आकर्षण का केंद्र है कोहिनूर टॉय ट्रेन

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डॉ. प्रभात कुमार सिंघल

भारत के पर्वतीय स्थलों को हर किसी का सपना होता हैं। जब भी इनकी यात्राओं का कार्यक्रम बनता है मन में रोमांस की हिलोरें उठने लगती हैं। ऊँचे-ऊँचे हरे-भरे पर्वत, पेड़-पौधे, झील,झरने, वन्यजीव से सरोबार वादियां-घाटियां, हॉर्स राइडिंग,माउंटेन बाइकिंग, ट्रेकिंग,बोटिंग चाय एवं कॉफी के बागान , सूर्योदय एवं सूर्यास्त के दृश्य न जाने कैसी-कैसी कल्पनाएं कर रोमांच अनुभव करने लगते हैं। ऐसे कल्पनाओं के बीच पता चले कि वहाँ पर्वतीय टॉय ट्रेन की सवारी भी करेंगे तो कहना ही क्या !
ऐसे चित्ताकर्षक पर्वतीय नजारों से पर्यटकों का मनोरंजन कर उनकी यात्रा को यादगार बनाने के लिए भारतीय रेलवे घाटा उठा कर भी देश के पांच नैरो गेज पर्वतीय स्टेशनों पर टॉय ट्रेनें अर्थात खिलौना रेलगाड़ी चला रहा है। सुरम्य पहाड़ी इलाकों में बहुत कम गति के साथ ज़िग-ज़ैग मार्गों से यात्रा से लनियों को भरपूर आनन्द प्राप्त होता है।
भारतीय पवतीय रेलवे के खिलौना ट्रेनों की चर्चा कर रहें हैं तो बतादें देश की पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग हिमालयी रेलवे को 1881 में, तमिलनाडु में नीलगिरि पर्वतीय रेलवे को 1908 में एवं हिमाचल प्रदेश में कालका शिमला रेलवे को 1903 में, पठानकोट-जोगिंदर रेलवे को1929 में और नेरल-माथेरान रेलवे को 1907 में यातायात के लिए शुरू किया गया था। इनके महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है कि यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने पर्वतीय रेलवे के अंतर्गत दार्जिलिंग हिमालयी रेलवे को 1999 में, नीलगिरि पर्वतीय रेलवे को 2005 में और कालका-शिमला रेलवे को 2008 में विश्व विरासत स्थल का दर्जा प्रदान किया गया था। रेल पर्यटन के मुकुट पर असली कोहिनूर हैं ये पांच टाय ट्रेन।
दार्जलिंग हिमालयी टाय ट्रेन
पश्चिम बंगाल की दार्जलिंग हिमालयी रेलवे टाय ट्रैन भारत में पहाड़ी यात्री रेल सेवा का पहला अद्भुत उदाहरण है। इसका निर्माण कार्य सर एशले ईडन (तब पश्चिम बंगाल सरकार के लेफ्टिनेंट गवर्नर) के अनुरोध पर नियुक्त एक समिति और फ्रेंकलिन प्रेस्टेज (पूर्वी बंगाल रेलवे कंपनी के एजेंट) की सिफारिशों द्वारा शुरू किया गया था। इसका निर्माण 1879 और 1881 के मध्य किया गया । इसकी शुरूआत 1881 में दार्जिलिंग स्टीम ट्रामवे कंपनी द्वारा की गई जिसका नाम 15 सितंबर, 1881बदलकर दार्जिलिंग हिमालयी रेलवे कंपनी रख दिया गया। दार्जिलिंग हिमालयी रेलवे कंपनी को 20 अक्टूबर, 1948 को भारत सरकार द्वारा अधिग्रहित कर लिया गया।
रेलवे मार्ग का घूम स्टेशन सबसे ऊँचा स्टेशन है जिसकी ऊँचाई 7,407 फुट है और भारत का सबसे ऊँचा रेलवे स्टेशन है। एक से बढ़ कर एक मनमोहक स्टेशन 88 किमी लम्बी 2 फीट नरो गेज रेल लाइन पर हैं। पहले न्यूजलपाईगुड़ी से सिलीगुड़ी टाउन, सिलीगुड़ी जंक्शन, सुकना, रंगटंग, तिनधरिया, गयाबाड़ी, महानदी, कुर्सियांग, टुंग, सोनादा, घूम और आखिरी स्टेशन दार्जिलिंग के सौंदर्य को पर्यटक अपलक निहारते रह जाते हैं। करीब 20 किमी की रफ्तार से चलने वाली खिलौना गाड़ी से सात घंटे के समय में पर्वतीय सौंदर्य का रसास्वादन करते हुए सेलनी जब 100 मीटर ऊंचे जलपाईगुड़ी से 2,200 मीटर तक ऊंचाई पर दार्जलिंग की यात्रा करते हैं, इस आंनद को वे जीवन भर नहीं भूल पाते हैं। इस मार्ग पर विभिन्न स्टेशनों से कई टॉय ट्रेनें जैसे दार्जिलिंग से घूम के बीच टॉय ट्रेन, टॉय ट्रेन जॉयराइड एवं सिलीगुड़ी से रंगटोंग तक टाय ट्रेन चलाई जाती हैं। बतादें ऑस्ट्रियाई आल्प्स के बाद, डीएचआर विश्व की दूसरी रेलवे प्रणाली है जिसे विश्व विरासत का दर्जा दिया गया है।
यह जानकर विचित्र सा लगता है कि पर्यटकों में लोकप्रिय इस रेल मार्ग का निर्माण अंग्रेजों ने सन् 1882 में ईस्ट इंडिया कंपनी के मजदूरों को पहाड़ों तक पहुंचाने के लिए किया था। उस समय आज जैसा दार्जलिंग नहीं था वरण एक सौ लोगों की आबादी ,20 झोंपड़ियां, 100 लोगों की आबादी ,मोनेस्ट्री एवं ऑब्जर्वेटरी हिल ही सब कुछ था।आज का नजारा पूरी तरह बदल चुका है। दार्जिलिंग हिमालयी रेलवे 19वीं सदी के प्रारंभ में हिल स्टेशनों की रानी के रूप में दार्जिलिंग के विकास और भारत के मुख्य चाय उगाने वाले क्षेत्रों के साथ घनिष्ठता के साथ जुड़ा हुआ है। दर्जिलिंग, जो अब घने वृक्ष युक्त पर्वतीय क्षेत्र है पहले सिक्कि का ही भाग था। इसको 1835 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा अपने सैनिकों के लिए विश्राम स्थल और स्वास्थ्य लाभ केन्द्र के रूप में चुना गया था। उन्होंने इस को सिक्किम से पट्टे पर लिया और हिल स्टेशन का निर्माण कार्य शुरू किया था। तब सड़क मार्ग से मैदानी इलाकों को जोड़ा गया था।
सन् 1878 में पूर्वी बंगाल रेलवे ने सिलीगुड़ी से स्टीम रेलवे के लिए एक विस्तृत प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जो पहले से ही कलकत्ता से दार्जिलिंग तक जुड़ा हुआ था। इसे सरकारी अनुमोदन प्राप्त होने पर निर्माण कार्य शुरू हुआ और 1881 तक यह पूरा हो गया था। वर्ष 1958 के बाद से इसका प्रबंधन सरकार के अधीन पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे द्वारा किया जा रहा है। इस रेलवे का मुख्यालय कुर्सियांग शहर में है।
नीलगिरी माउन्टेन टॉय ट्रेन
तमिलनाडु में नीलगिरी माउन्टेन खिलौना गाड़ी कन्नूर से ऊटी तक 46 किमी लंबा एक सिंगल ट्रैक है जोकि मेट्टुपालयम शहर को उटकमंडलम (ओटाकामुंड) शहर से जोड़ता है।
