कश्मीरी आतंकवाद : अध्याय 5 कश्मीर के कर्कोट, उत्पल और लोहर राजवंश – 3

संग्रामराज और रानी दिद्दा

रानी ने अपने जीवन काल में ही अपने भाई लोहर के शासक उदयराज के पुत्र संग्रामराज को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर उसे राज्य सिंहासन सौंप दिया था। जिसने रानी के पश्चात एक स्वतंत्र शासक के रूप में कार्य करना आरंभ किया। संग्रामराज नाम के इसी शासक ने लोहर वंश की स्थापना की थी।
संग्राम राज ने 1003 ईस्वी से 1028 ई0 तक शासन किया था। इसी के शासनकाल में 1015 ई0 में महमूद गजनवी का आक्रमण हुआ था। दोनों के बीच घनघोर युद्ध हुआ, जिसमें महमूद गजनवी को पराजित होकर भागना पड़ा था।

संग्राम राज और महमूद गजनवी

संग्रामराज ने अपने सेनापति तुंग के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजकर तौसी के मैदान में महमूद गजनवी को पराजय का स्वाद चखाया था। कहा जाता है कि इस युद्ध में महमूद गजनवी को इतनी अधिक सैनिक हानि हुई थी कि सारा मैदान उसके सैनिकों के शवों से भर गया था। अंत में महमूद गजनवी को मैदान छोड़कर भागना पड़ा था। ‘कैंब्रिज हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ में इस युद्ध के विषय में लिखा गया है कि :- ‘भारत में महमूद की यह पहली बड़ी पराजय थी। उसकी सेना अपरिचित पहाड़ी मार्गों पर रास्ता भूल गई और उसका पीछे मुड़ने का मार्ग बाढ़ के पानी ने रोक लिया परंतु अत्यधिक प्राणहानि के पश्चात यह सेना मैदानी क्षेत्रों में भागी और अस्त-व्यस्त हालत में गजनी तक पहुंच सकी।”
महमूद गजनवी ने 1021 ई0 में फिर से कश्मीर पर आक्रमण किया। इस बार भी उसने लोहकोट के किले पर ही आकर पड़ाव डाला। काबुल के राजा त्रिलोचनपाल ने उसका घेराव कर उसे युद्ध में खदेड़ना आरंभ कर दिया। जैसे ही इस घटना की जानकारी संग्रामराज को हुई तो उसने भी तुरंत अपनी एक बड़ी सेना त्रिलोचनपाल की सहायता के लिए भेज दी। दोनों राजाओं की संयुक्त सेना के प्रबल प्रहार के चलते महमूद गजनवी को एक बार फिर से युद्ध में करारी पराजय का सामना करना पड़ा। भारत के पराक्रमी पौरुष ने विदेशी आक्रमणकारी को यह बता दिया कि वह जितनी बार भी कश्मीर की धरती पर आएगा उतनी ही बार उसे पराजय का सामना करना पड़ेगा। बहुत ही अपमानित होकर महमूद गजनवी अपने देश पहुंचा।
मुस्लिम इतिहासकार नदीम ने महमूद गजनी के बारे में लिखा है :- “महमूद गजनवी ने अपनी पिछली पराजय का बदला लेने और अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने हेतु 1021 ईस्वी में कश्मीर पर पुराने रास्ते से ही फिर आक्रमण किया। परंतु फिर लोहकोट के किले ने उसका रास्ता रोक लिया। एक मास की असफल किलेबंदी के बाद बर्बादी की संभावना से डरकर महमूद ने दुम दबाकर भाग जाने में कुशलता समझी। इस पराजय से उसे कश्मीर राज्य की अजेय शक्ति का आभास हो गया और कश्मीर को हस्तगत करने का इरादा उसने सदा- सदा के लिए त्याग दिया।”

संग्रामराज और राजा त्रिलोचनपाल

राजा आनंदपाल के सुपुत्र त्रिलोचनपाल की सहायता इस समय संग्रामराज के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो गई थी । यदि राजा त्रिलोचनपाल की ओर से उसे समय पर सहायता नहीं मिलती तो परिणाम उल्टा भी हो सकता था। इसलिए हमें संग्रामराज की शूरवीरता और पराक्रमी युद्ध नीति के साथ-साथ त्रिलोचनपाल के राष्ट्रीय विचारों का भी सम्मान करना चाहिए। त्रिलोचनपाल अपने पिता की भांति ही शूरवीर और राष्ट्रवादी चिंतन का धनी था। विदेशी आक्रमणकारी महमूद गजनवी को मां भारती की ओर कुदृष्टि के साथ बढ़ते देखकर उसका खून खौल उठा था। यही कारण था कि उसने बिना किसी देरी के सही समय पर शत्रु का सामना करने के लिए अपने आपको अपनी सेना के सहित भारत माता की सेवा में समर्पित कर दिया। जिसका लाभ संग्रामराज को प्राप्त हुआ और अंतिम लाभ मां भारती को मिला। जिसका सम्मान बचाने में हमारे इन दोनों शूरवीरों ने उस समय अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। त्रिलोचनपाल के इस महान कार्य से हमें यह पता चलता है कि यदि उसके भीतर कश्मीर को बचाने की इतनी उत्कट और प्रबल इच्छा थी तो अफगानिस्तान की हिंदू संस्कृति को बचाने के लिए भी उसने और उसके पूर्वजों ने उस समय कितना बल लगाया होगा ? इसलिए त्रिलोचनपाल जैसे शूरपुत्रों को भारत के इतिहास का गौरव माना जाना चाहिए। मां भारती ऐसे सच्चे सपूतों के इतिहास को हमें इसी दृष्टिकोण और भावना के साथ पढ़ना चाहिए।
संग्राम राज की मृत्यु के उपरांत उसके पुत्र हर्ष ने कश्मीर के शासन की बागडोर संभाली। उसने 21 वर्ष तक कश्मीर पर राज्य किया । यह एक अदूरदर्शी राजा सिद्ध हुआ। क्योंकि इसने अपनी मूर्खताओं के चलते मुस्लिमों को कश्मीर की सेना में प्रवेश दिला दिया । उसके इस प्रकार के निर्णय ने कश्मीर के इतिहास को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके पश्चात कश्मीर में एक नए प्रकार का संघर्ष आरंभ हुआ। जो किसी न किसी रूप में आज तक जारी है।
1128 से लेकर 1150 ईस्वी तक कश्मीर पर राजा जयसिंह का शासन रहा । वह एक दृढ़ निश्चयी शासक था। जिसने कितनी ही कठिनाइयों और संघर्षों का सफलतापूर्वक सामना किया।

