना पिसवाया, घास खुदवाया, मल मूत्रादि उठवाया और चना खाने को दिये। हाय! क्यों पत्थर की पूजा कर सत्यानाश को प्राप्त हुए? क्यों परमेश्वर की भक्ति नहीं की?

शुद्ध ज्ञान, शुद्ध कर्म व शुद्ध उपासना का एक ही स्रोत है- वेद।.क्या सत्य है क्या असत्य है,क्या धर्म है क्या अधर्म है,क्या उचित है क्या अनुचित है….ये सब जानने की अन्तिम कसौटी वेद है। ऋषि दयानंद ने सत्यार्थप्रकाश में वेद की शिक्षाओं का सरल भाषा में प्रस्तुत कर मानव जाति पर बड़ा उपकार किया है। ऋषियों के ग्रन्थ ऐसे होते हैं जैसे समुद्र में गोता लगाना और मोती हाथ लगाना जबकि वेद से अनभिज्ञ मनुष्यों के ग्रन्थ ऐसे होते हैं जैसे खोदा पहाड निकली चूहिया।

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