इस टॉय ट्रेन से यात्रा करना अपने आपमें सुखद अनुभव होता है। मीलों-मील फैली हरयाली और खूबसूरत पहाड़ी के दृश्य मन मोह लेते हैं। रेल की बोगी नीले रंग की एवं बड़ी-बड़ी खिड़कियों होने की वजह से नीलगिरी माउन्टेन रेल कहलाती है। यह बीच के छः स्टेशनों का सफर तय करती है। स्टेशन भी अपने आप में दर्शनीय हैं। ट्रेन जब रेल लाइन के 260 पुलों,16 सुरंगों और 208 मोड़ों से हो कर गुजरती है और चढ़ाई पर जाते समय 4.9 घंटे और आते समय 3.9 घाटे की यात्रा में पर्यटकों के आंनद और आश्चर्य की सीमा नहीं रहती। यह खूबसूरत पर्वतीय यात्रा मेट्टुपालयम(कोयंबटूर) से प्रारम्भ होती है एवं 8 किमी पर कालर, 13 किमी पर एडर्ली ,18 किमी पर हिलग्रोव , 21 किमी पर रनीमीड ,25 किमी पर कटेरी रोड, 28 किमी पर कुन्नूर, 29 किमी पर वेलिंग्टन ,32 किमी परअरुवंकाडु, 38 किमी पर केत्ति, 42 किमी पर पट लवडेल एवं 46 किमी पर अंतिम स्टेशन उदगमंडलम आते हैं। नीलगिरि रेल प्रणाली को अद्वितीय माना जाता है क्योंकि यह एशिया की सबसे खड़ी रेल प्रणाली है।
नीलगिरि पर्वतीय रेल, भारत के राज्य तमिलनाडु में स्थित एक रेल प्रणाली है, जिसे 1908 में ब्रिटिश राज के दौरान बनाया गया था। शुरूआत में इसका संचालन मद्रास रेलवे द्वारा किया जाता था। इस रेलवे का परिचालन आज भी भाप इंजनों द्वारा किया जाता है। नीलगिरि पर्वतीय रेल, नवगठित सलेम मंडल के अधिकार क्षेत्र में आता है। दिलचस्प होगा यह जानना कि शाहरुख़ खान द्वारा अभिनीत हिंदी फिल्म ” दिल से” के प्रसिद्ध हिंदी गीत छैंया छैंया का फिल्मांकन इसी रेलवे की रेलगाड़ी की छत पर किया गया था।
कालका-शिमला खिलौना गाड़ी
हिमाचल प्रदेश में कालका -शिमला पर्वतीय रेल की यात्रा में पर्वतीय एवं प्राकृतिक सौन्दर्य को देखने का अपना ही आनन्द है। समुद्रतल से 656 मीटर ऊँचाई पर जब रेल कालका को छोड़ती है तो शिवालिक की घुमावदार पहाड़ी रास्ते से गुजरकर 2076 मीटर ऊँचाई पर स्थित शिमला तक जाती है। रेल मार्ग में 20 रेलवे स्टेशन, 103 लम्बी सुरंगे, 869 पुल एवं 919 घुमाव से देवदार और ओक के पेड़ों की हरी-भरी घाटियों के बीच प्राकृतिक सौंदर्य से श्रृंगारित राजसी हिमालय को देखने का आंनद वहीं महसूस कर सकता है जिसने इस यात्रा का सुख लिया है। इस टॉय ट्रेन में लगभग सात कोच हैं और एक बार में लगभग 200 यात्रियों ही बैठ सकते हैं। दो फीट एवं छह इंच नैरोगेज पर 9 नवम्बर 1903 यह रेलवे लाईन आज तक निरन्तर चल रही है।
इस रेलवे लाईन पर शिमला की ओर से जाने पर 7 कि.मी. दूरी पर समर हिल एक खूबसूरत स्थान है। पेड़ों से घिरे इस स्थान का वातावरण अत्यन्त शांत एवं स्वच्छ है। समीप ही चौडविक जल प्रपात में 67 फीट ऊँचाई से गिरता हुआ झरना मनमोहक लगता है। यहीं पर भगवान हनुमान जी का मंदिर भी बना है। शिमला से 11 कि.मी. दूरी पर तारा देवी मंदिर दर्शनीय स्थल है। अंग्रेजों ने हिमाचल के किन्नौर जिले के कल्पा में इस रेल ट्रैक को बनाने का प्लान बनाया था। पहले यह रेल ट्रैक कालका से किन्नौर तक पहुंचाया जाना था, लेकिन बाद में इसे शिमला लाकर पूरा किया गया।