राजा सहदेव और मुस्लिमों का प्रवेश

इसके पश्चात कश्मीर पर कई राजाओं का राज रहा जिन्होंने ऐसा कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं किया जिससे उनका गुणगान किया सके। 1301 ई0 में जाकर कश्मीर की गद्दी पर सहदेव नाम का शासक विराजमान हुआ। सहदेव ने भी हर्ष की मूर्खता को दोहराया और प्रशासन में विदेशी आक्रमणकारियों की संतानों को या लोगों को प्रवेश करने की खुली छूट दे दी।
इस शासक के समय में तुर्किस्तान से एक मुस्लिम सरदार शाहमीर आया। जबकि तिब्बत से एक रिंचन नामक राजकुमार आया था। तिब्बत का यह राजकुमार अपने देश से रुष्ट होकर आया था।
इतिहासकार हसन ने ‘हिस्ट्री ऑफ कश्मीर’ में लिखा है कि :- ‘सहदेव के शासनकाल में तातार सेनापति डुलचू ने 70,000 शक्तिशाली सैनिकों की सेना के साथ कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। अपने राज्य को क्रूर हमलावर की दया पर छोड़कर सहदेव किश्तवाड़ की ओर भाग गया। डुलचू ने हत्याकांड का आदेश दे दिया। हजारों लोग मार डाले गए। उससे भी अधिक लोग साथ आए तातार व्यापारियों के हाथों गुलामों के रूप में बेच दिए गए। कस्बों को आग लगा दी गई। खड़ी फसलें नष्ट कर दी गईं। यहां 8 महीने रहने के बाद डुलचू 50,000 ब्राह्मणों को दास बना कर ले गया । परंतु देवसर दर्रा पार करते हुए बर्फानी तूफान से उसकी सारी सेना और दास नष्ट हो गए।’
कश्मीर के अभी तक के इतिहास में ऐसी हिंसा अबसे पहले कभी नहीं देखी गई थी । लोगों ने इस कत्लेआम को अपनी आंखों से देखा तो वह दंग रह गए । क्योंकि किसी भी विदेशी हमलावर ने अबसे पहले ऐसा आतंक नहीं मचाया था। दुर्बल शासक के कारण कश्मीर के लोगों को ऐसे दुर्दिन देखने पड़े। इसी दुर्बल शासक सहदेव के समय में आये शाहमीर ने आगे चलकर ऐसे गुल खिलाए कि यहां पर धीरे-धीरे मुस्लिम जनसंख्या बढ़ने लगी। वैदिक संस्कृति का विनाश करने के लिए विदेशी मजहब की गंदी हवा कश्मीर के केसर की क्यारियों में यहीं से प्रवेश करने में सफल हुई ।जिसने केसर को दुर्गंधयुक्त कर दिया। आज बहुत लोग हैं जो कश्मीर की वैदिक संस्कृति के स्थान पर ‘गंगा जमुनी तहजीब’ की बातें करते देखे जाते हैं। यह लोग नहीं जानते कि वैदिक संस्कृति और आज की तथाकथित ‘गंगा जमुनी तहजीब’ में कितना अंतर है ? और यदि जानते हैं तो जानबूझकर मुस्लिम तुष्टिकरण करते हुए ‘गंगा जमुनी तहजीब’ नाम की काल्पनिक सभ्यता व संस्कृति को प्राथमिकता देते हैं। ऐसा मानने वाले लोग वही हैं जिन्होंने कश्मीर को बर्बाद करके रख दिया है। यह तथाकथित ‘गंगा जमुनी संस्कृति’ की अवधारणा भी वही अवधारणा है जो कश्मीर को नर्क बनाने में सफल रही है।
तिब्बत से भागकर आया राजकुमार रिंचन भी कश्मीर के लिए काल सिद्ध हुआ। उसे सहदेव ने प्रशासन में उच्च पद पर आसीन कर दिया था। जब सहदेव के बाद सेनापति रामचंद्र ने शासन पर अपना अधिकार जमाया तो अपने राजनीतिक चातुर्य से उसे भी सत्ता से हटाने में रिंचन सफल हो गया। यद्यपि उसके इस प्रकार के कार्य का कश्मीर की जनता ने विरोध किया। परंतु उसने रामचंद्र की पुत्री कोटा रानी से विवाह कर लिया । जिससे लोग शांत हो गए। कोटा रानी के कहने से उसने बौद्ध धर्म से हिंदू धर्म को स्वीकार कर लिया गया। ब्राह्मणों ने उसके हिंदू धर्म के स्वीकार करने को मान्यता प्रदान नहीं की। जिससे वह रुष्ट होकर मुसलमान बन गया। कश्मीर के इतिहास में वही पहला शासक था जो मलिक सदरुउद्दीन के नाम से कश्मीर का राजा बना।

डॉक्टर राकेश कुमार आर्य
संपादक उगता भारत

Comment: