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आज का चिंतन

यदि वेदों के आधार पर देश चलता तो कल्याण होताः आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ”

ओ३म्
-वैदिक साधन आश्रम तपोवन देहरादून के पांच दिवसीय ग्रीष्मोत्सव का समापन समारोह-
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वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून के पांच दिवसीय ग्रीष्मोत्सव के समापन कार्यक्रम में आगरा से पधारे वैदिक विद्वान पं. उमेश चन्द्र कुलश्रेष्ठ जी का व्याख्यान हुआ। उन्होंने कहा कि महर्षि दयानन्द महाभारत युद्ध के बाद भारत में आये। महाभारत के बाद पांच हजार वर्षों और भी अनेक महापुरुष भारत में आये परन्तु इनमें ऐसा कोई महापुरुष नहीं था जिसने धर्म, देश तथा समाज सुधार के सर्वांगीण विषयों पर चिन्तन प्रस्तुत किया हो। महर्षि दयानन्द ने पूरे भारत की पद यात्रा की थी। उन्होंने अनुभव किया था कि जो आर्यावर्त भारत देश वेद, ज्ञानियों और वीरों का था, आखिर उसका पतन क्यों हुआ? इसका प्रमुख कारण था कि देश का ब्राह्मण वर्ग वेद के अध्ययन अध्यापन तथा उस पर आचरण से हट गया था। इस कारण सारे देश एवं विश्व में अज्ञान फैल गया। आचार्य जी ने कहा कि देश में क्षत्रिय वर्ण के लोग राजा होते थे। अतीत में यह राजा ज्ञान का भण्डार हुआ करते थे। महाभारत युद्ध के उत्तर काल में यह अधिकांश सुरा व सुन्दरी में डूब गये। इन राजाओं ने अपने राज्य में वेदों पर आधारित राज्य व्यवस्था को महत्व नहीं दिया। समाज को सत्य ज्ञान देने वाले कोई आचार्य और विद्वान नहीं थे। इसका परिणाम हुआ देश का पतन। महर्षि दयानन्द ने देशवासियों को वेदों की ओर लौटने को कहा। उन्होंने क्षत्रियों का काम राज्य व्यवस्था को वेदों के आधार पर संचालन को बताया। उन्होेंने कोशिश की कि देश वैदिक विचारधारा व मूल्यों के आधार पर चले।

आचार्य जी ने कहा कि वेद और इसकी शिक्षाओं से किसी का विरोध नहीं है। पौराणिक जगत भी वेद को अपौरुषेय मानता है। दक्षिण भारत के लोग भी वेदों के विरोध में नहीं है। आचार्य जी ने कहा कि यदि देश वेदों के आधार पर चलता तो इसका कल्याण होता व अब भी हो सकता है। ऋषि दयानन्द जी ने देश की एक सम्पर्क भाषा होने व उसका अधिकाधिक प्रयोग करने का महत्व बताया। आचार्य जी ने कहा कि एकता का सूत्र पूरे देश में एक भाषा का प्रयोग करना होता है। उन्होंने कहा कि ऋषि दयानन्द ने अपनी प्रमुख पुस्तक ‘‘सत्यार्थप्रकाश” को आर्यभाषा हिन्दी में लिखकर एक क्रान्तिकारी कार्य किया था। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ से हिन्दी भाषा के गद्य साहित्य के विकास में सहायता मिली है। आचार्य जी ने कोलकत्ता में ब्रह्मसमाज के नेता केशव चन्द्र सेन से हुए वार्तालाप का उल्लेख कर बताया कि ऋषि दयानन्द के संस्कृत व्याख्यानों के अनुवादक उनके व्याख्यानों का सही अनुवाद नहीं करते थे। इस विषय में एक बंगाली सज्जन श्री केशवचन्द्र सेन की प्रेरणा से गुजरात में जन्में ऋषि दयानन्द ने आर्यभाषा हिन्दी को अपनाया था। आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने कहा कि आर्यसमाज की सभी संस्थाओं ने हिन्दी भाषा के प्रचार प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान किया है।

आचार्य कुश्रेष्ठ जी ने देश व जातीय उन्नति का तीसरा सूत्र बताते हुए कहा कि ऋषि दयानन्द के समय में देश जन्मना जातिवाद में बंटा हुआ था। आचार्य जी ने श्रोताओं को जातिवाद से होने वाली हानियां बताई। उन्होंने कहा कि जातिवाद से राष्ट्रीय एकता छिन्न-भिन्न होती है। धर्मान्तरण वा मतान्तरण का कारण भी जातिवाद बना। उन्होंने कहा कि करोडों की जनसंख्या वाले विधर्मीं बन्धुओं के पूर्वज हिन्दू वा आर्य थे। छुआछूत, बाहरी आक्रमण आदि अनेक कारणों से वह पूर्वज मुसलमान व ईसाई बने। जातिवाद व इससे उत्पन्न धर्मान्तरण वा मतान्तरण के कारण जनसंख्या असन्तुलन से पाकिस्तान बना। इस बुराई को जानकर ऋषि दयानन्द ने जन्मना जातिवाद को मिटाने की कोशिश की।

आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने बताया कि आर्यसमाज के गुरुकुलों में पढ़े सभी दलित व पिछड़ी जातियों के बच्चे वेदों की शिक्षा प्राप्त करके पण्डित बने व कहलाये। गुरुकुल के यह स्नातक आर्यों व हिन्दुओं के परिवारों में यज्ञ के ब्रह्मा बनकर यज्ञ कराते थे। अब भी कराते हैं। आचार्य जी ने कहा कि आर्यसमाज आजादी के समय तक एक क्रान्तिकारी संस्था थी। ऋषि दयानन्द ने जातिवाद को दूर करने सहित वैदिक वर्णाश्रम-व्यवस्था को पुनर्जीवित करने का प्रयत्न किया। आचार्य जी ने बताया कि आर्यसमाज में सबसे अधिक वानप्रस्थी एवं संन्यासी पिछड़ी जातियों के ही मिलेंगे जिनका समाज के सभी वर्ग आदर करते हैं।

आचार्य जी ने कहा कि ऋषि दयानन्द की यह विशेषता है कि उन्होंने अपनी पूजा नहीं कराई। अन्य मतों के गुरु अपने अनुयायियों से अपनी पूजा कराते हैं। ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज के अनुयायियों के लिए यह नियम बनाया है कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है तथा वेद का पढ़ना व पढ़ाना तथा सुनना व सुनाना सब आर्यों (वा मनुष्यों) का परम धर्म है। आचार्य जी ने कहा कि महर्षि दयानन्द ने सब मनुष्यों को वेद तथा परमात्मा से जोड़ा। परमात्मा मनुष्य व सभी प्राणियों की आत्मा के भीतर व्यापक एवं सर्वान्तर्यामीस्वरूप से विद्यमान है। आचार्य जी ने परमात्मा और आत्मा का व्याप्य-व्यापक संबंध बताया। अपने व्याख्यान को विराम देते हुए आचार्य जी ने कहा कि ऋषि दयानन्द ने ऐसे अनेक कार्य किये जिससे धर्म व संस्कृति को लाभ पहुंचा है।

समापन समारोह में डा. वागीश आर्य, आचार्य आशीष दर्शनाचार्य, स्वामी योगेश्वरानन्द सरस्वती, डा. रूपकिशोर शास्त्री कुलपति गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार, आचार्या डा. अन्नपूर्णा जी, डा. सुखदा सोलंकी जी, श्री विश्वपाल जयन्त, श्रीमती इन्दुबाला जी, श्री गोविन्द सिंह भण्डारी जी, पद्मश्री डा. बीकेएस संजय जी आदि विद्वानों के सम्बोधन हुए। श्री कुलदीप आर्य, श्री रुवेल सिंह आर्य तथा श्री रमेशचन्द्र स्नेही आदि भजनोपदेशकों के गीत व भजन भी हुए। समारोह में ऋग्वेद पर काव्यार्थ कर रहे ऋषिभक्त कवि श्री वीरेन्द्र राजपूत जी के ऋग्वेद-काव्यार्थ के प्रथम दशांश का लोकार्पण भी सम्पन्न किया गया। आश्रम का ग्रीष्मोत्सव सोल्लास सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। पांच दिवसीय उत्सव में स्वामी चित्तेश्वरानन्द जी द्वारा प्रातः योग एवं ध्यान का प्रशिक्षण दिया जाता रहा। इस अवसर पर आश्रम में अथर्ववेद पारायण यज्ञ हुआ जिसके ब्रह्मा स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी ही थे। आचार्या प्रज्ञा जी भी यज्ञ में विद्यमान रही और उन्होंने अपने भक्तिरस से पूर्ण उपदेशों से धर्मप्रेमी जनता को ईश्वर की उपासना के लाभ बताये। पं. सूरत राम शर्मा जी ने अथर्ववेद पारायण यज्ञ का संचालन किया। देहरादून के गुरुकल पौंधा के दो ब्रह्मचारियों ने यज्ञ में मन्त्रोच्चार किया जिससे आश्रम का सारा वातावरण ईश्वरमय व भक्तिरस से पूर्ण हो गया। आश्रम के प्रधान श्री विजय आर्य तथा मंत्री श्री प्रेम प्रकाश शर्मा जी ने आश्रम में पधारे सभी विद्वानों एवं अतिथियों का उत्सव में पधारने के लिए धन्यवाद किया। इस भव्य उत्सव को आयोजित करने के आश्रम के सभी अधिकारियोंको हार्दिक बधाई एवं धन्यवाद। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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