भले ही इस ट्रैक को महत्व की वजह से वर्ल्ड हैरिटेज का दर्जा मिल गया है, लेकिन 105 वर्ष पुराने इस ट्रैक पर कई खामियां भी हैं। इस ट्रैक पर बने कई पुल कई जगह इतने जर्जर हो चुके हैं कि स्वयं रेलवे को खतरा लिखकर चेतावनी देनी पड़ रही है। ऐसे असुरक्षित पुलों पर ट्रेन निर्धारित गति 25 किमी प्रतिघंटा की जगह 20 किमी प्रतिघंटा की गति से चलती है।
इस रेलमार्ग को 9 नवंबर, 1903 को यातायात के लिए खोल दिया गया था। भारतीय युद्ध विभाग द्वारा निर्धारित मानंदड़ो का पालन करते हुए सन् 1905 में इस लाइन को 2 फीट 6 इंच (762 मिमी) का किया गया। इस रेलवे को 1 जनवरी 1906 को सरकार द्वारा इसके निर्माता कंपनी से 1.71 करोड़ रुपये में खरीद लिया। प्रतिदिन लगभग डेढ़ हजार यात्री चलते हैं इस ट्रैक पर कालका-शिमला रेलमार्ग पर सामान्य सीजन में लगभग डेढ़ हजार यात्री यात्रा करते हैं, जबकि पीक सीजन मे यह आंकड़ा दुगुना हो जाता है।’ रेल तथ्य और करतब ‘ पर गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड में कालका-शिमला रेलवे को भारत में सबसे बड़ी नैरो गेज इंजीनियरिंग उपलब्धि के रूप में शामिल किया गया है।
नेरल-माथेरान टाय ट्रेन
माथेरान रेलवे नेरल को जोड़ता है, जो मुंबई-पूना मार्ग पर स्थित है। माथेरान के खूबसूरत हिल स्टेशन से डेढ़ घंटे की अवधि में तय किया गया सफ़र क्षेत्र के सुंदर प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर और चित्ताकर्षक है। महाराष्ट्र की विरासत माथेरान हिल रेलवे को 1901 और 1907 के बीच अब्दुल हुसैन आदमजी पीरभॉय द्वारा निर्मित किया गया था। यह 20 किमी का सफ़र तय कर मुंबई के पास पश्चिमी घाट की पहाड़ी में नेरल को माथेरान से जोड़ता है।करीब 2650 किमी ऊंचाई पर स्थित रेल मार्ग पर 121 छोटे -छोटे पुल और करीब 221 मोड़ आते हैं। इस मार्ग पर चलने वाली ट्रेन की स्पीड 20 किलोमीटर प्रति घंटे रहने से पर्यटक खूबसूरत नजारे का आनंद ले सकते हैं।
दो फीट की नैरो गेज रेल मार्ग को भविष्य के विश्व धरोहर स्थल के रूप में प्रचारित किया जा रहा है।
कांगड़ा वैली टाय ट्रेन
पहाड़ियों और घाटियों के मध्य सुंदर प्राकृतिक दृश्यों के साथ कांगड़ा टॉय ट्रेन पठानकोट और जोगिंदर नगर को जोड़ती है। कांगड़ा घाटी, किनारों पर पहाड़ियों, नदियों और धौलाधार श्रेणी के सुंदर दृश्य दिखाई देते हैं। यह पुराने कांगड़ा किले के खंडहरों को पार करता है।
पालमपुर के कई पुलों और चाय बगानों से होकर गुजरने वाली टॉय ट्रेन पठानकोट जंक्शन से होकर ज्वालामुखी रोड, कांगड़ा नगरोटा, पालमपुर, बैजनाथ से होकर जोगिंद्रनगर तक के मार्ग पर चलती है। ऐसे रमणिक पर्वतीय रेल मार्ग का कार्य 1926 में शुरू हुआ था और तीन साल बाद 63 किमी के इस मार्ग को यातायात के लिए खोल दिया गया। कांगड़ा टॉय ट्रेन 250 फीट और 1,000 फीट लंबी दो सुरंगों से गुजरती हैै। इस रेलवे ट्रैक पर अहजू स्टेशन समुद्र तल से 1,290 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

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